अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे के गबन का विवाद आगे कौन-सा मोड़ लेगा?

अयोध्या के चढ़ावे के गबन मामले में कई प्रतिप्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं. यह कि अगर कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई तो ट्रस्ट ने प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से जांच के लिए एसआईटी क्यों गठित करवाई? ऐसी एसआईटी, जिसके सदस्यों की ही निष्पक्षता पर गंभीर संदेह हैं. विरोधी तो कह रहे हैं कि इस एसआईटी जांच के पीछे ट्रस्ट की मंशा सच सामने लाने की नहीं, सीबीआई या ईडी की जांच से बचने की है.

/
राम मंदिर. (फोटो: पीटीआई)

अयोध्या में जून का महीना आम तौर पर 1857-58 की खट्टी-मीठी यादों का होता है- उसके फैजाबाद नाम से जाने जाते रहे हिस्से में भी. दरअसल, 1857 में आठ जून को देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लपटें फैजाबाद पहुंचीं तो अंग्रेजों का राज उनकी आंच में बुरी तरह झुलस गया था. ईस्ट इंडिया कंपनी की बागी हो गई देसी फौज ने उस दिन फैजाबाद की जेल का फाटक तोड़कर उसमें कैद अनूठी शख्सियत के धनी मौलवी अहमदउल्लाह शाह (जिन्हें कंपनी ने अपने खिलाफ सिर उठाने के ‘जुर्म’ में मौत की सजा सुना रखी थी) को छुड़ाकर अपना सेनापति घोषित किया और आज़ादी का ऐलान कर अंग्रेज़ी राज को बीते दिनों की बात बना दिया था.

यह और बात है कि यह आज़ादी अपनी वर्षगांठ भी नहीं मना पाई थी क्योंकि उक्त स्वतंत्रता संग्राम कुछ ही महीनों में विफल हो गया था. उसके अगले ही साल यानी 1858 में 15 जून को शाहजहांपुर जिले की पुवायां रियासत के एक विश्वासघाती राजा के भाई ने धोखे से मौलवी का कत्ल कर कंपनी द्वारा घोषित पचास हजार रुपये के इनाम के लालच में उनका सिर उसके कलक्टर को सौंप दिया था. उस वक्त मौलवी स्वतंत्रता संग्राम को नए सिरे से संगठित करने के प्रयत्न कर रहे थे और उनमें उक्त राजा से मदद मांगे गए थे.

ऐसे में स्वाभाविक ही है कि अयोध्या में आठ जून को उस बगावत की, तो 15 जून को मौलवी की शहादत की याद ताजा करने के उपक्रम हों. लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 07-08 जून को नए-नवेले राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले चढ़ावे की रकम के गबन से जुड़े ट्वीट करके अदालत से उसका स्वत: संज्ञान लेने की मांग क्या कर दी, यह मामला अभी तक लोगों की चेतना पर कहीं ज्यादा छा गया है और जाने कब तक छाया रहेगा.

इस गबन के सिलसिले में लोग यह भी याद कर रहे हैं कि पांच साल पहले 2021 में भी वह जून का ही महीना था, जब राम मंदिर के निर्माण व संचालन के लिए गठित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर भूमि की खरीद में करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे.

आरोपों में कहा गया था कि उसने कुछ ही देर पहले दो करोड़ में बेची गई एक भूमि उसके नए स्वामी से साढ़े अठारह करोड़ रुपयों में खरीदी है. तब इसे लेकर समाजवादी व आम आदमी आदि पार्टियों द्वारा ट्रस्ट के विरुद्ध बड़ा मोर्चा खोला गया था, लेकिन वह जैसे-तैसे मामले का पटाक्षेप करने में सफल रहा.

अलग हवा

अब उसकी याद दिलाते हुए कुछ लोग कह रहे हैं कि ट्रस्ट का रसूख ऐसा है कि वह चढ़ावे के गबन के ताजा मामले में भी अपने बच-बचाकर निकल जाने के उपाय ढूंढ ही निकालेगा. लेकिन दूसरी ओर इन लोगों से विपरीत राय रखने वाले लोग भी हैं, जो कह रहे हैं कि इस बार परिस्थितियां इतनी भिन्न हैं कि ट्रस्ट के लिए उनकी खाइयों को उतनी आसानी से पार पाना कतई संभव नहीं होगा.

इन लोगों का तर्क है कि इस बार ट्रस्ट के अपने (हिंदुत्व के) खेमे की भी अनेक भृकुटियां उसकी ओर तनी हुई हैं, जिनका दावा है कि उसके इस कृत्य से श्रद्धालुओं की आस्था आहत हुई हैं. इसके विपरीत 2021 में उसके समक्ष जो भी चुनौती थी, उसके विरोधियों की ओर से ही पेश की गई थी.

