भारतीय ही नहीं, विश्व सिनेमा भी हमेशा से इतिहास से प्रेरणा लेता रहा है. भारत के संदर्भ में देखें तो प्रारंभिक राष्ट्रवादी फिल्मों से लेकर स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक सिनेमा तक, अतीत केवल एक पृष्ठभूमि नहीं रहा बल्कि अर्थ और संवेदना का एक समृद्ध स्रोत रहा है. इस प्रक्रिया में फिल्मों ने इतिहास की जन-समझ को आकार दिया है- कभी उसे सरल बनाया, कभी उसका रोमानीकरण किया, पर अधिकांशतः वे व्याख्या की सीमाओं के भीतर ही रहीं.
मगर आज जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह कहीं अधिक चिंताजनक है. यह इतिहास की व्याख्या से आगे बढ़कर उसके निर्माण का प्रयास है. यह केवल सौंदर्यबोध का प्रश्न नहीं, बल्कि ज्ञानमीमांसा (Epistemology) का प्रश्न है, जो हमें इतिहासलेखन (Historiography) की उन मूलभूत अवधारणाओं की ओर लौटने को विवश करता है जिनके अनुसार इतिहास लिखना केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि साक्ष्यों, संदर्भों और दृष्टिकोणों के बीच सतत संवाद है.
इतिहासकार सदैव यह स्पष्ट करते रहे हैं कि व्याख्या और आविष्कार में मूलभूत अंतर होता है. पहली साक्ष्यों की सीमाओं के भीतर अर्थ तलाशती है, जबकि दूसरी उन सीमाओं को ही त्याग देती है.
फ्रांसीसी इतिहासकार मार्क ब्लॉक ने इतिहास को ‘समय में मनुष्य का विज्ञान’ कहा था. उनके लिए इतिहास का आधार स्रोतों की आलोचनात्मक जांच और जटिलताओं को स्वीकार करने की बौद्धिक विनम्रता थी. ईएच कार ने भी यह स्पष्ट किया कि इतिहासकार तथ्यों का चयन अवश्य करता है, मगर वह चयन साक्ष्यों के साथ निरंतर संवाद में ही सार्थक होता है. आज कुछ सिनेमाई प्रस्तुतियां मानो इस बौद्धिक अनुशासन से मुक्त हो चुकी हैं. वहां दर्शकों के सामने कोई बहस योग्य अतीत नहीं रखा जाता, बल्कि एक पूर्वनिर्धारित और निर्विवाद सत्य प्रस्तुत किया जाता है.
आज ऐतिहासिक भव्यता (historical spectacle) की एक ऐसी प्रवृत्ति उभर रही है, जिसमें पात्रों का निर्माण अभिलेखों और स्रोतों से कम, और वर्तमान की राजनीतिक चिंताओं तथा पूर्वाग्रहों से अधिक होता है. पद्मावत मध्यकालीन इतिहास को जिस प्रकार प्रस्तुत करती है, उसमें ऐतिहासिक जटिलताओं की अपेक्षा दृश्य वैभव और नैतिक द्वंद्व अधिक प्रमुख हो जाते हैं. इसी प्रकार तानाजी: द अनसंग वॉरियर मराठा-मुग़ल संबंधों की बहुस्तरीय ऐतिहासिक वास्तविकताओं को एक सरल, ध्रुवीकृत और सभ्यतागत संघर्ष में बदल देती है.
यह प्रवृत्ति सम्राट पृथ्वीराज में भी दिखाई देती है, जहां पृथ्वीराज चौहान को लगभग एक मिथकीय प्रतिरोध-नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. नायकत्व सिनेमा का स्वाभाविक गुण है, पर जब वह इतिहास की जटिलताओं को पूरी तरह विस्थापित कर देता है, तब इतिहास एक नैतिक कथा भर रह जाता है.
वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्तित्व, जो अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों, समझौतों और सीमाओं से निर्मित था, एक ऐसे प्रतीक में बदल दिया जाता है जो प्रश्न नहीं उठाता, केवल घोषणाएं करता है. परिणामतः इतिहास जिज्ञासा का विषय न रहकर वैचारिक पुष्टि का उपकरण बन जाता है.
यह आलोचना किसी एक फिल्म तक सीमित नहीं है. चिंता उस व्यापक प्रवृत्ति की है जिसमें सिनेमा अतीत पर अधिकार का दावा करने लगा है. समस्या काल्पनिकता (fictionalisation) में नहीं है.
साहित्य और सिनेमा में ‘यदि ऐसा होता तो?’ जैसे प्रतिकल्पनात्मक (counterfactual) प्रयोग लंबे समय से स्वीकृत रहे हैं. समस्या तब उत्पन्न होती है जब कल्पना स्वयं को अंतिम ऐतिहासिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करने लगे. तब दर्शक को सोचने के लिए नहीं, बल्कि मान लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है.
इसके विपरीत इतिहास लेखन बहुलता का पक्षधर है. रणजीत गुहा और सबाल्टर्न स्टडीज़ समूह ने इतिहास के उन स्वरहीन पात्रों को सामने लाने का प्रयास किया जिन्हें प्रभुत्वशाली इतिहास ने उपेक्षित कर दिया था. उनका उद्देश्य किसी एक स्थापित इतिहास को दूसरे से बदलना नहीं था, बल्कि इस धारणा को चुनौती देना था कि अतीत का केवल एक ही अधिकृत संस्करण हो सकता है. दुर्भाग्य से समकालीन सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा इसी बहुलता को संकुचित कर एक भावनात्मक और एकरेखीय कथा में बदल देता है.
