राम मंदिर चढ़ावा विवाद: विपक्ष ने ट्रस्ट और भाजपा पर साधा निशाना, विनय कटियार बोले- ‘ये जितने हैं, सब चोर हैं’

अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित हेराफेरी के आरोपों ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. विपक्षी दल ट्रस्ट, भाजपा और केंद्र सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं. एसआईटी जांच के बीच विनय कटियार समेत कई हिंदुत्ववादी नेताओं के बयान भी बहस का केंद्र बन गए हैं.

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने एक पोस्टर लगाया है, जिसमें अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले चंदे के पैसे के कथित हेराफेरी का जिक्र है. (फोटो: एक्स)

नई दिल्ली: अयोध्या में राम मंदिर के लिए इकट्ठा किए गए चढ़ावे में हेराफेरी के आरोपों ने भाजपा की सबसे अहम राजनीतिक और वैचारिक परियोजना के इर्द-गिर्द एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दलों द्वारा मंदिर के प्रबंधन से जुड़े ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल उठाए हैं. ऐसे में यह मामला सिर्फ़ कथित तौर पर चंदा-पेटी से चोरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है.

इन आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसआईटी (विशेष जांच दल) गठित किए जाने पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार (15 जून) को एक्स पर तीखा हमला किया.

उन्होंने लिखा, ‘भाजपा का भ्रष्ट शासनकाल दुर्भाग्यपूर्ण है, प्रदेश में बननी चाहिए आईआईटी, पर बन रही है एसआईटी’

उन्होंने प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को भी कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि जांच में पुलिस को विशेष ‘सहायता’ की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि आरोपी ‘बहुत दूर नहीं हैं.’

सालों तक भाजपा का दावा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक स्वतंत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर का निर्माण कराया. लेकिन अब जब वही ट्रस्ट – जिसके सदस्यों को कथित रूप से चुनकर नियुक्त किया गया था – पर ही शक के बादल मंडरा रहे हैं, तब यह सफाई काम नहीं आ रही कि वह मंदिर के रोजमर्रा के कामकाज का जिम्मेदार नहीं है.

इसके बजाय विभिन्न राजनीतिक दल भाजपा और प्रधानमंत्री की ओर सीधे उंगली उठा रहे हैं. दैनिक भास्कर की उस रिपोर्ट का हवाला देते हुए, जिसमें ट्रस्ट के कथित संचालन और लगभग 200 करोड़ रुपये के नुकसान का उल्लेख किया गया था, कांग्रेस ने एक्स पर लिखा कि यह मामला ‘आस्था की लूट’ है.

पार्टी की पोस्ट में कहा गया, ‘ये साफ तौर से आस्था पर डकैती है. राम मंदिर से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है. भाजपा और आरएसएस के लोगों ने इस चढ़ावा चोरी से उनकी आस्था पर चोट पहुंचाई है.’

यह मांग भी की जा रही है कि पूरे राम मंदिर ट्रस्ट, खासकर चंपत राय और ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए.

कांग्रेस ने कहा, ‘इस मामले में उच्च न्यायालय के सिटिंग जज के द्वारा समयबद्ध जांच कराई जाए और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए. इस संगठित लूट के जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं.’

वहीं, आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह ने कहा है कि चूंकि ट्रस्ट का गठन भारत सरकार ने किया था (सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद) और पीएमओ की इसमें निगरानी की भूमिका है, इसलिए मोदी अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते.

उन्होंने कहा कि राम मंदिर के दानपात्र और चढ़ावे में करोड़ों रुपये की चोरी के मामले सामने आने के बाद अब एक और बड़ा घोटाला उजागर हुआ है, जिसमें 2 करोड़ 92 लाख 86 हजार रुपये मूल्य की नजूल जमीन को 24 करोड़ रुपये में खरीदा गया.

सिंह ने उन दावों का हवाला दिया कि मंदिर के 50 से ज़्यादा कर्मचारी चढ़ावे की हेराफेरी में शामिल थे और ट्रस्ट द्वारा पहले खरीदी गई ज़मीन पर सवाल उठाए हैं.

