चंपत राय व अनिल मिश्र के इस्तीफ़े: बिना नैतिकता का नैतिक आधार!

संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है. इसीलिए ख़ुद को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह 'उसके' भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया.

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''गर्व से कहो, हम हिंदू हैं' का 'आह्वान' करने वाला संघ परिवार हिंदू नैतिकता का भी पाबंद नहीं है. होता तो उसके द्वारा प्रबंधित राम मंदिर में वह लूट नहीं ही मचती, जो मची और सालों तक चलती रही. तब इस लूट को लेकर उसकी लानत मलामत कर रहे विपक्षी दलों के नेता उसे अयोध्या को बदनाम करने की कोशिश करते मारीच, खर-दूषण और रावण भी नहीं ही लगते.' (फोटो: पीटीआई और आकांक्षा कुमार/द वायर)

गत शुक्रवार को अयोध्या से श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्र के इस्तीफों की खबर आई (जो ट्रस्ट द्वारा प्राप्तिस्वीकार या पुष्टि के अभाव में देर तक संदेहास्पद बनी रही, और अब कहा जा रहा है कि इन इस्तीफों पर ट्रस्ट की आगामी ग्यारह जुलाई की बैठक में विचार किया जाएगा.)

तो, और तो और, कई ऐसे लोग भी हैरत में पड़ गए, जो ट्रस्ट द्वारा प्रबंधित राम मंदिर के चढ़ावे के गबन का मामला उछलने के बाद से लगातार इस उम्मीद का पीछा करते आ रहे थे कि अपने आप नहीं तो, भरपूर जगहंसाई के बाद ही सही, न सिर्फ इन दोनों बल्कि दूसरे ट्रस्टियों का भी कर्तव्यबोध या अपराधबोध (अंतरात्मा की बात फिजूल है) जागेगा, वे आगे बढ़कर गबन में अपनी भूमिका नहीं तो चढ़ावे की रक्षा कर पाने में अपनी विफलता तो स्वीकार कर ही लेंगे. साथ ही, पश्चातापस्वरूप खुद को ट्रस्ट से अलगकर निष्पक्ष और भरोसेमंद (मनपसंद नहीं) जांच का रास्ता साफ कर देंगे.

इसलिए कि उनको इतना तो इल्म होगा ही कि जांच को प्रभावित करने और साक्ष्य मिटाने की उनकी क्षमता (यानी पद) बरकरार रहते न निष्पक्ष जांच हो सकती है और न दूध का दूध और पानी का पानी करने का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा हकीकत में बदल सकता है.

ख़ासकर, जब उन पर चढ़ावे के गबन से जुड़े आरोप भी नहीं, मंदिर निर्माण के वक्त भूमि व निर्माण सामग्री की खरीद में भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के भी आरोप हैं. ऐसे में उनके अपने पदों पर रहते कुछ हो सकता है तो यही कि गबन के खुलासे के 18-19 दिन बाद कुछ छोटी मछलियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करा दी जाएं और बड़ी मछलियों का नाम तक न लिया जाए.

नैतिक आधार की मिट्टी पलीद

लोगों की हैरत निराधार नहीं थी. क्योंकि, खबरों के अनुसार, चंपत और अनिल दोनों ने यह स्वीकार करने के बजाय कि गबन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के ‘नायकों’ में मची अंदरूनी उठापटक में उन पर इस्तीफे का भारी दबाव था, जिसके चलते उन्होंने बेमन से और बहुत देरी से यह कदम उठाया, नैतिक आधार पर इस्तीफे का दावा किया था- हालांकि तब तक उनके पास ऐसा कोई नैतिक आधार बचा ही नहीं था.

उस आधार की तो वे गबन की यथासमय एफआईआर न लिखाकर और उत्तर प्रदेश सरकार की एसआईटी में आश्रय तलाशकर पहले ही मिट्टी पलीद कर चुके थे. फलस्वरूप उनके पास इतनी-सी ही गुंजाइश बची थी कि इस्तीफे के बहाने जैसे-तैसे अपना चेहरा बचाने का उपक्रम कर लें.

लेकिन ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि महाराज से तो खैर यह उपक्रम भी संभव नहीं हुआ. उनके कोषाध्यक्ष रहते ट्रस्ट के कोष को इतना बड़ा चूना लगा, फिर भी वे अपना इस्तीफा देने के बजाय चंपत व अनिल के इस्तीफों की पुष्टि भर करते रहे.

लेकिन जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार, उसके आनुषंगिक संगठनों और उसके द्वारा नियंत्रित सरकारों के कार्यकलापों से वाकिफ हैं, उन्हें इस समूचे घटनाक्रम पर कतई कोई अचरज नहीं था. उसके बाद के घटनाक्रमों को लेकर भी नहीं ही है.

