जब यह पंक्तियां लिखी जा रही थीं, दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा छात्रों का एक विशाल प्रदर्शन हो रहा था जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी नाम के एक हाल ही में गठित संगठन के आह्वान पर हज़ारों युवा शांतिपूर्वक प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे.
पिछले कुछ दिनों में एक के बाद एक सार्वजनिक बल्कि राष्ट्रीय शैक्षणिक परीक्षाएं, किसी न किसी घपले के कारण रद्द हुईं या भीषण विवाद में आई हैं. लाखों छात्रों के जीवन और भविष्य के साथ निर्लज्ज खिलवाड़ किया जा रहा है और इस सबके लिए ज़िम्मेदार राजनेता न तो जबावदेह हैं, न ही अपना पद छोड़ रहे हैं, न उन्हें अकर्मण्यता और स्पष्ट ही भ्रष्ट आचरण के कारण हटाया जा रहा है.
पिछले लगभग दस वर्षों में राजनीति, सत्तारूढ़ राजनीति ने सार्वजनिक संवाद की भाषा को इस क़दर दूषित और विषाक्त कर दिया है कि उससे सामान्य शिष्टाचार या भद्रता गायब हो गई है. लोकतंत्र में वाद-विवाद होना अनिवार्य है पर इतनी अभ्रदता, इतना झगड़ालूपन और गाली-गलौज संवाद में पहले कभी शामिल और मान्य पहले कभी नहीं हुए.
भाषा का अवमूल्यन सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया जहां वैसे भाषा की बारीकियों का विश्लेषण रोज़ीना होता है. वहां युवाओं को कॉकरोच यानी तिलचट्टा कह दिया गया. बाद में, कुछ स्पष्टीकरण इस आशय का दिया गया कि आशय नकली वकीलों और क़ानून के नकली छात्रों को लेकर था, व्यापक युवाओं को लेकर नहीं.
लेकिन तब तक युवाओं के बीच इस भाषिक अपमान को लेकर नाराज़ी बहुत व्यापक हो गई और कॉकरोच जनता पार्टी नाम का एक संगठन बन गया और बनने के कुछ ही समय में उसमें करोड़ों सदस्य हो गए. मुख्यतः वर्तमान व्यवस्था से क्षुब्ध और असंतुष्ट युवा इसमें साथ आए हैं.
इस संगठन, जो अभी एक स्पष्ट राजनीतिक पार्टी के रूप में सामने नहीं आया है, को तरह-तरह से व्याख्यायित, लांछित, संदेहास्पद बताने की कोशिशें हो रही हैं. ऐसा होना अण्णा हजारे आंदोलन आदि का जो हश्र हुआ उसके अनुभव की रोशनी में, अस्वाभाविक और अतर्किक नहीं है. इसलिए सयानी नज़र तो यही कह रही है कि उसे जल्दबाज़ी में न परखा जाए और उससे बहुत उत्साहित न हुआ जाए. लेकिन भारत के युवाओं की निष्क्रियता और राजनीतिक दृष्टि के अभाव से क्षुब्ध-असंतुष्ट हम जैसे कुछ बूढ़ों को इस पहल से कुछ उम्मीद बंध रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
स्थापित व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन की दरकार है और वह एक दीर्घकालीन प्रोजेक्ट है. अंतरिम रूप से ऐसी पहल शायद हमें उस ओर उत्सुक-उत्साहित कर सकती हैं. उम्मीद का एक धुंधला क्षितिज, निराशा के काले आकाश के बरक़्स, होना ज़रूरी है. यह ऐसा क्षितिज लग रहा है.
नए रोज़गार
पिछले एक दशक की एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें प्रायः हर चीज़, सार्वजनिक जीवन में, संदिग्ध हो गई है, ख़ासकर विकास से संबंधित डेटा. कहा जा रहा है और आंकड़े दिए जा रहे हैं कि देश में बेरोज़गारी इस समय अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. मेरी कोई विशेषज्ञता नहीं है कि इस दावे की जांच-पड़ताल कर सकूं. मैं तो अपने आस-पास जो हो रहा है उसे देखकर कुछ नए रोज़गार के बारे में कहना चाहता हूं जो इधर के बरसों में बने और पनपे हैं.
हमारी हाउसिंग सोसाइटी में बहुत सी कारें हैं. सुबह-सुबह उनकी सफ़ाई करने कई लोग आते हैं, ज़्यादातर युवा. हरेक लगभग एक घंटे में चार-पांच कारें साफ़ कर चला जाता है. कम से कम एक युवा स्कूटर से आता-जाता है. हमारे पड़ोसियों में कुछ कुत्ता-प्रेमी भी हैं. सुबह उनके कुत्तों को घुमाने का काम करने भी कुछ युवा बाहर से आते हैं. ज़ोमेटो जैसे कई घर पर खाना या अन्य सामान पहुंचाने वाले व्यवसायों में वाहक के रूप में भी बहुत युवा स्कूटर या मोटर साइकिल पर आते रहते हैं.
चूंकि हिंदू समाज में धर्मपरायणता बढ़ी है, उस सिलसिले में कई तरह के शिक्षित-अशिक्षित पुरोहितों आदि की मांग बढ़ी है और इस खाते में भी रोज़गार बहुत बढ़ रहा है. लगे हाथ, यही लोग जब-तब दंगों आदि को उकसाने और उसमें हिंसक हरकतें करने का काम भी मुफ़्त कर देते हैं. फिर, गुंडों-लफंगों की संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और वे भी, बिना कोई पैसा लिए, श्रीराम की सेवा में, उनकी जय के नारे लगाते हुए, निरपराध दूसरों को घेरकर, उन्हें मार-पीटते, जब-तब मौत के घाट उतारते हुए, व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय हित में लगे रहते हैं.