बात को इस रूप में समझ सकते हैं कि उस बार विरोधियों के भूमि खरीद में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर जाने के बावजूद ट्रस्ट के ‘आत्मविश्वास से भरे’ महासचिव चंपत राय का कहना था कि ‘हम सौ साल से आरोप झेलते आ रहे हैं. महात्मा गांधी की हत्या के आरोप भी हम पर लगे. (इसलिए) हम आरोपों की चिंता नहीं करते मीडिया (को चाहिए कि वह) भी इसकी चिंता न करे.’

लेकिन इस बार वे इतने कमजोर, कहना चाहिए नर्वस, दिख रहे हैं कि एक आधे-अधूरे खंडन (जो अब गलतबयानी ज्यादा लगता है) के बाद मीडिया का सामना ही नहीं कर रहे, जबकि वह मीडिया को आमतौर पर उनके पक्ष का शुभचिंतक ही माना जाता है.

वे करें भी क्या, चढ़ावे की धनराशि की गिनती करने वाले कई कर्मचारियों के विरुद्ध कथित छापों में गबन की राशि के एक हिस्से की रिकवरी से उनके इस दावे की हवा निकल गई है कि फिलहाल, ट्रस्ट का आंतरिक ऑडिट हो रहा है और उसमें ‘कोई उल्लेखनीय बात’ सामने नहीं आई है.

इस सिलसिले में कई प्रतिप्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं. यह कि अगर कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई तो ट्रस्ट ने प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से जांच के लिए एसआईटी क्यों गठित करवाई?

ऐसी एसआईटी, जिसके सदस्यों के पिछले कारनामों के कारण उसकी निष्पक्षता में कई हल्कों को गंभीर संदेह हैं. विरोधी तो कह रहे हैं कि ‘खुशी-खुशी’ कराई जा रही इस एसआईटी जांच के पीछे ट्रस्ट की दूध का दूध और पानी का पानी करने की नहीं, सीबीआई या ईडी की जांच से बचने की मंशा है.

फिर, कोई ‘उल्लेखनीय बात’ नहीं थी तो आपाधापी में तथाकथित छापों में गबन की धनराशि की बरामदगी का सिलसिला क्योंकर और कैसे शुरू हुआ और सरयू में ढेर सारा पानी बह जाने के बावजूद अभी तक मामले में कोई एफआईआर क्यों नहीं लिखाई गई? (ये पंक्तियां लिखने तक युवक कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष शरद शुक्ला और धर्मसेना के प्रमुख संतोष दुबे ने मामले की एफआईआर दर्ज करने के लिए रामजन्म भूमि थाने में अपनी ओर से अलग-अलग अर्जियां दी हैं.)

बहरहाल, एक तरफ ये प्रश्न व प्रतिप्रश्न हैं और दूसरी ओर ट्रस्ट पर उसके ‘अपने’ भी हमलावर हो उठे हैं. इनमें वे भी शामिल हैं, जिनको ट्रस्ट के गठन के वक्त उसमें प्रतिनिधित्व नहीं मिला और वे भी, जिन्हें पिछले सालों में हिंदुत्ववादियों की अंदरूनी राजनीति में बरबस हाशिए पर धकेल दिया गया. इन सबको लगता है कि यह गबन उनके लिए अपने भीतर जमे सारे गुस्से को निकाल लेने और सब कुछ कह लेने का अवसर है.

घर के भेदी भी

इसलिए उनमें से कई ने ‘घर के भेदी’ की भूमिका भी अपना ली है और गबन या गड़बड़ करने वालों पर उंगली उठाते हुए उनको ‘चोर’ और ‘संघाचार्य’ तक कह रहे हैं. साथ ही वे पुराने मोदी-योगी अंतर्विरोध को भी उभार रहे हैं. कम से कम दो भाजपा नेता मामले की जांच के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखने व उन पर भरोसा करने के लिए चर्चा में हैं, जिनमें से एक चंपत राय का इस्तीफा भी मांग रहे हैं, जबकि दूसरी ओर ऐसे भी सज्जन हैं, जो कहते हैं कि यह ट्रस्ट तो मोदी की सरकार ने ही बनाया है. योगी सरकार ने बनाया होता तो उसमें ऐसे लोग होते ही नहीं.

ये सज्जन अपने हल्कों में इस ट्रस्ट को भंग कर देने की मांग भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं, वे ट्रस्ट की निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र को लपेटे में लेकर उनकी भी आलोचना कर रहे और उनको 1990 में कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग का गुनहगार भी बता रहे हैं. यह पूछते हुए कि इस अंगने में उनका क्या काम है?

