न्यूज़क्लिक को राहत, मगर अब भी बेरोज़गारी, बदनामी और अनिश्चितता का बोझ ढो रहे हैं पूर्व कर्मचारी

फरवरी 2024 तक न्यूज़क्लिक में क़रीब सौ लोग काम करते थे, जिनका घर सिर्फ़ वहीं के तनख़्वाह से चलता था. लेकिन संस्थान के ख़िलाफ़ एजेंसियों की कार्रवाई और बैंक खाते फ्रीज़ होने के चलते न्यूज़क्लिक से नौकरी गंवाने वाले क़रीब 80 प्रतिशत कर्मचारियों को अब तक कोई स्थाई नौकरी नहीं मिली है.

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न्यूज़क्लिक के दफ़्तर के अंदर की एक तस्वीर. (फोटो: सोनिया यादव/द वायर)

नई दिल्ली: ‘न्यूज़क्लिक में करीब पांच साल नौकरी करने के बाद उस संस्थान से मुझे खाली हाथ निकलना पड़ा. तीन महीने का वेतन रुका हुआ था. माथे पर एंटी-नेशनल का टैग था और कोई नौकरी देने को तैयार नहीं था. जहां भी जाओ लोगों को छापे की कहानी सुनने में ज्यादा दिलचस्पी थी, बजाय हमारी समस्याएं सुनने के. सब बर्बाद हो गया, और आज तक बर्बाद ही है.’

ये बातें न्यूज़ पोर्टल न्यूज़क्लिक में काम करने वाले एक ऐसे पूर्व कर्मचारी ने द वायर हिंदी से कहीं, जिनके घर 3 अक्टूबर 2023 की सुबह करीब 6 बजे दिल्ली पुलिस छापेमारी करने पहुंची थी. उस छापेमारी में उनका फोन और लैपटॉप जब्त कर लिया गया था, और इनसे संस्थान की फंडिंग और रिपोर्टिंग से जुड़े कुछ सवाल-जवाब किए गए थे.

उल्लेखनीय है कि न्यूज़क्लिक की फंडिंग को लेकर हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला आया है, जिसने संस्थान को एक बार फिर सुर्खियोंं में ला दिया है. मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अदालत द्वारा संंस्थान को क्लीन चिट दिए जाने के साथ ही केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को ‘क़ानून का घोर दुरुपयोग’ करने के लिए फटकार भी लगाई गई है.

न्यूज़क्लिक पर दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंंसल कृष्णा ने अपना फ़ैसला 29 मई 2026 को दिया था, जिसे 10 जून को अपलोड किया गया.

इस फ़ैसले में कोर्ट ने आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की एफआईआर और उसके आधार पर शुरू की गई पीएमएलए की कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि मौजूदा कार्यवाही न केवल दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के ख़िलाफ़ शक्तियों का मनमाना हमला और दुरुपयोग भी है. हाईकोर्ट ने ईडी के दावे को ‘पूरी तरह गलत और आधारहीन’ माना.

यहां साफ़ कर दें कि यह फ़ैसला ईडी और ईओडब्लू द्वारा कथित रूप से विदेशी निवेश से जुड़े मामले (एफडीआई) नियमों और अन्य क़ानूनों के उल्लंघन के आरोप से जुड़ा था, और संस्थान के ख़िलाफ़ यूएपीए का मामला अभी भी अदालत में है, जिसे लेकर 3 अक्टूबर 2023 को न्यूज़क्लिक के दफ़्तर और इससे जुड़े 70 से अधिक पत्रकारों, पूर्व कर्मचारियों और अन्य स्टाफ सदस्यों के साथ ही इसके किसी कार्यक्रम में भाग लेने वाले लगभग 100 घरों पर दिल्ली पुलिस ने छापेमारी की थी.

फिलहाल, हाईकोर्ट से जिस मामले में न्यूज़क्लिक को राहत मिली है, वह केस करीब छह साल पहले दर्ज किया गया था.

बदली ज़िंदगियां

अब कई सालों बाद आए इस फैसले के कानूनी मायने तो बहुत अहम हैं लेकिन अगर मानवीय दृष्टिकोण से देखें, तो इस मामले में ‘देर आए दुरुस्त आए’ का मुहावरा भी आप नहीं कह सकते. क्योंकि इन सालों में एक संस्थान के तौर पर न्यूज़क्लिक के लिए क्या बदला, उसकी शायद कल्पना की जा सकती है, लेकिन ये साल वहां काम करने वाले लोगों की जिंदगी को कैसे संघर्ष में तब्दील कर गए, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है.

