न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ ईडी का मामला नहीं टिक सका, जानिए आरोप और सबूत पर कोर्ट ने क्या कहा

ईडी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में तभी कार्रवाई शुरू करता है जब कोई मूल अपराध हुआ हो. इसके बाद वह उस पैसे का पता लगाता है जो उस अपराध से आया माना जाता है. अगर कोई मूल अपराध नहीं है, तो अपराध से कोई कमाई भी नहीं होगी. और अगर कोई कमाई नहीं हुई है, तो मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी नहीं बन सकता. न्यूज़क्लिक मामले में हाईकोर्ट ने यही कहा कि मामले में लगाए गए आरोपों के समर्थन में अपराध के आवश्यक तत्व नहीं पाए गए.

न्यूज़क्लिक के निदेशक और संपादक प्रबीर पुरकायस्थ. (साभार: यूट्यूब स्क्रीनशॉट)

मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम यानी पीएमएलए उस पैसे की लॉन्ड्रिंग (अवैध प्रक्रिया से कमाए पैसे को वैध बनाना) के लिए सज़ा देता है, जो किसी अपराध से कमाया गया हो. वह शुरुआती अपराध ही इसकी शुरुआत है. कानून इसे ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (सूचीबद्ध अपराध) या ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ (मूल अपराध) कहता है. इस कानून में एक शेड्यूल या सूची होती है, जिसमें दूसरे कानूनों के तहत आने वाले अपराध शामिल होते हैं.

इसमें धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और ड्रग्स से जुड़े अपराध आते हैं. सिर्फ़ उसी पैसे को ‘अपराध से हुई कमाई’ (proceeds of crime) माना जाता है जिसका संबंध सूची में दिए गए किसी अपराध से हो. लॉन्ड्रिंग बाद में की जाने वाली दूसरी कार्रवाई है. यह उस पैसे को छिपाने और उसे साफ़-सुथरा दिखाने की कोशिश है. इसलिए, मूल अपराध पहले होता है और उसे छिपाने का काम उसके बाद होता है.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) तभी कार्रवाई शुरू करता है जब कोई मूल अपराध (base crime) हुआ हो. इसके बाद वह उस पैसे का पता लगाता है जो उस अपराध से आया माना जाता है. इनके बीच सीधा संबंध होता है. अगर कोई मूल अपराध नहीं है, तो अपराध से कोई कमाई (proceeds of crime) भी नहीं होगी. और अगर अपराध से कोई कमाई नहीं हुई है, तो मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी नहीं बन सकता.

इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है. अगर कुछ चोरी ही नहीं हुआ है, तो चोरी का सामान रखने का आरोप नहीं लगाया जा सकता. अगर मूल अपराध को ही हटा दिया जाए, तो उस पर आधारित केस के लिए कोई आधार ही नहीं बचेगा. इसी तर्क के कारण न्यूज़ पोर्टल ‘न्यूज़क्लिक’ के खिलाफ चल रहा केस कमजोर पड़ गया.

यह विवाद एक विदेशी निवेश को लेकर था. न्यूज़क्लिक एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है. इसने देश भर में लोगों के आंदोलनों और संघर्षों को दिखाया है.

अप्रैल 2018 में इसकी मूल कंपनी को अमेरिका के एक निवेशक, ‘वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी’ से लगभग 9.59 करोड़ रुपये मिले. इसके बदले में कंपनी ने निवेशक को शेयरों का एक माइनॉरिटी ब्लॉक जारी किया. यह पैसा बैंकिंग चैनलों के ज़रिए आया था. इसकी जानकारी रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को दी गई थी.

दो साल से ज़्यादा समय बाद अगस्त 2020 में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (इकोनॉमिक ऑफेंस विंग) ने एफआईआर दर्ज की. यह शिकायत सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक अधिकारी ने भेजी थी. इसमें तीन अपराधों का आरोप लगाया गया था: धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक साज़िश.

कुछ ही दिनों में ईडी ने उन्हीं तथ्यों के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग का अपना मामला दर्ज कर लिया. फरवरी 2021 में उसके अधिकारियों ने पोर्टल के दफ़्तर और उसके कर्मचारियों के घरों की तलाशी ली. यह तलाशी चार दिनों तक चली.

