‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ आज की राजनीति को इतिहास के ज़रिये समझने का प्रयास है

पुस्तक समीक्षा: पुरुषोत्तम अग्रवाल की 'मजबूती का नाम महात्मा गांधी' गांधी को देवता नहीं बनाती, न ही उन्हें गिराकर खड़ा होना चाहती है. वह पाठक को एक मुश्किल जगह पर छोड़ देती है, जहां गांधी पूरी तरह सही भी नहीं हैं, पूरी तरह ग़लत भी नहीं.

'कई जगह ऐसा लगा जैसे लेखक गांधी पर फैसला सुनाने नहीं बैठे हैं. वे उनसे सवाल करते हैं, उनसे असहमत भी होते हैं और फिर दोबारा उनकी तरफ लौटते हैं.' (फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

महात्मा गांधी पर शायद ही कोई ऐसा बड़ा लेखक, इतिहासकार, राजनीतिक विचारक या पत्रकार हो जिसने कुछ न लिखा हो. उनके जीवन पर किताबों की पूरी एक लाइब्रेरी खड़ी की जा सकती है. किसी ने उन्हें संत बताया, किसी ने कुशल राजनीतिज्ञ. किसी ने आधुनिक भारत का निर्माता कहा. इतने सबके बाद भी उनके बारे में कहने, बताने और सुनने को कुछ-न-कुछ रह ही जाता है.

पुरुषोत्तम अग्रवाल की ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी‘ पढ़ते हुए बार-बार यही बात ध्यान में आती है. यह किताब गांधी को किसी तैयार खांचे में फिट करने की कोशिश नहीं करती. न वह गांधी का बचाव पक्ष बनती है. लेखक जैसे गांधी के आसपास बैठकर उन्हें देखने की कोशिश करते हैं उनकी सफलताओं को, उनकी भूलों को, उनके विरोधियों को, उनके समय को और उन सवालों को, जिनसे वे जूझ रहे थे.

किताब ख़त्म करने के बाद एक सवाल बचा रहा, आखिर ऐसा क्या था कि गांधी और सावरकर, दोनों एक ही देश, एक ही दौर और लगभग एक ही राजनीतिक संकट को देख रहे थे, लेकिन भारत की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें उनके सामने थीं?

लेखक गांधी को समझाने के लिए सावरकर को सामने रखते हैं. कई बार तो ऐसा लगता है कि गांधी को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका उनके विरोधियों को पढ़ना है. ख़ासकर तब, जब वह विरोध सिर्फ राजनीतिक न होकर राष्ट्र की अवधारणा से जुड़ा हो. सावरकर के बारे में लिखे गए हिस्सों में लेखक काफी विस्तार से रुकते हैं. आज के राजनीतिक माहौल में यह आसान रास्ता था कि सावरकर को कुछ उद्धरणों के सहारे खलनायक बना दिया जाए. यहां लेखक ऐसा नहीं करते. वे पहले सावरकर की पूरी दलील को सामने रखते हैं.

सावरकर लिखते हैं, ‘हिंदुत्व कोरा शब्द नहीं, पूरा इतिहास है.’

पहली नज़र में यह वाक्य सिर्फ एक वैचारिक घोषणा लगता है. लेकिन किताब दिखाती है कि इस वाक्य के भीतर पूरा राजनीतिक दर्शन छिपा हुआ है. सावरकर के लिए हिंदुत्व केवल धार्मिक पहचान नहीं था. वह इतिहास था, संस्कृति थी, भूगोल था और सबसे बढ़कर नस्ल थी. पर राष्ट्र क्या है? यह सवाल सुनने में जितना सीधा लगता है, उतना है नहीं. सावरकर का उत्तर था कि राष्ट्र साझा रक्त, साझा सांस्कृतिक स्मृति और साझा विरासत से बनता है.

