अलोकतांत्रिक वृत्तियां: हम एक अभद्र और विषाक्त लोकतंत्र बनाए जा रहे हैं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर आप संविधान सभा की याद करें, तो स्पष्ट है कि उसमें सबसे अधिक सदस्य हिंदू थे. हिंदू समाज ने ही मुख्यतः लोकतंत्र को स्वीकार और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक-भाषायी बहुलता का एहतराम किया था. क्या अब उसका हिंदुत्व से प्रेरित-प्रभावित बड़ा हिस्सा लोकतंत्र को तजकर भारतीय राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाह रहा है?

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"झूठों के घटाटोप में सच अल्पसंख्यक हो गया है. भ्रष्टाचार राम मंदिर से लेकर मुख्यमंत्रियों तक फैल गया है. संवैधानिक संस्थाओं जैसे चुनाव आयोग, न्यायालय, आदि का अनैतिक सत्ता-भक्त आचरण सामान्य बात हो गई है." (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

1975 में लगे आपातकाल की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर ‘अलोकतांत्रिक वृत्तियां’ पर आयोजित परिसंवाद में कुछ कहने का सुयोग जुटा. लोकतंत्र मूलतः एक सपना होता है जो पूरी तरह से कभी सचाई में न बदल पाने को अभिशप्त है. मनुष्य की प्रकृति में लोकतांत्रिक और एकाधिकार की वृत्तियां समांतर चलती रहती है और वह अपने इतिहास के आरंभ से अब तक इन दोनों वृत्तियों को लगभग समान रूप से विस्तृत और विकसित करता आया है.

अक्सर हम निजी और सामाजिक जीवन में दूसरों से लोकतांत्रिक व्यवहार की अपेक्षा करते हैं जबकि खुद एकाधिकारमूलक व्‍यवहार करते हैं. संख्‍या मात्र से हम संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन हम पर एक और बहुत शक्तिशाली लोकतंत्र इस क़दर हावी है कि उसके द्वारा हमारा गाहे-बगाहे अपमान पर हम चुप रहते हैं मानों कि हम कायर और चापलूसी आज्ञाकारी लोकतंत्र हैं. अपने सबसे लोकतंत्र होने का दावा अब हम कुछ संकोच और थोड़ी शर्म से ही कर पाते हैं.

इस समय हमारा लोकतंत्र पंचविकारों से ग्रस्त है. वह विकृत है क्योंकि उसमें अब लोक पर तंत्र का वर्चस्व है और लोक को लगातार अवमूल्यित किया जा रहा है. वह विच्छिन्न है क्योंकि उस का अपनी ही परंपरा से, लोकतांत्रिक प्रथाओं और मूल्यों से सारा संबंध टूट चुका है. वह विकलांग है क्योंकि उसकी सभी संवैधानिक इकाइयां बुरी तरह से कमज़ोर और निश्शक्त हो चुकी हैं.

वह विषाक्त है जिसमें बैर, प्रतिशोध, झूठ, घृणा, हिंसा-हत्या, बुलडोजिंग, लिंचिंग, जघन्य अपराधों में इज़ाफ़ा, जनप्रतिनिधियों की ख़रीद-फ़रोख़्त आदि दैनिक घटनाएं हैं. वह विरूप है जिसमें संवाद-विवाद में गाली-गलौज़, झगड़ा-झांसा, अभद्र भाषा, बढ़ती अभद्रता का बोलबाला है. हम एक अभद्र और विषाक्त लोकतंत्र बनाए जा रहे हैं.

लोकतंत्र में नागरिकता और मताधिकार दोनों ही बाधित किए जा रहे हैं: करोड़ों लोग वोट देने से वंचित किए गए हैं. विपक्ष को सत्ता लगातार देशद्रोही क़रार देकर, उसके चुने विधायकों-सांसदों की खुलेआम ख़रीद-फरोख़्त कर रही है. लोकतांत्रिक सहकार के वजाय धिक्कार-अहंकार का ज़ोर है. सर्वोच्च स्तर पर न्यायालय सत्ता की ओर अधिक, संविधान की ओर कम झुक रहे हैं. सचाई को इस क़दर छेंका जा रहा है कि उसकी जगह झांसों ने ले ली है.

