बशीर बद्र: बादल का साया है दुनिया, हर शै आनी-जानी है

द वायर उर्दू के संपादक फ़ैयाज़ अहमद वजीह मक़बूल शायर बशीर बद्र को याद करते हुए लिखते हैं कि 'सादा लफ़्ज़ों की मीनाकारी उनके यहां इस क़दर है कि उन्हें उर्दू शायरी का ‘गोल्डस्मिथ’ और ‘ज़रगर’ कहते हुए मेरे सामने उस कुम्हार की सूरत आ जाती है जो कच्ची मिट्टी के साथ रक्स करते हुए अपनी आंखों के सुनहरे जादू जगाता है. बशीर बद्र इसी जादू के शायर हैं.'

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'बशीर बद्र की पूरी शायरी ही ‘बोल-बतिया लेने’ की शायरी है, जिसमें एकांत के शोर की परतें दबे पांव की तरह अंदर कहीं मौजूद हैं.' (फोटो साभार: bashirbadr.com/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बशीर बद्र चले गए– ये ख़बर अख़बारों की सुर्ख़ी का सत्य हो सकती है; सुख़न-परस्तों के लिए तो ग़ज़ल की ज़बान में उनका कहा हुआ ही हर्फ़-ए-आख़िर है कि;

‘हम जो मिट जाएंगे, मिट जाएगी तहज़ीब-ए-ग़ज़ल’

और ये ‘तहज़ीब-ए-ग़ज़ल’ – जिसे हम नफ़ासत कहें, शाइस्तगी का नाम दें, लहजे की मिठास समझें या फिर सांस्कृतिक सौंदर्य और वैभव के रूप में देखना पसंद करें – जो हमारे ज़माने में कई मानों में बशीर बद्र से मख़्सूस है, उसकी ख़ुशबू अभी तक जाने कितनी सांसों में रची-बसी है.

हां, बशीर बद्र के चराग़ से लौ जलाने वाली हमारी शायरी का सिलसिला भी यक़ीन दिलाता है कि वो ग़ज़ल की नई रिवायत के बड़े दस्तख़त के रूप में देर तक हमारे साथ रहेंगे.

दरअसल, मुझ जैसे पाठक के लिए उर्दू शायरी के इस ‘गोल्डस्मिथ’ को मौत उसी वक़्त आ सकती है, जब ला-मुहाला हमारी बोल-चाल के लफ़्ज़ मिटा दिए जाएं या किसी तौर पर हमें ‘नए इंसान की चेतना’ ही से महरूम कर दिया जाए. यहां ‘नए इंसान की चेतना’ को ‘नए मिज़ाज के शहर’ और उसमें पैदा होने वाले ‘फ़ासलों’ के दर्शन के आलोक में देखा जाना चाहिए, क्यों कि पाठक के लिए ये बशीर बद्र के एहसास में तैरती लहरों की सबसे बड़ी वैचारिक कुंजी हो सकती है.

बहरहाल, ये सच है कि बशीर बद्र के हम-ज़ाद यानी सैयद मोहम्मद बशीर (1935-2026) हम से रुख़्सत हो गए, और बशीर बद्र वैसे ही मौजूद हैं जैसे उनके ला-फ़ानी शेर. मैं अपनी बात करूं तो कम-ओ-बेश तीन दहाइयों से इन्हें पढ़ते-सुनते हमारा अनुभव है कि इन्होंने उर्दू ग़ज़ल को हमारे व्यवहार की ज़बान में ढाल दिया है, और वो कई तरह से हमारी आदत बन चुके हैं.

यूं कह लें कि हमारे प्रेम की भाषा इस शायरी में है, हमारी मासूमियत की तितली इस शायरी में है, हमारे रोने-गाने का लम्हा इस शायरी में है और हमारी सियासत की मुंह बोलती तस्वीर भी इस शायरी में है. अब इस क़द और मर्तबे का शायर हमारे बीच से भला कैसे जा सकता है.

कभी मंटो ने अपने बारे में ये बात कही थी, ‘हो सकता है कि सआदत हसन मर जाए और मंटो न मरे…’ और आज मैं बशीर बद्र के लिए उसी बात को दोहरा रहा हूं. हां, मौत कई बार हम से हार जाती है, और हम किसी मंटो और बशीर बद्र की लाज़वाल रचनाओं से अपने जीवन के रंगों को चुनते रहते हैं.

बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया से जूझ रहे थे, उनकी यादें मर रही थीं, ऐसे में कोई नया शेर तो खैर कहां से आता, लेकिन इस दौरान भी उनकी शायरी रोज़मर्रा की ज़रूरत की तरह हमारे रहन-सहन और व्यवहार में शामिल रही और युगों तक रहेगी. दरअसल, कई बार ऐसा भी लगता है कि अगर हमारे ज़माने में ग़ज़ल को कहावत, लोकोक्ति और मुहावरे का नाम देना हो तो बशीर बद्र की शायरी इसकी सबसे अच्छी मिसाल है.

मैं यहां विशेष तौर पर उनकी शायरी के जिस हिस्से की तरफ़ इशारा करना चाहता हूं, वो सीधे-सादे लफ़्ज़ों की शायरी से ज़रा पहले हमारी ‘बातचीत’ ही है. और ये इस हद तक ‘बातचीत’ है कि जब शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी जैसे आलोचक ने इस पर उंगली रखने की कोशिश करते हुए कह दिया कि बशीर बद्र के यहां अलिफ़ )उर्दू वर्णमाला का अक्षर (गिर जाता है और ‘य’ (उर्दू वर्णमाला का एक और अक्षर) ग़ायब हो जाती है, तो उन्होंने इसे अपनी शायरी में किसी तरह का कच्चा-पन मानने के बजाय जवाब दिया कि ‘मेरा अतीत अयोध्या से जुड़ा हुआ है. बस्ती से ताल्लुक़ है जहां ‘य’ को पूरी तरह खींचना और उर्दू का ‘अलिफ़’ पूरे ज़ोर से अदा करना अवधी को पंजाबी बना देता है…’

अब हमारी बोल-चाल को मिट्टी की ख़ुशबू के साथ इस हद तक अपना लेने वाले बशीर बद्र को मौत कैसे आ सकती है. गोया कि जो बदन रुख़्सत हुआ, वो सैयद मोहम्मद बशीर का था, उस बशीर का जो अपनी याददाश्त के टूटते-बिखरते टुकड़ों में कहीं सिमटता जा रहा था, और कई बार अपनी टूटती काया में भी बशीर बद्र के लफ़्ज़ों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था.

(फोटो साभार: bashirbadr.com)

‘वो ग़ज़ल का लहजा… न कहा हुआ न सुना हुआ’

फिर कहने दीजिए कि अपनी शायरी में आम लोगों की बोली बोलने वाली रूह बशीर बद्र की है, जो आज भी हमारी दुनिया से हम-कलाम है. सच है कि उर्दू को अवधी और हिंदी का रंग देने वाले इस शायर ने अलंकृत शायरी के उस रूप में भी शायरी की जहां फ़ारसी ग़ज़ल की परंपरा ज़रा गहरी है. लेकिन जब अपनी रचनात्मकता की तरफ़ आए तो ऐसा भी हुआ कि ‘चांद’ को ‘चांद’ ही लिखा और अरबी-फ़ारसी की रिवायत से आने वाले शब्दों की गुंजाइश ही ख़त्म कर दी.

रही बात फ़ारसी तराकीब (शब्द-संयोजन) और इज़ाफ़त (संबंध सूचक) की तो इससे भी एक तरह की दूरी इख़्तियार करने लगे, और बोल-चाल की सीधी-सादी ज़बान को ग़ज़ल के आहंग में संवारने लगे. बोल-चाल को ग़ज़ल की ज़बान बनाने वाले इनसे पहले भी आए और बाद में भी देखे गए, लेकिन बशीर बद्र की तरह आम इंसानी सतह को छूने वाली और ग़ज़ल का मान रखने वाली काव्यात्मक भाषा अपने नए व्याकरण और समकालीन संवेदना के साथ इस तरह कहीं और कहां पैदा हो सकी कि;

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता

क्या इस शायरी की संवेदना हर युग की समकालीन संवेदना नहीं है, और क्या ये शाश्वत सत्य का रूप धर लेने के बाद भी हमारी अपनी ही ज़बान का अलाप नहीं है. हां, ये मोमिन की मशहूर-ए-ज़माना ग़ज़ल की याद भी दिलाती है, लेकिन यहां उस परंपरा का फ़र्क़ भी साफ़ है, जहां फ़ारसी रिवायत से अलग हिंदुस्तानी बोली का रंग कुछ ज़्यादा ही चोखा आया है, और शायद ये रंग इसलिए भी इन्हें रास आया कि इनके सामने ‘नई दुनिया’ और ‘नए इंसान’ के मसले थे और कई बार ये मसले इनके अपने जीवन के निजी अनुभव भी थे.

