हिंदुत्व पॉप का ज़हरीला कारोबार: मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा वाले गानों से हो रही कमाई

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट की नई रिपोर्ट- ‘प्रॉफिटिंग फ्रॉम हेट म्यूजिक’ संगीत के सहारे पल रहे नफ़रत के कारोबार के बारे में बताती है कि ऐसे गानों में भाजपा और संघ का वही नैरेटिव नज़र आता है, जिसमें मुसलमानों को ‘जिहादी’ और ‘देशद्रोही’ जैसे नामों से संबोधित किया जाता है. जिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ये सब उपलब्ध है, वे इसके ख़िलाफ़ कोई क़दम न उठाते हुए घृणा से हो रही इस कमाई को वैधता दे रहे हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मोदी युग के पॉलिटिकल लैंडस्केप को सरसरी तौर पर भी समझना चाहें, तो इस वक़्त एक बड़ी बात शायद ये कही जा सकती है कि ध्रुवीकरण की खुली सियासत के बीच धार्मिक अल्पसंख्यकों, ख़ास तौर पर मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा की प्रायोजित भाषा समाज के भीतर जड़ पकड़ चुकी है.

धर्म संसद के हेट स्पीच हों या प्रोपगैंडा फिल्मों का सांप्रदायिक उन्माद, इस नफ़रती भाषा के निशाने पर यही अल्पसंख्यक हैं, और अब इस भाषा ने गीत-संगीत की शैली में भी हिंदुत्व की उस विचारधारा को कई मानों में ज़्यादा उग्र और आक्रामक बना दिया है, जो अल्पसंख्यकों के साथ ऐतिहासिक तौर पर हिंसा का आह्वान करती आई है. साफ़ कहें तो इसी भाषा का एक स्वरूप बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंदमठ’ (1882) जैसे उपन्यास में भी नज़र आता है.

यहां नफ़रत और तशद्दुद के संदर्भ में जिस गीत-संगीत की बात की जा रही है, यूं तो उसका नज़ारा हमने कई त्योहारों के दौरान उस उन्मादी भीड़ की सूरत में भी किया है जो मस्जिद और धार्मिक स्थलों के आगे नज़र आती है.

लेकिन इन नजारों से अलग अब एक अमेरिकी थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट में बाक़ायदा ऐसे गानों को सूचीबद्ध कर दिया है, जो चिंताजनक तौर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को सुनियोजित तरीक़े से निशाना बनाते हैं.

दरअसल, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट (सीएसओएच) की नई रिपोर्ट, प्रॉफिटिंग फ्रॉम हेट म्यूजिक इस हवाले से एक ऐसी भयावह तस्वीर पेश करती है, जिसमें सीधे तौर पर हिंसा को बढ़ावा देने वाले 523 गानों का गहन अध्ययन किया गया है.

रिपोर्ट में जहां इन गानों के बोलों की छान-फटक की गई है, कोडेड लैंग्वेज पर रौशनी डाली गई है, वहीं गाने वालों की प्रोफाइलिंग के साथ-साथ इस पूरे कारोबारी मॉडल की संरचना पर बेहद गंभीर और नीतिगत सवाल उठाए गए हैं.

नफ़रत का कारोबार

असल में, रिपोर्ट जनवरी 2025 से जनवरी 2026 तक के उस डेटा का विश्लेषण करती है, जो यूट्यूब, स्पॉटिफाई, एप्पल म्यूजिक और मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी से लिया गया है.

ऐसे में अगर इसके व्यावसायिक मॉडल से ही बात शुरू करें तो इस कारोबार में सिंगर और उन्हें होस्ट करने वाले तमाम प्लेटफॉर्म प्रायोजित नफ़रत और हिंसा की आड़ में कमाई भी कर रहे हैं.

यूं देखें तो इन उल्लेखित डिजिटल माध्यमों से लोगों तक पहुंचने वाले (सिर्फ़ यूट्यूब पर इन गानों को 198 मिलियन से ज़्यादा बार देखा-सुना गया है) ये गाने जहां इन प्लेटफॉर्मों के अपने नियमों और गाइडलाइन का उल्लंघन करते हुए खुली हिंसा का आह्वान करते हैं, वहीं गीत-संगीत की पॉप शैली में ‘कॉन्सपिरेसी थ्योरी’ और ‘अमानवीय भाषा’ को इन माध्यमों में पूरी ताक़त से गढ़ते नज़र आते हैं.

