नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों से पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के छोटे बेटे और समाजवादी पार्टी (सपा) की बागी मौजूदा विधायक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उत्तर प्रदेश संगठन में शामिल हो गए हैं.
सत्ताधारी पार्टी ने 25 जून को इस अहम राज्य के लिए अपनी नई संगठनात्मक टीम की घोषणा की, जिसमें 19 उपाध्यक्ष, आठ महासचिव और 19 सचिव शामिल हैं.
मालूम हो कि केंद्रीय मंत्री और कुर्मी समुदाय से आने वाले नेता पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के छह महीने बाद पार्टी ने अपने संगठन के ढांचे में बदलाव किया है.
राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह को 19 उपाध्यक्षों में से एक के तौर पर चुना गया. उन्होंने सीधे तौर पर अपने बड़े भाई और विधायक पंकज सिंह की जगह ली, जो पहले इसी पद पर थे.
हालांकि, उपाध्यक्षों की सूची में सबसे खास नाम पूजा पाल का है, जो वर्तमान में चायल विधानसभा सीट से सपा की विधायक हैं.
उल्लेखनीय है कि पूजा पाल 2024 के राज्यसभा चुनावों में भाजपा के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग करने के बाद से ही खुले तौर पर इस पार्टी का साथ दे रहीं थीं. हालांकि, वह अभी भी सपा की मौजूदा विधायक हैं, लेकिन अब उनकी राजनीतिक निष्ठा पूरी तरह से बदल चुकी है.
ज्ञात हो कि अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा ने पिछले साल अगस्त में पाल को पार्टी से निकाल दिया था. यह कार्रवाई तब की थी, जब उन्होंने राज्य विधानसभा में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तारीफ़ की थी.
उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री ने उनके पति राजू पाल की 2005 में इलाहाबाद में हुई हत्या के मामले में ‘इंसाफ़’ किया है. राजू पाल की हत्या के समय वे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के मौजूदा विधायक थे. इस हत्या की वजह से ही युवा पूजा पाल चुनावी राजनीति में आईं.
भाजपा की यूपी इकाई का उपाध्यक्ष चुने जाने के बाद पाल ने कहा, ‘मैं पार्टी की विचारधारा, सिद्धांतों और संगठनात्मक ढांचे के प्रति पूरी निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी के साथ काम करते हुए संगठन को और मजबूत बनाने की लगातार कोशिश करूंगी.’
वहीं, भाजपा संगठन में पूजा पाल के शामिल होने से जानकार हैरान हैं, क्योंकि वह कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती नहीं हैं और भाजपा से उनका पहले कोई खास जुड़ाव नहीं रहा है. हालांकि, उन्हें शामिल करके भाजपा गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने की उम्मीद कर रही है, खासकर ऐसे समय में जब मुख्य विपक्षी पार्टी, समाजवादी पार्टी, पीडीए नैरेटिव (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पर दांव लगा रही है.
उनकी पदोन्नति का एक और रणनीतिक मकसद जो सामने नज़र आता है, वह यह है कि इससे दिवंगत नेता अतीक अहमद और उनके पति राजू पाल की 2005 में हुई हत्या से जुड़ी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाली बात लोगों के ज़हन में लगातार बनी रहती है.
मालूम हो कि पाल-गडेरिया समुदाय पारंपरिक रूप से भेड़ चराने का काम करता रहा है और राज्य में गैर-यादव पिछड़ी जातियों के वोट बैंक का एक अहम हिस्सा है. भाजपा के लिए मारे गए अतीक अहमद, जो पूर्व सांसद और पांच बार विधायक रहे थे, एक ऐसे मुस्लिम ‘माफिया’ का चेहरा थे, जिनके खिलाफ आदित्यनाथ की सरकार ने सत्ता में आने (2017) के बाद से ही एक बड़ा अभियान चलाया था.
इस दौरान सरकार ने उनकी करोड़ों रुपये की संपत्ति ढहा दी और उनसे जुड़े कई लोगों को या तो गोली मारकर हत्या कर दी गई थी या उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था.
ज्ञात हो कि 2023 में लाइव टीवी पर अतीक और उनके भाई अशरफ अहमद की सरेआम हत्या ने उन्हें प्रयागराज की गलियों से बाहर भी लोगों के ज़हन में मजबूती से स्थापित कर दिया था.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अप्रैल में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें प्रदेश में हिंदी फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ पर रोक लगाने की मांग की गई थी. इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस फिल्म में अतीक की हत्या को भारतीय खुफिया एजेंसियों द्वारा रची गई एक सरकारी कार्रवाई के तौर पर गैर-कानूनी तरीके से दिखाया गया है.
