महाभारत और जाति का सवाल: क्या इसे राष्ट्रीय महाकाव्य कहा जाना चाहिए?

पुस्तक अंश : एक ग्रन्थ के रूप में इसकी क्रमागत उन्नति के इतिहास के बावजूद जो सम्भावित प्रश्न इक्कीसवीं सदी के ‘महाभारत’ के श्रोता अथवा पाठक पूछ सकते हैं वह यह है कि, ‘क्या यह विभाजनकारी सामाजिक प्रथाओं को न्यायोचित ठहराता है?’ और यदि ऐसा है तो क्या हमें इसे एक राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा देना चाहिए?

"‘महाभारत’ ने अतीत के स्मरण की एक अनूठी विधि का निर्माण किया. भारत ने इस विधि को अपनी राष्ट्रीय स्मृति को संरक्षित करने के एक माध्यम के रूप में आत्मसात कर लिया है. इस प्रकार, इस अर्थ में ‘महाभारत’ हमारा एक राष्ट्रीय महाकाव्य है." (आवरण साभार: राजकमल प्रकाशन)

भारतीय साहित्य, संस्कृति और इतिहास की समझ में महाभारत की केंद्रीय भूमिका रही है. लेकिन क्या इस महाकाव्य को केवल एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा जाना चाहिए, या इसके भीतर मौजूद सामाजिक और वैचारिक अंतर्विरोधों की भी पड़ताल जरूरी है? साहित्यिक आलोचक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता गणेश नारायण देवी (जी. एन. देवी) अपनी पुस्तक महाभारत: महाकाव्य एवं राष्ट्र में इसी प्रश्न पर विचार करते हैं. प्रस्तुत अंश में वे डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के संदर्भ में महाभारत, जाति व्यवस्था, राष्ट्र की अवधारणा और भारतीय समाज के संबंधों की पड़ताल करते हैं. हिंदी में इसका अनुवाद हरि प्रताप त्रिपाठी ने किया है और इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

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कुरुक्षेत्र के युद्ध के प्रारम्भ में अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से कहते हैं—

‘हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा. अतएव हे माधव! अपने ही बन्धु एवं धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे. यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते; तब भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोषों को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों विचार नहीं करना चाहिए. कुल के नाश से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है. हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यन्त दूषित हो जाती हैं—और स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है. वर्णसंकर कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है. लुप्त हुई पिंड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर भी अधोगति को प्राप्त होते हैं. इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं…हा शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं. यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करनेवाले को शस्त्र हाथ में लिये हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मरना भी मेरे लिए कल्याणकारी होगा.’

यह जानते हुए भी कि उनकी पत्नी द्रौपदी पांचों पांडवों की साझी स्त्री है, अर्जुन ऐसे वचन कहते हैं. यह ‘भारत’ की कथा में ठीक-ठीक उचित नहीं दिखता कि उनकी माता ने जिन पुत्रों को जन्म दिया उनके पिता भिन्न-भिन्न देवता थे. उनके पिता पांडु एवं ताऊ धृतराष्ट्र का जन्म व्यास से हुआ था एवं उनके दादा शांतनु ने क्षत्रिय कुल में विवाह नहीं किया था. मूल वीरोचित काव्य में युद्ध का चित्रण इतिहास के एक ऐसे काल के अंतिम चरण पर होता है जो भारत में सर्वाधिक सृजनात्मक लोगों का मिश्रण बिंदु है. इनमें शामिल हैं—स्थानीय जनजातीय समुदाय के लोग, दक्षिण से आए कृषक वर्ग के लोग, सिन्धु सभ्यता का निर्माण करने वाले समाज के वंशज, वह वर्ग जिसने एक नई भाषा का सृजन किया और युद्ध की उत्कृष्ट शैलियों एवं एक बिलकुल अलग ग्राम्य संस्कृति का निर्माण किया. अर्जुन का नायकत्व, वीरता तथा उनका धैर्य एवं ‘भारत’ के मूल रचनाकार की गहन बुद्धिमत्ता या प्रगाढ़ पांडित्य को देखते हुए यह अत्यन्त सम्भव है कि कुलसंकर और रक्त एवं वंश मिश्रण का भय कालान्तर में उपजा एक भय रहा होगा जो सारगर्भित ‘महाभारत’ में बहुत बाद में जोड़ा गया होगा, जब ‘गीता’ को महाकाव्य में सम्मिलित किया गया. फिर भी एक ग्रन्थ के रूप में इसकी क्रमागत उन्नति के इतिहास के बावजूद जो सम्भावित प्रश्न इक्कीसवीं सदी के ‘महाभारत’ के श्रोता अथवा पाठक पूछ सकते हैं वह यह है कि, ‘क्या यह विभाजनकारी सामाजिक प्रथाओं को न्यायोचित ठहराता है?’ और यदि ऐसा है तो क्या हमें इसे एक राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा देना चाहिए?