यूट्यूब (210), मेटा म्यूजिक लाइब्रेरी (109), स्पॉटिफाई (103) और एप्पल म्यूजिक (101) के ये गाने – जिन्हें ‘हिंदुत्व पॉप हेट सॉन्ग्स’ (एच-पॉप) का नाम दिया गया है, में एक तरह से मुग़लों को विलेन के तौर पर पेश करते हुए हिंदुओं के साथ हुए ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का बदला आज के हिंदुस्तानी मुसलमानों से लेने को कहा गया है.

दरअसल, यहां गाने के बोल कथित ऐतिहासिक अत्याचारों का वर्णन करते हैं, और भारतीय मुसलमानों को उन अत्याचारों का उत्तराधिकारी बनाते हुए उनके ख़िलाफ़ हिंसा को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं.

लेकिन रिपोर्ट हमें यहां बताती है कि ये नफ़रत सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं है, बल्कि ईसाइयों और दूसरे गैर-हिंदू समुदायों को भी ‘धर्मांतरण’ के खतरे के रूप में पेश करते हुए ‘हिंदू राष्ट्र’ की कल्पना की गई है.

एक तरह से ये वही नैरेटिव है, जो मौजूदा सत्ता की सरपरस्ती में पाठ्यक्रम की किताबों से लेकर संघ के वैचारिक एजेंडे के तौर पर ‘धर्म परिवर्तन’ और ‘लव जिहाद’ के नाम पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.

बहरहाल, इन गानों में गैर-हिंदू समुदायों को ‘द अदर’ यानी ‘वो जो हमसे अलग हैं’ के ख़ाने में रखकर बहुसंख्यक कट्टरवाद और संघ के वैचारिक एजेंडे को पेश करने की खुली कोशिश की गई है.

उदहारण के तौर पर यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म की बात की जाए तो इसके 210 में से 106 गानों में इस बात की निशानदेही की गई है कि ये गैर-हिंदू समुदाय, ख़ास तौर पर मुसलमान हिंदुओं के लिए बड़ा ख़तरा हैं, और ये हिंदू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनका ‘धर्म परिवर्तन’ करते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़, ऐसे गानों को मिलियन में व्यूज़ मिले. इनमें वो गाने भी हैं जिनमें सीधे-सीधे हिंसा की बात नहीं की गई. हालांकि रिपोर्ट में चिंता ज़ाहिर की गई है कि आगे चलकर ये नफ़रत हिंसा की जगह भी ले सकती है.

हिंदुत्व प्रोपगैंडा!

इसी तरह कम से कम 7 गाने ऐसे हैं जो ‘हिंदू वर्चस्व’ के विचार को बढ़ावा देते हैं, और दावा करते हैं कि जहां आज इनकी (धार्मिक अल्पसंख्यकों की) मस्जिदें और दूसरे धार्मिक स्थल हैं, असल में उन पर हिंदुओं का हक़ है. ऐसे ही कुछ गानों में भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की बात भी दोहराई गई है.

रिपोर्ट ये भी बताती है कि ऐसे 46 गाने एक ही यूट्यूब चैनल ‘Sangam Dhun’ से लिए गए हैं. यहां रिपोर्ट इस तरह भी पड़ताल करती है कि इनमें हिंदुओं को ‘दुश्मनों’ पर हमला करने के लिए उकसाया गया है. और कथित तौर पर ये ‘दुश्मन’ मुसलमान हैं.

जैसा कि पहले ही कोडेड-लैंग्वेज की बात कही गई, तो हिंदुत्व पॉप गानों में बार-बार भाषा को बदलने की कोशिश नज़र आती है, जहां धार्मिक अल्पसंख्यकों को ‘सांप’, ‘टोपी वाले’, ‘देशद्रोही’ और ‘एंटी-नेशनल’ जैसे कोडेड-टर्म्स से संबोधित किया जाता है.

इसके पीछे प्लेटफॉर्म के नियमों से बचने की चालाकी तो है ही, और ये वही भाषा है जिसमें पीएम मोदी तक ‘हिंसा करने वालो को कपड़ों से पहचाने’ जाने की बात कर चुके हैं.

इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं है कि ये गाने कोडेड-टर्म्स में ही लिखे गए हैं. असल में यहां डायरेक्ट इन-डायरेक्ट सारे हरबे अपनाए गए हैं और मुसलमानों के लिए आम तौर से बोले जाने वाले अपमानजनक शब्द ‘कटवे’ का इस्तेमाल भी किया गया है. इस तरह इन गानों में कई बार साफ़-साफ़ संदेश देने की कोशिश की गई है कि, ‘जो मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक हिंदू वर्चस्व को तस्लीम नहीं कर सकते उन्हें भारत में रहने का कोई हक़ नहीं है.’

ऐसी ही एक और यूट्यूब चैनल की पड़ताल में बताया गया है कि इसके गानों में मुसलमानों से धर्म युद्ध तक की कल्पना की गई है, और हिंदुओं से इसमें बढ़-चढ़कर शामिल होने को कहा गया है.

इन गानों में भी सत्ताधारी दल और संघ का वही नैरेटिव नज़र आता है, जिसमें मुसलमानों को ‘जिहादी’ और ‘देशद्रोही’ जैसे खिताबों से संबोधित किया जाता है.

असल में इन गानों की वैचारिक पृष्ठभूमि यही है, जो ‘द अदर’ ख़ास तौर पर मुसलमानों के धार्मिक स्थलों को तोड़ना चाहती है और अपने ‘राष्ट्रवाद’ की भावना में ताज महल को ‘तेजोमहालय’ कहती आई है.

उकसावे की भाषा और विज्ञापन

बहरहाल, रिपोर्ट अपने विश्लेषण में हर दो में से एक गाने को सीधे-सीधे हिंसा के लिए उकसाने वाला बताती है. इस तरह ये 523 में से 263 गानों में सीधे-सीधे धमकी और हिंसा की बात को हमारे सामने रखती है, और बाक़ी के 260 गानों में भाषा की अभद्रता के बारे में बताती है.

इसी क्रम में ये जानकर थोड़ी हैरत ज़रूर होती है कि इन गानों के साथ 103 कंपनियों और संस्थानों के विज्ञापन भी दिखाए गए.

रिपोर्ट यहां इस बात को उजागर करती है कि यूट्यूब पर ही 78 प्रतिशत ऐसे वीडियो हैं, जो न सिर्फ़ प्लेटफॉर्म के नियमों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि 83 प्रतिशत वीडियो वो भी हैं जो हिंसा के लिए उकसाते हैं.

ऐसे में सवाल पैदा होता है कि जब इन गानों के साथ चैटजीपीटी, गूगल नोटबुकएलएम, अमेज़न प्राइम, एडोब, डेल, फ्लिपकार्ट और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) जैसी कंपनियों और संस्थानों के विज्ञापन दिखाए गए तो क्या ये सब सिर्फ़ इस कारोबारी मॉडल का हिस्सा महज़ थे या वो भी इस नफ़रत और हिंसा के प्रसार के साझेदार हैं. और क्या इसके लिए यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म ने अपनी ही गाइडलाइन को पूरी तरह से नज़र अंदाज़ किया.

मिसाल के तौर पर, ‘बाबा का बुलडोज़र’, शीर्षक वाले गाने के साथ डेल (Dell) का विज्ञापन दिखाया गया.

ग़ौरतलब है कि इस गाने में मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र कार्रवाई को जश्न और उत्सव के रूप में चित्रित किया गया है.

ऐसे ही ‘मुस्लिम बेटियों को अब हमारे घर ले आना है’ शीर्षक वाले गाने में लेवाइस (Levi’s) का विज्ञापन दिखाया गया. इस गाने के बोल हैं; ‘लव जिहाद क्या होता है अब तुमको ये समझाना है, मुस्लिम बेटी को बहू बनाकर अब अपने घर लाना है.’

रिपोर्ट के मुताबिक़, ये गाना महिलाओं को हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच ‘धार्मिक और डेमोग्राफिक वॉर’ में ‘ट्रॉफी’ की तरह चित्रित करता है, और हिंदू राष्ट्रवाद के उस विचार को भी पेश करता है जहां मुस्लिम महिलाओं को पीड़ित के तौर पर ‘मदद और उद्धार’ की ज़रूरत है और उसी समय वो ‘सेक्सुअल डिजायर’ यानी यौन आकांक्षा की कोई वस्तु भी है.

गाने में इस काम को ‘नेक मक़सद’ के टोन और लहजे में बयान किया गया है, जिसके तहत मुस्लिम महिलाओं का ‘सभ्य हिंदू समाज’ में ‘घर वापसी’ करवाना ज़रूरी है.

