नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (5 जून) को असम की चार महिलाओं को देश से बाहर भेजने (निर्वासन) पर रोक लगा दी. राज्य के एक विशेष ‘फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल’ ने पहले यह आदेश दिया था कि वे बांग्लादेश से आई अवैध प्रवासी हैं.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने अधिकारियों को 16 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. कोर्ट ने प्रतिवादियों को चार हफ़्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का भी निर्देश दिया.
पीठ ने सरभानु बेगम, सलेहा खातून, बसिराम नेसा और मुस्त नुरेज़ा बेगम द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र, असम सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किए.
इन महिलाओं ने असम के स्पेशल फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और गौहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को चुनौती दी थी, जिनमें ट्रिब्यूनल की इस बात पर मुहर लगाई गई थी कि वे देश में अवैध रूप से दाखिल हुई थीं और उन्हें वापस भेजा जाना चाहिए.
जस्टिस नाथ ने चारों मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए जोड़ते हुए कहा, ‘नोटिस जारी करें, जिसका जवाब 16 जुलाई 2026 तक आना चाहिए. इस बीच, आज जैसी स्थिति है, वैसी ही बनी रहेगी. अगर याचिकाकर्ता हिरासत में हैं, तो उन्हें अगली सुनवाई की तारीख, यानी 16 जुलाई 2026 तक देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा.’
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जन्म से भारतीय नागरिक होने के बावजूद उन्हें कई सालों से डिटेंशन सेंटर में रखा गया है.
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनका जन्म भारतीय माता-पिता के घर हुआ था और वे जन्म से ही भारत में रह रही हैं. महिलाओं ने कहा कि उनके नाम वोटर लिस्ट और अन्य सरकारी रिकॉर्ड में शामिल हैं.
महिलाओं का दावा है कि इसके बावजूद उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया और देश से बाहर भेजने का आदेश दिया गया, क्योंकि उनकी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पेश किए गए दस्तावेजों में कथित तौर पर कुछ कमियां और विसंगतियां थीं.
अरुणाचल: अनधिकृत बसावट की चिंताओं के चलते कथित 15 अवैध मस्जिदें सील की गईं
अरुणाचल प्रदेश सरकार ने ईटानगर राजधानी क्षेत्र में 15 मस्जिद स्थलों को सील कर दिया है. स्थानीय खबरों के अनुसार, एक प्रशासनिक जांच में पाया गया कि ये बिना ज़रूरी मंज़ूरी के चल रही थीं.
यह कार्रवाई ‘अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गनाइज़ेशन’ (एपीआईवाईओ) के लगातार विरोध-प्रदर्शनों और लामबंदी के बाद हुई है. यह संगठन राज्य के कुछ हिस्सों में कथित अनधिकृत इमारतों और बसावट के तरीकों को लेकर चिंता जताता रहा है.

संगठन ने पहले आंदोलन के कार्यक्रमों की घोषणा की थी, जिसमें राजधानी क्षेत्र में बंद का आह्वान भी शामिल था. साथ ही, उन्होंने आदिवासी हितों के लिए बढ़ती चुनौती बताते हुए सरकार से दखल देने की मांग की थी.
राज्य सरकार के प्रवक्ता और शिक्षा मंत्री पीडी सोना ने कहा कि इस मुद्दे को इस वर्ष की शुरुआत में औपचारिक रूप से सरकार के समक्ष उठाया गया था. उस समय एपीआईवाईओ के प्रतिनिधियों और मुख्यमंत्री पेमा खांडू के बीच चर्चा हुई थी.
इसके बाद जिला प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वे उन धार्मिक ढांचों की स्थिति की जांच करें जो कथित रूप से जरूरी सरकारी अनुमति के बिना संचालित हो रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अधिकारियों द्वारा किए गए सत्यापन अभियान में कैपिटल कॉम्प्लेक्स क्षेत्र के भीतर 15 मस्जिद स्थलों की पहचान की गई, जिन्हें अनधिकृत पाया गया.
सरकार के अनुसार, सीलिंग और अन्य प्रवर्तन संबंधी कार्रवाई करने से पहले सभी मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया.
अधिकारियों ने अधिकांश मामलों में कानूनी जांच और प्रशासनिक कार्यवाही पूरी करने के बाद सीलिंग और बेदखली से संबंधित कदम उठाए. बाकी मामलों की अलग से समीक्षा की गई और बाद में उन पर भी समान कार्रवाई शुरू की गई.