दरअसल, मेरठ के सांप्रदायिक दंगों की चोट, उसमें ख़ाक हो जाने वाली उनकी शायरी और फिर हिजरत का दर्द- उनके एहसास पर रेंगने वाली व्यथा ही नहीं, बल्कि उस सब्र और ज़ब्त की कहानी भी है, जहां एक ज़रा सी उजलत से शायरी इश्तिहारी हो सकती थी, उसका लहजा लाउड हो सकता था, लेकिन उन्होंने अपने ज़ब्त के दायरे में दर्द की ऐसी कहानी सुनाई और ग़ज़ल को क़िस्सा-गोई के ऐसे फन में ढाल दिया कि ये कई ज़मानों के इंसानों के दुख की रुदाद बनती चली गई.

यूं देखें तो बशीर बद्र ने जी भर अपनी दास्तान सुनाई, लेकिन शायरी की हद तक उसे कभी अपनी मज़लूमियत का इश्तिहार नहीं बनने दिया. दरअसल, उदासी और किसी हद तक मज़लूमियत का ये साया उनकी शायरी के बयान के किसी एकांत में इस तरह पड़ता रहा कि;

आज हम सब के साथ ख़ूब हंसे
और फिर देर तक उदास रहे

इसी बात को यूं कह लीजिए कि उनकी शायरी में उदासी और मज़लूमियत शोर पैदा नहीं करती, बल्कि चुपचाप एकांत की गहराइयों को और गहरा करती चली जाती है. यूं परतों में लिपटी एकांत की ऐसी गहराई शायद इसलिए भी इनके यहां पैदा हुई कि वो अपने आस-पास की बातचीत में लफ़्ज़ों के ठहराव को सुन रहे थे, उसकी ख़ामोशी को महसूस कर रहे थे और अपने अंदर उठने वाली ग़ज़ल की तरंग को काग़ज़ की सतह पर किसी तस्वीर की तरह सजल कैफ़ियत में उतार रहे थे.

यही वजह है कि मैं इन्हें उर्दू की स्वाभाविकता, सरलता और प्रवाह का ‘गोल्डस्मिथ’ कहता रहा हूं. आप चाहें तो इसे उनके लहजे की ‘बे-तकल्लुफ़ी’ कह लें, और ये वही ‘बे-तकल्लुफ़ी’ है जो गांव और उसके चौपाल की बतकही में सुनाई पड़ती है. यूं देखें तो बात वो ‘नए इंसान’ और ‘नई दुनिया’ की करते हैं, लेकिन लहजा अपने गांव की चौपाल में तलाश करते हैं. और ये दो तहज़ीबों के मिलन से ज़्यादा अपने दुख की उस मस्ती का राग है, जिसे बोल-बतिया लेने वाले देहात की मिट्टी से उठाया गया और बंद कमरों के नए इंसान के आंसूओं पर मल दिया गया.

असल में बशीर बद्र की पूरी शायरी ही ‘बोल-बतिया लेने’ की शायरी है, जिसमें एकांत के शोर की परतें दबे पांव की तरह अंदर कहीं मौजूद हैं. इस ख़ूबी से मालामाल शायरी के बारे में कहने को ये भी कहा जा सकता है कि बशीर बद्र जैसे-जैसे मुशायरों में मक़बूल होते गए, उनकी ज़बान आसान होती चली गई. हालांकि, बात ऐसी सादा भी नहीं है.

