क्या मुज़फ़्फ़रनगर पर जो सैको की किताब का नाम सरकार की बेचैनी की वजह है?

जो सैको की किताब 'द वंस एंड फ्यूचर रायट' पहले फ्रेंच में प्रकाशित हुई. भारत में भी यह उम्मीद की जा रही थी कि इसका भारतीय संस्करण - अंग्रेज़ी में - जल्द ही पाठकों के हाथों में होगा. हालांकि, अब लगभग तय है कि इसका भारतीय संस्करण पाठकों तक नहीं पहुंचेगा.

सैको की किताब का एक पृष्ठ.

आखिरकार, यह उस कलाकार का काम है जिसने इस विधा में महारत हासिल की है. पेइंग द लैंड, पैलेस्टाइन और सेफ एरिया गोराज्दे जैसी उनकी चर्चित कृतियों ने दुनिया के संघर्षग्रस्त इलाकों को जिस ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ पाठकों के सामने रखा है, वह उनकी विशिष्ट पहचान बन गई. उनकी बारीक रिपोर्टिंग, बारीक विवरणों पर पकड़ और असाधारण रेखांकन हर पुस्तक को एक कलाकृति बना देते हैं, ऐसी कलाकृति, जो आनंद भी देती है और समझ भी विकसित करती है.

अगर जो सैको ने उन दंगों और हिंसा के एक साल बाद, जिन्होंने भारत के सबसे बड़े राज्य को झकझोर दिया था, मुज़फ्फरनगर जाने की जहमत उठाई होती, तो क्या हम उनके काम को देखने के इच्छुक नहीं होते? हम देखेंगे?

दिल्ली के किताब विक्रेताओं ने इस पुस्तक की अग्रिम (एडवांस) बुकिंग ले रखी थी और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि किताब पिछले साल ‘अक्टूबर तक’ पहुंच जाएगी. फिर जून 2026 आ गया. अब पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के एक प्रवक्ता से पता चला है कि पुस्तक में एक ‘आपत्तिजनक नक्शा’ है.

पहले की सरकारें कश्मीर को लेकर अपनी आपत्तियों के बावजूद, ऐसे नक्शों पर मुहर लगा देती थीं, उन पर काले स्टिकर चिपका देती थीं या संबंधित हिस्से को ढंक देती थीं. लेकिन इस प्रकाशक के लिए 2×2 इंच का एक नक्शा ही पूरी किताब को खारिज कर देने की वजह बन गया. आपत्ति की एकमात्र वजह थी नियंत्रण रेखा (एलओसी) की सीमारेखा का उसमें दिखाया गया स्वरूप.

यह स्थिति और भी अजीब तब लगी, जब जो सैको ने द वायर के सिद्धार्थ भाटिया से बातचीत में बताया कि मामला केवल एक नक्शे का नहीं था. प्रकाशक किताब के पांच पन्नों में बदलाव चाहता था. सैको के मुताबिक, वह इन मांगों से ‘तंग आ गए’ और उन्होंने कोई भी बदलाव करने से इनकार कर दिया.

किसी पुस्तक का भारतीय संस्करण न होना उसकी पहुंच को गंभीर रूप से सीमित कर देता है. विदेशी संस्करण की ऊंची कीमत (ब्रिटेन में इसका संस्करण 20 पाउंड का है) अपने आप उसके पाठकों का दायरा छोटा कर देती है, हालांकि महानगरों में किताब की कुछ दुकानों ने इसकी प्रतियां मंगाई हैं और वे सीमित संख्या में उपलब्ध हैं.

लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस तरह की किताब से भारत सरकार को दिक्कत क्या हो सकती है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने सरकार की संभावित आपत्ति का अनुमान लगाते हुए दुनिया के इतने चर्चित लेखक की किताब प्रकाशित न करने का फैसला क्यों किया?

दुनिया के सबसे जीवंत लोकतंत्र को तो इस बात का स्वागत करना चाहिए कि लोग स्केलपेल और स्केच पेन के साथ भारत की कहानी पर रोशनी डालें और उसके अनेक पहलुओं को दर्ज करें. लेकिन जैसा कि फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी, निताशा कौल और फिलिप ओसेला जैसे कई स्कॉलर, जिन्हें वैध वीज़ा होने के बावजूद हवाई अड्डों पर लंबी और शत्रुतापूर्ण पूछताछ के बाद भारत में प्रवेश नहीं करने दिया गया, ने अनुभव किया है कि भारत पर होने वाले उस शोध और अकादमिक काम के प्रति एक खास तरह की असहिष्णुता मौजूद है जो भाजपा सरकार के नजरिये से मेल नहीं खाता- खासकर तब, जब वह शोधकर्ता भारतीय न हो.