हो भी कैसे, अतीत में बहुत दूर न जाएं तो भी, जो नरेंद्र मोदी सरकार इस ट्रस्ट व उसके ट्रस्टियों की नियोक्ता व प्रेरणा है, उसको वे पिछले बारह सालों से रोज अपनी नैतिकताएं बदलते और असुविधाजनक होते ही उनसे मुंह मोड़ लेते या चिढ़ाने पर उतरते देख रहे हैं.

यह भी कि वह उस संवैधानिक नैतिकता तक को तिरस्कृत कर चुकी है, जिसके पालन के बगैर उसके द्वारा ली गई संविधान की शपथ का कोई मतलब नहीं रह जाता.

यहां 04 नवंबर, 1948 को संविधान सभा में संविधान का मसौदा पेश करते हुए बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जो बातें कही थीं, उनके आईने में इस बात को समझना कतई कठिन नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) परिवार, सरकार और मंत्रियों को देश की संवैधानिक नैतिकता (जो कानून व संविधान के शासन की रीढ़ है) का तनिक भी अभ्यास क्यों नहीं है और क्यों वे अपने मनों में उसके प्रति इतना भी सम्मान नहीं रखते कि किसी तरह इस अनभ्यास को दूर करना चाहें.

यह तब है जब बाबा साहेब ने तभी कह दिया था कि संवैधानिक नैतिकता स्वाभाविक या जन्मजात नहीं होती और उसे अभ्यास द्वारा पाना व अपनाना पड़ता है. उन्होंने इस अभ्यास को इस बात के मद्देनजर बहुत जरूरी बताया था कि देशवासियों की असल जिंदगी में लोकतंत्र को कायम रखने के लिए इस नैतिकता का (जिसकी भावना कतई स्वत:स्फूर्त नहीं होती) प्रसार सर्वथा अपरिहार्य है.

संवैधानिक नैतिकता को ठेंगा

उन्होंने यह कहने से भी संकोच नहीं किया था कि भारतीयों का अभी इस समतामूलक नैतिकता को सीखना व अभ्यास में लाना बाकी है, क्योंकि भारत की भूमि स्वभावतः लोकतांत्रिक नहीं है और संविधान की कार्यप्रणाली इस बात पर निर्भर करती है कि चुनी गई सरकार अपनी नीतियों में किसके हितों को प्राथमिकता देती है.

इसी तरह 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी दी थी कि इस नैतिकता से विहीन सत्ताधीश चाहें तो संविधान के लिखित शब्दों (यानी स्वरूप) को बदले बिना, केवल प्रशासन चलाने के तरीके बदल करके संविधान की मूल भावना को नष्ट कर सकते हैं.

कैसे?

इसे यों समझ सकते हैं कि संवैधानिक नैतिकता कहती है कि सरकार का कोई भी मंत्रालय ऐसी गंभीर त्रुटि या गड़बड़ करता है, जिससे लाखों लोग प्रभावित होते हैं तो उसका नैतिक उत्तरदायित्व संबंधित मंत्री का ही है और उसको इस उत्तरदायित्व को स्वीकार करते हुए किसी के मांगने की प्रतीक्षा किए बगैर अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, न कि मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व की आड़ लेकर अपनी कुर्सी से चिपके रहना चाहिए. हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में इस नैतिकता के पालन के एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं.

लेकिन मोदी की पहली सरकार के महज एक साल बाद 24 जून, 2015 को (जब ललित मोदी से जुड़े बहुप्रचारित विवाद के सिलसिले में तत्कालीन विदेशमंत्री सुषमा स्वराज व राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे मांगे जा रहे थे) तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहकर कि ‘इस सरकार में मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते भैया, यह यूपीए की नहीं, एनडीए की सरकार है’, ‘घोषणा’ कर दी थी कि वह सरकार स्वयं को सारी संवैधानिक नैतिकताओं से परे कर लेने के फेर में है.

अब, शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का ताजा प्रकरण (जिसमें नीट-यूजी, सीबीएसई और सीयूईटी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में बार-बार के पेपर लीक, ऑनस्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) व मूल्यांकन प्रणाली में अन्यायकारी गड़बड़ियों, अनियमितताओं व भ्रष्टाचार और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की विडंबनाओं से भरी कार्यप्रणाली पर अनेक सवाल उठने और इन सबके लिए उत्तरदायी होने के बावजूद न वे अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं और न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही उनसे इस्तीफा दे या राष्ट्रपति से उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश कर रहे हैं) हमें सिर्फ यह बताता है कि इस सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल में ‘खुद को संवैधानिक नैतिकताओं से परे कर लेने का लक्ष्य’ सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है.