सिंह ने कहा कि ट्रस्ट अध्यक्ष के उत्तराधिकारी ने भी भ्रष्टाचार की बात कही. राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे विनय कटियार ने भी चोरी के आरोप लगाए. भाजपा के पूर्व मीडिया प्रभारी रजनीश सिंह और संतोष दुबे ने भी चढ़ावे में गड़बड़ी और चोरी की बात सार्वजनिक रूप से कही, लेकिन किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया गया. जो भी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे गालियां दी जाती हैं और बदनाम करने की कोशिश की जाती है.

संजय सिंह ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों की गिरफ्तारी, ट्रस्ट को भंग करने और ईमानदार लोगों को जिम्मेदारी सौंपने की मांग की.

ट्रस्ट कितना स्वतंत्र था?

साल 2020 में जब सरकार ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए एक ‘स्वतंत्र ट्रस्ट’ गठित करने की घोषणा की थी, तब सरकार ने – जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी पीआईबी प्रेस विज्ञप्तियां भी शामिल थी – इसमें मोदी की भूमिका को बहुत ज़्यादा दिखाया था.

404 शब्दों की उस प्रेस विज्ञप्ति में ‘प्रधानमंत्री’ शब्द का चार बार और ‘पीएम’ शब्द नौ बार जिक्र किया गया था.

ट्रस्ट की वेबसाइट के अनुसार, उसके 15 में से 12 सदस्यों को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा संसद में ट्रस्ट गठन की घोषणा के बाद नामित किया गया था. गृह मंत्री अमित शाह ने ट्रस्ट की गठन की घोषणा की थी.

आरोपों को नजरअंदाज करना नामुमकिन है

जिस बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया जा रहा है, उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा दशकों से बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि आंदोलन से राजनीतिक लाभ प्राप्त करती रही है और इसे हिंदू अस्मिता की ऐतिहासिक पुनर्स्थापना के रूप में पेश करती रही है.

दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक केपी मलिक ने एक्स पर लिखा, ‘अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर के चढ़ावे में कथित 200 करोड़ रुपये के घोटाले की खबरें बेहद गंभीर और चिंताजनक हैं. यदि वास्तव में इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता हुई है, तो सवाल उठता है कि इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इतने लंबे समय तक निगरानी और ऑडिट व्यवस्था क्या कर रही थी?’

उन्होंने धोखाधड़ी के आरोपों को हिंदू आस्था पर हमला बताया और जवाबदेही की मांग की.

आम लोगों के बीच जो बातें चल रही हैं, उनसे ऐसा लगता है कि अगर नए रूप में पेश की गई आक्रामक हिंदू पहचान का मुख्य प्रतीक ही वित्तीय अनियमितताओं के घेरे में आ जाता है, तो यह प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी व सरकार के लिए एक बड़ी समस्या होगी, जिन्होंने हर कीमत पर उस पहचान को बढ़ावा दिया था.

इसके अलावा मंदिर फंड के कथित दुरुपयोग को लेकर अयोध्या में भाजपा के खिलाफ जमीनी स्तर पर राजनीतिक लामबंदी भी शुरू होती दिखाई दे रही है.

15 जून को कांग्रेस नेता शरद शुक्ला ने अयोध्या शहर में एक विशाल होर्डिंग लगवाया, जिसमें राम मंदिर के दान-पात्र के फंड में भ्रष्टाचार के आरोपों का ज़िक्र था और धार्मिक परंपरा के अनुसार इसकी क्या सज़ा हो सकती है, यह भी बताया गया था.

जिस राज्य में भाजपा भ्रष्टाचार-विरोधी मुद्दे पर सत्ता में आई और प्रधानमंत्री ने खुद इस दावे का नेतृत्व किया, वहीं नगर निगम के कर्मचारियों को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लगा पोस्टर हटाते हुए देखा गया. ऑनलाइन पोस्ट किए गए वीडियो में देखा जा सकता है कि जैसे ही वह पोस्टर हटा, उसके पीछे एक और होर्डिंग दिखाई दिया, जिस पर किसी कमर्शियल प्रोडक्ट का विज्ञापन था.