दिल्ली हाईकोर्ट ने 29 मई को पुलिस की एफआईआर और ईडी का केस, दोनों ही रद्द कर दिए. यह फैसला जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने सुनाया. उन्होंने सबूतों को वैसे नहीं परखा जैसे कोई ट्रायल कोर्ट करता है. उनका काम सीमित था. उन्हें बस यह देखना था कि क्या आरोपों को पूरी तरह सच मान लेने पर भी कोई अपराध बनता है. उन्होंने एक-एक करके इन आरोपों पर विचार किया. इस फ़ैसले को समझने का सबसे आसान तरीका यही है कि हम भी उसी तरह से चलें.

वह सीमा जो उस समय थी ही नहीं

मुख्य आरोप पैसे के नियमों से बचने (इवेज़न) का था. अभियोजन पक्ष का कहना था कि न्यूज़क्लिक ने डिजिटल न्यूज़ में विदेशी निवेश की सीमा से बचने के लिए अपने शेयरों की कीमत उनकी फेस वैल्यू से कहीं ज़्यादा रखी थी. आज यह सीमा लागू है. यह डिजिटल न्यूज़ में विदेशी निवेश को 26% तक सीमित करती है और इसके लिए सरकार की मंज़ूरी ज़रूरी है. लेकिन अप्रैल 2018 में, जब पैसा आया था, तब ऐसी कोई सीमा नहीं थी.

यह बाद में 18 सितंबर 2019 को जारी प्रेस नोट 4 के ज़रिए आया. यह निवेश उस नियम के लागू होने से एक साल से भी ज़्यादा समय पहले किया गया था. तब तक नियम से बचने या उसे टालने जैसी कोई बात ही नहीं थी.

बात इससे भी ज़्यादा अहम है. निवेश स्वीकार करने से पहले न्यूज़क्लिक ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखा था. उन्होंने पूछा था कि क्या प्रिंट मीडिया के लिए बने नियम ऑनलाइन समाचारों पर भी लागू होते हैं.

मंत्रालय ने जवाब दिया कि ऑनलाइन पब्लिकेशन प्रिंट मीडिया के दायरे में नहीं आता है. असल में, कंपनी को बताया गया कि इस पर कोई सेक्टर-स्पेसिफिक यानी किसी सेक्टर विशेष के लिए कोई सीमा लागू नहीं होती है. कोर्ट ने इस बातचीत को अहम माना. जो व्यक्ति नियामक से पूछता है और मंज़ूरी पाता है, वह कानून से कुछ छिपा नहीं रहा होता है.

प्रीमियम लेना कोई अपराध नहीं है

अगला आरोप ओवरवैल्यूएशन (ज़रूरत से ज़्यादा कीमत तय करने) का था. शेयरों की फेस वैल्यू 10 रुपये थी. उन्हें निवेशक को 11,510 रुपये में जारी किया गया था. अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) ने इस अंतर को हेरफेर का सबूत माना. कोर्ट ने इसे अलग नज़रिए से देखा.

विदेशी मुद्रा से जुड़े नियम किसी भारतीय कंपनी को विदेशी खरीदार को सस्ते दाम पर शेयर बेचने की इजाज़त नहीं देते. शेयर की कीमत उसकी ‘फेयर वैल्यू’ (उचित मूल्य) के बराबर या उससे ज़्यादा होनी चाहिए. एक स्वतंत्र वैल्यूअर (मूल्यांकन करने वाला) किसी मान्य तरीके का इस्तेमाल करके यह ‘फेयर वैल्यू’ तय करता है.

इस मामले में, वैल्यूअर ने प्रति शेयर कीमत 9,188 रुपये तय की थी. 10 रुपये की फेस वैल्यू (अंकित मूल्य) पर शेयर बेचना ही कानून का उल्लंघन होता. बातचीत के बाद तय की गई 11,510 रुपये की कीमत उस न्यूनतम सीमा (फ्लोर) से ऊपर थी, जिस पर नियमों के अनुसार कीमत होनी चाहिए.

प्रीमियम कोई अपराध का सबूत नहीं है. यह दिखाता है कि कोई निवेशक किसी बिज़नेस की क्या कीमत समझता है. खरीदार ने बातचीत के बाद इसे चुकाने पर सहमति जताई थी. इसमें जनता का पैसा शामिल नहीं था. निवेशक ने कभी नहीं कहा कि उसने ज़्यादा कीमत चुकाई है. कोर्ट ने इस कीमत को एक आर्थिक फ़ैसला बताया, जिससे किसी अपराध का पता नहीं चलता.