हिंसा सदियों से रोज़गार रहा है और हमारे समय में उसमें बहुत इज़ाफ़ा हुआ है.
यह अटकल लगाने का काफ़ी आधार है कि ऐसे पत्रकारों और अन्य क़िस्म के प्रचारकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है जो स्वामिभक्त हैं और सत्ता का लगातार बचाव करते रहते हैं. फिर सत्ताधारियों की रैलियों, रोड शो आदि में वक़्तन-फ़ावक़्तन भीड़ और उसे कुछ पैसा आदि देकर जुटाने की दरकार होती है: यह भी एक अलक्षित रोज़गार है. कहीं पढ़ा कि हमारे शीर्ष नेता ने एक हज़ार से अधिक दिन रोड शो आदि में बिताये हैं.
टेलीविजन पर जो नए-नए चैनल आते रहते हैं उनमें एंकरों आदि की बड़ी संख्या रोज़गार पाती है. भले उनमें से कई गोदी मीडिया की तरह, भाषा और माहौल बिगाड़ने में सक्रिय होते हैं, कुल रोज़गार की गणना में उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता. यह अगर प्रश्न हो सकता है कि इस रोज़गार से कितना उत्पादन बढ़ा है, इतना तो स्पष्ट है कि झूठ-घृणा-हिंसा-भेदभाव का उत्पादन बढ़ा है. रोज़गार और राष्ट्रीय हित के बीच एक नया संबंध बना है.
91 बरस पहले
21 से 25 जून 1935 को पेरिस में इंटरनेशनल राइटर्स कांग्रेस फॉर द डिफेंस ऑफ कल्चर आयोजित हुई जिसका हेनरी बारबूस, लुई अरांगा, मैक्सिम गोर्की, रोम्यां रोलां, आंद्रे ब्रेतां, आंद्रे मालरो, आंद्रे ज़ीद आदि ने आह्वान किया था. इस कांग्रेस में ईएम फास्टर, एलडस हक्सले, वर्जीनिया वुल्फ, पाब्लो नेरूदा, बर्नार्ड शॉ, यूजीन ओ नील, बर्तोल्त ब्रेख्त, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, बोरिस पास्तरनाक, टॉमस मान आदि ने भाग लिया.
38 देशों से 200 से अधिक लेखक और बुद्धिजीवियों ने यूरोप पर मंडरा रहे फासीवाद के विरुद्ध इस अभियान में भाग लिया. भारत से भी मुल्क राज आनंद और सज्जाद ज़हीर इस कांग्रेस में शामिल हुए.
अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘लैंगुएजेज़ ऑफ फ्रीडम’ (स्पीकिंग टाइगर्स) में राजनीतिशास्त्री नीरा चंधोक ने इस कांग्रेस का विवरण देते हुए बताया है कि वाममार्गी उनके अलग-अलग संप्रदाय के लोग, मध्यममार्गी, अतियथार्थवादी, अवां गार्द की हस्तियां, उदारपंथी, शांतिवादी आदि उसमें फासीवाद के विरुद्ध एकजुट हुए. पांच दिनों तक हज़ारों श्रोताओं के सामने अपने समय में सर्वसत्तावादी ख़तरे से निपटने के लिए संभव उपायों पर चर्चा की.
सभी लेखक बर्बरता के विरुद्ध थे पर उनके बीच इस पर विवाद था कि साहित्य का प्रोटोकोल और लेखक की ज़िम्मेदारी क्या हो. कई बार प्रभाववादियों और सामाजिक यथार्थवादियों के बीच झगड़े पेरिस की सड़कों तक पर हुए और हाथापाई तक की नौबत आ गई.
आंद्रे ज़ीद ने इस रुख़ का खंडन किया कि लेखक को लिखने के लिए एकांत चाहिए. उनका इसरार था कि वह लेखक कृत्रिम होगा जिसका सचाई से संबंध न हो. उन्होंने यह भी कहा कि लेखक को विचारों के उस संसार से प्रतिबद्ध होना चाहिए जिनका लक्ष्य संसार में परिवर्तन लाना हो.
पास्तरनाक ने संगठन बनाने या संगठित होने के विरुद्ध चेतावनी दी और कहा कि लेखक की निजी मुक्ति ही मैटर करती है. संगठन कला की मृत्यु होता है. यह उल्लेखनीय है कि आंद्रे ज़ीद को लगभग दस बरस बाद और पास्तरनाक को लगभग बीस बरस बाद नोबेल पुरस्कार मिला. जो भी हो, यह कांग्रेस फ़ासीवाद के विरुद्ध सबसे बड़ा आयोजन थी. कहा जाता है कि भारत में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के लिए जो तत्व प्रेरिक थे उनमें यह कांग्रेस भी थी.
इस समय भारत में जो राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति है और उदार मूल्यों पर जिस तरह से सुनियोजित हमले लगातार हो रहे हैं उसमें हम कई लेखकों और कलाकार मित्रों को लग रहा है कि सृजन और बौद्धिक समुदाय को इस समय चुप नहीं बैठना चाहिए, अपनी समवेत आवाज़ उठाना चाहिए.