न्यूज़क्लिक में फरवरी 2024 तक करीब सौ लोग काम करते थे. इन सौ लोगों में ज़्यादातर उस संस्थान के अपने कर्मचारी और पत्रकार थे, जिनका घर सिर्फ़ न्यूज़क्लिक की तनख़्वाह से ही चलता था. इसमें भी ज़्यादातर ऐसे लोग थे, जो देश के विभिन्न राज्योंं के निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों से राब्ता रखते थे और अपने घर के इकलौते कमाने वाले थे.

संस्थान में कई ऐसे युवक-युवतियां भी थे, जो अपने परिवार की पहली पीढ़ी के तौर पर आजीविका कमाने के लिए घर से बाहर निकले थे. इन्हें इस दौरान नौकरी जाने से आर्थिक परेशानियां तो हुईं ही, साथ ही छापे के चलते मानसिक तनाव और सामाजिक स्तर पर ‘एंटी-नेशनल’ के टैग के चलते लोगों की संदेह भरी नज़रों का भी सामना करना पड़ा है.

इस रिपोर्ट को करने के दौरान हमें पता चला कि छापों के बाद न्यूज़क्लिक से नौकरी गंवाने वाले करीब 80 प्रतिशत कर्मचारियों को अब तक कोई स्थाई नौकरी नहीं मिली है.

मामले की शुरुआत कहां से हुई?

संस्थान के ख़िलाफ़ इस मामले की शुरुआत अगस्त 2020 में बताई जाती है, जब दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक न्यास भंग), 420 (धोखाधड़ी) और 120बी (आपराधिक साज़िश) के तहत एफआईआर दर्ज की थी. इसके बाद आर्थिक अपराध शाखा की एफआईआर के आधार पर ही ईडी ने 2 सितंबर 2020 को पीएमएलए के तहत न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया. हालांकि, न्यूज़क्लिक के ज़्यादातर कर्मचारियों को इसकी ख़बर फरवरी 2021 में तलाशी अभियान के दौरान ही मिली.

इसके बाद 9 फरवरी 2021 की सुबह जब ज़्यादातर लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे, तब ही ट्विटर (अब एक्स) पर न्यूज़क्लिक के दफ़्तर पर ईडी के छापेमारी की ख़बरें कुछ पत्रकारों द्वारा पोस्ट की गईं, जो जल्द ही ऑनलाइन मीडिया और टीवी चैनलों पर भी ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर दिखने लगी.

न्यूज़क्लिक की एक पूर्व पत्रकार आरती* इस दिन को याद करते हुए कहती हैं, ‘ईडी की रेड की जानकारी मुझे सुबह एक पत्रकार के सोशल मीडिया पोस्ट से मिली थी. मैंने इसके बाद कुछ लोगों को फोन और मैसेज किए, तो पता लगा कि छापा दफ़्तर और कुछ वरिष्ठ लोगों के घर पर जारी है, जिसमें हमारे प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ, संपादक प्रांजल पांडे और एचआर हेड अमित चक्रवर्ती के घर की जानकारी सामने आई. लेकिन इन सबके बीच न्यूज़क्लिक का काम नहीं रुका, टीम ने हमेशा की तरह तय समय से अपना काम शुरू किया और उस दिन भी हमारी ख़बरें प्रकाशित हुईं. बिना किसी डर के सरकार से सवाल करती हुई, अपने चले आ रहे अंदाज़ में.’

इस संबंध मे संस्थान के एक अन्य पूर्व कर्मचारी आकाश* बताते हैं, ‘न्यूज़क्लिक के दफ़्तर में करीब 38 घंटे छापेमारी चली, वहीं प्रबीर के घर पर पांच दिन छापेमारी जारी रही. यह एक लंबा समय था. हालांकि, इस दौरान संस्थान के काम पर कोई असर नहीं देखने को मिला. क्योंकि उस समय कोविड महामारी चल रही थी, और इसलिए संस्थान में ज़्यादातर काम करने वाले लोग अपने घरों से ही काम कर रहे थे.’