एक असली निवेशक, जिसे ग़लती से ‘घोस्ट’ (फ़र्ज़ी) कहा गया

इसके बाद अभियोजन पक्ष ने निवेशक से ही सवाल किए. उसने कहा कि ‘वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी’ नाम की कोई कंपनी मौजूद ही नहीं थी. उसने उसी नाम की एक ऐसी कंपनी की ओर इशारा किया जिसे 2017 में अमेरिका में बंद कर दिया गया था. अगर निवेशक एक ‘शेल कंपनी’ (सिर्फ़ कागज़ों पर मौजूद कंपनी) थी, तो पूरा लेन-देन बनावटी लग रहा था.

कोर्ट ने पाया कि दावे में तथ्यों को गलत समझा गया था. डेलावेयर के कानून के तहत, जहां कंपनी रजिस्टर्ड थी, लिस्ट से हटाए गए नाम का अस्तित्व खत्म नहीं होता. कोई दूसरी कंपनी उस नाम को अपना सकती है. न्यूज़क्लिक के साथ डील करने वाले निवेशक को नवंबर 2017 में नए सिरे से रजिस्टर किया गया था.

उसके बाद उसने अपना कारोबार जारी रखा. वह कैंसल की गई कंपनी नहीं थी.

इससे भी ज़्यादा अहम बात एक चूक थी. पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट, जिसमें पोर्टल के खिलाफ़ मामले का ब्यौरा था, में ऐसी कोई बात नहीं कही गई जिससे यह साबित हो कि निवेशक फ़र्ज़ी था. आरोप तो लगाया गया, लेकिन उसे साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया.

वेतन देना पैसे का गलत इस्तेमाल नहीं है

तीसरा आरोप पैसे के गलत इस्तेमाल (साइफ़निंग) का था. अभियोजन पक्ष का कहना था कि विदेश से आया ज़्यादातर पैसा वेतन, कंसल्टेंसी फ़ीस और किराए के तौर पर बाहर चला गया. उन्होंने इन भुगतानों को निवेश का दूसरी जगह इस्तेमाल माना.

अदालत ने इन्हें न्यूज़रूम चलाने का खर्च माना. एक न्यूज़ कंपनी पत्रकारों को वेतन देती है. वह अन्य कामों और दफ़्तर की जगह के लिए भी भुगतान करती है. ये आम खर्च हैं, कोई साज़िश नहीं.

अदालत ने कहा कि भले ही खर्च ज़्यादा था, लेकिन ज़्यादा खर्च करना कोई अपराध नहीं है. यह तर्क बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिया गया था. इस तर्क के हिसाब से, नुकसान में चल रही कोई भी कंपनी जो अपने स्टाफ़ को सैलरी देती है, वह मनी लॉन्ड्रिंग करने वाली कंपनी कहलाएगी. ऐसा कानून नहीं हो सकता.

कोई पीड़ित नहीं, कोई धोखाधड़ी नहीं

संपत्ति से जुड़े दोनों अपराध अपने आप ही साबित नहीं हो पाए. कानून की नज़र में धोखाधड़ी का एक निश्चित स्वरूप होता है. इसके लिए ज़रूरी है कि कोई व्यक्ति हो जिसे धोखा दिया गया हो. उस व्यक्ति को अपनी संपत्ति देने के लिए उकसाया गया हो. यहां इनमें से कोई भी बात मौजूद नहीं थी.

निवेशक ने अपनी मर्ज़ी से पैसे दिए थे. उसने कभी भी धोखाधड़ी की शिकायत नहीं की. शिकायत करने वाला व्यक्ति एक मुखबिर था, जिसका इस सौदे में कोई हित नहीं था. वह ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसके साथ कथित तौर पर गलत हुआ हो.

भरोसा तोड़ने (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) का आरोप भी इसी तरह की वजह से खारिज हो गया. इसके लिए ज़रूरी है कि कोई संपत्ति किसी को सौंपी गई हो और फिर उसे बेईमानी से हड़प लिया गया हो. शेयर खरीदना न तो संपत्ति सौंपना है और न ही उसका गलत इस्तेमाल करना. यह एक सामान्य व्यावसायिक सौदा है.

अदालत ने माना कि अगर आरोपों की हर बात को सच भी मान लिया जाए, तब भी ये दोनों अपराध नहीं बनते.

