विज्ञान का वर्चस्व या ज्ञान का एक तरीका? ‘साइंटिज़्म’ पर लाल्टू की पड़ताल

पुस्तक अंश: देखा जाए तो हर तरह का ज्ञान आखिरकार वैज्ञानिक ज्ञान रह जाता है. फलसफे की ज़रूरत महज़ विज्ञान की समझ बढ़ाने की रह जाती है. कई दार्शनिक इस सरलीकरण को खारिज करते हैं. उनका मानना है कि हर दार्शनिक सवाल को वैज्ञानिक तरीकों से देखा या समझा नहीं जा सकता है.

(आवरण साभार: एकलव्य फाउंडेशन)

एकलव्य फाउंडेशन से प्रसिद्ध कवि लाल्टू की हाल ही में प्रकाशित किताब ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाज: आम ज़बान में कुछ बातें, वस्तुतः विज्ञान को आम जीवन से जोड़ने का सराहनीय प्रयास है. हरजिंदर सिंह उर्फ लाल्टू पेशेवर रूप से सैद्धांतिक प्रकृति विज्ञान के प्राध्यापक हैं. उनकी कविताएं जिस प्रकार से सामाजिक जटिलताओं और असमानताओं के प्रति एक विरोधी रुख अपनाने के लिए प्रसिद्ध हैं, विज्ञान की यह किताब भी समाज से ही अपनी पक्षधरता रखती है.

किताब का समर्पण भी ‘चार्वाक और प्रोमेथियस’ का झंडा बुलंद रखने वालों के नाम है. वह सब जो समाज में स्थापित रूढ़ियों पर सवाल उठाते हैं. यह किताब इसीलिए लेखक के सवालों के मंथन का परिणाम है. समसामयिक विज्ञान और समाज से उसके बनते संबंधों पर आम ज़बान में विचार करती हुई यह किताब कथा-कहन की रोचकता से भरे होने के साथ-साथ अपने तर्कों में पूर्णतः वैज्ञानिक है. प्रस्तुत है इस किताब से उद्धृत अंश जो स्वयं विज्ञान की अवधारणा पर प्रचलित दृष्टि से परे जाकर विचार करता है.

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विज्ञान-हठ या साइंटिज़्म

आम ज़बान में किसी के व्यवहार को अवैज्ञानिक कहना एक गाली जैसा हो गया है. जो कुछ वैज्ञानिक है, वह सही है, तर्क-आधारित है. विज्ञान से इतर व्यवहार गलत है, तर्कहीन है, और खारिज करने लायक है. ऐसा आम तौर पर मान लिया जाता है. समाज में वैज्ञानिकों को सम्मान के साथ देखा जाता है. कई ज़रूरी मुद्दों पर उनकी राय ली जाती है. अक्सर वे गलत होते हैं, कई बातें तर्क से हट कर महज़ आस्था के आधार पर कर रहे होते हैं, पर उनके कहे को संजीदगी से लिया जाता है. तमाम बहसों या अक्सर दी गई गलत सूचनाओं के बावजूद समाज का विज्ञान और वैज्ञानिकों पर भरोसा रहा है, भले ही समाज में ज़्यादातर लोगों की सोच बिल्कुल ही ग़ैर-वैज्ञानिक हो. खास तौर पर पश्चिमी मुल्कों में समाज ने विज्ञान को वह सत्ता सौंप दी है, जो कभी धर्म-संस्थाओं के हाथ होती थी.

कुछ दार्शनिक विज्ञान के प्रति पूजा जैसी भावना को साइंटिज़्म या विज्ञान-हठ कह कर दुत्कारते हैं. इस हठ का विरोध करने वाले मानते हैं कि विज्ञान इल्म पाने का महज़ एक तरीका है और दूसरे तरीकों से अलग इसकी कोई खास हैसियत नहीं हो सकती. यह ज़रूरी नहीं कि वे विज्ञान के खिलाफ हों, पर आज समाज में प्रकृति-विज्ञान को मिली हैसियत से उन्हें परेशानी है. उन्हें यह भी चिंता की बात लगती है कि हर तरह के सवाल पर विज्ञान के तरीकों का इस्तेमाल करने की कोशिश होती है. ज़ाहिर है कि विज्ञान-हठ की बात धुंधली-सी है. कोई भी ऐसा नहीं कहेगा कि उसमें ऐसा हठ है.