पीडी सोना ने कहा कि प्रशासन ने स्वदेशी संगठनों द्वारा उठाई गई चिंताओं का समाधान कानूनी और प्रशासनिक माध्यमों से किया है और उम्मीद जताई कि अब आगे किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.
अरुणाचल: क्रिश्चियन फोरम ने सरकार को धर्मांतरण विरोधी क़ानून के नियम बनाने का काम रोकने का आग्रह किया
अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (एसीएफ), जो राज्य का सबसे बड़ा ईसाई संगठन है, ने राज्य की भाजपा-नीत सरकार को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है.
फोरम ने मांग की है कि ‘अरुणाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम’ (एपीएफआरए) के तहत नियम बनाने और उन्हें अधिसूचित करने की चल रही प्रक्रिया को तुरंत रोक दिया जाए.

एपीएफआरए को 1978 में पेश किया गया था, लेकिन इसे कभी लागू नहीं किया गया. सितंबर 2024 में गौहाटी हाईकोर्ट ने अरुणाचल सरकार को निर्देश दिया था कि वह इस अधिनियम के नियम बनाए और उन्हें अधिसूचित करे.
मुख्यमंत्री पेमा खांडू को सौंपे गए एक ज्ञापन में फोरम ने कहा कि राज्य का ईसाई समुदाय नियमों को बनाकर इस अधिनियम को लागू करने की प्रक्रिया को लेकर बहुत चिंतित है. फोरम का मानना है कि इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जिससे संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सद्भाव और लोगों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बुरा असर पड़ सकता है.
एसीएफ ने कहा, ‘एपीएफआरए, 1978 पर बनी उच्च-स्तरीय समिति द्वारा उठाया गया मौजूदा कदम, जो बिना किसी पर्याप्त जन-परामर्श के उठाया गया है, उसने आबादी के एक बड़े हिस्से में व्यापक आशंका और असंतोष पैदा कर दिया है.’
फोरम ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि विभिन्न संगठनों – जिनमें धार्मिक संस्थाएं और आम नागरिक भी शामिल हैं – द्वारा की गई अपीलों के बावजूद राज्य सरकार इस मामले पर आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित दिखाई देती है.
एसीएफ ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘व्यापक आम सहमति और सभी संबंधित पक्षों के साथ सार्थक परामर्श के बिना उठाया गया ऐसा कदम राज्य के भीतर अनावश्यक तनाव और अशांति पैदा कर सकता है.’ फोरम ने मांग की कि इस पूरी प्रक्रिया को तुरंत रोक दिया जाए.
ज्ञापन में कहा गया है, ‘सरकार को इस प्रक्रिया को रोकने के अपने फैसले की सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए और एपीएफआरए को रद्द करने के विषय पर सभी प्रभावित पक्षों के साथ व्यापक परामर्श शुरू करना चाहिए.’
इस अधिनियम को स्वदेशी समुदायों की पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को बाहरी प्रभावों या दबाव से बचाने के उद्देश्य से पेश किया गया था. इससे पहले राज्य सरकार ने कहा था कि एपीएफआरए को अदालत के निर्देश का सम्मान करते हुए लागू किया जाएगा; इस संबंध में मुख्यमंत्री खांडू ने स्पष्ट किया था कि नियमों का मसौदा किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है.
मिज़ोरम: कांग्रेस की चेतावनी- दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती संख्या राज्य के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा
मिजोरम की विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने शुक्रवार (5 जून) को राज्य में दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती संख्या पर गंभीर चिंता जताई. पार्टी ने चेतावनी दी कि अगर इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो इससे गहरी सामाजिक असमानता और विभाजन पैदा हो सकता है.
कांग्रेस भवन में आयोजित एक राजनीतिक सत्र को संबोधित करते हुए मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव लालबियाकज़ामा ने कहा कि मजदूरों के बीच भूमिहीनता का मुद्दा तत्काल ध्यान देने और दीर्घकालिक नीतिगत समाधान की मांग करता है.

उन्होंने कहा, ‘मिजोरम में अब बड़ी संख्या में ऐसे दिहाड़ी मजदूर हैं जिनके पास अपनी जमीन नहीं है. लंबे समय में यह हमारे समाज में गंभीर भेदभाव और सामाजिक असमानता को जन्म देगा. हमें अभी से इसके समाधान के बारे में सोचना शुरू करना होगा.’
