बंगनामा: इतिहास के पन्ने पर बसा शहर तामलुक

मिदनापुर ज़िले का तामलुक पहली नज़र में बंगाल के किसी भी अन्य आम शहर जैसा लगता है, मगर इतिहास बताता है कि लगभग 2500 वर्ष पूर्व तामलुक की जगह पर बंगाल की खाड़ी पर स्थित था ताम्रलिप्त नामक पोत-नगर, जिसने उस युग में उत्तर तथा पूर्वी भारत के वाणिज्यिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बंगनामा की अड़तालीसवीं क़िस्त.

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तामलुक राजबाड़ी. (फोटो साभार: विकीपीडिया कॉमंस/Amitabha Gupta)

रूपनारायण नदी के किनारे बसा तामलुक शहर देखने में मुझे मिदनापुर ज़िले के ग्रामीण रूप का एक और पहलू लगा. अगस्त 1995 में बांंकुड़ा ज़िले से मेरा वहां तबादला हो गया था. आप अगर आज भी तामलुक शहर जाएं तो शायद पाएंगे एक और संकुलित मुहल्लों, संकरी सड़कों, और बिखरे बाज़ार वाला शहर जहां गर्मी और सर्दी में धूल छाई रहती है और वर्षा ऋतु में रास्तों पर पतलून मोड़ कर चप्पल या जूते हाथ में लेकर निकलना पड़ता है.

देखकर नहीं लगेगा कि यह बंगाल के एक और सामान्य शहर के अलावा कुछ है या यहां देखने-जानने की भी कुछ विशेष या रोचक चीजें हैं. इस शहर में अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट व ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी के पद पर कुछ महीने बिताने के बाद मैं जान पाया कि तामलुक का इतिहास अति प्राचीन है.

इतिहास का महत्वपूर्ण पन्ना

लगभग 2500 वर्ष पूर्व इस जगह पर बंगाल की खाड़ी पर स्थित था ताम्रलिप्त नामक पोत जिसने उस युग में उत्तर तथा पूर्वी भारत के वाणिज्यिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. प्राचीन काल से इस पोत-शहर ताम्रलिप्त का उल्लेख भारतीय परंपराओं, श्रीलंका के इतिहास के ग्रंथों, चीनी यात्रियों- ह्वेन सैंग तथा फा हियेन के संस्मरणों, तथा यूनानी भूगोलविदों के वृतांतों में भी मिलता है.

यूनान के प्रसिद्ध भूगोलविद टॉलेमी ने इसे ‘टामालाइटिस’ नाम से वर्णित किया था. सन 1940 से यहां पर कई बार पुरातात्त्विक उत्खनन भी किए गए जिनसे ज्ञात हुआ कि ताम्रलिप्त में कम-से-कम तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से निरंतर मानव वास रहा है. यहां से मिट्टी के बर्तन, सिक्के, टेराकोटा मूर्तियां, मनके, रिंग-वेल तथा अन्य अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो एक समृद्ध नगरीय जीवन का प्रमाण देते हैं.

इन सब सूत्रों में पाए ब्योरों से ताम्रलिप्त का एक चहल-पहल भरा चित्र उभरता है. यह पोत-नगर पूर्वी भारत को श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन से जोड़ता था तथा यहां से रेशम, नील, तांबा तथा अन्य वस्तुओं का निर्यात किया जाता था. ताम्रलिप्त देश के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण द्वार बन गया था. साथ ही यह नगर सम्राट अशोक के जीवन काल में ही एशिया महाद्वीप में बौद्ध धर्म के प्रसार का केंद्र बन चुका था और भिक्षुओं, तीर्थयात्रियों और विद्वानों के लिए भारत तथा अन्य बौद्ध देशों के बीच आवागमन का प्रमुख पोत था.

ज़ाहिर है कि जिस जगह भिन्न देशों के लोगों का आना-जाना होगा वहां संस्कृतियों का मिलन भी होगा. इसलिए ताम्रलिप्त में भारतीय, श्रीलंकाई, दक्षिण-पूर्व एशियाई और चीनी प्रभावों का संगम हुआ एवं यहां से विचारों और वस्तुओं के संग तकनीकों तथा कला का भी आदान-प्रदान हुआ.

समय के साथ गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में गाद जमने और नदियों के मार्ग बदलने से समुद्र-तट पीछे हटता गया तथा बंदरगाह की समुद्र तक सीधी पहुंच समाप्त हो गई. फलस्वरूप समुद्री व्यापार तथा अन्य सभी प्रकार के लेन-देन अन्य पोतों की ओर स्थानांतरित हो गए तथा समय के थपेड़ों ने ताम्रलिप्त को भी तामलुक में बदल दिया.

संग्रहालय की नींव

मेरे तामलुक आने के कुछ दिनों बाद वहां के इतिहास के बारे में जानने के लिए मैं नगरपालिका भवन में स्थित तामलुक संग्रहालय को देखने गया. एक छोटा संग्रहालय जिसमें काल-अनुसार पश्चिम मेदिनीपुर इलाक़े से प्राप्त प्रागैतिहासिक पत्थर के औज़ार, शुंग, कुषाण, गुप्त और पाल काल की टेराकोटा प्रतिमाएं, प्राचीन सिक्के (कुछ पंच-चिह्नित भी), एक रोमन एम्फोरा (मिट्टी का पात्र), पटचित्र तथा तामलुक और आसपास के उत्खननों से प्राप्त मूर्तियां तथा अन्य पुरावशेष सजाए गए थे.

