मंगलुरु: नई दिल्ली के भारत मंडपम में बीते गुरुवार (4 जून) को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के ‘रिफॉर्म्स उत्सव’, जो मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने के मौके पर किसी केंद्रीय मंत्रालय द्वारा आयोजित अपनी तरह का पहला कार्यक्रम था- में बोलते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने एक बयान दिया.
उन्होंने कहा, ‘मुझे एक भी ऐसा उदाहरण दीजिए जहां किसी व्यक्ति ने अपनी पहचान या धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण सुरक्षित महसूस न करने की वजह से भारत छोड़ दिया हो.’ उन्होंने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को विपक्ष द्वारा फैलाया गया ‘प्रोपगैंडा’ कहकर खारिज कर दिया.
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री की ओर से आया यह बयान सिर्फ़ सच्चाई से इनकार नहीं था. यह ज़मीनी हकीकत को बुरी तरह से तोड़-मरोड़कर पेश करना था, जहां नफ़रत से प्रेरित हिंसा और संस्थागत भेदभाव बढ़ रहे हैं.
पिछले एक दशक में- जब से भाजपा सत्ता में आई है, भारत के अल्पसंख्यकों – खासकर मुसलमानों और हाशिए पर मौजूद समुदायों से ईसाई धर्म अपनाने वालों – को हिंदुत्व चरमपंथियों के हमलों का सबसे ज़्यादा सामना करना पड़ा है. और यह सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि सरकारी तंत्र या तो नाकाम रहा है या फिर ऐसे खुलेआम हमलों पर पूरी तरह से आंखें मूंदे रहा है.
और तो और, केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों ने ऐसी नीतियां लागू की हैं जिन्होंने पहले से ही कमज़ोर इन समुदायों को और ज़्यादा हाशिए पर धकेल दिया है.
यहां अल्पसंख्यक अधिकारों के उन कई उल्लंघनों की सूची दी गई है जिन्हें रिजिजू ने अपनी सरकार की छवि सुधारने की बेताब कोशिश में नज़रअंदाज़ कर दिया.
‘गोरक्षक’ हिंसा
अगर रिजिजू या उनका भाषण लिखने वाले ने बस एक बार गूगल पर सर्च किया होता, तो उन्हें 2014 के बाद भारत में ‘गो-रक्षक’ हिंसा की लिस्ट मिल जाती. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) – जो हर साल अपराध के आंकड़े जारी करने वाली एकमात्र सरकारी संस्था है – ने हमेशा ‘गो-रक्षक’ हिंसा या नफ़रत से प्रेरित अपराधों (हेट क्राइम्स) को अलग कैटेगरी में रखने से इनकार किया है.
हालांकि, अलग-अलग समय पर हुई कई अध्ययनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हत्या और चोट पहुंचाने के मामलों को दर्ज किया गया है. विकिपीडिया पर ऐसी कम से कम 82 घटनाओं की सूची है. यह किसी भी तरह से पूरी सूची नहीं है, क्योंकि देश के ज़्यादातर हिस्सों में ऐसी हिंसा के कई मामले रिपोर्ट ही नहीं होते.
फिर भी, इससे यह साफ़ पता चलता है कि ‘गो-रक्षक’ समूहों ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में मुस्लिम समुदायों में किस हद तक दहशत फैलाई है.
धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भाषण
हाल के वर्षों में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भाषणों (हेट स्पीच) में तेज़ी से और लगातार बढ़ोतरी देखी गई है. ‘सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज़्ड हेट‘ (सीएसओएच) द्वारा चलाया जा रहा एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट, ‘इंडिया हेट लैब’, एक दशक से भी ज़्यादा समय से नफ़रत फैलाने वाले भाषणों के मामलों पर बारीकी से नज़र रख रहा है. अकेले 2025 में ट्रैकर्स ने 21 राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश और दिल्ली में प्रत्यक्ष नफ़रत फैलाने वाले भाषण की 1,318 प्रमाणित घटनाओं को दर्ज किया- यानी हर दिन औसतन चार घटनाएं.
‘इंडिया हेट लैब’ की अध्ययन के मुताबिक, यह 2024 के मुक़ाबले 13% ज़्यादा था और 2023 में दर्ज 668 घटनाओं से लगभग दोगुना था. इनमें से लगभग 98% घटनाएं मुसलमानों को निशाना बनाकर की गईं और बाकी ईसाइयों को. अध्ययन में यह भी बताया गया कि ये घटनाएं मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों में अक्सर रैलियों, धार्मिक जुलूसों या सार्वजनिक सभाओं में हुईं. इन आयोजनों में बहिष्कार और सामाजिक अलगाव की अपीलें आम थीं.