यह तर्क दिया जा सकता है कि सिनेमा ने हमेशा इतिहास के साथ रचनात्मक स्वतंत्रता बरती है. यह सही भी है. किंतु नाटकीय प्रस्तुति (dramatisation) और विकृति (distortion) में अंतर होता है. द कश्मीर फाइल्स एक अत्यंत दुखद और जटिल ऐतिहासिक प्रसंग को जिस दृष्टि से प्रस्तुत करती है, उसे अनेक इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने चयनात्मक और एकांगी बताया है.
इसी प्रकार द केरल स्टोरी के तथ्यात्मक आधार और उसके व्यापक निष्कर्षों पर भी गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं. चिंता अतिशयोक्ति से अधिक उस प्रवृत्ति की है जिसमें चयनित कथाओं को प्रामाणिक इतिहास के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है.
इतिहास केवल अकादमिक विमर्श नहीं होता बल्कि विविधताओं से भरे समाजों में वह लोगों की स्मृतियों, पहचानों और सामूहिक अनुभवों का हिस्सा होता है. जब सिनेमा अतीत को एकमात्र सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है, तब वह सामाजिक विभाजनों को और कठोर बना सकता है या यूं कहें कि बना भी देता है.
समुदाय साझा इतिहास के सहभागी नहीं रहते; वे एक नाटकीय सभ्यतागत संघर्ष के स्थायी नायक और खलनायक में बदल दिए जाते हैं. तब इतिहास संवाद का नहीं, राजनीतिक लामबंदी का माध्यम बन जाता है और यह अंततः समाज की चेतना और समझ को क्षत विक्षत करता है.
यहीं, हेडन ह्वाइट के विचार अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं क्योंकि उन्होंने कहा था कि किसी कथा की शक्ति केवल तथ्यों से नहीं, बल्कि उसके कथात्मक विन्यास और भावनात्मक प्रभाव से भी आती है. सिनेमा अपनी दृश्यात्मक शक्ति और भावनात्मक तीव्रता के कारण इस प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है. ऐसे समय में, जब पढ़ने की संस्कृति लगातार कमज़ोर हो रही है, बहुत-से लोगों के लिए इतिहास से पहला और शायद अंतिम परिचय सिनेमा ही बन जाता है और इस प्रकार का परिचय प्रीतिकर नहीं दिखता.
यहीं सबसे बुनियादी प्रश्न उठता है- अतीत को कहने का अधिकार किसके पास है और उसके साथ जुड़ी जिम्मेदारी क्या है? जब फिल्मकार इतिहासकार की भूमिका ग्रहण करते हैं, लेकिन इतिहासकार की पद्धति और अनुशासन को नहीं अपनाते, तब कहानी और ज्ञान के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब ऐसी प्रस्तुतियां समकालीन राजनीतिक परियोजनाओं के साथ जुड़कर वर्तमान को वैध ठहराने का माध्यम बनने लगती हैं.
यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सिनेमा की कल्पनाशीलता, असहमति और प्रश्नाकुलता पर कोई अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए. चुनौती सिनेमा को सीमित करने की नहीं, बल्कि उसे उसके उचित संदर्भ में समझने की है. उसे इतिहास का अंतिम निर्णायक नहीं, बल्कि अनेक व्याख्याओं में से एक के रूप में देखा जाना चाहिए. तभी रचनात्मक स्वतंत्रता और ऐतिहासिक ईमानदारी दोनों साथ-साथ सुरक्षित रह सकती हैं.
इसके लिए इतिहास की सार्वजनिक समझ को भी पुनर्जीवित करना होगा. विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में इतिहास को रटने की वस्तु नहीं, बल्कि प्रमाण, व्याख्या और बहस के माध्यम से विकसित होने वाली बौद्धिक प्रक्रिया के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए. उतना ही आवश्यक यह भी है कि सिनेमा में विविध दृष्टिकोणों को स्थान मिले.
जब अनेक कथाएं समानांतर रूप से अस्तित्व में होती हैं, तब वे एक-दूसरे से संवाद करती हैं, एक-दूसरे को चुनौती देती हैं और किसी एक संस्करण को अंतिम सत्य बनने से रोकती हैं. इस अर्थ में बहुलतावादी सिनेमा, बहुलतावादी इतिहासलेखन का स्वाभाविक विस्तार है. यहां राज्य की भूमिका सेंसर की नहीं, बल्कि एक ऐसे संरक्षक की होनी चाहिए जो स्वतंत्र रचनात्मकता, शोध और विविध दृष्टिकोणों को प्रोत्साहित करे.
इतिहास, जैसा कि इतिहास लेखन हमें सिखाता है, कभी बंद ग्रंथ नहीं होता. वह अतीत और वर्तमान, प्रमाण और व्याख्या, स्मृति और अर्थ के बीच चलने वाला निरंतर संवाद है. जब यह संवाद एकालाप में बदल जाता है- चाहे वह कितना ही दृश्यात्मक और आकर्षक क्यों न हो- तब इतिहास भी क्षीण होता है और समाज भी. सिनेमा अतीत को प्रकाशित कर सकता है, बशर्ते वह विनम्रता के साथ स्वयं को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक बड़े और जटिल संवाद का सहभागी माने.
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि सिनेमा इतिहास से संवाद करे या नहीं. प्रश्न यह है कि क्या वह इतिहास के पास समझ की तलाश में जाएगा या निश्चितताओं का निर्माता बनकर. इस प्रश्न का उत्तर केवल हमारी फिल्मों को नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति, हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति और स्वयं हमारे भविष्य को भी आकार देगा.
(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)