आपकी हिम्मत भी कैसे हुई भारत पर शोध करने की, और वो भी सिर्फ़ वही दोहराने के बजाय जो पीआईबी आपको बताता है? आपकी तो किस्मत ही खराब है!

इतिहास को अपने मुताबिक गढ़ने की सरकारी कोशिश केवल पाठ्यपुस्तकों को भ्रामक सूचनाओं से भरे प्रचार-पुस्तिकाओं में बदल देने तक सीमित नहीं है. यह उन तमाम कामों और अध्ययनों का प्रतिरोध भी करती है, जो हिंदुत्व की गढ़ी हुई ऐतिहासिक कहानियों को चुनौती देते हैं. और सच तो यह है कि गंभीर और ईमानदार शोध का अधिकांश हिस्सा ऐसा करता भी है.

इसलिए सैको के काम पर पहली आपत्ति की वजह भी शायद वही है, जिसका सामना दूसरे विद्वानों को इमिग्रेशन काउंटरों पर या ऑनलाइन नफ़रत भरे अभियानों के रूप में करना पड़ता है. सैको को उस कहानी की ओर ध्यान खींचने से हतोत्साहित किया जाना चाहिए, एक ऐसे दंगे की कहानी, जिसके घावों और उससे जुड़ी भावनाओं को भाजपा स्थानीय स्तर पर अपने राजनीतिक हितों के लिए जीवित रखना चाहती है, लेकिन साथ ही यह भी चाहती है कि उसकी चर्चा वैश्विक स्तर पर न हो.

स्थानीय स्तर पर इसका इस्तेमाल करो, लेकिन दुनिया के सामने इसकी चर्चा मत होने दो.

सैको महज़ किसी ‘नैरेटिव’ को जोड़ने-गढ़ने का काम नहीं करते. उनका काम मुज़फ्फरनगर के लोगों की ज़िंदगी में उस तरह हवा में नहीं पहुंचा, जैसे कभी-कभी महानगरों के कुछ चर्चित पत्रकारों की रिपोर्टिंग ‘पैराशूट’ से पहुंच जाती है. सैको वहां धीरे-धीरे पहुंचे, ठहरे, और दंगे के एक साल बाद उसके निशानों को खोजने और, उनके अपने शब्दों में, ‘दंगे को पकड़ने’ की कोशिश की.

उन्होंने उस हिंसा की स्थायी छाप को दर्ज किया और उसकी राजनीति को उन स्पष्ट संकेतों के ज़रिये जोड़ा, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था, मसलन, वे लोग जो एक साल बाद भी राहत शिविरों में रहने को मजबूर थे, और उनकी कहानियां एवं गवाहियां.

सैको की बकवास पहचानने की क्षमता बेहद पैनी है. वह पीड़ित मुसलमानों के कुछ दावों पर अपनी शंका छिपाने की कोशिश नहीं करते, और न ही जाट पक्ष के कुछ बयानों को बिना सवाल स्वीकार करते हैं. ये वही दो समुदाय थे, जो 2013 में आमने-सामने खड़े हो गए थे, जबकि उससे पहले वे बरसों, बल्कि कहिए कि दशकों तक साथ रहते आए थे और उनके बीच आपसी समझ-बूझ का रिश्ता था.

सैको की खासियत यह है कि वह घटनाओं का ऐसा सूक्ष्म और तथ्यपरक ब्यौरा पेश करते हैं, जिसे भारत के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों से बहुत परिचित न होने वाला पाठक भी समझ सकता है. और यही बात उस सरकार के लिए असहज हो सकती है, जो मुज़फ्फरनगर में जो कुछ हुआ, उसकी तस्वीर को धुंधला कर देना चाहती हो.

भाजपा सरकार निश्चित रूप से अतीत को याद करना चाहती है, और 2013 भी उसकी स्मृतियों का हिस्सा होगा. लेकिन उस अतीत को याद करने का तरीका वही होना चाहिए, जो वह खुद तय करे, न कि वह जो सैको अपनी किताब में दर्ज करते हैं.

इस पुस्तक के लिए सैको ने उग्र हिंदुत्व के विवादास्पद पैरोकार यति नरसिंहानंद से भी मुलाकात की थी और इस वृत्तांत में उनकी उपस्थिति प्रमुखता से दर्ज है. सैको के मुताबिक, नरसिंहानंद खुलकर मुसलमानों को मिटा देने की वकालत करते दिखाई देते हैं, जो एक नरसंहारकारी मंशा की ओर इशारा करता है.