पुराने हिंदुत्ववादी नेता फिर से सक्रिय हो रहे 

जब से कथित गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं, हिंदुत्व आंदोलन के कुछ पुराने चेहरे फिर से सक्रिय हो गए हैं और अपना गुस्सा उन लोगों पर निकाल रहे हैं जो आज मंदिर का कामकाज संभाल रहे हैं.

ऐसे ही एक नेता हैं भाजपा के विनय कटियार, जो कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति और बाबरी मस्जिद विध्वंस आंदोलन में एक अहम और विवादित चेहरा हुआ करते थे.

जब पत्रकारों ने उनसे कथित हेराफेरी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘ये जितने भी हैं, सब चोर हैं.’ उनका इशारा उन सभी लोगों की ओर था जो उनके अनुसार राम मंदिर परियोजना के नियंत्रण से उनके हटने के बाद उससे जुड़े रहे.

विनय कटियार भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव, उत्तर प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व राज्यसभा सदस्य, पूर्व लोकसभा सांसद और बाबरी मस्जिद विध्वंस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से रहे हैं. विध्वंस में उनकी भूमिका को लेकर उन पर चला आपराधिक मामला किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा.

उन्होंने 1984 में बजरंग दल की स्थापना की थी. हालांकि राम मंदिर निर्माण प्रक्रिया में उनकी भूमिका सीमित रही और प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में हुए प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में भी वे प्रमुख रूप से दिखाई नहीं दिए. वे समय-समय पर इस बात को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे हैं कि उन्हें किनारे कर दिया गया.

अब, मोदी के दौर में हिंदुत्व के चमक-धमक वाले रूप से नाखुश कटियार ने अपनी पार्टी को उन ‘बलिदानों’ की याद दिलाई है जो उन्होंने और ‘उनके जैसे लोगों’ ने दिए थे, ताकि मौजूदा नेतृत्व फल-फूल सके.

अयोध्या वाली लोकसभा सीट पर भाजपा की हार के बाद कटियार ने एक बार फिर सार्वजनिक रूप से खुद को उस इलाके की राजनीति में एक अहम पक्षकार के तौर पर पेश किया. किनारे किए जाने के बावजूद ‘रिटायर’ होने के बजाय उन्होंने अवध क्षेत्र के निवासियों के बीच धार्मिक नफ़रत की भावना को हवा देना जारी रखा.

इसीलिए उत्तर प्रदेश में कटियार का बयान चिंता का विषय हो सकता है, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं.

2027 में राजनीतिक हालात

अगले चुनाव में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने की कोशिश करेगी, जबकि पिछले चुनावी मुकाबले (लोकसभा, 2024) में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी.

2004 में जब कांग्रेस पार्टी ने अपनी राज्य इकाई में बदलाव किया, तो भाजपा ने अपने तत्कालीन यूपी प्रमुख कटियार को हटा दिया था. उस समय कांग्रेस ने अपना सामाजिक दायरा बढ़ाने के लिए गैर-कुलीन जातियों के नए चेहरों को शामिल किया था, जबकि भाजपा ने कुलीन-जाति के वोटरों के नुकसान की आशंका को देखते हुए कटियार को हटा दिया, जो पिछड़ी जाति से आते हैं.

एक तरह से उस समय भाजपा ने पिछड़े वर्ग के वोटरों को एकजुट करने की कोशिश छोड़ दी थी. भले ही तब से हालात बदल गए हों, लेकिन 2027 में भाजपा को एक बार फिर समाजवादी पार्टी के पिछड़े-दलित-आदिवासी (पीडीए) चुनावी समीकरण का सामना करना पड़ सकता है – जिसमें शायद कांग्रेस पार्टी और दूसरे सहयोगी भी शामिल हों.