कई दार्शनिकों में सवालों के जवाब ढूंढने के लिए पूरी तरह तर्क पर निर्भरता को हठ माना जा सकता है. खास तौर पर बीसवीं सदी के महान दार्शनिक विलर्ड वान ओरमान क्वाइन के बारे में कहा जाता है कि वह ऐसे सवालों को चर्चा लायक नहीं मानता था जिनको सुलझाने के लिए विज्ञान के तरीकों का इस्तेमाल न हो सके. बीसवीं सदी की शुरुआत में समाजशास्त्र में प्रकृतिवाद नामक धारणा उभरी, जिसके मुताबिक सामाजिक सवालों से जूझने के लिए विज्ञान के तरीकों यानी आंकड़े इकट्ठे करना, सांख्यिकीय विश्लेषण आदि का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. एमिल दुर्खीम ने इस तरह से बढ़ते शहरीकरण के साथ खुदकुशी में बढ़त को समझने की कोशिश की. आखिर इंसान भी कुदरत का हिस्सा है, और विज्ञान कुदरत के हर पहलू की पड़ताल करता है, इसलिए इंसान की फितरत और उसके सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए विज्ञान के तरीकों का इस्तेमाल सही लगता है.

ऐसे देखा जाए तो हर तरह का ज्ञान आखिरकार वैज्ञानिक ज्ञान रह जाता है. फलसफे की ज़रूरत महज़ विज्ञान की समझ बढ़ाने की रह जाती है. कई दार्शनिक इस सरलीकरण को खारिज करते हैं. उनका मानना है कि हर दार्शनिक सवाल को वैज्ञानिक तरीकों से देखा या समझा नहीं जा सकता है. दर्शन और विज्ञान में तारतम्य हो, इसमें कोई समस्या नहीं है, पर विज्ञान के वर्चस्व का विरोध ज़रूरी है.

इंसान और कुदरत में उसकी हैसियत पर हर सवाल का जवाब विज्ञान से नहीं मिल सकता. समाजशास्त्र और प्रकृति-विज्ञान के बीच रिश्ते को लेकर भी ऐसा ही सवाल उठता है. बेशक प्रकृति-विज्ञान यानी भौतिकी, रसायनिकी और जैविकी में समाज विज्ञान के विषयों, जैसे अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र आदि के बनिस्बत ज़्यादा तरक्की हुई दिखती है. यह इसलिए नहीं है कि वैज्ञानिक ज़्यादा समझदार हैं या विज्ञान के तरीके सबसे बेहतर हैं, बल्कि इसलिए कि इंसान की फितरत बड़ी जटिल होती है और इसे निर्जीव चीजों की तरह या महज़ अणु-परमाणुओं के गुणधर्मों के आधार पर नहीं समझा जा सकता.

यह सही है कि अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के दीगर और विषयों में विज्ञान के तरीकों और खास तौर पर गणित का व्यापक इस्तेमाल हुआ है. ऐसा मुमकिन है कि भौतिकी की तरह कभी समाजशास्त्र को भी गणित के समीकरणों में समेटा जा सकेगा. कई समाजशास्त्री इस बात से असहमत हैं. उनका मानना है कि विज्ञान में जिस तरह के मॉडल बनाए जाते हैं, वैसे मॉडल समाजशास्त्र में कामयाब नहीं हो सकते. मॉडल भी वक्त के साथ बदलते रहते हैं, और अलग-अलग विषयों में उनका खाका अलग होता है, इसलिए विज्ञान के तरीके की कोई अलग शिनाख्त कर पाना आसान नहीं है.

विज्ञान और समाज: यह ज़रूरी है कि समाज में विज्ञान पर जागरूकता और वैज्ञानिक चेतना फैलाई जाए, पर इसके लिए विज्ञान को श्रेष्ठ साबित करना ज़रूरी नहीं है. ज़रूरत इस बात की है जिन गैर-वैज्ञानिक बातों से हमें नुकसान पहुंचता है, उनके बारे में लोगों को समझाया जाए. मसलन, सुबह या देर रात को धर्म स्थानों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से शोर का प्रदूषण बढ़ने से हमें जो जिस्मानी और रूहानी नुकसान होता है, उस बारे में समझाएं. पर ऐसे समाज में जहां धर्म की बड़ी भूमिका है, यह ज़रूरी नहीं है कि हम लोगों से यह कहें कि वे ईश्वर में आस्था छोड़ दें. भिन्न धर्मों में आस्था रखते हुए या नास्तिक होते हुए भी शांति के साथ रहा जा सकता है, इस बात को बढ़ावा दें.

वैज्ञानिक तर्कशीलता की सीमाएं

अक्सर लोग कहते हैं कि विज्ञान हर सवाल का जवाब नहीं देता है. सही है, वैज्ञानिक पद्धति हर सवाल के जवाब ढूंढने के लिए इस्तेमाल में नहीं लाई जा सकती. हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि विज्ञान की कई सीमाएं हैं.

नैतिक निर्णयः यह हर कोई जानता है कि वैज्ञानिक जानकारी का अक्सर अनैतिक मकसद के लिए इस्तेमाल होता रहा है. आम तौर पर इसके बारे में यह कहा जाता है कि विज्ञान यह तय नहीं करता कि शोध का विषय क्या होगा. रासायनिक, जैविक या नाभिकीय शस्त्रों पर काम करना है या नहीं, हिरोशिमा पर बम गिराना है या नहीं, ये वैज्ञानिक सवाल नहीं हैं. विज्ञान का मकसद कुदरत के बारे में जानकारी इकट्ठी करना है, उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे हो – नैतिक या अनैतिक उद्देश्यों के लिए हो – यह विज्ञान या वैज्ञानिकों के हाथ में नहीं है.

