नॉर्थईस्ट डायरीः नगालैंड-असम सीमा विवाद गहराया, सीमावर्ती निवासियों की त्रिपक्षीय वार्ता की मांग

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में त्रिपुरा, मणिपुर, असम, नगालैंड और मिज़ोरम के प्रमुख समाचार.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: X/@assampolice)

नई दिल्ली: असम-नगालैंड सीमा पर हालिया तनाव के बाद मंगलवार को उरियामघाट और मारियानी में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. स्थानीय निवासियों, छात्र संगठनों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने दोनों राज्य सरकारों से तत्काल हस्तक्षेप कर सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा, आजीविका और हितों की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की.

उरियामघाट में लगभग 18 संगठनों ने स्थानीय लोगों के साथ एक विशाल जनसभा आयोजित की, जिसमें बार-बार उभरने वाले सीमा विवादों और उनके दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की गई. सभा में तीन प्रस्ताव पारित किए गए. इनमें दशकों पुराने असम-नगालैंड सीमा विवाद के शीघ्र और स्थायी समाधान की मांग, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के माध्यम से ज्ञापन भेजने का निर्णय शामिल था.

प्रदर्शनकारियों ने यह भी मांग की कि असम और नगालैंड सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ सीमा के दोनों ओर के स्थानीय संगठनों को शामिल करते हुए एक त्रिपक्षीय बैठक आयोजित की जाए, ताकि भविष्य में संघर्षों को रोका जा सके और क्षेत्र में शांति बनाए रखी जा सके.

आयोजकों की ओर से बोलते हुए स्थानीय निवासी अनंत गोगोई ने कहा कि सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोग दशकों से अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं और बार-बार होने वाले विवादों से निराश हैं.

उन्होंने कहा, ‘असम-नगालैंड सीमा विवाद वर्षों से अनसुलझा है और वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. हमें न्यायिक समाधान की उम्मीद है, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को लगातार तनाव और विवादों का सामना करना पड़ रहा है. हम चाहते हैं कि दोनों सरकारें और जनता के प्रतिनिधि साथ बैठकर शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने का व्यावहारिक रास्ता निकालें.’

प्रदर्शनों के दौरान मरियानी और उरियामघाट के कई हिस्सों में सड़क अवरोध भी किए गए, जिससे असम और नगालैंड के बीच यातायात प्रभावित हुआ.

खबरों के अनुसार, प्रदर्शनकारी कथित अतिक्रमण और डराने-धमकाने की घटनाओं के खिलाफ कार्रवाई तथा स्थानीय लोगों की सुरक्षा की मांग कर रहे थे. सभा में शामिल महिलाओं ने भी क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने की अपील की. उनका कहना था कि स्थायी शांति के बिना विकास संबंधी पहलें प्रभावी नहीं हो पाएंगी.

इस बीच, असम टी ट्राइब्स स्टूडेंट्स एसोसिएशन की मरियानी शाखा ने अलग प्रदर्शन करते हुए एक ज्ञापन सौंपा. संगठन ने सीमा क्षेत्रों में बढ़ती कथित धमकियों और असुरक्षा पर चिंता जताई.

संगठन ने असम सरकार से मांग की कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास कार्यों को बिना किसी बाधा के जारी रखा जाए और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं.

दोनों विरोध प्रदर्शनों का मुख्य मांग एक ही था – असम, नगालैंड सरकार और प्रभावित समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक संवाद प्रक्रिया शुरू की जाए.

संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि शीघ्र ही सार्थक कदम नहीं उठाए गए, तो पूरे क्षेत्र में बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू किए जा सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि हाल ही में मरियानी क्षेत्र में तनाव तब बढ़ गया था जब सड़क मरम्मत कार्य को कथित तौर पर नगालैंड के कुछ लोगों ने यह दावा करते हुए रोक दिया कि जिस भूमि पर काम हो रहा था, वह उनकी है. इसी घटना के बाद सीमा विवाद एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है.