झूठों के घटाटोप में सच अल्पसंख्यक हो गया है. भ्रष्टाचार राम मंदिर से लेकर मुख्यमंत्रियों तक फैल गया है. संवैधानिक संस्थाओं जैसे चुनाव आयोग, न्यायालय, विभिन्न आयोगों, सीबीआई, ईडी आदि का अनैतिक सत्ता-भक्त आचरण सामान्य बात हो गई है. अल्पसंख्यकों को दोयम दर्ज़े की नागरिकता पर क़ानूनन नहीं, सामाजिक स्तर पर ढकेला जा रहा है. असहमति लगभग अपराध मान ली गई है. टुच्चई, दबंगई, गुंडई की भयानक बढ़त हो रही है.

अगर आप संविधान सभा की याद करें, तो स्पष्ट है कि उसमें सबसे अधिक सदस्य हिंदू थे. हिंदू समाज ने ही मुख्यतः लोकतंत्र को स्वीकार और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक-भाषायी बहुलता का एहतराम किया था. क्या अब उसका हिंदुत्व से प्रेरित-प्रभावित बड़ा हिस्सा लोकतंत्र को तजकर भारतीय राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाह रहा है और क्या हिंदू चित्त, उसका सवर्ण हिस्सा, समता के बढ़ते दबाव से विचलित हो रहा है?

क्या दलित वर्ग हिंदू चित्त के इस नए झुकाव से बेख़बर है या अपने समता के संघर्ष से विश्वासघात करने जा रहा है, हिंदू राष्ट्र में शामिल होकर, फिर अपने निचले दर्ज़े को स्वीकार करते हुए?

हमारे लिए कला

इस बहस को चलते, तेज़ होते, मंद पड़ते हमारे यहां कम से कम साठ साल यानी छह दशक हो गए कि कला कला के लिए होती है या जीवन के लिए. यह भी अलग मान लिया गया है कि तथाकथित कलावादी यह लड़ाई निर्णायक रूप से जीवनवादियों से हार चुके हैं और उन्हें साहित्य की मुख्यधारा के हाशिये पर, शायद हमेशा के लिए, ढकेल दिया गया है.

मुख्यधारा में जीवन-समाज-जन, सभी का कला पर वर्चस्व स्थापित हो गया है: कला इन्हीं के लिए होती है; कला का अपनी इयत्ता या सत्व पर इसरार करना एक पश्चगामी प्रतिक्रियावादी हरकत है.

इस बात को हिसाब में नहीं लाया गया या जाता कि सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, जनतंत्र के संकटग्रस्त होते समाज में सांप्रदायिक और धर्मांध, घृणा और झूठ, हिंसा और नागरिक भेदभाव फैलाने वाली प्रवृत्तियों और शक्तियों के विरुद्ध आज बहुनिंदित कलावादी आगे की पंक्ति में निडर खड़े हैं. जीवन आज कला को नहीं बचा रहा बल्कि कला ही जीवन के सत्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है.

यह मुद्दा इस मुकाम पर उठाने का कारण अमेरिकी साहित्यकार जै़डी स्मिथ का एक भाषण है, जो उन्होंने पिछले महीने अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड लैटर्स में दिया और हाल ही में न्यूयार्क रिव्यू ऑफ बुक्स में प्रकाशित हुआ है.

जै़डी स्मिथ बताती हैं कि 1949 में इसी मंच से बोलते हुए उपन्यासकार ईएम फॉर्स्‍टर ने ‘कला के लिए कला’ सिद्धांत का मसला उठाते हुए कहा था कि इस सिद्धांत की बहुत दुर्व्‍याख्या और दुरुपयोग हुए हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि ज़्यादा ख़तरनाक अवधारणा यह है कि कला ही मैटर करती है जबकि सचाई यह है कि कला के अलावा और बहुत सारी चीज़ें हैं जो मैटर करती हैं. विज्ञान की भूमिका की आलोचना करते हुए फॉर्स्‍टर ने कहा कि ‘अगर लोगों की रुचि ज्ञान में अधिक और सत्ता में कम होती तो मनुष्य कहीं अधिक सुरक्षित स्थिति में होता.’

हिरोशिमा पर अणु बम गिराने की अमेरिकी कार्रवाई के सिलसिले में फॉर्स्‍टर ने कहा था कि मनुष्य जाति जीवित रह सकती है अगर वह एक तरह का निष्क्रियता, सार्वभौमिक आलस्य बरते. जै़डी टिप्पणी करती हैं कि अनंत प्रगति या विकास की फैंटेसी में फंसी दुनिया को, पृथ्वी को नष्ट करने पर उतारू विकास के बजाय, सचमुच निष्क्रियता की आज दरकार है.

