उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों में स्थापित किए जाएंगे ‘धर्मांतरण-रोधी’ सेल

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने निर्देश दिया कि सभी यूनिवर्सिटी और उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्मांतरण रोधी प्रकोष्ठ बनाए जाएं. पत्र में कहा गया है कि छात्रों को प्रभावित करके, उनमें डर पैदा करके, मानसिक दबाव बनाकर या अनैतिक प्रलोभन देकर किए जाने वाले किसी भी प्रकार के अवैध या जबरन धार्मिक धर्मांतरण के प्रयास पूरी तरह अस्वीकार्य, अनैतिक और क़ानून के ख़िलाफ़ हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों और मेडिकल, डेंटल कॉलेजों में ‘धर्मांतरण-रोधी प्रकोष्ठ’ (anti-conversion cells) स्थापित करने का निर्देश दिया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस कदम को राज्य की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार का समर्थन प्राप्त है.

राज्यपाल सचिवालय द्वारा कुलपतियों, सभी राज्य विश्वविद्यालयों और संस्थानों के निदेशकों तथा सभी उच्च शिक्षण संस्थानों, जिनमें मेडिकल संस्थान और अन्य संस्थाएं शामिल हैं, को भेजे गए एक पत्र में कहा गया है कि छात्रों को कथित रूप से प्रलोभन, मनोवैज्ञानिक दबाव या अन्य अनैतिक तरीकों के माध्यम से प्रभावित किए जाने (धर्मांतरण के लिए) की खबरों के मद्देनज़र परामर्श सेवाओं, निगरानी प्रणालियों, छात्र कल्याण तंत्र, शिकायत एवं रिपोर्टिंग प्रक्रियाओं को मजबूत किया जाए और निवारक सुरक्षा उपाय स्थापित किए जाएं.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पत्र में कहा गया है, ‘छात्रों को प्रभावित करके, उनमें भय पैदा करके, मानसिक दबाव बनाकर या अनैतिक प्रलोभन देकर किए जाने वाले किसी भी प्रकार के अवैध या जबरन धार्मिक धर्मांतरण के प्रयास पूरी तरह अस्वीकार्य, अनैतिक और कानून के खिलाफ हैं.’

पत्र में यह भी दावा किया गया है कि ‘प्रलोभन या मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से छात्रों का धर्मांतरण करने के प्रयासों’ संबंधी खबरें लगातार मिल रही हैं. ‘विश्वविद्यालय और संस्थान के स्तर पर ‘कट्टरपंथ-विरोधी’ इकाइयों या छात्र कल्याण प्रकोष्ठों को बहुत सक्रिय किया जाना चाहिए.’

पत्र में यह भी सुझाव दिया गया है कि संस्थान ‘नैतिक मूल्यों, तार्किक सोच और कानूनी अधिकारों’ पर लेक्चर और सेमिनार आयोजित करें. साथ ही, यह निर्देश भी दिया गया है कि यदि कोई संगठन, समूह या व्यक्ति धर्मांतरण के प्रयासों से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है, तो इसकी सूचना तत्काल स्थानीय प्रशासन और पुलिस को दी जाए.

पत्र में आगे कहा गया है कि ऐसे मामलों में राज्य के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए.

गौरतलब है कि द वायर पहले भी अपनी रिपोर्ट में बता चुका है कि धर्मांतरण-विरोधी कानूनों का इस्तेमाल प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कई बार स्वतः संज्ञान लेकर या राजनीतिक निर्देशों के तहत दुरुपयोग के रूप में किया जाता है. बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों से जुड़े लोग भी इनका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को परेशान करने के लिए करते हैं. कोई भी गैर-हिंदू संस्थान या समूह जो मुफ्त क्लिनिक, स्कॉलरशिप या यहां तक ​​कि एक मैत्रीपूर्ण प्रार्थना सभा का आयोजन करता है, वह जांच के दायरे में आ जाता है और उसके बाद कानूनी और गैर-कानूनी तरीके से परेशान किया जाता है.

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें किसी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन द्वारा शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद पुलिस ने कमजोर या लगभग न के बराबर सबूतों के बावजूद तुरंत कार्रवाई की. कम दोषसिद्धि दर को देखते हुए, गिरफ्तारियां, अदालती मुकदमे और हिंसा सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करते हैं. इन कानूनों को लेकर यह धारणा बनी है कि उनका उपयोग धर्मांतरण रोकने के बजाय अल्पसंख्यकों को डराने करने के लिए एक हथियार के रूप में किया जा रहा है.

इसी वर्ष अप्रैल में उत्तर प्रदेश विधि-विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत दर्ज की जा रही झूठी एफआईआर की ‘चिंताजनक प्रवृत्ति’ की आलोचना करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को निर्देश दिया था कि वे व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि ऐसे मामलों में क्या कार्रवाई की जा रही है.