राष्ट्र के इस विमर्श की दूसरी तरफ़ गांधी थे, जो राष्ट्र को एक नैतिक और राजनीतिक समुदाय की तरह देखते थे. किताब के कुछ सबसे मजबूत पन्ने वहीं हैं, जहां अग्रवाल, सावरकर की नस्ल-आधारित राष्ट्र की अवधारणा की परतें खोलते हैं. पढ़ते हुए कई बार लगता है कि लेखक सिर्फ इतिहास नहीं लिख रहे, बल्कि आज की राजनीति के स्रोत तलाश रहे हैं.

सिस्टर निवेदिता का उदाहरण इसी से जुड़ा है. सावरकर उन्हें हिंदू परंपरा के प्रति गहरे समर्पण के बावजूद एक अपवाद की तरह देखते हैं, क्योंकि उनकी नस्ल हिंदू नहीं थी. यह प्रसंग छोटा है, लेकिन उससे पूरी बहस का स्वरूप साफ होने लगता है. आखिर किसी राष्ट्र में सदस्यता का आधार क्या होगा रक्त, धर्म, संस्कृति या नागरिकता?

1857 के विद्रोह की चर्चा भी इसी संदर्भ में होती है. लेखक बताते हैं कि उस दौर में ‘हिंदुस्तान के हिंदू और मुसलमान’ जैसी भाषा केवल नारा नहीं थी. उसमें एक राजनीतिक संभावना छिपी हुई थी. लेकिन वही संभावना बाद के दशकों में लगातार कमज़ोर होती गई. यहां लेखक ब्रिटिश नीति, सर सैयद अहमद खान, पृथक निर्वाचन और सांप्रदायिक राजनीति की चर्चा करते हैं. अच्छी बात यह है कि वे इतिहास को नैतिक नाटक में नहीं बदलते.

इस हिस्से को पढ़ते हुए बार-बार लगा कि इतिहास शायद इतना सीधा नहीं होता कि सारी ज़िम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या एक फैसले पर डाल दी जाए. लेखक भी ऐसा नहीं करते. अलग-अलग राजनीतिक फैसले हैं, अलग-अलग आशंकाएं हैं, अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं हैं, और धीरे-धीरे एक ऐसी स्थिति बनती है जिसमें साझी राष्ट्रीयता की कल्पना कमजोर पड़ने लगती है.

यहां लेखक गांधी से सबसे कठिन सवाल पूछ रहे हैं. गांधी के बारे में लिखी गई बहुत-सी किताबों में खिलाफ़त आंदोलन को या तो रणनीतिक प्रतिभा की तरह प्रस्तुत किया जाता है या पूरी तरह नजरअंदाज़ कर दिया जाता है. लेखक दोनों रास्तों से बचते हैं. वे मानते हैं कि खिलाफ़त को असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ना गांधी की गंभीर राजनीतिक भूल थी.

यह टिप्पणी किताब में अचानक नहीं आती. वे विस्तार से बताते हैं कि तुर्की के भीतर क्या चल रहा था, खिलाफ़त की वास्तविक स्थिति क्या थी और भारतीय मुसलमानों के भीतर इस प्रश्न को लेकर कितनी विविध राय मौजूद थीं. स्वामी सहजानंद सरस्वती का एक संस्मरण किताब में आता है. वे मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना आज़ाद दोनों को सुनते हैं. मोहम्मद अली बार-बार इस्लाम का उल्लेख करते हैं. आज़ाद पूरे भाषण में देश और राष्ट्रीय प्रश्नों की बात करते हैं.

यह छोटा-सा प्रसंग पढ़ते हुए समझ में आता है कि उस समय मुसलमान राजनीति के भीतर भी कितने अलग रास्ते मौजूद थे. आज़ाद को अक्सर कांग्रेस के एक बड़े नेता के रूप में याद किया जाता है, लेकिन यहां उनकी भूमिका उससे कहीं बड़ी दिखाई देती है. वे केवल एक राजनेता नहीं थे. वे उस संभावना का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमें भारतीय राष्ट्रवाद और इस्लामी बौद्धिक परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हो सकते थे.