भाजपा और उसके सहयोगी दलों के कई सांसदों, विधायकों और मंत्रियों पर खुलेआम नफरती भाषण देने के आरोप लगे हैं. राज्य तंत्र और न्यायपालिका – दोनों ही उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहे हैं.
बुलडोज़र से अन्याय
संपत्तियों को गिराने के लिए बुलडोज़र का इस्तेमाल- जिसे दक्षिणपंथी हलकों में अक्सर ‘बुलडोज़र जस्टिस’ कहा जाता है- ने मुस्लिम इलाकों को बहुत ज़्यादा प्रभावित किया है. इसके पीछे एक पैटर्न है. हर बार किसी सांप्रदायिक घटना या विरोध-प्रदर्शन के बाद मुसलमानों के घर आसानी से निशाना बन जाते हैं.
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अकेले अप्रैल और जून 2022 के बीच ऐसी 128 तोड़-फोड़ की घटनाओं को दर्ज किया. इन घटनाओं में 600 से ज़्यादा लोगों को निशाना बनाया गया, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे. 2024 में सुप्रीम कोर्ट के सज़ा के तौर पर की जाने वाली तोड़-फोड़ को रोकने के निर्देशों के बावजूद उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में ये अभियान जारी रहे.
खासकर भाजपा शासित राज्यों में ‘न्याय’ दिलाने का आम तरीका बनने से बहुत पहले मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान की सरकार ने 2016 में ही इस तरीके की शुरुआत कर दी थी. सबसे हालिया मामला 13 मई का है, जब ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के एक पार्षद राज्य की बुलडोज़र कार्रवाई का शिकार बने.
महाराष्ट्र में छत्रपति संभाजीनगर ज़िले में मतीन पटेल का घर तब गिरा दिया गया जब पुलिस ने आरोप लगाया कि उन्होंने निदा खान को पनाह दी थी. निदा खान एक युवा टेली-कॉलर है, जो नासिक के चर्चित ‘टीसीएस केस’ में अपनी कथित भूमिका के कारण जांच के दायरे में आई थीं.
भारत में धर्मांतरण-विरोधी क़ानून
भारत के एक दर्जन से अधिक राज्यों ने कठोर धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू किए हैं, जो अक्सर ईसाइयों और मुसलमानों को निशाना बनाते हैं.
ईसाइयों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा पर दायर कई याचिकाओं के बाद इस साल फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट ने ‘राज्य की शह पर होने वाली गुंडागर्दी’ और गिरफ़्तारियों के मामलों की समीक्षा करने पर सहमति जताई. याचिकाकर्ता ‘नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज़ इन इंडिया’ ने तर्क दिया कि इन कानूनों की परिभाषा अस्पष्ट है और ये कानून गुंडागर्दी करने वाले समूहों को अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ झूठी शिकायतें दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, इन कानूनों के तहत 400 से ज़्यादा ईसाइयों को गिरफ़्तार किया गया है.
अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण-विरोधी कानून के तहत दर्ज कई मामलों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा था कि उनमें ‘ऐसी कानूनी कमियां थीं जिन्हें ठीक नहीं किया जा सकता’ और ऐसा लगता है कि ये उत्पीड़न के मकसद से दर्ज किए थे. ऐसे फैसलों के बावजूद उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों में प्रार्थना सभाओं और चर्च की सेवाओं के दौरान गिरफ्तारियां और पुलिस की दखलंदाज़ी जारी रही है.
इन कानूनों का मुसलमानों पर भी बहुत ज़्यादा असर पड़ा है, खासकर अंतरधार्मिक विवाहों से जुड़े तथाकथित ‘लव जिहाद’ के मामलों में.
‘अवैध बांग्लादेशी’ का नैरेटिव
बड़े पैमाने पर ‘अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों’ का नैरेटिव, जिसकी शुरुआत असम, पश्चिम बंगाल और भाजपा के चुनावी अभियानों से हुई थी, अब भारतीय राजनीति का एक बार-बार दोहराया जाने वाला मुद्दा बन चुका है.
2016 में रिजिजू, जो उस समय गृह राज्य मंत्री थे, ने बिना किसी स्रोत के संसद में कहा था कि लगभग 2 करोड़ ‘अवैध बांग्लादेशी प्रवासी’ हैं. यह दावा तब किया गया था जब सरकार ने खुद माना था कि इस संबंध में सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
‘बांग्लादेशी’ कहे जाने वाली इस राजनीतिक बयानबाजी का भारत में मुसलमानों की ज़िंदगी पर सीधा असर पड़ा है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कई मुसलमानों, खासकर प्रवासी मज़दूरों को ‘बांग्लादेशी घुसपैठिया’ होने के आरोप में भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा है.