बहरहाल, भाषा की सरलता और कई बार मुशायरे की शायरी के बावजूद उर्दू आलोचना में वो महत्वपूर्ण, बल्कि प्रतिनिधि शायर बने रहे. ऐसा कैसे हुआ तो इसका सीधा-सा जवाब ये हो सकता है कि अपने समकालीनों की तुलना में उन्होंने ज़बान की तोड़-फोड़ और फ़ैशन वाली दुरूहता को ज़्यादा नहीं अपनाया, और अभिव्यक्ति की विलक्षणता और मौलिकता को अपनी शायरी का गहना बनाने पर ज़ोर देने लगे. इस विशिष्टता में भाषा का प्रयोग उसकी सहजता और प्रवाह के साथ ही लयात्मकता की शैली भी उनकी एक बड़ी ख़ूबी नज़र आती है.

‘है कौन पिरोये जो बिखराई हुई ग़ज़लें’

यहां मुझे ये बात दोहराने दीजिए कि सादा लफ़्ज़ों की मीनाकारी उनके यहां इस क़दर है कि उन्हें उर्दू शायरी का ‘गोल्डस्मिथ’ और ‘ज़रगर’ कहते हुए मेरे सामने उस कुम्हार की सूरत आ जाती है जो कच्ची मिट्टी के साथ रक्स करते हुए अपनी आंखों के सुनहरे जादू जगाता है.

बशीर बद्र इसी जादू के शायर हैं. हां, उन्होंने ग़ज़ल में नई तस्वीरें उतारीं और नए-नए अंदाज़ में अपनी बातें यूं कही कि;

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया न कहा हुआ न सुना हुआ

शायरी से अलग उनकी शख़्सियत का अपना करिश्मा भी था, वो एक ख़ास अंदाज़ और लय में ठहर-ठहरकर शेर पढ़ते थे और कई बार ऐसी भूमिका बांधते थे कि अब कोई बहुत नाज़ुक-सी बात या ऐसी बात कह देंगे जो शायरी में पहले नहीं कही गई. और ये उस मुशायरा-बाज़ी से अलग कोई चीज़ थी जहां नाचने-गाने को ही शायरी समझ लिया जाता है.

बहरहाल, बशीर बद्र की शोहरत बहुत हद तक अवामी है- लेकिन, पड़ोसी मुल्क से कूटनीतिक संबंधों का मौक़ा रहा हो या संसद में इल्ज़ाम-तराशी के दौरान तंज़ के तीर चलाए गए हों -इनके शेर सुनाई पड़ते रहे. कमाल ये है कि इस क़दर अवामी शायर होने के बावजूद उन्हें साहित्य की दुनिया में भी किसी-न-किसी तौर पर तस्लीम किय गया. हालांकि, उर्दू आलोचना उन्हें खुले दिल से बड़ा शायर कहने से बचती रही.

इसके बरअक्स उनकी शेख़ी को निशाना बनाया और उनके बड़े सारे ऐब भी निकाले गए. शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी ने तो यहां तक लिख दिया कि, ‘बशीर बद्र अल्फ़ाज़ के ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल और तकनीकी ख़ामियों से बच निकलें [इनके यहां हुरूफ़ इस कसरत से दबते हैं कि शेर का आहंग बुरी तरह मजरूह हो जाता है] तो वो एक महदूद क़िस्म की, लेकिन अच्छी इश्क़िया शायरी कर सकते हैं.’

यहां कई बातें अपनी जगह ठीक हो सकती हैं, लेकिन क्या हमारी आलोचना ने इस तरह भी विचार किया कि उयूब या कमी-कोताही तो ग़ालिब के कलाम में भी है, फिर ऐसी किसी बात को उठाकर कहना कि ‘महदूद क़िस्म की, लेकिन अच्छी इश्क़िया शायरी कर सकते है…’ हमारी आलोचना में बे-मतलब की ऐंठ नहीं तो और क्या है. मैं तो इसे बे-मतलब की बौद्धिकता भी कहूंगा, जो दिशानिर्देश भी जारी करती है.

असल में हमारे यहां ऐसी आलोचना की भी अपनी मजबूरी रही है कि वो याद किए गए सबक़ से अलग कोई सबक़ पढ़ने का हौसला पैदा नहीं कर सकी, फिर निजी रंजिशें भी हैं.