लालबियाकज़ामा ने जनता, खासकर युवाओं को उन राजनीतिक वादों से गुमराह न होने की चेतावनी दी, जो वास्तविक नहीं हैं.
मुख्यमंत्री लालडुहोमा सहित सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपल्स मूवमेंट (जेडपीएम) के नेताओं द्वारा कथित तौर पर किए गए राजनीतिक दावों की कड़ी आलोचना करते हुए, कांग्रेस नेता ने कहा कि विकास के दावे – जिनमें तीन साल के भीतर राज्य को आत्मनिर्भर बनाने और डार्ज़ो नदी से 2,400 मेगावाट बिजली पैदा करने के वादे शामिल हैं – अव्यावहारिक थे और मतदाताओं को गुमराह करने के उद्देश्य से किए गए थे.
उन्होंने कहा, ‘अगर कोई हमसे ऐसे वादे करता है, तो इसे युवाओं का अपमान समझना चाहिए. मिजोरम के युवाओं, अब जागने का समय आ गया है.’
भाजपा पर कटाक्ष करते हुए कांग्रेस नेता ने लोगों को पार्टी के जाल में फंसने के खिलाफ भी आगाह किया.
उन्होंने दावा किया कि भाजपा का एजेंडा भूमि के लिए खतरा है और यह मिजोरम की संस्कृति और धार्मिक पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है.
लालबियाकज़ामा ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा शासन के दौरान भारत के आर्थिक और प्रशासनिक संकेतकों में गिरावट आई है. उनके अनुसार भारतीय मुद्रा का मूल्य लगातार घटा है और वह आर्थिक रूप से कमजोर पड़ोसी देशों की मुद्राओं के स्तर तक पहुंच गया है.
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि वर्तमान केंद्र सरकार के कार्यकाल में कम-से-कम छह बार परीक्षा-पत्र लीक होने की घटनाएं हुई हैं, लेकिन किसी मंत्री या अधिकारी ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली.
उन्होंने बार-बार सामने आए प्रश्नपत्र लीक मामलों का उल्लेख करते हुए सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाए.
लालबियाकज़ामा ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर रही है.
उन्होंने यह भी दावा किया कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), छात्र संगठनों और नागरिक समूहों द्वारा चलाए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों का भाजपा पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ रहा है और इससे सत्तारूढ़ दल पर दबाव बढ़ा है.
मणिपुर: 13 मई की हत्याओं को लेकर गतिरोध जारी, यूएनसी ने बंधकों को रिहा करने की योजना रद्द की
मणिपुर में बंधक संकट को लेकर गतिरोध जारी है, यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने 14 कुकी बंधकों को रिहा करने की अपनी योजना रद्द कर दी है. इस संगठन ने उन छह नगा नागरिकों की रिहाई की मांग की है, जिन्हें कथित तौर पर कुकी समूहों ने बंधक बना रखा है.
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक बयान में यूएनसी ने कहा कि कुकी बंधकों को रिहा करने की योजना ‘रद्द’ कर दी गई है, और इसके पीछे ‘नगा लोगों की मौजूदा भावना’ को कारण बताया.

कुकी और नगा – दोनों समुदायों द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग-37 पर आर्थिक नाकेबंदी किए जाने के कारण बाज़ार और स्कूल बंद रहे हैं.
कांगपोकपी ज़िले में थाड़ौ समुदाय के तीन चर्च नेताओं की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद 13 मई को कम से कम 14 कुकी और छह नगा लोगों को बंधक बना लिया गया था.
13 मई का यह हमला तब हुआ, जब थाडौ बैपटिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया और यूनाइटेड बैपटिस्ट काउंसिल के नेता, चूड़ाचांदपुर में आयोजित एक बैपटिस्ट सम्मेलन से कांगपोकपी ज़िले लौट रहे थे. जीवित बचे लोगों के अनुसार, सुबह लगभग 10 बजे कोटलेन और कोटज़िम गांवों के बीच अज्ञात बंदूकधारियों ने उनके दो वाहनों पर गोलियां चला दीं.
कई नगा संगठनों के एक मंच- जॉइंट ट्राइब्स काउंसिल ने अपहृत नगा लोगों की रिहाई सुनिश्चित करने में मणिपुर सरकार की कथित विफलता की कड़ी आलोचना की है.