असम और नगालैंड के बीच सीमा विवाद स्वतंत्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन से जुड़ा एक पुराना मुद्दा है. यह मामला लंबे समय से न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर विचाराधीन है तथा समय-समय पर सीमावर्ती इलाकों में तनाव और झड़पों का कारण बनता रहा है. सीमावर्ती समुदायों का कहना है कि स्थायी समाधान के अभाव में वे लगातार असुरक्षा और अनिश्चितता की स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

त्रिपुरा में हिरासत में यातना मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद आठ पुलिसकर्मी निलंबित

त्रिपुरा सरकार ने हिरासत में कथित यातना और रिश्वतखोरी के एक मामले में आठ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है. इनमें ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन और ईस्ट अगरतला महिला पुलिस स्टेशन के ऑफिसर-इन-चार्ज (ओसी) भी शामिल हैं. यह कार्रवाई त्रिपुरा हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद की गई है.

यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है जिनमें कहा गया है कि अगरतला नगर निगम (एएमसी) से जुड़े एक भवन निर्माण विवाद में दो लाख रुपये की कथित रिश्वत देने से इनकार करने पर बनमालीपुर निवासी एक महिला और उसके परिवार को पुलिस हिरासत में शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

राज्य के गृह सचिव अभिषेक सिंह ने हाईकोर्ट को बताया कि विभागीय जांच के बाद ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन के ओसी सुब्रत देबनाथ,  ईस्ट अगरतला महिला पुलिस स्टेशन की ओसी शकुंतला देबनाथ, उपनिरीक्षक (एसआई) सैकत डे, सहायक उपनिरीक्षक (एएसआई) आनंद देबबर्मा,  कांस्टेबल सुमन आचार्य, कांस्टेबल मिथुन रुद्रपाल, विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) रिपुल देबनाथ, विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) शुभंकर धर को निलंबित किया गया है.

गृह सचिव ने यह भी बताया कि गिरफ्तार किए गए एसपीओ जॉय देबनाथ और अगरतला नगर निगम की अस्थायी टास्क फोर्स के कर्मचारी रवींद्र नारायण घोष को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है और वे वर्तमान में न्यायिक हिरासत में हैं.

सिंह ने बताया कि इसके अलावा, गृह विभाग के अवर सचिव समरेंद्र देबबर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, क्योंकि कोर्ट ने कथित तौर पर गुमराह करने वाला हलफनामा जमा करने के लिए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संभावना पर चिंता जताई थी.

इस मामले की समीक्षा अभी मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव और जस्टिस बिस्वजीत पालित की डिवीजन बेंच कर रही है.

विवाद की शुरुआत बनमालीपुर निवासी रत्ना रॉय की शिकायत से हुई. उनका आरोप है कि अगरतला नगर निगम ने उनके घर के निर्माण कार्य को रुकवा दिया था. बाद में नगर निगम की टास्क फोर्स के कर्मचारी रवींद्र नारायण घोष ने उनके बेटे से 2 लाख रुपये की रिश्वत मांगी.

शिकायत के अनुसार, रिश्वत देने से इनकार करने पर 4 अप्रैल की रात घोष और कुछ पुलिसकर्मियों के नेतृत्व में एक दल उनके घर में घुस आया.

आरोप है कि रत्ना रॉय के बेटे सैकत साहा की पिटाई की गई, उसे ईस्ट अगरतला पुलिस स्टेशन ले जाया गया और हिरासत में उसका यौन शोषण किया गया. रॉय और उनके पति ने भी आरोप लगाया कि उनके साथ मारपीट की गई.

रॉय ने दावा किया कि सीनियर पुलिस अधिकारियों से कई बार शिकायत करने के बावजूद शुरू में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई. उनके हाईकोर्ट जाने के बाद एफआईआर दर्ज की गई और कोर्ट ने 5 मई को नोटिस जारी किया.

त्रिपुरा: आदिवासी संगठन ने क्षेत्रीय दलों पर अलग राज्य की मांग छोड़ने का लगाया आरोप

नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, अलग आदिवासी राज्य की मांग करने वाले आदिवासी चिंतकों के संगठन तिपरालैंड स्टेटहुड डिमांड कमेटी (टीएसडीसी) ने गुरुवार को आरोप लगाया कि क्षेत्रीय आदिवासी दल इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) और तिपरा मोथा राजनीतिक सत्ता का हिस्सा बनने के बाद आदिवासी समुदाय के लिए अलग राज्य की अपनी लंबे समय से चली आ रही मांग से पीछे हट गए हैं.