(फोटो साभार: bashirbadr.com)

‘मैं पयंबर तो नहीं…’

मैं ये नहीं कह रहा हूं कि बशीर बद्र ने कमज़ोर या ख़राब शायरी नहीं की, ख़ूब की है. लेकिन इस बिना पर उनके पूरे क़द को नाप देना और इस तरह कमतर साबित करने की कोशिश करना, वो भी तब जब उन्होंने सौ तरह के मज़मून बांधे हों- मेरे ख़याल में और कुछ नहीं तोते की राएं-टाएं ही है.

उनकी कमज़ोर शायरी, मुशायरा-गर्दी और बड़बोलेपन के बावजूद मेरी निजी राय है कि बशीर बद्र उन चंद बड़े शायरों में हैं, जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल को हर तरह से नई दिशा दी, और कई मानों में ग़ज़ल को बदल भी दिया. हां, उनकी शायरी अपने समय से नज़र नहीं चुराती और बशीर बद्र के शब्दों में कहें तो पहले जो ग़ज़ल शराब पी रही थी वो इनके यहां नीम का रस पीने लगी.

मैं तो ये भी कह सकता हूं कि बशीर बद्र की सारी अच्छी-बुरी शायरी एक तरफ़, उन सारे शेरों का क्या जिनको अपनी बेपनाह शोहरत की वजह से किसी सनद की भी ज़रूरत नहीं. बहरहाल, ऐसे ही एक शेर का क़िस्सा नक़ल कर देता हूं कि इसकी शोहरत अपने शायर से भी कहीं ज़्यादा है, पहले शेर दोहरा लीजिए कि;

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

जी, ये वही शेर है जो बस और ट्रक पर लिखा गया और चश्मे की दुकान पर भी. और यही शेर दिलीप कुमार की ज़बान पर जारी रहा और मीना कुमारी की डायरी में भी महफूज़ रहा और तो और हमारी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के किसी कमरे की दीवार पर भी आवेज़ां देखा गया. कहते हैं मीना कुमारी को ये शेर इतना पसंद था कि अंग्रेज़ी की एक पत्रिका में उन्होंने अपनी लिखावट में इसे छपवा दिया था.

इससे पहले कि कोई इसे सिर्फ़ आवामी शेर क़रार दे, कह देना चाहिए कि शमीम हनफ़ी जैसे बड़े आलोचक ने भी इस शेर की ‘बे-तकल्लुफ़ी’ को महसूस करते हुए इस तरह दाद दी कि; ‘शोहरत के मामले में बशीर बद्र से इस शेर का मुवाज़ना किया जाए तो शेर अपने शायर से चार गज़ आगे ही दिखाई देगा.’

गोया ये शेर ब-यक-वक़्त अवामी भी है, और आलोचना में भी उसकी ‘बे-तकल्लुफ़ी’ की दाद मौजूद है. बात वही है कि बशीर बद्र के पास उनकी कमज़ोर शायरी से ज़्यादा अच्छी शायरी है, और इस अच्छी शायरी में भी मौलिकता अपने किसी दूसरे समकालीन शायर से कहीं ज़्यादा है.

कहना चाहिए कि बशीर बद्र शायर हैं और थोड़ी-बहुत आलोचना लिखने वाले साहित्यकार भी. अलबत्ता जब वो आलोचना की किताब में अपने शेरों की मिसाल हद से ज़्यादा देते नज़र आते हैं तो बोर करने लगते हैं.

‘सुना है बद्र साहब महफ़िलों की जान होते हैं’

हालांकि जैसी अच्छी शायरी उन्होंने की और जितनी भी की, उसके बाद ‘इतराना’ एक हद तक बनता है. मगर क्या कीजिए कि आलोचना उन्हें खुले दिल से मुंह नहीं लगा रही थी और मुल्क के हर चौथे-पांचवें आदमी को उनकी शायरी याद थी, ऐसे में शायर की एक ‘अना’ ही थी जो उनसे कहलवा रही थी कि सिर्फ मीर और ग़ालिब ही मेरे हरीफ़ और प्रतिद्वंद्वी हैं.