न्यूज़क्लिक के कई पूर्व पत्रकारों ने बताया कि इस छापे के कुछ दिन बाद ही प्रबीर ने सभी कर्मचारियों के साथ एक ऑनलाइन मीटिंग की और सबको स्थिति से अवगत कराते हुए यह आश्वस्त किया कि संस्थान ने फंडिंग से जुड़े सभी जरूरी नियमों का पालन किया है और कहीं भी किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं की गई. संस्थान पहले की तरह ही अपना काम जारी रखेगा और हाशिए के लोगों की आवाज़ उठाने की अपनी कोशिश जारी रखेगा.

वहीं, फरवरी 2021 में रेड के दौरान न्यूज़क्लिक को देश और दुनिया से भरपूर समर्थन मिला था. पत्रकार, कामगार, कलाकार और युवाओं के संगठनों के साथ ही जनआंदोलनों, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में इसके काम करने वालों ने संस्थान के काम को लेकर एकजुटता दिखाई थी.

सात महीने बाद फिर आई ईडी

इसके बाद सितंबर 2021 आया और आयकर विभाग ने न्यूज़क्लिक का सर्वे किया. उस समय एक बार फिर न्यूज़क्लिक की एकजुटता और सरकार से सवाल की आवाज़े उठने लगीं. इसके बाद मामला एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया.

फिर अगस्त 2023 में न्यूज़क्लिक का नाम लोकसभा में गूंजा. न्यूज़क्लिक की पूर्व पत्रकार रीमा* बताती हैं, ‘सात अगस्त 2023 को मेरे अलावा कई लोग दफ़्तर में आए थे और लोकसभा की कार्यवाही को देख रहे थे. इस बीच भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने न्यूयार्क टाइम्स की किसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए न्यूज़क्लिक का नाम लिया और इसे चीनी फंडिंग और देश विरोधी बताते हुए ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से जोड़ा. वह दिन हम सबके लिए कभी न भूलने वाला है.’

रीमा आगे बताती हैं, ‘हमारे संपादकों ने दफ़्तर में मौजूद सभी लोगों से फ़ौरन घर निकलने को कह दिया. साथ ही यह भी कहा कि संभलकर जाएं और अगली किसी सूचना तक दफ़्तर न आएं. इसके बाद डर का माहौल बनना शुरू हुआ. क्योंकि टीवी चैनलों और उसके पत्रकारों ने न्यूज़क्लिक और यहां काम करने वाले लोगों को एंटी-नेशनल और तमाम देश-विरोधी तमगों के साथ टैग करना शुरू कर दिया. हालांकि, संस्थान का काम इसके बाद भी बिना रुकावट जारी रहा.’

मालूम हो कि फंडिंग को लेकर संबित पात्रा, अनुराग ठाकुर समेत कई भाजपा नेताओं ने संस्थान पर चाइनीज़ प्रोपगैंडा फैलाने का आरोप लगाया था, इसके बाद दिल्ली पुलिस ने भी आतंकवाद विरोधी क़ानून गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत केस दर्ज किया.

फंडिंग और कथित प्रोपगैंडा से जुड़े आरोप

न्यूज़क्लिक पर आरोप लगाए गए कि उसने ‘चीनी प्रोपगैंडा’ फैलाने के लिए एक अमेरिकी अरबपति से फंडिंग ली है. इसी संबंध में 3 अक्टूबर 2023 को वेबसाइट के शीर्ष नेतृत्व से लेकर जूनियर स्टाफ सदस्य, पूर्व कर्मचारी और कई अन्य बाहरी लोग, जो कभी किसी रूप में इस संस्थान से जुड़े थे, के घरों पर छापेमारी की गई थी.

पुलिस ने छापेमारी के दौरान इन लोगों के मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर समेत इलेक्ट्रॉनिक सामान ज़ब्त कर लिए और इस मामले में न्यूज़क्लिक के एडिटर-इन-चीफ़ प्रबीर पुरकायस्थ और एचआर हेड अमित चक्रवर्ती को गिरफ़्तार किया गया.

अक्टूबर 2023 में पुलिस ने दिल्ली स्थित न्यूज़क्लिक कार्यालय पर ताला लगा दिया था. (फोटो: अरेंजमेंट)

इसके बाद अनिश्चितता और इसके कर्मचारियों के बीच डर, तनाव और आजीविका का संकट शुरू हो गया. कुछ लोगों ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी, तो कुछ उस छापेमारी की दहशत को दिमाग से निकालने के लिए संघर्ष करने लगे. किसी तरह फोन, लैपटॉप आदि का जुगाड़ किया गया. मगर इस बीच काम जारी रहा.