ये कठोर प्रश्न हैं; और परवर्ती युग की मान्यताओं के आधार पर प्राय: प्राचीन ग्रन्थों, जैसे वेदों, उपनिषदों अथवा ‘महाभारत’ के विषय में इस तरह के प्रश्न नहीं पूछे जाते हैं. यह सत्य है कि एक रचनाकार अपनी सांस्कृतिक परिस्थिति में कार्य करता है एवं न्याय के विचार निरन्तर विकसित होते रहते हैं. फिर भी, दुनिया के सर्वोच्च साहित्यिक ग्रन्थ इस तरह के कालदोषयुक्त परीक्षणों में उत्तीर्ण होते हैं बशर्ते कि यह परीक्षण समानुभूतिपूर्वक किया गया हो. तो आइए देखते हैं कि ‘महाभारत’ के परिप्रेक्ष्य में यह समानुभूतिक दृष्टि क्या हो सकती है? इस दृष्टि को जांचने का सर्वप्रथम आदर्श माध्यम यह है कि इसका सर्वाधिक गम्भीर आलोचनात्मक परीक्षण किया जाए, तत्पश्चात यह देखा जाए कि क्या इस पुस्तक को थोड़ी मध्यम दृष्टि से भी देखा जा सकता है. इसके लिए मैं 20वीं सदी के विद्वान डॉ. भीमराव आंबेडकर की टिप्पणियों से आरम्भ करूंगा. वे एक ऐसे नेता हैं जिनका भारतीय समाज में योगदान गौतम बुद्ध की तुलना में कहीं से भी कमतर नहीं है. डॉ. आंबेडकर अपनी पुस्तक ‘एन्निहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में लिखते हैं—

‘चातुर्वर्ण्य कोई नवीन व्यवस्था नहीं है. यह उतनी ही प्राचीन है जितने कि वेद. इसी कारण आर्य समाजियों द्वारा हमें यह बतलाया जाता है कि इसके दावे पर विचार करना चाहिए. सामाजिक संगठन की एक व्यवस्था के रूप में आकलन करने पर इसकी कई बार परीक्षा ली गई और यह असफल हुआ है. कितनी ही बार ब्राह्मणों ने क्षत्रियों का समूल विनाश किया है. कितनी बार क्षत्रियों ने ब्राह्मणों का विनाश किया है. ‘महाभारत’ एवं पुराण क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों के बीच संघर्षों की घटनाओं से भरे पड़े हैं. केवल ब्राह्मण ही क्षत्रियों की आंख की किरकिरी नहीं थे, अपितु क्षत्रिय भी ब्राह्मणों के लिए ऐसे ही थे. ऐसा प्रतीत होता है कि क्षत्रिय आततायी हो गए थे और आम जनमानस चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के अधीन निरीह, निःशस्त्र होने के कारण आतंक से अपनी रक्षा हेतु ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था. भागवत द्वारा यह स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि कृष्ण का जन्म इन्हीं क्षत्रियों के विनाश हेतु हुआ था.’