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, इसने यह भी मांग की है कि 14 कुकी लोगों को, जिन्हें 13 मई को नगा संगठनों द्वारा इसी तरह बंधक बनाया गया था, तब तक हिरासत में रखा जाए, जब तक कि छह नगा लोगों को रिहा नहीं कर दिया जाता.
इससे पहले मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने नगा और कुकी समुदायों के नेताओं से सभी बंधकों को तत्काल रिहा करने की अपील की थी.
मेघालय और असम विवादित लापांगाप में खेती फिर से शुरू करने पर सहमत
मेघालय और असम विवादित लापांगाप इलाके में खेती-बाड़ी को लेकर हफ़्तों की अनिश्चितता के बाद मंगलवार (2 जून) को एक अंतरिम समझौते पर पहुंचे. इस समझौते के तहत दोनों तरफ़ के किसानों को सीमा से जुड़े बड़े मुद्दों का हल निकलने तक अपनी पारंपरिक खेती-बाड़ी जारी रखने की इजाज़त होगी.
शिलांग टाइम्स के अनुसार, यह फ़ैसला दोनों राज्यों के मंत्रियों, बड़े अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और समुदाय के नेताओं की एक संयुक्त बैठक में लिया गया. यह बैठक मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा और उनके असम के समकक्ष हिमंता बिस्वा शर्मा के बीच हाल ही में हुई बातचीत के बाद हुई.

इस व्यवस्था के तहत, पनार किसानों को पहाड़ी के निचले इलाकों में धान की खेती जारी रखने की इजाज़त होगी, जबकि कार्बी आंगलोंग के तापत के निवासी विवादित इलाके के ऊंचे हिस्सों में केला, अनानास और अदरक जैसी फसलों की खेती जारी रखेंगे.
अधिकारियों ने बताया कि इस समझौते का मकसद मौजूदा स्थिति को बनाए रखना और यह पक्का करना है कि खेती-बाड़ी में कोई रुकावट न आए.
दोनों सरकारें इस बात पर सहमत हुईं कि मालिकाना हक और सीमा के अंतिम निर्धारण के मामले की जांच एक उचित राज्य-स्तरीय तंत्र द्वारा की जाएगी, जिसे इस मुद्दे को सुलझाने का काम सौंपा गया है. तब तक सभी संबंधित पक्षों से शांति बनाए रखने और ऐसे किसी भी काम से बचने का आग्रह किया गया है जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है.
यह ताज़ा सफलता पिछले महीने स्थानीय अधिकारियों द्वारा गांव के प्रतिनिधियों के बीच आम सहमति बनाने की एक नाकाम कोशिश के बाद मिली है. 18 मई को पश्चिम जयंतिया हिल्स प्रशासन द्वारा बुलाई गई एक बैठक बिना किसी समझौते के खत्म हो गई थी, क्योंकि दोनों पक्ष इलाके में बागवानी गतिविधियों के मुद्दे पर एकमत नहीं थे.
बीते 18 मई को लापांगाप क्षेत्र में पत्थरबाज़ी और दोनों पक्षों के लोगों के बीच हल्की झड़प के बाद तनाव बढ़ गया था. उसके बाद मेघालय सरकार ने इलाके में सुरक्षा बलों को तैनात किया था.
त्रिपुरा: चिट फंड घोटाला मामले में सीबीआई अदालत ने तीन अधिकारियों को सजा सुनाई
पश्चिम त्रिपुरा की एक विशेष सीबीआई अदालत ने त्रिपुरा के एक चिट फंड घोटाले में प्रगति शील इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (सीएमडी) तथा दो अन्य अधिकारियों को छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के अनुसार, यह मामला जनता से जमा कराए गए लगभग 5 से 6 करोड़ रुपये के गबन से संबंधित है.
अदालत ने दोषी ठहराए गए तीनों अधिकारियों पर 3-3 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया. वहीं कंपनी को भी अलग से दोषी ठहराते हुए उस पर 7 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया.

विशेष अदालत ने कंपनी के सीएमडी अरिंदम दास, निदेशक परितोष दास तथा प्रशासनिक निदेशक दीपशिखा चक्रवर्ती को जनता से एकत्रित जमा राशि के गबन का दोषी पाते हुए छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई.
