एल्गार परिषद केस: एनआईए ने वर्नोन गोंज़ाल्विस और अरुण फरेरा की ज़मानत रद्द करने की अर्ज़ी दी

एनआईए ने अधिकार कार्यकर्ताओं- वर्नोन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा की ज़मानत रद्द करने के लिए मुंबई प्रेस क्लब में आरोपियों के कुछ पत्रकारों से अनौपचारिक मुलाकात को आधार बताया है. एजेंसी ने पिछले महीने तेलुगु कवि-कार्यकर्ता वरवरा राव और वकील-शिक्षाविद सुधा भारद्वाज की ज़मानत रद्द करने के लिए दायर अर्ज़ी में भी यही तर्क दिए थे.

वर्नोन गोंसाल्विस और अरुण फरेरा.

मंगलुरु: एल्गार परिषद मामले में लंबे समय तक जेल में रहने और फिर ज़मानत पर रिहा होने के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अधिकार कार्यकर्ताओं – वर्नोन गोंज़ाल्विस और अरुण फरेरा – को फिर से जेल भेजने की कोशिश कर रही है.

एनआईए ने पिछले महीने तेलुगु कवि-कार्यकर्ता वरवरा राव और वकील-शिक्षाविद सुधा भारद्वाज की जमानत रद्द करने की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था. बुधवार, 10 जून को एजेंसी ने वर्नोन गोंज़ाल्विस और अरुण फरेरा की जमानत रद्द करने की मांग करते हुए एक नया आवेदन दायर किया.

यह कदम मुंबई प्रेस क्लब में चल रहे विवाद के बाद उठाया गया, जहां आरोपियों ने कुछ पत्रकारों से अनौपचारिक मुलाकात की थी. केंद्रीय एजेंसी का दावा है कि यह उनकी जमानत की शर्तों का उल्लंघन है.

जमानत रद्द करने के लिए दायर नए आवेदनों में एजेंसी ने एक बार फिर वही आधार बताए है कि गोंज़ाल्विस और फरेरा को इस मामले या इसी तरह के अन्य मामलों में शामिल किसी भी व्यक्ति से संपर्क में रहने की मनाही है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2023 में गोंज़ाल्विस और फरेरा को जमानत दी थी, लेकिन जमानत की शर्तें मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने तय की थीं.

राव और भारद्वाज के मामले में पहले दाखिल की गई ज़मानत रद्द करने की अर्ज़ियों में भी यही तर्क दिए गए थे.

एजेंसी का आरोप है कि 19 जनवरी को प्रेस क्लब में हुई बैठक प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन की विचारधारा का प्रचार करने के लिए आयोजित की गई थी.

एनआईए ने एल्गार परिषद मामले के आरोपियों की जमानत रद्द कराने के लिए उनके फोन कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन और मुंबई प्रेस क्लब की आंतरिक रिपोर्ट का सहारा लिया है.

इस मामले की अगली सुनवाई 19 जून को होगी.

इस मामले में ज़मानत पाने वाले सभी आरोपी सुनवाई के लिए नियमित रूप से अदालत आते रहे हैं. हालांकि ज़मानत की शर्तें उन्हें एक-दूसरे से मिलने से रोकती हैं, लेकिन यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है क्योंकि उन्हें हर पखवाड़े अदालत की तारीखों पर और जब भी मामले में अर्ज़ियां दाखिल की जाती हैं, तब अदालत में एकत्र होना पड़ता है.

मुंबई प्रेस क्लब विवाद की शुरुआत 19 जनवरी को क्लब परिसर में एल्गार परिषद मामले के कुछ आरोपियों की एक अनौपचारिक बैठक से हुई थी. क्लब ने इस बैठक के आयोजन के लिए तीन वरिष्ठ पत्रकारों- गुरबीर सिंह, बर्नार्ड डी’मेलो और श्रीकांत मोदक को कारण बताओ नोटिस जारी किया तथा उनकी सदस्यता छह वर्षों के लिए निलंबित कर दी.

सिंह ने मुंबई सिटी सिविल कोर्ट का रुख किया और अपने पक्ष में अंतरिम आदेश प्राप्त किया, जिसके तहत न केवल उनकी सदस्यता बहाल की गई बल्कि उन्हें क्लब के आगामी चुनाव लड़ने की अनुमति भी दी गई. अदालत ने अंतरिम आदेश में टिप्पणी की कि ‘प्रथमदृष्टया यह कार्रवाई केवल उन्हें क्लब के चुनाव लड़ने से रोकने के उद्देश्य से की गई प्रतीत होती है.’

हालांकि, क्लब के सदस्यों के बीच इस खींचतान का उन कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों की ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ता है, जो लंबे समय से जेल में बंद हैं, जबकि उनके मामले की सुनवाई शुरू होने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं. कई स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों और डिजिटल एक्सपर्ट्स ने 2018 में एल्गार परिषद मामले के आधार बने डिजिटल सबूतों की सच्चाई पर सवाल उठाए हैं.

वर्ष 2021 में द वायर द्वारा प्रकाशित एक संयुक्त पड़ताल के तहत यह पाया गया था कि मामले में नामजद कई कार्यकर्ता पेगासस मैलवेयर के संभावित शिकार भी थे. द वायर के निष्कर्षों की पुष्टि करने वाली इसी प्रकार की रिपोर्ट्स विभिन्न स्वतंत्र प्रयोगशालाओं द्वारा भी जारी की गई थीं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)