सिर्फ़ साज़िश का आरोप

इस समय तक संपत्ति से जुड़े आरोप हट चुके थे. डायरेक्टरेट के लिए एक आरोप अभी भी अहम था. मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत आपराधिक साज़िश (क्रिमिनल कॉन्स्पिरेसी) अपने आप में एक ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (कानून के तहत तय अपराध) है. अगर साज़िश का आरोप बना रहता, तो ईडी का केस भी चल सकता था. इसलिए एजेंसी ने इसी पर ज़ोर दिया. उसने पोर्टल के फाउंडर प्रबीर पुरकायस्थ और विदेश में मौजूद दो लोगों के बीच साज़िश का आरोप लगाया.

कोर्ट ने एजेंसी के पक्ष में एक कानूनी सिद्धांत को माना. किसी अपराध को करने का समझौता अपने आप में एक अपराध हो सकता है. साज़िश पूरी होने के लिए असल में अपराध का होना ज़रूरी नहीं है. लेकिन मुश्किल सिद्धांत की नहीं थी, बल्कि सबूतों की थी.

साज़िश के लिए कोई गैर-कानूनी मकसद या गैर-कानूनी तरीका होना ज़रूरी है. ईडी ने इनमें से किसी का भी आरोप नहीं लगाया. उसने मिलीभगत का दावा तो किया, लेकिन यह नहीं बताया कि किस गैर-कानूनी काम पर सहमति बनी थी. लगभग 18 महीने की जांच और पोर्टल के कर्मचारियों से बार-बार पूछताछ के बाद भी कोई भी दोषी साबित करने वाली बात सामने नहीं आई. सिर्फ़ दावा कर देने से साज़िश साबित नहीं होती.

जब आधार ही नहीं रहेगा, तो केस भी नहीं टिकेगा

यहीं पर फ़ैसले का तर्क पूरा होता है. मनी लॉन्ड्रिंग के लिए अपराध से हुई कमाई (proceeds of crime) का होना ज़रूरी है. और इस कमाई के पीछे कोई ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (कानून में तय अपराध) होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022) मामले में यह बात साफ़ की थी; इसी फ़ैसले से मनी लॉन्ड्रिंग कानून का दायरा तय होता है. तब से हाईकोर्ट भी इसी नियम को लागू कर रहे हैं. नियम बिल्कुल साफ़ है: अगर मुख्य अपराध (predicate offence) ही रद्द हो जाता है, तो मनी लॉन्ड्रिंग का केस अकेले नहीं टिक सकता.

यहां भी ऐसा ही हुआ. जैसे ही एफआईआर रद्द हुई, ईडी के केस का आधार ही खत्म हो गया. कोर्ट ने एफआईआर के साथ-साथ मनी-लॉन्ड्रिंग की जांच भी बंद कर दी. एजेंसी की केस फ़ाइल मांगने वाली एक जुड़ी हुई याचिका भी बेमतलब हो गई और उसे निपटा दिया गया.

वह मंज़ूरी जिसे चुपचाप हटा दिया गया

एक बात ने इस फ़ैसले को अहम बना दिया. पुलिस ने एक नहीं, बल्कि दो स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की थीं. पहली रिपोर्ट ‘न्यूज़क्लिक’ को एडवांस कॉपी के तौर पर भेजी गई थी. इसमें रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया का ज़िक्र था. सेंट्रल बैंक ने पुष्टि की थी कि पैसा ‘ऑटोमैटिक रूट’ से आया था. उन्हें इसमें कोई देरी या विदेशी मुद्रा नियमों का कोई उल्लंघन नहीं मिला. संक्षेप में, रेगुलेटर ने इस ट्रांज़ैक्शन को मंज़ूरी दे दी थी.

दूसरी रिपोर्ट अलग थी. इसमें रिज़र्व बैंक का ज़िक्र हटा दिया गया था. उसकी जगह नए आरोप लगाए गए. इस बदलाव की कोई वजह नहीं बताई गई. दोनों रिपोर्ट पर एक ही अधिकारी के दस्तख़त थे.

कोर्ट ने इस बदलाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया. उसने इस बात पर ध्यान दिया कि जानकारी हटाने का क्या मतलब निकलता है. कोर्ट ने माना कि रेगुलेटर की मंज़ूरी वाली पहली रिपोर्ट ही यह दिखाने के लिए काफ़ी थी कि कोई उल्लंघन नहीं हुआ था.