इस बीच चंपत राय का एक ऐसा वीडियो वायरल हो चुका है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सबसे पहले जनवरी, 2024 में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से ठीक पहले सामने आया था. वीडियो में राम मंदिर की सुरक्षा और चढ़ावे के तौर-तरीकों पर बात करते हुए वे कह रहे हैं कि ‘दरवाज़े में सोना मढ़वा दिया…चोर आएंगे पंडित जी की गर्दन काटेंगे और ले जाएंगे…ये अयोध्या है भइया!’

बताया जाता है कि तब उन्होंने अपने अंदाज में अपनी चिंता को रेखांकित किया था, लेकिन अब सोशल मीडिया यूजर्स और विपक्षी नेता उनके इस वीडियो को शेयर कर उन पर ‘खुद मियां फजीहत दीगरां नसीहत’ जैसे तंज कस रहे हैं.

दूसरी ओर बजरंग दल के संस्थापक अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व सांसद विनय कटियार कह रहे हैं कि ट्रस्ट या मंदिर की व्यवस्था से जुड़े जो भी लोग इस गड़बड़ी में शामिल हैं, सब चोर हैं और उनको जल्द से जल्द अपने पद से हटकर या तो भागना पड़ेगा या जेल जाना पड़ेगा.

उनके मुताबिक, श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कोई भी घोटाला बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह पांच सौ वर्षों की परीक्षा, प्रतीक्षा और बलिदान से बने राम मंदिर और उसमें आस्था रखने वालों से विश्वासघात है. उनका दावा है कि ‘चोरों’ को कोई और नहीं तो वे खुद ठीक कर देंगे, न उनको माफ करेंगे, न ही छोड़ेंगे.

ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास तो यह तक कह चुके हैं कि चढ़ावे को लेकर जो कुछ हुआ है, अब उसकी जांच भगवान ही करेंगे, क्योंकि किस-किस का नाम गिनाऊं, सबके सब बेईमान हैं, कोई भी दूध का धुला नहीं है. इनमें जो लोग पहले साइकिल पर चलते थे, आज वे बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं और उनकी विशाल संपत्तियां बन गई हैं.

महंत पूछते हैं कि जब इन सबकी नीयत संदिग्ध है तो जांच से भला क्या हासिल होगा? अलबत्ता, वे योगी आदित्यनाथ को लेकर विश्वास से भरे हुए हैं.

उनका मुंह खुलेगा तो?

मामले का एक और पक्ष यह है कि इधर राम मंदिर से जुड़ी खबरों के सहारे रहने वाले कितने ही पत्रकार अपने को बेरोजगार अनुभव करने लगे थे, क्योंकि निर्माण और साथ ही उससे जुड़े उत्सव व तामझाम पूरे हो जाने के बाद वह उनको उनके माध्यमों में जगह या सुर्खियां नहीं दिला पा रहा था. अब, चढ़ावे की राशि के गबन के भंडाफोड़ के बाद वे खुश हैं कि कुछ और दिनों के लिए ही सही, उनकी पूछ फिर बढ़ गई है.

लेकिन उनमें से कई अपना पुराना रवैया भूलकर आश्चर्यजनक रूप से ट्रस्ट के आलोचक हो गए हैं और उसकी पोल खोल रहे हैं, जिसे देखकर लोगों को आश्चर्य हो रहा है.

कुछ लोग इसका एक कारण यह बताते हैं कि भाजपा, विहिप और ट्रस्ट ने इन पत्रकारों से अपना भरपूर प्रचार करवाने के बाद मोदी योगी राज में अपने बेहतर मीडिया मैनेजमेंट के भरोसे उनको दूध की मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया था. (क्योंकि मीडिया संस्थानों की ‘सहृदयता’ से उनको सहज ही ‘बड़े पत्रकार’ उपलब्ध हो गए थे. सो भी बिना मोल.)

ऐसे ही ‘बाहर फेंक दिए गए’ एक ‘उत्साही’ पत्रकार ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा, ‘अभी तो देखते जाइए कि जिन कर्मचारियों से अभी ट्रस्ट के लोग गबन की रकम की रिकवरी करा रहे हैं, उनको मुंह खोलने का मौका मिलेगा, तो क्या होगा? जहां तक गबन की बात है, उसकी धनराशि का एक हिस्सा ही सही, बरामद कराकर एक तरह से ट्रस्ट ने मान ही लिया है कि गबन तो हुआ है.’

ऐसे में इस सवाल के जवाब की अभी प्रतीक्षा ही की जा सकती है कि स्थितियां आगे कौन-सी करवट लेंगी. क्या वैसी ही जैसी लेकर हिंदुत्ववादी समाचार माध्यम भी ट्रस्ट के लिए असुविधाजनक खबरें छापने लगे हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)