बात निकली ही है तो हास्य-व्यंग के शायर साग़र ख़य्यामी का तज़्किरा भी कर ही दूं कि जब बशीर बद्र ने ग़ालिब और मीर को अपना हरीफ़ बताया तो साग़र ने तंज़ करते हुए लाल किले के मुशायरे में पढ़ दिया कि;

है ताल्लुक़ कबीर के घर से
रिश्ता रखते हैं मीर के घर से
डाका ग़ालिब के घर पड़ा साग़र
माल निकला बशीर के घर से

ऐसी बड़ी सारी बातें बशीर बद्र के लिए कही गईं, और शायद अपने समय में उन्हें सबसे ज़्यादा निशाना बनाया गया. इसका एक नुक़सान यूं हुआ कि उनकी संजीदा बातों पर भी विचार नहीं किया गया. जैसे मुझे उनका ये जुमला याद आ रहा है कि, ‘सच्ची ग़ज़ल के दो दुश्मन थे एक तो यही जो उर्दू को अरबी-फ़ारसी की बांदी समझने वाले थे और दूसरे मुशायरे में नाचने-गाने वाले. ’

ऐसे में जब कहा जाता है कि मुशायरे ने बशीर बद्र जैसे शायर को ख़राब किया, तो मुझे लगता है कि ये पूरा सच नहीं है. हां, उन्होंने मुशायरे की शान ऐसे भी बढ़ाई कि वहां तमाशे कम और ज़बान से कुर्बत पैदा करने के वसीले ज़्यादा नज़र आने लगे.

बहरहाल, मुशायरे का लेबल अच्छी शायरी को अदब से बाहर कर ही देता है, ऐसे में बशीर बद्र किसी हद तक फ़िराक़, सरदार जाफ़री, जज़्बी, और मजरूह वगैरह के साथ और बाद में मुशायरों से अलग साहित्य के हवालों में आते रहे.

हां, बशीर बद्र शेखी बघारते थे, डींग हांकते थे, मगर कोई तो बात है जो उनके दावे को सच साबित करती है, जैसे 1985 में आए ग़ज़ल संग्रह ‘आमद’ में उन्होंने 2035 के पाठकों के नाम एक ख़त लिखा, और दावा किया कि जो उर्दू और हिंदी बोल सकता है वो मेरी ग़ज़ल से बच नहीं सकता. और ये बात आज की सबसे बड़ी सच्चाई है.

‘कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे’

असल में वो अपनी ज़बान की जिस सादगी और आसानी पर इतराते रहे, उसने एक दो मौक़े पर उन्हें गुमराह भी किया और इस हद तक किया कि उन्होंने नस्री ग़ज़ल (गद्यात्मक ग़ज़ल) तक कहने का हौसला कर डाला, लेकिन जल्द ही एहसास हो गया कि ग़ज़ल का हुस्न उसके अपने सांचे में है, सो ग़ज़ल की तरफ लौट आए, यूं देखें तो उन्होंने नज़्म कहने की भी कोई बड़ी कोशिश नहीं की और अपनी सारी रचनात्मकता ग़ज़ल के नाम कर दी.

यूं भी किसी शायर की तअल्ली और आत्ममुग्धता को इतनी अहमियत नहीं देनी चाहिए, लेकिन बशीर बद्र के मामले में उनकी शायरी से ज़्यादा उनके दावों पर बात की गई, ये और बात है कि किसी सनद के बिना भी वो हमारे चंद मक़बूल और बड़े शायरों में हैं.

इन बातों से अलग देखिए तो कथित राजनीतिक स्वार्थ के लिए उन्होंने ख़ुद को कालिदास और मीर भी कहा और बड़बोलेपन की सारी हदें शायद उस वक़्त पार कर दीं, जब उन्होंने कह दिया कि, ‘इंसानियत की रौशनी मुझे भाजपा से मिली है…’

इसका सिरा तलाश करता हूं तो लगता है कि जबलपुर के उस कवि सम्मेलन से ये सब शुरू हुआ, जब मेरठ दंगे के बाद 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बशीर बद्र को गले लगाते हुए कह दिया कि, तुम्हारे घर जल जाने का मुझे बहुत दुख हुआ.