पश्चिम त्रिपुरा जिले के विशेष सीबीआई न्यायाधीश ने इस मामले में प्रगति शील इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड को भी दोषी करार दिया और कंपनी पर अलग से जुर्माना लगाया.
यह मामला कैलाशहर पुलिस थाना मामला संख्या 90/2012 से जुड़ा है, जो 30 अप्रैल 2012 को दर्ज किया गया था. बाद में त्रिपुरा सरकार और भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा जारी अधिसूचनाओं के आधार पर 8 अक्टूबर 2013 को सीबीआई ने इस मामले को पुनः दर्ज किया.
सीबीआई ने आगे की जांच अपने हाथ में लेते हुए उन आरोपों की पड़ताल की कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता और अन्य निवेशकों से धन जमा कराया, लेकिन बाद में उनकी राशि वापस नहीं की. जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने आम जनता से जुटाए गए लगभग 5 से 6 करोड़ रुपये का गबन किया.
जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 28 मई 2018 को अरिंदम दास, परितोष दास, दीपशिखा चक्रवर्ती दास तथा प्रगति शील इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया.
विशेष न्यायाधीश ने आदेश दिया कि दोषियों से वसूल की गई जुर्माने की राशि सक्षम अधिकारियों को भेजी जाए, ताकि उसे पीड़ित जमाकर्ताओं के बीच अनुपातिक रूप से वितरित किया जा सके.
अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि जिलाधिकारी एवं जिला कलेक्टर, उनाकोटी जिला, कैलाशहर के माध्यम से संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जाए, ताकि उनके प्रशासनिक क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुसार इसका वितरण किया जा सके.
अदालत ने यह भी अनुरोध किया कि कानून के तहत यथासंभव आरोपियों की कुर्क की गई संपत्तियों से ठगी गई राशि की वसूली की जाए और उसे उन पहचाने गए जमाकर्ताओं एवं निवेशकों में अनुपातिक रूप से बांटा जाए, जिन्हें उनकी जमा की गई रकम वापस नहीं मिली है.
नगालैंड: सरकार ने तंबाकू और निकोटीन वाले उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया
नगालैंड के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग ने राज्य में ऐसे खाद्य पदार्थों पर रोक लगा दी है जिनमें तंबाकू और निकोटीन का इस्तेमाल किया गया है. इसमें तंबाकू या निकोटीन वाले गुटखा और पान मसाला भी शामिल हैं.
विभाग ने गुरुवार को ‘खाद्य सुरक्षा और मानक (कुछ उत्पादों की बिक्री पर रोक और प्रतिबंध) नियम, 2011’ (समय-समय पर संशोधित) के नियम 2.3.4 के तहत एक अधिसूचना जारी किया.

इस नियम के अनुसार, ‘खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006’ की धारा 3(1)(j) में बताई गई परिभाषा के तहत, किसी भी खाद्य उत्पाद या खाने की चीज़ में तंबाकू और निकोटीन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.
इसमें कहा गया है कि ‘सामग्री’ (ingredient) का मतलब है कोई भी पदार्थ, जिसमें फूड एडिटिव भी शामिल है, जिसका इस्तेमाल भोजन बनाने या तैयार करने में किया जाता है और जो अंतिम उत्पाद में मौजूद होता है (चाह परिवर्तित रूप में ही क्यों न हो). यह परिभाषा खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 3(1)(y) तथा संबंधित नियमों में दी गई है.
विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के 23.09.2016 के उस आदेश का हवाला दिया जो ‘ट्रांसफर केस सिविल नंबर 1/2010 (सेंट्रल अरेकानट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन और अन्य)’ के मामले में दिया गया था.
आदेश में कहा गया था कि गुटखा बिक्री पर लगे प्रतिबंध से बचने के लिए कुछ निर्माता बिना तंबाकू वाले पान मसाले और सुगंधित चबाने वाले तंबाकू (च्यूइंग टोबैको) को अलग-अलग पाउच में बेच रहे हैं. इन्हें अक्सर एक साथ पैक कर या एक ही विक्रेता द्वारा एक ही स्थान से बेचा जाता है ताकि उपभोक्ता दोनों उत्पाद खरीदकर उन्हें मिलाकर गुटखे की तरह इस्तेमाल कर सकें.
अधिसूचना में कहा गया कि सरकार का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा तंबाकू और निकोटीन आधारित उत्पादों के सेवन को नियंत्रित करना है.