‘महाभारत’ के आदि पर्व में कृष्ण के जीवन का यही वास्तविक लक्ष्य था तथा ‘गीता’ भी कृष्ण के जीवन के इसी लक्ष्य की व्याख्या करती है. इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में विभिन्न समुदायों के मध्य संघर्ष के इतिहास के डॉ. आंबेडकर के कथन को भी झूठा नहीं ठहराया जा सकता. यह अन्तर्जातीय एवं अन्तर्वर्णीय संघर्ष वर्तमान समाज में भी देखा जा सकता है. ‘एन्निहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ की रचना स्पष्ट रूप से जाति-भेद द्वारा भारतीय समाज में उत्पन्न संकट की पोल खोलने व इसकी नींव अर्थात जाति एवं वर्ण व्यवस्था जिस पर यह स्थित है, की भ्रान्ति को उजागर करने हेतु हुई थी. यह किसी प्राचीन साहित्यिक रचना की काव्यगत उदात्तता अथवा शैलीगत कौशल पर टिप्पणी करने के उद्देश्य से लिखा गया निबंध नहीं था. इसलिए, उनका यह विश्लेषण सटीक बैठता है. पुस्तक में डॉ. आंबेडकर द्वारा एक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जिसे ‘महाभारत’ के आधुनिक पाठकों को गम्भीरतापूर्वक पढ़ना चाहिए. यह टिप्पणी हिंदू समाज की ‘राष्ट्र’ के रूप में स्थिति के विषय में है. वे तर्क देते हैं कि जाति को लेकर हिंदू समाज के बहिष्कारवादी लगाव की वजह से ही हिंदू समाज राष्ट्र नहीं बन सकता. यहां मैं उनकी टिप्पणी को प्रस्तुत करना चाहूंगा क्योंकि ‘महाभारत’ के ऐतिहासिक दावे पर उनकी टिप्पणी से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है—

‘जाति की परिणति किसी आर्थिक दक्षता में नहीं होती है. जाति के वर्गीकरण से मनुष्य प्रजाति में न कभी कोई सुधार आया है, न आ सकता है. हालांकि जाति से एक बात अवश्य हुई है. इसने हिंदुओं को पूरी तरह विसंघटित एवं नीतिभ्रष्ट कर दिया है.

पहली और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात जिस पर ध्यान देना चाहिए वह यह है कि हिंदू समाज एक मिथक है. ‘हिंदू’ स्वयं में एक विदेशी नाम है. (इस संबंध में दी गई टिप्पणी यह वर्णित करती है कि किस प्रकार अल-बरूनी की ‘तारीख-अल-हिन्द’ में ईस्वी सन् 1017 में इस शब्द का प्रयोग हुआ) यह शब्द मुस्लिमों द्वारा स्वयं को यहां के मूल निवासियों से अलग दिखाने के लिए प्रयुक्त किया गया था. उन्हें किसी साझा नाम की जरूरत महसूस नहीं हुई, क्योंकि उनमें समुदाय निर्माण का कोई विचार न था. हिंदू समाज नाम की कोई चीज़ अस्तित्व में है ही नहीं. यह केवल जातियों का एक समुच्चय है. प्रत्येक जाति अपने अस्तित्व के विषय में सचेत है. जातियों से कभी किसी संघ का निर्माण नहीं होता है. एक जाति में दूसरी जाति के प्रति परस्पर कोई भाव नहीं होता, जब तक कि उनके बीच हिंदू-मुस्लिम दंगे ना हो रहे हों.

समाजविज्ञानी कहते हैं कि ‘एक जैसा होने की चेतना’ (पहली बार यह वाक्यांश अमेरिकन समाजविज्ञानी फ्रैंकलिन हेनरी गिडिंग्स ने 1896 में प्रस्तुत किया था) का हिंदुओं में भारी अभाव है. हिंदू चेतना जैसा कुछ भी अस्तित्व में नहीं है. प्रत्येक हिंदू में जो चेतना विद्यमान है वह उसकी जाति की चेतना है. यही कारण है कि हिंदुओं को एक समाज अथवा राष्ट्र के निर्माण हेतु नहीं कहा जा सकता है.’

जाति व्यवस्था के पक्ष में मुझे कोई तर्क नहीं देना. मैंने स्वयं जीवनपर्यन्त जाति के बंधंन में जकड़े जाने से इनकार किया है और जाति तथा धर्म से भरसक ऊपर उठकर प्रयत्न किया है कि इनके कारण उत्पन्न विभिन्न अन्यायों से लड़ सकूं. मैं डॉ. आंबेडकर के इस कथन से सहमत हूं कि एक जाति विभाजित समाज में कदाचित ही किसी राष्ट्र-राज्य का लक्षण प्रकट हो सकता है. यहां जिस बिंदु पर मैं प्रकाश डालना चाहता हूँ वह यह है कि क्या ‘महाभारत’ एक वैकल्पिक राष्ट्र के विचार को प्रस्तुत करता है? और क्या यह राष्ट्र की उसी अवधारणा का परिणाम है कि यह शताब्दियों तक इसके श्रोताओं और पाठकों के बीच गूंजता रहा.

