नई दिल्ली: नरेगा संघर्ष मोर्चा ने ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) एक्ट’ को लागू करने पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है. उसका आरोप है कि यह कानून मज़दूरों के प्रतिनिधियों और नागरिक समाज संगठनों से पर्याप्त बातचीत किए बिना ही लागू किया जा रहा है.
ज्ञात हो कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को दिसंबर 2025 में रद्द कर दिया गया था और इसकी जगह ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ (जिसे वीबी-जी राम जी भी कहा जाता है) को लाया गया. केंद्र सरकार ने यह भी सूचित किया है कि मनरेगा 1 जुलाई 2026 से औपचारिक रूप से बंद हो जाएगा.
वर्ष 2006 में लागू किया गया मनरेगा भारत की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजनाओं में से एक रहा है. नरेगा संघर्ष मोर्चा (एनएसएम) श्रमिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों, कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज समूहों का एक राष्ट्रीय मंच है, जो मनरेगा और ग्रामीण आजीविका के मुद्दों पर कार्य करता है.
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने एक बयान जारी कर कहा कि नए क़ानून के तहत नियम बनाने और उन्हें लागू करने से पहले सरकार को मज़दूर संगठनों और नागरिक समाज के साथ निष्पक्ष और पारदर्शी बातचीत करनी चाहिए.
संगठन ने कहा कि मनरेगा एक जन अधिनियम था- जो मज़दूरों के वर्षों के संघर्ष और जमीनी लामबंदी की वजह से बना था. आरोप लगाया कि अब इसे एक अपारदर्शी, मनमाने और अलोकतांत्रिक कानून से बदलकर मजदूरों के अधिकारों पर हमला किया जा रहा है.
मोर्चे का आरोप है कि इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों में नरेगा श्रमिकों और नागरिक समाज के सदस्यों के साथ सार्थक चर्चा या संवाद किए बिना जल्दबाजी में पारित कर दिया गया.
संगठन ने अपने बयान में कहा कि मसौदा नियमों में मनरेगा की उन्हीं विशेषताओं को बरकरार रखा गया है, जिनके खिलाफ पिछले पांच साल से भी अधिक समय से देश भर के मजदूर आवाज उठा रहे हैं- खासकर टेक्नोलॉजी का जबरन इस्तेमाल और कम मजदूरी दर.
उसके अनुसार, तकनीक-आधारित प्रणालियों और मजदूरी दरों से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान किए बिना इन्हें लागू नहीं किया जाना चाहिए.
संगठन के अनुसार, तकनीक-आधारित प्रणालियों और मजदूरी दरों से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान किए बिना इन्हें लागू नहीं किया जाना चाहिए.
संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बार-बार आश्वासन देने के बावजूद कि वीबी-जी राम जी लागू होने तक मनरेगा बिना रुकावट जारी रहेगा- जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है.
बयान में कहा गया है कि स्थानीय अधिकारी काम की मांग के आवेदन स्वीकार नहीं कर रहे हैं और न ही कार्यस्थल खोल रहे हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के 3,200 करोड़ रुपये से अधिक के मजदूरी भुगतान अभी भी रुके हुए हैं.
एनएसएम ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि अप्रैल 2025 से अप्रैल 2026 के बीच मनरेगा के तहत रोजगार में 57 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि मई 2026 में इसमें 49 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. संगठन ने यह भी कहा कि चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निशन) आधारित उपस्थिति प्रणाली से जुड़ी समस्याएं कामकाज में बाधा डाल रही हैं और कई श्रमिक इससे बाहर हो रहे हैं.
अंत में संगठन ने नए कानून को लागू करने से रोकने की मांग करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले निष्पक्ष और पारदर्शी सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए. साथ ही यह भी मांग की कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल और मजदूरी दरों को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताओं पर ध्यान देते हुए नियमों के मसौदे में बदलाव किया जाना चाहिए.