पूजा पाल की राजनीति देखें, तो उन्होंने अबतक तीन चुनाव जीते हैं. वह पहली बार 2007 में बसपा की उम्मीदवार के तौर पर विधायक चुनी गई थीं. उन्होंने 2012 में इलाहाबाद पश्चिम सीट बरकरार रखी थी, लेकिन 2017 में वह तीसरे स्थान पर रहीं. इसके कुछ समय बाद उन्हें बसपा से निकाल दिया गया और वह सपा में शामिल हो गईं. सपा के टिकट पर उन्होंने पड़ोसी ज़िले कौशांबी की चायल सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.
हालांकि, सपा के साथ उनका रिश्ता ज़्यादा समय तक नहीं चला. 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने सपा के कई अन्य विधायकों के साथ राज्यसभा चुनाव में भाजपा का समर्थन किया. अपने इस बागी कदम को सही ठहराते हुए पाल ने कहा कि उनका वोट एक ‘बहन’ की ओर से अपने ‘भाई’ आदित्यनाथ के प्रति आभार का प्रतीक था, क्योंकि उन्होंने उनकी और उनके समुदाय की ‘सालों पुरानी पीड़ा’ को दूर किया था.
अपने इस कदम से पाल ने अप्रैल 2023 में प्रयागराज में लाइव टीवी पर अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ़ की चकित करने वाली दोहरी हत्या का श्रेय आदित्यनाथ को दिया. इस अपराध के लिए तीन शूटरों को गिरफ़्तार किया गया था और फ़िलहाल उन पर मुक़दमा चल रहा है.
हालांकि, पाल के विद्रोह का स्थानीय स्तर पर बहुत कम असर हुआ, क्योंकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 2024 में कौशांबी लोकसभा सीट जीती और चायल समेत सभी पांच विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की.
खुलेआम बगावत करने और लगातार भाजपा की तरफ झुकाव होने के बावजूद सपा ने उनके खिलाफ़ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की. मामला तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा जब अगस्त 2025 में राज्य विधानसभा में भाषण के दौरान पाल ने अपराध और माफिया के खिलाफ़ आदित्यनाथ की ‘ज़ीरो-टॉलरेंस नीति’ की खुलकर तारीफ़ की.
उन्होंने अतीक अहमद जैसे अपराधियों को ‘मिट्टी में मिलाने’ के लिए आदित्यनाथ का व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद किया. पाल ने कहा, ‘मुख्यमंत्री ने सचमुच न्याय सुनिश्चित किया और न्याय दिलाया.’
इसके बाद सपा ने पार्टी-विरोधी गतिविधियों और अनुशासन तोड़ने के आरोप में उन्हें तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया. हालांकि, यूपी विधानसभा के अनुसार वह अभी भी सपा की विधायक बनी हुई हैं.
उल्लेखनीय है कि अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ पर राजू पाल की हत्या की साज़िश रचने और 2023 में राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल की हत्या की योजना बनाने का आरोप था. उमेश पाल हत्याकांड में अतीक का बेटा असद खान मुख्य आरोपी था, क्योंकि सीसीटीवी फुटेज में उसे पाल पर अंधाधुंध गोली चलाते हुए देखा गया था.
इसके बाद झांसी में एक कथित एनकाउंटर में यूपी एसटीएफ ने असद और एक अन्य व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी. बेटे की हत्या के दो दिन बाद, अतीक और उसके भाई अशरफ को तीन अज्ञात हमलावरों ने लाइव टीवी पर गोली मार दी, जिससे उनकी मौत हो गई.
यह घटना तब हुई जब अतिक और अशरफ को उमेश पाल हत्याकांड में कथित भूमिका की जांच के लिए प्रयागराज लाए जाने के बाद मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा था, और उस समय पुलिस और मीडियाकर्मी भी वहां मौजूद थे.
बाद में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक न्यायिक आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि यह दोहरी हत्या पुलिस अधिकारियों और यूपी सरकार के अधिकारियों द्वारा रची गई ‘पहले से तय साजिश’ नहीं थी.
आयोग ने यह भी कहा कि उसे ऐसा कोई ‘संबंध’, ‘सुराग’, ‘सबूत’ या ‘परिस्थिति’ नहीं मिली जिससे यह पता चले कि पुलिस व्यवस्था या सरकार हमलावरों के साथ मिली हुई थी या उनकी मिलीभगत थी.
असद खान और तीन अन्य लोगों की हत्या की जांच करने वाले दो सदस्यों के एक अलग न्यायिक आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला कि वे असल ‘एनकाउंटर’ में हुई गोलीबारी की घटनाएं थीं. इसके अलावा झांसी में असद को गोली मारकर ढेर करने वाली यूपी एसटीएफ टीम को बहादुरी के लिए पुलिस मेडल से सम्मानित किया गया.
(उमर राशिद स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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