एक बैठक में टीएसडीसी के नेता अघोर देबबर्मा ने कहा कि त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (टीटीएएडीसी) के अधीन आने वाले क्षेत्रों के लिए अलग राज्य की मांग आज भी प्रासंगिक है. उन्होंने राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराने का आग्रह किया.

तिपरालैंड अलग राज्य की मांग को लेकर एक रैली की फाइल फोटो: X/@KumarMevar)

देबबर्मा ने कहा कि यह मांग संविधान के प्रावधानों पर आधारित है और वर्षों से राज्य के कई स्वदेशी राजनीतिक दलों के चुनावी अभियानों का प्रमुख मुद्दा रही है.

उन्होंने कहा, ‘हम टीटीएएडीसी क्षेत्रों के लिए अलग राज्य की मांग कर रहे हैं. यह संविधान के अनुच्छेद 1 और 2 के तहत एक संवैधानिक मांग है. जिन दलों ने कभी राज्य गठन को अपना प्रमुख राजनीतिक उद्देश्य बताया था, वे सत्ता में आने के बाद इस मुद्दे से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं.’

उनके अनुसार, समिति ने यह बैठक इसलिए बुलाई ताकि चुनावों से पहले आदिवासी समुदाय से किए गए वादों की राजनीतिक नेताओं को याद दिलाई जा सके.

टीएसडीसी नेता ने आरोप लगाया कि आईपीएफटी, जिसकी स्थापना ‘तिपरालैंड’ की मांग के साथ हुई थी और जो बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सहयोगी बन गई, सरकार में शामिल होने के बावजूद इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ा सकी.

उन्होंने तिपरा मोथा की भी आलोचना करते हुए कहा कि यह पार्टी ‘ग्रेटर तिपरालैंड’ की मांग के साथ उभरी और इसी आधार पर जनता का समर्थन हासिल किया, लेकिन अपने घोषित उद्देश्य की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं कर सकी.

देबबर्मा ने दावा किया कि दोनों दलों ने आदिवासी समुदाय के अधिकारों, पहचान और सांस्कृतिक हितों की रक्षा का वादा करके जनता का समर्थन प्राप्त किया था.

जब उनसे तिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मन की भूमिका के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि राजनीतिक वादों को पूरा करने की जिम्मेदारी केवल किसी एक नेता की नहीं, बल्कि पूरी पार्टी नेतृत्व की होती है.

उन्होंने कहा, ‘कोई भी वादा केवल औपचारिक बयानबाज़ी बनकर नहीं रह जाना चाहिए. लोगों को स्थिति का आकलन करना चाहिए और स्वयं अपने निष्कर्ष निकालने चाहिए.’

समिति ने एक बार फिर टीटीएएडीसी क्षेत्रों के लिए अलग राज्य की मांग दोहराते हुए कहा कि आदिवासी समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और हितों की रक्षा के लिए यह कदम जरूरी है.

देबबर्मा ने बांग्लादेश सीमा पार से कथित अवैध प्रवासन पर भी चिंता व्यक्त की. उनका कहना था कि इससे राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना प्रभावित हो सकती है.

टीएसडीसी आदिवासी नेताओं, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक संगठन है, जो वर्तमान में टीटीएएडीसी के प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग राज्य के गठन की वकालत करता है.

मणिपुर: कुकी-ज़ो परिषद ने नगा हत्याओं पर अध्यक्ष की टिप्पणी को लेकर सफाई दी

कुकी-ज़ो परिषद (केज़ेडसी) ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि मणिपुर में छह नगा नागरिकों की हत्या को लेकर उसके अध्यक्ष द्वारा व्यक्त किया गया खेद इस बात की स्वीकारोक्ति नहीं था कि इस अपराध के लिए पूरा कुकी-ज़ो समुदाय जिम्मेदार है. परिषद ने कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया है.