और फिर आया दिसंबर 2023, 18 तारीख के करीब यह ख़बर सामने आई कि न्यूज़क्लिक के बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए गए हैं.

इस संबंध में एक पूर्व कर्मचारी राकेश* बताते हैं, ‘हमें बैंक अकाउंट फ्रीज़ होने की ख़बर भी सोशल मीडिया से मिली. फिर एक ऑनलाइन मीटिंग में संस्थान द्वारा बताया कि गया कि इसके ख़िलाफ़ कोर्ट का रुख किया गया है और उम्मीद है कि कोर्ट लोगों की रोज़ी-रोटी का मसला प्राथमिकता से देखेगी. हालांकि इस बीच क्रिसमस और नया साल आ गया और न्यूज़क्लिक के कर्मचारियों को न सैलरी मिली और न ही कोर्ट में त्वरित सुनवाई हुई.’

एक अन्य कर्मचारी शाबाज़* बताते हैं, ‘मेरा परिवार दिल्ली में किराए के मकान में रहता है, बच्चों के स्कूल की फीस जानी होती है. इसके अलावा घर के तमाम और भी खर्चे होते हैं, जिसके लिए हम सैलरी पर ही निर्भर थे. जैसे-तैसे बचत के पैसों से कुछ दिनों तक मामला संभला. उसके बाद संस्थान की ओर से जनवरी के आखिरी सप्ताह में कह दिया गया कि ‘दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि अब आप दूसरी नौकरी तलाश लें क्योंकि संस्थान सैलरी देने की स्थिति में नहीं है, हमारे खाते फ्रीज़ हैं और संस्थान कई सारे लीगल मामलों में फंसा है, जिसमें बहुत सारे पैसे लग रहे हैं.’

शाबाज़ आगे बताते हैं, ‘हमने एक महीने का नोटिस पीरियड पूरा किया और फरवरी आखिर में लगभग सभी कर्मचारियों की नौकरी चली गई. हमें कथित मुख्यधारा के चैनलों या संस्थानों में कोई स्वीकारने को तैयार नहीं था क्योंकि हम न्यूज़क्लिक से थे, एक ऐसा संस्थान जिस पर देश विरोधी काम करने का आरोप लगा है, कई लोगों ने हमें एंटी-नेशनल मान भी लिया था.’

अक्टूबर 2023 में न्यूज़क्लिक के समर्थन में हुआ एक प्रदर्शन. (फोटो: याक़ूत अली/द वायर)

नौकरी के लिए संघर्ष

द वायर हिंदी से बातचीत में संस्थान के एक पूर्व पत्रकार बताते हैं कि उन्होंने अपनी मौजूदा सैलरी से करीब 30 प्रतिशत कम पर मजबूरी में एक अन्य मीडिया संस्थान जॉइन किया, क्योंकि उनके पास न आमदनी का कोई अन्य स्रोत था न ही नौकरी के लिए कोई अन्य विकल्प. कुछ मीडिया संस्थानों ने उन्हें कहा कि ‘आपका काम अच्छा है, लेकिन आपको अपने यहां नौकरी देकर हम कानून की नज़रों में नहीं आना चाहते, क्योंकि आपके पुराने संस्थान पर जांच अभी भी जारी है.’

न्यूज़क्लिक के कई ज़्यादातर पूर्व पत्रकारों और कर्मचारियों को नौकरी गंवाने के करीब दो साल बीतने के बाद भी स्थाई नौकरी नहीं मिली है. वे जैसे-तैसे फ्रीलांस काम के जरिए अपना गुजारा कर रहे हैं. इसके अलावा ज़्यादातर ऐसे लोग हैं, जिन्होंने किसी और संस्थान में कम वेतन पर काम तो शुरू कर दिया है, लेकिन दिल्ली पुलिस का खौफ उन्हें आज भी है.

ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला उन्हें थोड़ा सुकून ज़रूर दे सकता है, लेकिन उनकी चली गई नौकरी नहीं लौटा सकता.

न्यूज़क्लिक के लिए साल 2018 में जूनियर लेवल पर कुछ महीनों के लिए काम करने वालीं स्वाति* बताती हैं कि उन्होंने महज़ ढाई-तीन महीने संस्थान में काम किया था और अब वह मीडिया से पूरी तरह दूरी बना चुकी हैं, और फिलहाल अपने घर से कुछ किताबों के अनुवाद का काम देखती हैं.

उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस उनके यहां भी छापे के लिए पहुंची थी, और उनका लैपटॉप और फोन ले गई. लैपटॉप में उनका अनुवाद से जुड़ा जरूरी काम था, जिसकी बदौलत उन्हें पैसे मिलने थे. लेकिन छापे के बाद सब मुश्किल हो गया. उन्हें कई महीनों तक पूछताछ को लेकर मानसिक पीड़ा रही और आज भी करीब दो साल का समय बीते जाने के बाद उन्हें उनका लैपटॉप और फोन नहीं लौटाया गया है.

गौरतलब है कि अक्टूबर 2023 की छापेमारी के दौरान पुलिस ऐसे कई पत्रकारों के घर भी पहुंची थी, जो बरसों या महीनों पहले न्यूज़क्लिक छोकर किसी अन्य संस्थान में काम करने लगे थे.

ऐसे कुछ कर्मचारियों ने बताया कि दिल्ली पुलिस की छापेमारी के बाद उनके तत्कालीन संस्थानों ने उन्हें काम से निकाल दिया और वे अचानक बेरोज़गार हो गए. फिर शुरू हुई दूसरी नौकरी की तलाश, इसमें भी कुछ ही लोग सफल हुए और कुछ आज भी बेरोज़गारी की ज़िंदगी गुजारने को मजबूर हैं.

मानसिक पीड़ा

पत्रकारों और कर्मचारियों के घरों पर हुई दिल्ली पुलिस की इस अचानक छापेमारी के दौरान नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के ख़िलाफ़ प्रदर्शन, किसान आंदोलन और दिल्ली दंगों में रिपोर्टिंग से जुड़े सवाल पूछे गए थे. लोगों के निजी बैंक खातों की जानकारी और कई लोगों से उनके परिवार की निजी जानकारियां भी मांगी गई थीं.

कई जगह तो कुछ लोगों को पुलिस नौकरी छोड़ने की सलाह दे गई, तो कुछ के घर से किताबें और ज़रूरी सामान, जिसमें परिवार के लोगों का भी फोन और लैपटॉप शामिल था, अपने साथ ले गई थी.

ज़्यादातर लोगों को 3 अक्टूबर को लोधी रोड स्थित दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के दफ़्तर ले जाया गया था और घंटों तक ऐसे सवालों से परेशान किया गया. इसके बाद कई लोगों को इसी जगह कई बार पूछताछ के लिए बुलाया गया, जो उनके लिए अब तक मानसिक आघात का कारण बना हुआ है.

‘प्रक्रिया ही सज़ा बन गई’

दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया फैसले को लेकर इसके प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ द वायर से कहते हैं कि ‘देर आए पर दुरुस्त आए.’

वे कहते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया ही सज़ा के समान है. इस दौरान जिन लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ी, उन्होंने सिर्फ़ अपनी आजीविका नहीं खोई, बल्कि फोन और लैपटॉप जब्त होने से आजीविका का साधन भी खो दिया. उनके नुकसान की कभी भरपाई नहीं की जा सकती. इसमें कई ऐसे नौजवान भी थे, जो अपनी नौकरी के शुरुआती दौर में थे, उन्हें पैसों सहित तमाम अन्य दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा.

प्रबीर आगे बताते हैं कि न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मौजूदा समय में यूएपीए के अलावा आयकर और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के मामले अदालत में चल रहे हैं. वे कहते हैं तमाम टैक्स और कानूनी बाधाओं को लेकर संस्थान संघर्ष कर रहा है. हाईकोर्ट के फैसले ने एक रोशनी का काम किया है, लेकिन अभी लंबी लड़ाई है. और ये सब पत्रकारिता की चुनौतियों में शामिल हैं.

(नोट*: यहां पहचान सुरक्षित रखने के लिए कई पत्रकारों और कर्मचारियों के नाम बदल दिए गए हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यूएपीए मामले में पुलिस उन्हें कभी भी निशाना बना सकती हैं. न्यूज़क्लिक ने अपने सभी प्रेस बयानों में तमाम एजेंसियों द्वारा लगाए सभी आरोपों से इनकार किया है, और इस कार्रवाई को स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला बताया है.)