और बशीर बद्र ने शायराना जवाब इस तरह दिया कि, ‘मेरा घर नहीं जला… मेरा घर तो आपका और दुनिया के करोड़ों कविता प्रेमियों का दिल है, आप निश्चिंत रहें, भगवान की कृपा से वो बिल्कुल महफूज़ है…’

इसके बाद अटल जी से अक़ीदत और प्रेम की कहानी में वो मोड़ भी आया जब बशीर बद्र और कुछ दूसरे शायरों ने अटल फैन क्लब की स्थापना कर दी, जिसका मक़सद वाजपेयी को लखनऊ सीट से चुनाव जीतने में मदद करना था. ऐसे में जब उन्हें मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया तो कहा गया कि ये भाजपा से वफ़ादारी का सिला है.

उस वक़्त लोकसभा चुनाव के दौरान बशीर बद्र ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता भी ग्रहण की और वाजपेयी के लिए लखनऊ में उनके चुनाव प्रचार की कहानी तो कई बार लोगों से सुनी है. उस समय भाजपा प्रेम में वो उस प्रोपगैंडा के शिकार भी नज़र आए जो अल्लामा इक़बाल को आज भी इस तरह निशाना बनाती है कि ‘तराना-ए-हिन्दी‘ लिखने वाले इक़बाल ने बाद में ‘तराना-ए-मिल्ली‘  लिखा, जिसमें ‘मुस्लिम हैं हमवतन है सारा जहां हमारा’ जैसी बातें हैं.

हां, बशीर बद्र ने भाजपा और आरएसएस से दो क़दम आगे जाकर ‘सारे जहां से अच्छा…’ को इक़बाल की कमज़ोर रचना तक बता दिया, और ख़ुद को इक़बाल से अच्छा मुसलमान बताते हुए यहां तक कह दिया कि मैं राष्ट्रवादी भाजपा से प्रेम करता हूं. हैरत तब होती है जब वो अटल जी को अपना ‘अदबी और तहजीबी पिता’ तक कह देते हैं. शायद ये स्वार्थ की ही राजनीति थी जो वो भाजपा और अटल जी से अक़ीदत की हद तक प्रेम करते हुए अपनी देशभक्ति को भी इसी सियासी आईने में पेश कर रहे थे.

अलबत्ता वो उस समय वाजपेयी का चुनाव प्रचार छोड़कर लखनऊ से लौट आए थे जब उन्हें नरेंद्र मोदी के आने की ख़बर दी गई थी. इस बारे में उनका कहना था कि ‘नरेंद्र मोदी बुरे आदमी हैं मैं उन्हें कभी पसंद नहीं कर सकता…’ ये शायद उस आलोचना से बचने की दिशा में भी एक क़दम था जो गुजरात दंगे के बाद मोदी के लिए ज़ोर पकड़ रही थी, शायद उन्हें एहसास था कि भाजपा और अटल प्रेम की वजह से वो पहले ही एक बड़े वर्ग से नाराज़गी मोल ले चुके हैं, अब अगर मोदी के साथ भी चुनाव प्रचार किया तो उनपर सीधे-सीधे मुस्लिम दुश्मनी के आरोप लग सकते हैं.

बहरहाल, सच यही है कि मोदी से नफ़रत करने वाले बशीर बद्र मानते थे कि भाजपा ने उन्हें इंसान बनाया. ऐसे में एक पाठक के तौर पर मैं उनके बड़बोले-पन, ओहदे की सियासत और ख़ुद को एक कल्चर हीरो के तौर पर मनवाने की उनकी कोशिश को याद रखते हुए भी एक बड़े शायर से अपनी मोहब्बत के इज़हार में उन्हीं का शेर दोहराना चाहता हूं कि;

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

हां, मैं उसी बशीर बद्र को याद रखना चाहता हूं जो एक छात्र की हैसियत से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए तो वहां उनकी ग़ज़ल पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही थी, मैं उस बशीर बद्र को याद रखना चाहता हूं जिसने इसी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘अलीगढ़ मैगज़ीन’ के संपादक की हैसियत से ग़ालिब के हवाले से एक यादगार अंक हमें दिया.

सच कहूं तो मैं बशीर बद्र को सिर्फ इसलिए भी याद रख सकता हूं कि उन्होंने गांव-देहात के गीतों को ग़ज़ल की ज़बान में ढालने की कल्पना की थी. रही बात शायरी की तो उनके पास अच्छी और बहुत अच्छी शायरी है, जहां हमारी आलोचना को संभलकर क़दम रखने की ज़रूरत है.