छह नगा पुरुषों की हत्या के विरोध में एक रैली. (फोटो: पीटीआई)

यह स्पष्टीकरण उस बयान के एक दिन बाद आया, जिसमें केज़ेडसी के अध्यक्ष हेनलियेंथांग थांगलेट ने छह नगा बंधकों की हत्या पर ‘हमें बेहद खेद है’ कहते हुए घटना की निंदा की थी.

एक बयान में परिषद ने कहा कि अध्यक्ष द्वारा व्यक्त किया गया खेद ‘पूरी तरह मानवता, करुणा और नैतिक जिम्मेदारी की भावना’ से प्रेरित था. परिषद ने कहा कि इसका उद्देश्य कुकी-ज़ो समुदाय पर सामूहिक दोषारोपण करना या यह संकेत देना नहीं था कि हत्या के लिए पूरा समुदाय जिम्मेदार है.

परिषद के अनुसार, यह संवेदना इसलिए व्यक्त की गई क्योंकि छह पीड़ितों के शव कुकी-ज़ो गांवों के निकट स्थित क्षेत्रों से बरामद हुए थे. यह केवल शोकाकुल परिवारों के प्रति सहानुभूति और संवेदना प्रकट करने का प्रयास था.

केज़ेडसी ने दोहराया कि कुकी-ज़ो समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली किसी भी राजनीतिक, सामाजिक या सामुदायिक संस्था ने निर्दोष नागरिकों की हत्या को न तो मंजूरी दी है, न उसका समर्थन किया है और न ही उसे प्रोत्साहित किया है.

परिषद ने कहा कि हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान अभी नहीं हो पाई है और तथ्यों का पता लगाने और दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच की मांग की.

साथ ही परिषद ने कुकी-ज़ो नागरिकों की हत्याओं, गांवों और चर्चों पर हुए हमलों तथा धार्मिक नेताओं की हत्या की घटनाओं की भी निष्पक्ष जांच की मांग की. परिषद का कहना था कि ‘चुनिंदा सुरक्षा उपायों या चुनिंदा न्याय’ के आधार पर स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती.

इससे पहले शुक्रवार को ऑल नगा स्टूडेंट्स एसोसिएशन, मणिपुर (एएनएसएएम) ने केज़ेडसी की माफी को खारिज करते हुए तीखी आपत्ति जताई और छह नगा बंधकों की हत्या पर परिषद के बयान को अस्वीकार कर दिया.

इस बीच, जोमी स्टूडेंट्स फेडरेशन (जनरल हेडक्वार्टर्स) ने स्वयं को कुकी-ज़ो परिषद से अलग बताते हुए कहा कि वह न तो इस संगठन को मान्यता देता है और न ही उसकी गतिविधियों का समर्थन करता है.

फेडरेशन ने कहा कि केज़ेडसी द्वारा स्वयं को जोमी सहित कई समुदायों का प्रतिनिधि बताने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है.

गौरतलब है कि 13 मई को कांगपोकपी जिले के लेइलोन वैफेई गांव से अगवा किए गए छह नगा नागरिकों के शव 10 जून को एक कुकी-ज़ो गांव के निकट बरामद हुए थे. यह बरामदगी सेनापति जिले से अगवा किए गए 14 कुकी लोगों की रिहाई के एक दिन बाद हुई थी.

मणिपुर में मई 2023 से मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा जारी है. इस हिंसा में अब तक कम-से-कम 260 लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं.

मणिपुर में 13 मई को तीन कुकी चर्च नेताओं की हत्या की जांच एनआईए करेगी

अधिकारियों ने बुधवार (24 जून) को बताया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पिछले महीने मणिपुर में तीन कुकी चर्च नेताओं की हत्या की जांच के लिए मामला दर्ज किया है.