पर पेशेवर वैज्ञानिक इतना कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. न ही हर दार्शनिक विज्ञान को इस तरह मूल्य-निरपेक्ष मानता है. कुन ने कहा था कि हम जो देखते हैं, वह थिअरी-मय होता है. उसी तरह, वैज्ञानिक जांच के पीछे मूल्य-बोध होता है. वैज्ञानिक अपने शोध के विषय तय करते हैं. कुदरत के बारे में किसी भी सवाल के कई पहलू होते हैं, इनमें से क्या जांच का विषय होगा, यह तय करना वैज्ञानिक के हाथ होता है.

दूसरी बात यह कि एक ही अवलोकन की अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं. आंकड़े जैसे भी हों, वैज्ञानिक के पास चुनने को एक से ज़्यादा व्याख्याएं हैं. इसलिए सिद्धान्त चुनते हुए अपने पूर्वाग्रहों से बच पाना नामुमकिन है. आखिर में शोध भले ही पूर्वाग्रहों से बचकर किया गया हो, पर जो जानकारी मिली उसका इस्तेमाल कैसे होगा, किस तरह की टेक्नोलॉजी बनेगी इस पर चुप्पी साध लेना भी एक तरह की पक्षधरता है. जो मानव विरोधी है, कुदरत विरोधी है, उसके खिलाफ खड़ा होना हर इंसान की जिम्मेदारी है. वैज्ञानिक भी इंसान होता है.

आज ज्यादातर वैज्ञानिक खोज कॉरपोरेट घरानों के पैसों से हो रही है और इसका फायदा भी वो ही उठाते हैं. अक्सर ऐसा भी होता है कि कंपनियों से पैसा लेकर किया गया शोध शक के दायरे में होता है, और इसके विरोध में उठी आवाजें धीमी रह जाती हैं. वैसे माली हितों से अलग भी निजी पूर्वाग्रहों से विज्ञान पर पड़े असर की कई मिसालें हैं. एक बड़ी मिसाल सोश्यो-बायोलॉजी यानी सामाजिक-जीवशास्त्र की है. इस पर 70-80 के दशकों में खूब बहस छिड़ी थी. इसमें दावा यह था कि डार्विन के सिद्धान्तों का इस्तेमाल सामाजिक संबंधों के नियम-कायदों को समझने के लिए किया जा रहा है. भिन्न प्रजातियों के बीच संबंधों को समझने में डार्विन के सिद्धान्त काम आते हैं.

मसलन, बिल्ली देखते ही चूहा क्यों भागता है, इसे समझने के लिए यह तर्क दिया जाता है कि अतीत में जो चूहे बिल्ली से दूर नहीं भागते थे उनकी संततियों की तादाद कम रह गई. पीढ़ी दर पीढ़ी बिल्ली से डरने की फितरत बच जाने वाले चूहों के जीन्स में रह गई. यह परिवेश के साथ अनुकूलन का सिद्धान्त है. इसी तरह इंसान में सांप का डर जन्म-जात होता है, यह भी एक ही तर्क से समझा जा सकता है. पर इसे एक ही प्रजाति के भिन्न लोगों पर ही लागू किया गया. जैसे, भाई-बहनों या करीब के रिश्तों में यौन-संबंध न होने (इन्सेस्ट-अवॉइडेंस) को ऐसे समझा गया कि चूंकि ऐसे रिश्तों से न केवल जीन्स में विविधता नहीं बढ़ेगी, बल्कि इनकी वजह से जीन्स में गड़बड़ी बढ़ेगी और इससे प्रजाति नाश की ओर बढ़ेगी, इसलिए समाज में इन रिश्तों की मनाही है. पर क्या यह जीन्स में तय होता है? सोश्यो-बायोलॉजिस्ट यही कहेंगे, पर हम सब जानते हैं कि दरअसल हमें यह सीख समाज से मिली है कि ऐसे रिश्ते गलत हैं.

यानी यह जैविक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रोक है. इससे भी ज़्यादा विवादास्पद यह है कि बलात्कार, हिंसा, समलिंगियों और भिन्न नस्ल के लोगों के लिए नफरत, पुरुषों में एक से ज़्यादा यौन-रिश्तों की प्रवृत्ति आदि के लिए ऐसे ही तर्क दिए जाते हैं. सोश्यो-बायोलॉजी की कई आलोचनाओं में से सबसे अहम यह है कि बिना पर्याप्त जांच किए दी गई ये व्याख्याएं अपराधियों को छूट देती हैं कि उनके अपराध के लिए वे बचाव का रास्ता जेनेटिक उलझनों में ढूंढ़ निकालें.

(साभार: एकलव्य फाउंडेशन)