‘आर्टिकल 14‘ में छपी एक विस्तृत रिपोर्ट में रिपोर्टर स्निग्धेन्दु भट्टाचार्य ने कई ऐसे मामलों का ज़िक्र किया है जहां हिंदू विजिलेंट ग्रुप्स और पुलिस ने बंगाली बोलने वाले मुसलमानों को भाजपा शासित राज्यों से पलायन करने पर मजबूर किया.
साल 2019 में जब असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया शुरू हुई, तो लगभग 19 लाख लोगों को अवैध घुसपैठिया मानकर सूची से बाहर कर दिया गया. इनमें से एक बड़ी आबादी बंगाली मूल के मुसलमानों की थी, हालांकि इससे कई हिंदू भी प्रभावित हुए थे.
एक तरफ जहां अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है, वहीं पिछले कुछ सालों में पलायन (माइग्रेशन) से जुड़ा एक और रुझान भी सामने आया है.
अमेरिका स्थित प्यू रिसर्च सेंटर ने 2024 में देश में पलायन के पैटर्न पर एक रिपोर्ट जारी की. इस विश्लेषण से पता चला कि भारत से बाहर जाने वालों में ईसाई लगभग 16% और मुसलमान लगभग 33% हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में लगभग 80% लोग हिंदू हैं, लेकिन देश से बाहर जाने वालों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ़ 41% है; यह बात दुनिया भर में पलायन करने वालों के धार्मिक आधार पर किए गए सर्वे में सामने आई है.
विवादास्पद एसआईआर प्रक्रिया
‘अवैध बांग्लादेशियों’ के नाम पर पैदा किए गए राजनीतिक माहौल का उपयोग उस समय भी हुआ जब चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया शुरू की.
इससे पहले चुनाव आयोग ने बिहार में भी यही प्रक्रिया लागू की थी, और वहां भी कई परिवार रातों-रात वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए थे. दोनों राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया राज्य विधानसभा चुनावों से ठीक पहले की गई थी.
भाजपा ने एसआईआर को अवैध घुसपैठियों की ‘पहचान’ करने और उन्हें ‘हटाने’ के लिए एक असरदार कदम बताया है और दावा किया है कि इससे पश्चिम बंगाल में वोट-बैंक की राजनीति का पर्दाफ़ाश हुआ है. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) समेत विपक्षी दलों ने इसे ‘पिछले दरवाज़े से लाया गया एनआरसी’ कहकर इसकी आलोचना की है, जो असली भारतीय नागरिकों, खासकर बंगाली मुसलमानों और बांग्लादेश से आए कुछ हिंदू शरणार्थियों को निशाना बनाता है.
जब से पश्चिम बंगाल में एसआईआर लागू हुआ है, द वायर ने इस मुद्दे पर विस्तार से रिपोर्टिंग की है और राज्य भर में मुसलमानों की बेबसी और उन्हें जान-बूझकर बाहर किए जाने की कहानियां सामने लाई हैं. पश्चिम बंगाल चुनावों से कुछ महीने पहले ही पूरी हुई इस प्रक्रिया में 90 लाख से ज़्यादा मतदाता एसआईआर प्रक्रिया के ज़रिए बाहर हो गए. इनमें से 34% से ज़्यादा मुसलमान हैं.
संसद और सरकार में अल्पसंख्यकों का कम प्रतिनिधित्व
आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार मोदी की तीसरी कैबिनेट (2024) में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है. यह सिलसिला पिछली सरकार के आखिरी दौर से ही चल रहा है, जब आखिरी मुस्लिम मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी अपनी राज्यसभा सीट हार गए थे. ईसाइयों का प्रतिनिधित्व भी बहुत कम है. रिजिजू ईसाई समुदाय के उन बहुत कम लोगों में से एक हैं जो संसद पहुंचे हैं और मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं.
मुसलमान, जो भारत की आबादी का लगभग 14-15% (करीब 20 करोड़ लोग) हैं, 2024 में चुनी गई 18वीं लोकसभा में केवल 24 सीटों (जो लगभग 4.4% है) पर हैं. यह पिछले छह दशकों में सबसे कम हिस्सेदारी में से एक है. सभी 24 मुस्लिम सांसद विपक्षी दलों, मुख्य रूप से इंडिया गठबंधन से हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