रामगढ़ कांग्रेस में उनका वक्तव्य ग्यारह सौ बरसों के साझा इतिहास ने भारत को हमारी साझा उपलब्धि से गौरवान्वित किया है आज भी पढ़ने पर ताजा लगता है. इस हिस्से में लेखक की सहानुभूति साफ दिखाई देती है. लेकिन यह सहानुभूति तर्क के रास्ते से आती है, भावुकता के रास्ते से नहीं.

किताब को पढ़ते हुए कुछ सवाल भी मन में आते हैं. गांधी और सावरकर पर इतनी विस्तृत चर्चा के बीच आंबेडकर अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं. यह अनुपस्थिति इसलिए महसूस होती है क्योंकि आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक संघर्षों में गांधी-आंबेडकर संवाद भी शामिल है. किताब का फोकस अलग है, इसलिए यह कोई बड़ी कमी नहीं बनती, लेकिन पाठक के मन में यह इच्छा जरूर छोड़ती है कि लेखक इस दिशा में भी थोड़ा और बढ़ जाते.

गांधी की धार्मिकता पर भी लेखक काफी उदार दिखाई देते हैं. कई जगह मैं यह जानना चाहता था कि क्या गांधी की आध्यात्मिक भाषा ने कभी उनके राजनीतिक संदेश को सीमित भी किया? लेखक इस सवाल को छूते हैं, लेकिन उस पर बहुत देर नहीं रुकते.

किताब के आखिरी हिस्सों में पहुंचकर लगता है कि अग्रवाल की असली दिलचस्पी राजनीति से भी आगे की किसी चीज़ में है. और वह है गांधी की नैतिक दुनिया.

किताब के अंतिम अध्यायों में गांधी को ‘तपस्वी’ की तरह समझने की कोशिश की गई है. यह शब्द आज की राजनीति में इतना घिस चुका है कि पहली बार पढ़कर थोड़ा संदेह होता है. लेकिन धीरे-धीरे स्पष्ट होता है कि लेखक तपस्या को त्याग या कष्ट के अर्थ में नहीं ले रहे. उनके लिए तपस्या का अर्थ है निरंतर आत्मपरीक्षण, दूसरों के दुख को समझने की कोशिश, अपने विश्वासों को भी विवेक की कसौटी पर कसना. यहीं नरसी मेहता का भजन बार-बार सामने आता है वैष्णव जन तो तेणे कहिए जे, पीर पराई जाणे रे…

किताब का शायद सबसे सुंदर तर्क यह है कि गांधी की राजनीति को उनकी करुणा से अलग करके नहीं समझा जा सकता. अहिंसा, सत्याग्रह, उपवास, संवाद ये अलग-अलग विचार नहीं थे. ये सब उस कोशिश के हिस्से थे जिसमें व्यक्ति अपने दुख से आगे बढ़कर दूसरे के दुख को महसूस करना सीखता है.

कई जगह ऐसा लगा जैसे लेखक गांधी पर फैसला सुनाने नहीं बैठे हैं. वे उनसे सवाल करते हैं, उनसे असहमत भी होते हैं और फिर दोबारा उनकी तरफ लौटते हैं.

यह किताब गांधी को देवता नहीं बनाती. न उन्हें गिराकर खड़ा होना चाहती है. वह पाठक को एक मुश्किल जगह पर छोड़ देती है, जहां गांधी पूरी तरह सही भी नहीं हैं, पूरी तरह गलत भी नहीं. सावरकर पूरी तरह खारिज़ नहीं होते, लेकिन उनके विचारों के परिणामों पर कठोर सवाल खड़े होते हैं. आज़ाद पर लिखे गए पन्ने पढ़ते हुए मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि अगर उनकी साझी भारतीय राष्ट्रीयता वाली सोच को ज़्यादा राजनीतिक ताकत मिली होती तो शायद हमारी कहानी कुछ अलग भी हो सकती थी.

(तेजस्वी ठाकुर स्वतंत्र पत्रकार हैं.)