13 मई को हिंसा प्रभावित राज्य के कांगपोकपी ज़िले में संदिग्ध उग्रवादियों ने तीन चर्च नेताओं की गोली मारकर हत्या कर दी थी और चार अन्य को घायल कर दिया था. मारे गए लोग ‘थाडौ बैपटिस्ट एसोसिएशन’ (टीबीए) के सदस्य थे और एक धार्मिक सभा में शामिल होने के बाद चूड़ाचांदपुर से लौट रहे थे.

मणिपुर पुलिस. (फोटो: पीटीआई)

एनआईए की 8 जून की एफआईआर के अनुसार, हथियारबंद बदमाशों ने चूड़ाचांदपुर से कांगपोकपी जाते समय ज़ीरो पॉइंट (कोटज़िम और कोटलेर्न इलाके के बीच) पर दो गाड़ियों पर घात लगाकर हमला किया.

इसमें कहा गया है कि इस घटना में कुकी समुदाय के तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और गाड़ियों में सवार चार अन्य लोगों को गोली लगी.

मणिपुर पुलिस ने घटना के दिन ही इस संबंध में मामला दर्ज किया था. केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश के बाद एनआईए ने हाल ही में मामला दर्ज किया है और जांच शुरू कर दी है.

आतंकवाद-रोधी एजेंसी को दिए अपने निर्देश में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि ‘यह मामला हथियारबंद बदमाशों द्वारा नागरिकों की जान-माल को नुकसान पहुंचाने और समाज में डर और दहशत पैदा करने के मकसद से किए गए हमले से जुड़ा है. अपराध की गंभीरता, इसके राष्ट्रीय असर और बड़ी साजिश का पता लगाने की ज़रूरत को देखते हुए, इसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए.’

असम में 33,145 एचआईवी संक्रमित, पूर्वोत्तर में सबसे अधिक: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय

असम पूर्वोत्तर भारत में एचआईवी (एचआईवी) के साथ जीवन जी रहे लोगों की सबसे अधिक संख्या वाला राज्य बनकर उभरा है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, असम में वर्तमान में 33,145 लोग एचआईवी के साथ जीवन जी रहे हैं, जो राज्य में अनुमानित 0.13 प्रतिशत प्रसार दर (प्रिवेलेंस) को दर्शाता है.

(फोटो: पीटीआई)

इन आंकड़ों के हिसाब से असम पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में सबसे आगे है. इसके बाद मिज़ोरम में 26,321, नगालैंड में 23,731 और मणिपुर में 23,463 संक्रमित लोग हैं. त्रिपुरा में 10,769, मेघालय में 9,244, अरुणाचल प्रदेश में 2,630 और सिक्किम में 533 मामले सामने आए हैं.

ये आंकड़े क्षेत्र की विशिष्ट जनसांख्यिकीय और महामारी-विज्ञान संबंधी परिस्थितियों को दर्शाते हैं. सूची में असम का शीर्ष पर होना केवल उसकी बड़ी आबादी के कारण महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसलिए भी कि यह पूर्वोत्तर को भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाला एक प्रमुख परिवहन और वाणिज्यिक केंद्र है. लोगों की अधिक आवाजाही, प्रवासन, शहरीकरण और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुंच एचआईवी की रोकथाम और उपचार के प्रयासों को जटिल बना सकती है.

असम में एचआईवी संक्रमण के मामलों में महिलाओं की हिस्सेदारी भी उल्लेखनीय है. पूर्वोत्तर में एचआईवी पॉजिटिव पाई गई 13,809 महिलाओं में से अकेले 6,809 महिलाएं असम से हैं, जो कुल संख्या का लगभग आधा हिस्सा है.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि असम में 146 गर्भवती महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव पाई गई हैं, जो पूर्वोत्तर के राज्यों में सबसे अधिक संख्या है. इसके बाद नगालैंड में 127 और मेघालय में 124 मामले दर्ज किए गए हैं. ये आंकड़े माता से शिशु में संक्रमण की रोकथाम (Prevention of Parent-to-Child Transmission) कार्यक्रमों को मजबूत करने तथा समय पर प्रसवपूर्व जांच और उपचार सुनिश्चित करने की आवश्यकता जोर दिया.