इतना ही नहीं, वह समझ गई है कि इस नैतिकता का पालन करती रहकर वह संविधान के उद्देश्यों व भावनाओं के विरुद्ध जाकर अपने व अपनों के स्वार्थ पूरे नहीं कर सकती. इसलिए बरबस भूल जाती है कि संवैधानिक नैतिकता विधि द्वारा स्थापित देश के संविधान की आत्मा और मूल्यों से जुड़ी हुई है.

और हिंदू नैतिकता को भी

यहां एक पल को मान सकते हैं कि चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार का देश के संविधान से पुराना वैर है, इसलिए मोदी सरकार द्वारा संवैधानिक नैतिकता का तिरस्कार और चंपत व अनिल जैसे स्वयंसेवकों द्वारा धर्मेंद्र प्रधान जैसे मंत्रियों के अनुकरण की कोशिशें बेहद स्वाभाविक हैं.

लेकिन इस सिलसिले का पूरा सच यह है कि ‘गर्व से कहो, हम हिंदू हैं’ का ‘आह्वान’ करने वाला संघ परिवार हिंदू नैतिकता का भी पाबंद नहीं है. होता तो उसके द्वारा प्रबंधित राम मंदिर में वह लूट नहीं ही मचती, जो मची और सालों तक चलती रही. तब इस लूट को लेकर उसकी लानत मलामत कर रहे विपक्षी दलों के नेता उसे अयोध्या को बदनाम करने की कोशिश करते मारीच, खर-दूषण और रावण भी नहीं ही लगते.

यहां पिछले दिनों अयोध्या के दैनिक ‘जनमोर्चा’ में वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी द्वारा लिखे एक लेख का यह उद्धरण बहुत प्रासंगिक है, जिसमें वे कहते हैं:

‘संघ परिवार निरंतर जिस सनातन धर्म और उसके मूल्यों की बात करता है, उसके वैदिक साहित्य में मनुष्य को पंच ऋणों का उत्तरदायी बताया गया है. साथ ही इन ऋणों से मुक्त होने के निरंतर प्रयास करते रहने को उसका कर्तव्य बताया गया है. इसे ‘मैन डूइंग हिज ड्यूटी’ भी कहा गया है और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने ‘ऋणशोध करते हुए मध्यवर्ती मानव’ के रूप में इसका अनुवाद किया है.

ये ऋण हैं – पितृ ऋण, ऋषि ऋण, देव ऋण, भूत ऋण और मनुष्य ऋण, जिसे नृऋण भी कहा जाता है. इसमें पहले ऋण का शोधन तो मनुष्य को परिवार के प्रति दायित्व के पालन की सीख देता है, जबकि अन्य ऋणों का शोधन उसे व्यापक समाज व प्रकृति के प्रति दायित्वों से जोड़ता है. ऋषि ऋण ऋषियों से प्राप्त ज्ञान के संरक्षण और विकास की सीख देता है तो देव ऋण पूजा पाठ के बाह्य अनुष्ठान का नाम नहीं बल्कि उसका उद्देश्य भीतर के सोए हुए देवता का आह्वान है. नृऋण मनुष्य को मानव समाज की सेवा और प्रकृति सेवा की प्रेरणा देता है.

नृऋण से तभी उऋण हुआ जा सकता है जब सार्वभौमिक दया भावना के साथ पूरी मानव जाति की सेवा की जाए और भूत ऋण से तब, जब यह माना जाए कि किसी व्यक्ति का जीवन सिर्फ मानव समाज पर निर्भर नहीं करता. उसमें जल, वायु, वातावरण, पशु-पक्षियों, वृक्ष-वनों, पहाड़ों, नदियों और समुद्रों आदि का भी योगदान है.’

अपने इस लेख में उन्होंने पूछा है कि क्या संघ परिवार ने कभी हिंदू समाज के भीतर की इस सनातन नैतिकता को जगाने का प्रयास किया?

फिर खुद ही उत्तर दिया है कि पिछले 12 सालों में उसने तमाम किस्म के अपराधों, भ्रष्टाचारों और अनैतिकताओं का सिर्फ उसी समय विरोध किया है, जब वे उसके किसी विरोधी द्वारा किए गए हों. ये दुष्कृत्य उनके अपने संगठन, पार्टी या सरकार से जुड़े लोगों द्वारा किए जाते हैं तो वह उस पर या तो खामोश रहता व उसका बचाव करता या उससे ध्यान बंटाने के लिए दूसरी बातें करने लगता है.

रखवाली में बेईमानी

साफ है कि संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है. इसीलिए अपने को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया.