यहां ये प्रश्न इसलिए नहीं उठाए गए हैं कि इनसे जाति पर डॉ. आंबेडकर द्वारा लगाए गए आरोपों से विमुक्ति प्राप्त की जा सके. ये आरोप तर्कसंगत हैं. ये प्रश्न इसलिए उठाए गए हैं ताकि इनके उत्तर प्राप्त करते समय हम यह देख सकें कि इस महाकाव्य का हमारे समाज के साथ कैसा संबंध है. यहां बारह वर्षों के वनवास के चरम बिंदु पर पांडवों पर अधिरोपित ‘जीवन के अहम प्रश्नों’ (यक्ष प्रश्न) पर प्रकाश डालना उचित होगा. इन पहेलियों को ‘यक्ष प्रश्न’ अर्थात अस्तित्व संबंधी कठिन, दुर्लभ अथवा पारभौतिक विषयों पर प्रश्न कहा जा सकता है. ये समस्त प्रश्न एक यक्ष द्वारा पूछे जाते हैं जो कथा के अंत में स्पष्ट होता है कि युधिष्ठिर के पिता यम हैं.

यह कथा इस प्रकार है—जब समस्त पांडव भ्राता बारह वर्षों के वनवास के उपरान्त अपनी योजनाओं के विषय में विचार-विमर्श कर रहे थे तभी एक भिक्षुक आकर उनसे कहता है कि एक मायावी हिरण उसका रास्ता रोक रहा है. नकुल को उस हिरण का सामना करने हेतु भेजा जाता है. हिरण का दूर तक पीछा करते-करते वे एक सुन्दर झील के समीप पहुंचते हैं जहां झील के किनारे उन्हें एक सारस दिखाई देता है. सारस नकुल से कहता है कि ‘मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना इस जलाशय का जल मत ग्रहण करना अन्यथा यह विषाक्त हो जाएगा’. नकुल इस निर्देश की उपेक्षा करते हैं और जलाशय का जल पी लेते हैं जिससे वहीं उनकी मृत्यु हो जाती है. नकुल की प्रतीक्षा करने के पश्चात युधिष्ठिर सहदेव को नकुल की खोज में भेजते हैं और उनकी भी वही गति होती है. इसके बाद भीम और अर्जुन जाते हैं. अपने चारों भाइयों के वापस न लौटने पर युधिष्ठिर स्वयं जाते हैं और सरोवर के किनारे चारों भाइयों के मृत शरीर और एक सारस को देखते हैं. लेकिन अपने भाइयों के विपरीत युधिष्ठिर सारस के समस्त प्रश्नों का उत्तर देते हैं.

जब युधिष्ठिर उन समस्त दुर्लभ यक्ष प्रश्नों का उत्तर दे देते हैं तब सारस प्रकट करता है कि वह युधिष्ठिर का पिता यम है. इस प्रकार वे उनके समस्त भाइयों को पुनर्जीवित कर देते हैं. जहां अन्य प्रश्न व्यक्ति की स्वयं से आसक्ति, पारिवारिक दायित्वों, स्वयं के समुदाय के प्रति कर्तव्य एवं राज्य के विषय में हैं, वहीं इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—कौन सूर्य का उदय करता है, कौन इसे गति प्रदान करता है, कौन सूर्यास्त लाता है तथा सूर्य का यथार्थ स्वभाव क्या है?

युधिष्ठिर उत्तर देते हैं—ब्रह्मा के कारण सूर्योदय होता है, उन्हीं के कारण यह आकाश में आरोहण करता है, ईश्वर की सहायता से यह अपने कक्ष का निर्माण करता है तथा धर्म के कारण सूर्यास्त होता है. सत्य सूर्य का सार है; और सत्य की अनुपस्थिति में सूर्य का कोई अस्तित्व नहीं है.