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए रोकथाम, उपचार, देखभाल और सहयोग को जोड़ने वाली एक रणनीति अपनाई है. एचआईवी कार्यक्रम के तहत सूचना, शिक्षा और संचार पहलों को शामिल किया गया है ताकि जागरूकता बढ़ाई जा सके, जांच के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा सके और सामाजिक कलंक को कम किया जा सके.

प्रख्यात स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. सुनीला गर्ग ने कहा, ‘असम के ताजा आंकड़े संकेत देते हैं कि जारी प्रयासों के बावजूद राज्य अब भी क्षेत्र में एचआईवी के सबसे बड़े बोझ को वहन कर रहा है. इसलिए इस प्रवृत्ति को उलटने के लिए रोकथाम, निगरानी और उपचार सेवाओं में निरंतर निवेश अत्यंत आवश्यक है.’

मिजोरम: एमज़ेडपी का चकमा-बहुल क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में 121% वृद्धि का दावा, एसआईआर के दौरान जांच की मांग

मिजो ज़िरलाई पॉल (एमज़ेडपी) ने मंगलवार को राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची में शामिल संदिग्ध अवैध विदेशियों की गहन जांच की मांग की. छात्र संगठन ने दावा किया कि वर्ष 2005 के बाद से चकमा-बहुल क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में 121.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इस अवधि में 97 नए गांव मतदाता सूची में जुड़े हैं.

आइजोल में आयोजित एक प्रेस वार्ता में एमज़ेडपी के अध्यक्ष सी. लालरेमरुआता ने कहा कि संगठन ने उन निर्वाचन क्षेत्रों की 2005 और 2024 की मतदाता सूचियों का स्वतंत्र विश्लेषण किया है, जहां लंबे समय से कथित अवैध प्रवासन को लेकर चिंताएं जताई जाती रही हैं.

एक चकमा बहुल गांव. (फोटो साभार: फेसबुक/Mizo Zirlai Pawl – MZP)

एमज़ेडपी के अनुसार, संगठन द्वारा अवैध प्रवासन की दृष्टि से संवेदनशील माने गए 195 गांवों में मतदाताओं की संख्या 2005 में 43,540 से बढ़कर 2024 में 96,531 हो गई.

लालरेमरुआता ने बताया कि 98 ऐसे गांव, जो 2005 और 2024 दोनों की मतदाता सूचियों में शामिल थे, वहां मतदाताओं की संख्या में 31.15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. वहीं, 97 ऐसे गांव, जो 2005 की सूची में नहीं थे लेकिन 2024 की सूची में शामिल हुए, उनमें कुल 39,428 मतदाता दर्ज किए गए.

उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन के विश्लेषण में भारत और बांग्लादेश की दोहरी नागरिकता रखने वाले कुछ लोगों तथा वैध मकान नंबर के बिना दर्ज मतदाताओं के मामले भी सामने आए हैं.

एमज़ेडपी अध्यक्ष ने कहा कि संगठन जल्द ही मुख्य निर्वाचन अधिकारी को एक औपचारिक शिकायत सौंपेगा। इसमें संगठन द्वारा चिन्हित सभी 195 गांवों का विस्तृत सत्यापन कराने की मांग की जाएगी, जिन क्षेत्रों में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वे भी इसमें शामिल होंगे.

छात्र संगठन ने निर्वाचन अधिकारियों और बूथ-स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) से अपील की कि मतदाता सूची में अवैध रूप से शामिल लोगों के नाम हटाए जाएं.

लालरेमरुआता ने याद दिलाया कि 1995 के एसआईआर अभियान के दौरान एमज़ेडपी के सदस्यों ने चुनाव अधिकारियों की सहायता की थी, जिसके परिणामस्वरूप 10,000 से अधिक कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे.

इस बीच, संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी एथेल रोथांगपुई ने बताया कि एसआईआर की प्रक्रिया पूरे राज्य में जारी है और इसके 28 जून तक पूरा होने की संभावना है.

उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के पारिवारिक रिकॉर्ड 2005 के एसआईआर से नहीं जुड़ पाएंगे, उनके नाम मतदाता सूची से स्थायी रूप से हटा दिए जाएंगे.