इसीलिए सांस्कृतिक संगठन का चोला धारण किए रहने के बावजूद उसके स्वयंसेवकों की लोलुपताओं ने आजकल सारी नैतिकताओं और तर्क प्रणालियों को बेमानी करके रख दिया है और उसके कई ‘ज्ञानी’ यह पूछने पर निरुत्तर हो जाते हैं कि उनको संविधान आधारित लोकतंत्र में भरोसा है, या रामराज्य में?

उस रामराज्य में ऐसा क्या होगा, जो मौजूदा संविधान में नहीं है और इस संविधान की कौन-सी चीजें रामराज्य में हटा दी जाएंगी? अखंड भारत और हिंदू राष्ट्र दोनों चीजें एक साथ कैसे बन सकती हैं, जबकि दोनों परस्परविरोधी हैं?

यहां यह भी भूला नहीं जा सकता कि समूचे राम मंदिर आंदोलन के दौरान इस परिवार ने शायद ही कभी उससे जुड़ी किसी नैतिकता को अपनी ‘राजनीति’ ( हां, राजनीति क्योंकि उसने इस आंदोलन का भरपूर राजनीतिकरण किया) और सहूलियतों के आड़े आने दिया हो. आड़े आने देता तो यह स्थिति पैदा नहीं होती कि राम मंदिर के चढ़ावे के गबन के बाद अयोध्या में आम तौर पर लोग एक ही सवाल पूछते कि उसमें नया क्या है? (पढ़िए: ‘राम मंदिर चढ़ावा विवाद : अयोध्या में जो हो रहा है, उसमें नया क्या है?‘, द वायर हिंदी, 13 जून, 2026)

इतिहास गवाह है कि उसने अपने स्वयंसेवकों के सुखभोग व सुविधा के लिहाज से जब चाहा, राम मंदिर आंदोलन को ठंडे बस्ते में डाला और निकाला. अपनी इस राजनीति को वह निरंतर रणनीति कहता रहा और इस रणनीति को अनैतिक होने की कितनी छूट थी, इस बात से समझ सकते हैं कि 6 दिसंबर, 1992 को दुनिया भर के मीडिया के सामने दिनदहाड़े बाबरी मस्जिद ढहाने के बावजूद उसके किसी भी स्वयंसेवक या सेनानी ने उसमें अपनी ज़रा-भी भूमिका स्वीकार नहीं की. उसके तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की ‘जो कहा सो किया’ की दर्पोक्ति भी सभाओं व सड़कों से आगे बढ़कर किसी अदालत में उसे स्वीकार करने तक नहीं ही पहुंची.

अब राम मंदिर के चढ़ावे के गबन के खुलासे के बाद राम और राम मंदिर में उसकी आस्था की पोल भी पूरी तरह खुल गई है. इसकी भी कि आस्था और अविवेक के अपने गठजोड़ के आगे उसे देश के करोड़ों रामभक्तों की सच्ची आस्था की कितनी परवाह है. इतनी भी नहीं कि वह अपने को ‘राम को लाने’ का दावा करने और मोदी की उंगली पकड़ाकर ‘छोटा’ करने से रोक सके.

इस सबके बीच वह कैसे उम्मीद कर सकता था कि चढ़ावे के नोट गिनने वाले उसके कर्मचारी पूरी तरह नैतिक व ईमानदार बने रहेंगे, जबकि उनकी भर्ती प्रक्रिया भी पारदर्शी नहीं बताई जाती और लोग चर्चा कर रहे हैं कि एक ‘भर्ती घोटाला’ भी हुआ है.

चील के घोंसले में मांस?

बहरहाल, एक बार फिर अरुण कुमार त्रिपाठी के शब्दों में कहें तो संघ परिवार की ये कारस्तानियां ही हैं, जिनके चलते महात्मा गांधी, विवेकानंद और अरविंद जैसे मनीषियों का यह आकलन अब एक सीमा तक गलत सिद्ध होता दिखने लगा है कि हिंदू समाज में प्रवेश कर चुकी तमाम बुराइयों के बावजूद उसमें इतनी नैतिकता है कि वह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित संविधान का पालन करेगा.

साथ ही बहुसंख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यकों का ख्याल रखते हुए उनसे पूछकर फैसले करेगा और अपने समाज के विभिन्न तबकों के प्रति अपने व्यवहार को निरंतर उदार बनाता जाएगा.

जाहिर है कि चंपत और अनिल के इस्तीफों की भूमिका और उपसंहार जैसे भी हों, उनके लिए उनका नैतिक आधार तलाशना वैसे ही है जैसे चील के घोंसले में मांस की तलाश करना. ऐसा नहीं होता तो वे अनेक श्रद्धालुओं के राम के आने से अपनी झोंपड़ी के भाग खुल जाने के भोले विश्वास से छल की राह पर चलने से पहले सौ बार सोचते.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) में रहते हैं.)