नई दिल्ली: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में जारी चारधाम यात्रा के दौरान पिछले 45 दिनों में 120 से ज़्यादा श्रद्धालुओं की मौत हो चुकी है. बताया गया है कि इसकी वजह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और दुर्घटनाएं हैं.
उल्लेखनीय है कि इस यात्रा का एक बड़ा हिस्सा पैदल तय किया जाता है और इसमें ज़्यादा ऊंचाई और खराब मौसम का सामना करना पड़ता है.
द टेलीग्राफ की ख़बर के मुताबिक, मृतकों की कुल संख्या में से कम से कम 45 मौतें चमोली ज़िले में गौचर शहर और बद्रीनाथ के बीच हुई हैं. यह यात्रा का काफ़ी ढलान वाला और ठंडा हिस्सा है.
इसके अलावा, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा के दौरान सड़क हादसों में दो दर्जन से ज़्यादा तीर्थयात्रियों की मौत हो चुकी है.
इस संबंध में चमोली ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अभिषेक गुप्ता ने घोषणा की है कि यात्रा के रास्ते पर क्यूआर कोड लगाए जाएंगे, ताकि श्रद्धालु उन्हें स्कैन करके डॉक्टरों की मदद ले सकें.
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने शुक्रवार (5 जून) को पत्रकारों से कहा, ‘यात्रा के रास्ते में श्रद्धालुओं के लिए मेडिकल कैंप लगाए गए हैं, लेकिन हर एक यात्री की मेडिकल स्क्रीनिंग करना मुमकिन नहीं है. जिन्हें ज़रूरत हो, वे मेडिकल मदद के लिए क्यूआर कोड स्कैन करें.’
उन्होंने बताया कि चमोली में 54,000 से ज़्यादा श्रद्धालुओं की मेडिकल स्क्रीनिंग की गई, जिनमें से 28,000 की उम्र 50 साल से ज़्यादा थी.
अभिषेक गुप्ता ने आगे कहा, ‘हमने मई में छह बीमार श्रद्धालुओं को एयरलिफ्ट करके अस्पतालों में भर्ती कराया था.’
हालांकि, कई श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया है कि यात्रा के रास्ते में चिकित्सा संबंधी कोई उचित सुविधा नहीं है.
आसनसोल के एक श्रद्धालु अभिजीत बसु ने कहा, ‘मेडिकल कैंप असल में बिना डॉक्टर वाले छोटे बूथ हैं. सरकारी सुविधाओं में खाना खराब मिलता है और पुलिस श्रद्धालुओं के साथ बुरा बर्ताव करती है.’
सोशल मीडिया पर बीते दो दिनों से वायरल हो रहे एक वीडियो में केदारनाथ में पुलिसकर्मी श्रद्धालुओं पर लाठियां चलाते और उन्हें धक्का देते हुए दिख रहे हैं.
गौरतलब है कि हाल के वर्षों में इस तीर्थयात्रा में मृत्यु दर काफी ज़्यादा रही है. रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में यात्रा के दौरान 246 तीर्थयात्रियों की मृत्यु हुई, जबकि 2025 के सीज़न में 83 लोगों की मौत की सूचना मिली.
ज्ञात हो कि इस तीर्थयात्रा के रास्ते ऊंचे पहाड़ी इलाकों से होकर गुज़रते हैं, जहां ऑक्सीजन का स्तर कम होता है और चढ़ाई भी काफ़ी खड़ी होती है; इससे बुज़ुर्ग तीर्थयात्रियों और पहले से किसी बीमारी से पीड़ित लोगों के स्वास्थ्य को ख़तरा हो सकता है.