घटनाओं का यह क्रम इस केस से कहीं ज़्यादा अहमियत रखता है. कोई जांच एजेंसी रिपोर्ट में बदलाव कर सकती है. लेकिन वह रेगुलेटर की मंज़ूरी को बिना कुछ कहे दबा नहीं सकती और फिर यह उम्मीद नहीं कर सकती कि कोर्ट पहले वाले वर्शन को नज़रअंदाज़ कर देगा.

अदालत सिर्फ़ यह कहकर रुक सकती थी कि कोई अपराध नहीं हुआ है. लेकिन वह इससे आगे बढ़ी. उसने इस जांच को याचिकाकर्ताओं की आर्थिक स्थिति की मनमानी और बिना किसी ठोस आधार के की गई पड़ताल बताया. अदालत ने इस कार्रवाई को ‘मैलाफ़ाइड’ यानी बुरी नीयत से की गई कार्रवाई माना. उसने इसे ‘याचिकाकर्ताओं की आज़ाद और निष्पक्ष पत्रकारिता पर मनमाना हमला और शक्तियों का दुरुपयोग’ कहा.

अदालत ने इस मामले को अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े फैसलों की लंबी कड़ी में रखा. कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) और विनोद दुआ बनाम भारत संघ (2021) के मामलों का हवाला दिया. न्यूज़क्लिक ने कहा कि इस फैसले से उसका पक्ष सही साबित हुआ है.

फैसले के बाद ईडी ने कहा है कि वह आगे अपील करेगी. उसके मामले पर निष्पक्ष बात होनी चाहिए. एजेंसी का तर्क है कि कोर्ट ने धोखाधड़ी को बहुत सीमित नज़रिए से देखा. कोर्ट ने पूछा कि पार्टियों में से किसे धोखा दिया गया. ईडी का कहना है कि यह गलत सवाल है. उसका असली मामला यह था कि बैंकों और रेगुलेटर के सामने झूठे दावे किए गए थे.

उसका कहना है कि ये दावे निवेशक की असलियत, फंड के सोर्स और वैल्यूएशन से जुड़े थे. इस नज़रिए से देखें तो धोखा विदेशी कंपनी को नहीं, बल्कि सरकार को दिया गया. तर्क यह है कि रेगुलेटर के साथ धोखाधड़ी के मामले में किसी प्राइवेट पीड़ित की ज़रूरत नहीं होती.

यह बात मामूली नहीं है और हो सकता है कि कोई बड़ी अदालत इसकी जांच करे. लेकिन इसके सामने दो ठोस तथ्य हैं. रिज़र्व बैंक ने रेमिटेंस की जांच की और उसे मंज़ूरी दी. जिस सीमा (कैप) से बचने की बात कही जा रही है, वह पैसा आने के समय मौजूद ही नहीं थी.

धोखाधड़ी तभी मानी जाती है जब किसी को गुमराह किया जाए. यहां रेगुलेटर को गुमराह नहीं किया गया था. उसने जांच की और मंज़ूरी दी. जब सरकार के अपने रेगुलेटर को कोई गड़बड़ी नहीं मिली, तो सरकार को धोखा देने का आरोप साबित करना मुश्किल है.

एक फ़र्क समझना ज़रूरी है, क्योंकि दोनों मामलों में आसानी से भ्रम हो सकता है. आतंक-रोधी कानून के तहत ऐसा नहीं है. उस अलग मामले में चीन के पक्ष में प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए विदेशी फंडिंग के आरोपों में पुरकायस्थ को 2023 में गिरफ़्तार किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में उनकी गिरफ़्तारी को इस आधार पर रद्द कर दिया कि उन्हें गिरफ़्तारी के लिखित कारण नहीं दिए गए थे. वह मुक़दमा अपनी अलग प्रक्रिया के तहत चल रहा है.

मनी लॉन्ड्रिंग का मामला विषय और नतीजे, दोनों ही लिहाज़ से अलग था. यह मामला एक ही निवेश पर टिका था, जो कानूनी तौर पर किया गया था और जिसे रेगुलेटर ने मंज़ूरी दी थी. हाईकोर्ट को इसमें कोई अपराध नहीं मिला.

यह तर्क न्यूज़क्लिक से आगे तक जाता है. यह ऐसे हर मामले को उसी सवाल पर वापस ले आता है जिसे शुरुआत में ही सबसे आसानी से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. क्या कोई अपराध हुआ भी था?

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