जै़डी स्मिथ को साहित्य और कलाओं के सीमित प्रभाव का गहरा अहसास है. पर वे इसरार करती हैं कि भले कला हमारी संवेदना और सहानुभूति को प्रेरित करनेवाली एकमात्र विधा न हो, वह एक विधा तो है. अगर उपन्यास में किसी विपदा में पड़े-फंसे चरित्रों के प्रति हम संवेदनशील होते हैं तो क्या ऐसी ही संवेदनशीलता उन लोगों के लिए अनुभव करते हैं जो फ़िलिस्तीन, सूडान, यूक्रेन, ईरान आदि में मारे जा रहे हैं?

इसकी कोई गारंटी नहीं है कि जैसी सहानुभूति हम कला में अनुभव करते हैं वैसी हम अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में दिखा-बरत पाएंगे. सहानुभूति या समानुभूति एक बदलने वाला, वैध्य गुण है पर यह भी सही है कि ‘सहानुभूति के पूरी तरह से अनुपस्थित होने से नए नरक पैदा होते हैं’. लेकिन निरी सहानुभूति काफ़ी नहीं है, यह भी जै़डी बखूबी जानती हैं.

उनकी असली दिलचस्पी और केंद्रीय तर्क है स्वायत्तता. वे इसका एहतराम करती हैं कि हर युग को नियमित करते आए हैं दो विचार: शक्ति और प्रगति. उनका इसरार है कि कला शक्तिशाली नहीं होती और न ही उसमें प्रगति होती है. वह नख-दंतहीन होती है. कलाकार के पास कोई हथियार नहीं होते, वह कोई क़ानून नहीं बनाता, वह किसी को क़ैद में नहीं रखता, न ही कहीं युद्ध करता है. इस संदर्भ में कला शक्तिहीन होती है. वैसे ही कला में कोई प्रगति नहीं होती. अच्छी कला, किसी भी समय में की गई हो, हमेशा जीवित रहती है. उसमें ऐसा बहुत सारा है जो नई टेक्नोलॉजी कर सकती है. पर यह सारी यांत्रिकता मानवीय गरमाहट और संस्पर्श नहीं पैदा कर सकती, न ही उसकी ज़रूरत को ख़त्म कर सकती है. जब हम पढ़ते हैं तो हम किसी दूसरे मनुष्य से संबंध बनाते हैं. शायद कोई मशीन ऐसी हो जो बेहतर यौनाचार कर सकती हो, पर हम चाहते हैं कि हमसे कोई दूसरा मानव-व्यक्ति केलि करे. हम ऐसे ही अनुभवों के लिए इस पृथ्वी पर आए हैं.

पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पोषित बेहतर सुविधा की धारणा को लेकर ज़ैडी स्पष्ट हैं: अगर कला भी बेहतर सुविधा से की जाने लगेगी तो वह इस व्यवस्था की गुलाम हो जाएगी. कला को सुविधापूर्ण नहीं, असुविधाजनक होना चाहिए. कला सुशोभन हो सकती है, अलंकरण भी, पर वह सुविधाजनक, कट्टर, उपकृत नहीं. सशक्त होने के विशेषाधिकार से दूरी रखकर ही कला के प्रतिरोध की शक्ति आकार लेती है.

वे स्वीकार करती हैं कि जब अमेरिकी सड़कों पर मारे जा रहे थे तो वे अपना उपन्यास लिख रही थीं. उपन्यास का उस नारकीय परिदृश्य से कुछ लेना-देना नहीं है जिसमें अमेरिकी आज रह रहे हैं. वे इतिहास की ग़लत तरफ़ हैं और हमेशा रहेंगी उस कलाकार के साथ जो यह अधिकार रखती है कि वह सिर्फ़ अपने लिए कला रचे, कला मात्र के लिए और अपने मानवीय बंधुओं के लिए. पढ़ना हमें सिखाता है कि मनुष्य कैसे हैं, वे क्या कर सकने के योग्य हैं, वे क्यों वह सब करते हैं जो वे करते हैं, और वे क्यों बहुत सारी चीज़े अनकियी छोड़ देते हैं. ऐसी कला हम बनाते हैं, वह हमारे लिए है. उसकी शक्ति ऐसी नहीं है जिसे राष्ट्रपति मान्यता दें पर उसी अपनी ऊर्जा है. वह राष्ट्रपति के बाद भी जीवित रहेगी और हमारे बाद भी.

जै़डी स्मिथ ने स्वायत्त कला को हमारे स्थायी संकट से जोड़कर उसकी मानवीयता, उसमें अंतर्निहित मानवीय संभावना और प्रासंगिकता पर पुनर्विचार करने का न्योता दिया है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)