संग्रहालय मुझे बहुत रुचिकर लगा लेकिन मैं सबसे अधिक प्रभावित हुआ इसकी स्थापना की कहानी से. वास्तव में यह संग्रहालय तामलुक के कुछ जागृत नागरिकों द्वारा अपने क्षेत्र और नगर के इतिहास का शोध और धरोहर का संरक्षण कर इन्हें जीवित रखने का एक अनुसरणीय प्रयास तथा आने वाली पीढ़ियों को एक अमूल्य देन है.

संग्रहालय में मेरा परिचय डॉ. कमल कुंडू से हुआ. डॉ. कुंडू के नेतृत्व में स्थानीय इतिहास प्रेमियों, शौक़िया पुरातत्ववेत्ता और शोधकर्ताओं ने तामलुक संग्रहालय व शोध केंद्र के नाम से दिसंबर 1975 में इस संस्था का शुभारंभ किया. इन्होंने मिलकर पुरावस्तुओं का संग्रह और सर्वेक्षण किया और उनके अध्ययन और वर्गीकरण का भी कार्य किया. शुरुआत में प्रशांत कुमार मंडल ने ताम्रलिप्त संग्रहालय एवं अनुसंधान केंद्र के मानद क्यूरेटर का उत्तरदायित्व संभाला था. अंततः 2001 में इस संग्रहालय को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप दिया गया.

कमल कुंडु ने मुझे बताया कि ताम्रलिप्त के पुरातत्व एवं इतिहास में उनकी रुचि उनके शिक्षक डॉ. डीसी सरकार, जो कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास व संस्कृति के प्रसिद्ध प्रोफेसर थे, ने पनपाया था. 1972 में डॉ. कुंडु की नियुक्ति भारतीय स्टेट बैंक में हुई और तैनाती बैंक की तामलुक शाखा में हो गई. तब से ही अपने गुरु से प्रेरित हो कर वह स्थानीय इतिहास की गवेषणा में जुट गए. उनके साथ हो लिए बैंक में उनके सहकर्मी प्रशांत कुमार मंडल तथा और एक मित्र, आशुतोष मैती.

मिला लोगों का साथ

1970 के दशक के प्रथम भाग से इस उत्साही दल का मुख्य लक्ष्य रहा तामलुक के इतिहास के अवशेषों तथा पांडुलिपियों का संग्रह. कमल कुंडु याद करते थे कि उनका फ़ुरसत का वक्त ज्ञात पुरातात्विक स्थानों का चक्कर लगाते, पोखरों तथा अन्य जलाशयों के खनन के दौरान प्राप्त वस्तुओं का पीछा करते, एवं परिवारों के पास पड़े अभिलेखों तथा पांडुलिपियों की तलाश करते बीतता था.

खोज के बाद जो कुछ भी कमल कुंडु और साथी गवेषकों को मिलता वे उसे लखन प्रधान को सुपुर्द कर देते थे. इतिहास के प्रेमी लखन प्रधान एक पान की दुकान चलाते थे और उनकी दुकान ही ताम्रलिप्त के बहुमूल्य पुरावस्तुओं का पहला घर व गोदाम था.

रुचिकर होने के बावजूद इतिहास के टुकड़ों को बटोरने का यह काम इन शोधकर्ताओं के लिए समय और पैसे दोनों की दृष्टि से ही क्षतिकारक था, लेकिन रुचि और उमंग के समक्ष लाभ और नुक़सान का हिसाब कहां टिक सकता है.

हां, कमल कुंडु और उनके साथियों की योजना को कार्यान्वित करने के लिए तामलुक के निवासी भी सहायता का हाथ बढ़ाते गए- शहर और निकटवर्ती क्षेत्र के लोगों ने कभी वित्तीय मदद की तो कभी पुरावस्तु और पांडुलिपियां का दान किया. अक्सर इन सब के साथ कई व्यक्ति आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देते रहे, जैसा कि तोरुलता भट्टाचार्य ने किया.

तामलुक संग्रहालय में पांडुलिपियों का भी अच्छा संचयन है. इसका एक बड़ा भाग इस संस्था को तोरुलता भट्टाचार्य नामक एक अस्सी वर्षीय भद्र महिला ने दान में दिया था. उनके दान किए गए कई बांग्ला और ओडिया पोथियां 16वीं एवं 17वीं सदी की बताई जाती हैं जिनमें रामायण तथा महाभारत की दुर्लभ प्रतियां भी हैं.

कमल बाबू ने बताया कि तोरुलता भट्टाचार्य के पुत्र को अपनी मां द्वारा पांडुलिपियों का दान करना बिल्कुल गवारा न था. उनकी मां ने जब कहा कि ये अभिलेख बहुत पुराने हैं तो उसने अपनी मां को पलटकर कहा, ‘तूमियो तो पूरोनो होय गेचो. तोमकेओ की बाड़ी थेके बार कोरे देबो? (तुम भी तो पुरानी हो गई हो, क्या तुम्हें घर से बाहर निकाल दूं)?’

उसकी मां ने शांत भाव से अपने लड़के से कहा, ‘आमी बूड़ो होय गेचि किंतु तोमार बाड़ी ते शुरोखित आचि. किंतु ऐइ पूरोनो पुथी गुलो ओदेर संग्रह संस्था ते ई निरापद थाकबे (मैं बूढ़ी हो गई हूं पर तुम्हारे घर में सुरक्षित हूं, लेकिन ये प्राचीन पांडुलिपियां उनके संग्रहालय में ही सुरक्षित रहेंगी.’ फिर उनके बदज़बान पुत्र को उनकी बात माननी पड़ी. कमल कुंडू के लिए तोरुलता भट्टाचार्य के शब्द प्रेरणा का स्रोत बन गए.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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