ऐसे ही कुछ अन्य प्रश्न भी हैं जिनका उत्तर देकर युधिष्ठिर सत्य के अनुकरण को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्म बताते हैं और इसके अतिरिक्त सभी सामाजिक क्षेत्रों में मनुष्य के समस्त दायित्वों को इसकी अपेक्षा सीमित महत्त्व देते हैं. यह एक उत्कृष्ट विचार है, एक शाश्वत नैतिक मूल्य जो समय एवं स्थान की समस्त सीमाओं को पार कर जाता है. फिर भी क्या ‘महाभारत’ केवल इस सत्य के सन्दर्भ में है, अथवा केवल पराभौतिक विषयों के बारे में है अथवा यह वर्ण व्यवस्था का बचाव है या ब्राह्मणवाद का महिमामंडन?

क्या यह मनुस्मृति जैसी कोई पुस्तक है—सामाजिक विभेदीकरण के निकृष्टतम समेकन (एकीकरण) का एक सैद्धान्तिक ग्रन्थ और इनमें एकमात्र अन्तर यह है कि ‘महाभारत’ काव्यगत शैली में रचित है? इन समस्त प्रश्नों पर विचार किया जाना चाहिए. यद्यपि ये भी यक्ष प्रश्नों की तरह अत्यन्त जटिल हैं.

इन समस्त प्रसंगों के मध्य ‘महाभारत’ के अद्भुत सर्जनाकार को प्रारम्भिक ‘भारत’ को आधार बनाकर अपने महाकाव्य की रचना करनी थी. उनके काल में साहित्य का वर्गीकरणमंत्र, सूत्र, शास्त्र एवं सूत साहित्य के रूप में होता था. कौटिल्य की राजनीति पर पुस्तक शास्त्र थी जैसे कि नाट्य पर भरत की पुस्तक. इसके विपरीत ‘महाभारत’ सदा के लिए एक सूत साहित्य बना रहा. सूत लोग काव्य के वाचक थे जो यहां-वहां, एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण करके वीरगाथाओं का गान करते थे. उनकी ये रचनाएं ग़ैर-ब्राह्मणवादी परम्परा के लिए थीं इसलिए वेदों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मण उन्हें तुच्छ समझते थे.

प्राचीन भारत में ब्राह्मण वर्ग द्वारा ये सूत कभी पसन्द नहीं किये जाते थे. उनकी रचनाओं का पाठ, उन्हें कंठस्थ करना अथवा उनका वर्णन करना ग़ैर-ब्राह्मणों हेतु निषिद्ध नहीं था. इसलिए, अपनी रचना के समय से ही ‘महाभारत’ एक ऐसा साहित्य था जो सभी के लिए सुलभ था. इसके रचयिता व्यास को वृहत भागवत ग्रन्थ (‘गीता’ नहीं) के रचयिता के रूप में भी जाना जाता है. व्यास के उत्तरवर्ती युग में भागवत के अध्ययन से कुछ शास्त्रविधियां भी सम्बद्ध हो गईं. इसके श्रोता तो ग़ैर-ब्राह्मण हो सकते थे, परंतु इसके वाचक अनिवार्य रूप से ब्राह्मण समुदाय से ही होते थे.

इसके विपरीत ‘महाभारत’ के पाठ अथवा व्याख्या से ऐसा कोई भी विस्तृत नियम नहीं जुड़ा था. और, इस प्रकार यह वाल्मीकि ‘रामायण’ की भांति एक ऐसा महाकाव्य बना जो सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध था. सुलभ था.

इनमें महाभारत को इतिहास की दृष्टि से देखा गया जबकि ‘रामायण’ को काव्य (पद्य) के रूप में. व्यास के ‘महाभारत’ को यह विशिष्ट स्थान प्राप्त हुआ, परंतु अपने समकालीन समय से विरत होने एवं अपनी दृष्टि को सुदूर अतीत की ओर प्रक्षेपित करने का मूल्य भी चुकाना पड़ा.