पिछले छह वर्षों में सोशल मीडिया और सार्वजनिक सभाओं में दिए गए उनके बयानों के कारण, क्षेत्र से बाहर के लोग भी उनके नाम और विचारों से परिचित रहे हैं. सैको का यह चित्रण उस लक्ष्य को विश्वसनीयता दे सकता था, जिसके तहत मोदी सरकार, खासकर चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में मतदाताओं को धार्मिक आधार पर पूरी तरह विभाजित करने वाली राजनीति को बढ़ावा देती रही है.

लेकिन अफसोस, यह सब घरेलू दर्शकों के लिए है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सरकार अब भी खुद को एक ‘जीवंत लोकतंत्र’ के रूप में पेश करने और यह संदेश देने में लगी है कि ‘सब चंगा सी’. विदेश यात्राओं के दौरान, मसलन नॉर्वे में प्रधानमंत्री के भाषणों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा कई बार लगभग नेहरूवादी आशावाद की याद दिलाती है.

वहां योग, शून्य की खोज और यह तथ्य कि यहूदियों और मुसलमानों का भारत में आगमन सदियों पहले हुआ था, जैसे संदर्भ बार-बार सामने लाए जाते हैं. लेकिन सैको की पैनी रेखाएं इन अलग-अलग खांचों को तोड़ देती हैं और पूरी तस्वीर सामने रख देती हैं.

अपनी किताब में सैको उसके शीर्षक का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि मुज़फ्फरनगर कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि वह एक ऐसी श्रृंखला की कड़ी है जिसमें विभाजन, अयोध्या और गुजरात की हिंसा जैसी घटनाएं भी शामिल हैं.

सैको इन घटनाओं को उस परियोजना में आए व्यवधानों के रूप में देखते हैं, जिसे आधुनिक भारत 1950 से आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है, एक ऐसे देश के रूप में उभरने की परियोजना, जो उपमहाद्वीप में बहुसंख्यकवादी राजनीति के दलदल में पूरी तरह न धंसकर लोकतांत्रिक मूल्यों का एक उदाहरण बन सके.

मुज़फ्फरनगर, अयोध्या और गुजरात के बीच स्थापित किया गया यह सीधा संबंध ही शायद वह बात थी, जिसने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया को सबसे ज़्यादा डरा दिया.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की यात्रा के बाद जो सैको एक सवाल पर गंभीरता से विचार करते दिखाई देते हैं- क्या कुछ राजनीतिक दल अपने सामाजिक आधार को अधिक स्थायी बनाने के लिए लोकतंत्र के साथ हिंसा को जानबूझकर मिला देते हैं?

सैको लिखते हैं कि किस तरह 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के दौर में विकसित हुई राजनीति का एक मॉडल 2014 के बाद पूरे भारत में दिखाई देने लगा. संभव है कि यह उन ‘पांच पन्नों’ में शामिल रहा हो, जिनमें बदलाव करने की मांग प्रकाशक ने की थी.

आखिर 2023 में गुजरात हिंसा पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के साथ क्या हुआ था, और उसके बाद खुद बीबीसी के साथ क्या हुआ, यह याद ही है.

सैको के मुताबिक, मुज़फ्फरनगर महज़ अतीत की एक घटना नहीं है. कुछ बेहद प्रभावशाली राजनीतिक ताकतों के लिए यह एक तरह का मैनुअल है- समाज को एक खास ढंग से विभाजित करने और लोकतंत्र को पूरी तरह बहुसंख्यकवादी दिशा में मोड़ने का खाका.

संभव है कि यही असली वजह रही हो कि प्रकाशक पीछे हट गए और सैको से उनकी किताब में बदलाव करने का आग्रह किया.

मुज़फ्फरनगर को समझने और उसका गंभीर अध्ययन करने की ज़रूरत पर सैको इसलिए ज़ोर देते हैं, ताकि वह भविष्य के लिए एक और अनुकरणीय नमूना न बन जाए. वह चेतावनी देते हैं कि यह दिखाता है कि किस तरह अतिदक्षिणपंथी ताकतें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कब्ज़ा जमाने का रास्ता तैयार कर सकती हैं.

शायद सैको जिस तस्वीर को हमारे सामने खोलकर रखते हैं, वही आज के सत्ता-समर्थकों को सबसे अधिक असहज करती है.

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