आधुनिक भारतीय भाषाओं में, तमिल भाषा व्यास द्वारा ‘महाभारत’ के रचनाकाल से ही प्रयोग में थी. भारतीय भाषाओं में कई अन्य भाषाएं दूसरी सहस्राब्दी के प्रारम्भ से जन अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में उदित होने लगीं. इनमें से अनेक भाषाओं में ‘भगवद्गीता’ अथवा ‘महाभारत’ के कुछ अंशों का अनुवाद हुआ है. संस्कृत के विद्वानों ने इस महाकाव्य की लिखित प्रतियां निकालीं, यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्र में भी लोगों के पास यदि थोड़ी भी समृद्धि होती थी तो वे इन प्रतियों को अपने घर में सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते थे. जब भंडारकर इंस्टीट्यूट द्वारा ‘महाभारत’ की पांडुलिपियों का संकलन किया जा रहा था तो ऐसी अनेक पांडुलिपियां ऐसे क्षेत्रों व स्थलों से प्राप्त हुईं जो कभी भी ज्ञान का विशेष केंद्र नहीं रहे.

उदाहरण हेतु, 1512 ईस्वी की एक ऐसी ही हस्तलिखित पांडुलिपि गुजरात के आदिवासी क्षेत्र के एक गांव संखेड़ा से प्राप्त हुई. समीक्षात्मक संस्करण में इसे ‘संखेड़ा कपूरी’ रूपान्तरण के नाम से सम्मिलित किया गया है. आदिवासियों से जुड़े मेरे अनेक कार्यों के लिए मैंने असंख्य बार संखेड़ा की यात्रा की है, और मुझे वहां कभी भी ब्राह्मणवादी अथवा वैदिक शिक्षा का कोई साक्ष्य नहीं प्राप्त हुआ.

औपनिवेशिक काल में ‘महाभारत’ एवं ‘गीता’ का सुप्रतिष्ठित पुनरागमन हुआ. अपनी-अपनी विचारधाराओं तथा राजनीतिक धारणाओं में सर्वथा भिन्न नायक, जैसे लोकमान्य तिलक, श्री अरविन्द तथा महात्मा गांधी ‘गीता’ से समान उत्साह से जुड़ सकते थे. कदाचित यह कहना अनुचित न होगा कि अन्य सांस्कृतिक तत्त्वों में ‘महाभारत’ भी एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक रचना है जो भारतीयों को एक पटल पर ले आने का प्रयत्न करती है. इस देश में भाषायी, भौगोलिक, व जीवनयापन संबंधी इतनी व्यापक विविधताएं हैं कि कोई भी भारतीय इनसे वास्तविक रूप में समग्रता से नहीं जुड़ सकता.

‘महाभारत’ में व्यापक रूप से ज्ञात प्राचीन ग्रन्थों में प्राप्त होने वाली भारत की ‘विराट कल्पना’ अन्तर्निहित है. यहां महाकाव्य के रूप में इसकी संरचना की बात नहीं हो रही, अपितु इसके द्वारा ‘मानव स्थिति’ के विराट चित्रण की चर्चा हो रही है.

‘महाभारत’ ने अतीत के स्मरण की एक अनूठी विधि का निर्माण किया. भारत ने इस विधि को अपनी राष्ट्रीय स्मृति को संरक्षित करने के एक माध्यम के रूप में आत्मसात कर लिया है. इस प्रकार, इस अर्थ में ‘महाभारत’ हमारा एक राष्ट्रीय महाकाव्य है. यह महाकाव्य एक राष्ट्र के विषय में नहीं, अपितु अतीत को स्मरण करने की हमारी पद्धति के विषय में है. एक राष्ट्र के रूप में यह हमें एक समानुभूत अतीत के माध्यम से जोड़ता है न कि किसी समान सामूहिक अनुभूत स्व (आत्म) के रूप में.

इस तरह, इस विधि में अतीत को लेकर अत्यन्त सुगमता का एक भाव है क्योंकि यह अनेक आरम्भ बिंदुओं को स्वीकार करता है. ‘महाभारत’ का मूल तत्त्व किसी भी अंधराष्ट्रवादी या एकिक विचार का विरोध करता है. क्योंकि यह समस्त ओर से व्यापक विविधता के लक्षणों से चिह्नित है. ‘महाभारत’ हमें किसी काल्पनिक भूभागीय राष्ट्र से न जोड़कर अनवरत कालचक्र द्वारा प्रदर्शित ‘समय’ के विचार में एक साथ पिरोता है जो अनवरत कालचक्र है, इस महाकाव्य का प्रतीक है और जो हमें विनम्रतापूर्वक समस्त जीव-जन्तुओं के अस्तित्व को स्वीकार करने का विराट भाव देता है.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)