ऐसे ही ‘जो गौ माता ने काटे हम उनने काटेंगे’ शीर्षक वाले गाने में आरबीआई का विज्ञापन दिखाया गया, जो रिपोर्ट के मुताबिक़ मुसलमानों और दलितों की लिंचिंग के लिए खुले तौर पर उकसाता है.

रिपोर्ट यहां बताती है कि इस तरह की नफ़रत और हिंसा भड़काने वाले 55 प्रतिशत गानों के लिए यूट्यूब का ‘सुपर थैंक्स’ फीचर भी एक्टिव था.

बता दें कि इस फीचर का इस्तेमाल करते हुए दर्शक वीडियो बनाने वालों को पैसे भेजकर उनकी आर्थिक मदद कर सकते हैं.

ऐसे ही मयूर म्यूज़िक चैनल, जिस पर 25 गाने चिह्नित किए गए, को यूट्यूब का सिल्वर बटन भी मिला हुआ है. सवाल है कि ऐसे चैनल किस तरह फल-फूल रहे हैं कि यूट्यूब को उन्हें इस तरह से भी सम्मानित करना पड़ रहा है.

बहरहाल, इस कारोबारी मॉडल को इस तरह भी समझा जा सकता है कि रिपोर्ट में मेटा (फेसबुक) पर जिन 30 बड़े हिंदुत्व पॉप सिंगर का अध्ययन किया गया, उनमें से 20 का फेसबुक अकाउंट मॉनिटाइज़ था.

शिकायतों की अनदेखी

ऐसा नहीं है कि इस सिलसिले में शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश नहीं की गई. रिपोर्ट के मुताबिक़ अक्टूबर 2025 में 225 गानों (जो डेटा का 43 प्रतिशत हैं) के बारे में चार ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों से शिकायत की गई और बताया गया कि ये गाने प्लेटफॉर्म की नीतियों का उल्लंघन करते हैं.

लेकिन मई 2026 तक 225 में से 207 गाने (92 प्रतिशत) अब भी प्लेटफॉर्म पर मौजूद हैं. गोया कि सिर्फ़ 18 गानों पर कार्रवाई की गई.

रिपोर्ट में बताया गया है कि यूट्यूब और मेटा की तुलना में स्पॉटिफाई और एप्पल म्यूजिक में रिपोर्टिंग टूल्स अपेक्षाकृत कमज़ोर और पेचीदा हैं, और किसी तरह से शिकायत की भी जाती है तो एक शिकायत दर्ज करने में 33 मिनट से ज़्यादा का समय लगता है.

इसके बावजूद अगर किसी तरह चैनल बंद भी कर दिए जाते हैं, तो नए चैनल बना लिए जाते हैं.

रिपोर्ट में इसकी मिसाल देते हुए बताया गया है कि गायक संदीप आचार्य के अकाउंट को कम से कम तीन बार सस्पेंड किया गया, इसके बावजूद उनके 26 में से 21 गाने दूसरे यूट्यूब चैनलों पर उपलब्ध हैं.

बहरहाल, रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि इन प्लेटफॉर्मों के अलावा 103 गानों का इस्तेमाल करके 59 लाख से ज़्यादा इंस्टाग्राम रील बनाई गई.

हालांकि ये आंकड़े इस रिपोर्ट की झलकियां महज़ हैं, वरना रिपोर्ट में इस नफ़रत के चौतरफ़ा जाल को बड़ी महारत से पेश किया गया है.

कुलमिलाकर, इन पॉप गानों में जहां मुसलमानों को ‘देशद्रोही’, ‘आतंकवादी’ और ‘दुश्मन’ कहा गया है, वहीं ‘काले सांप’ की संज्ञा देते हुए इन्हें पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी जोड़ा गया है. और तो और रोहिंग्या के इर्द-गिर्द चलने वाले नैरेटिव को भी यहां इस्तेमाल किया गया है.

बात यहीं ख़तम नहीं होती कि रिपोर्ट में ऐसे गाने का भी तज़्किरा है जो गाज़ा में इज़राइल की सैन्य कार्रवाई को महिमामंडित करता है और भारतीय मुसलमानों के साथ इसी तरह के बर्ताव की वकालत करता है.

ऐसे में समझ में आता है कि मुसलमानों से नफ़रत कितनी गहरी हो चुकी है और इसके कारोबारी मॉडल की पहुंच कितनी तेज़ रफ़्तार है.

मिसाल के तौर पर, 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले की ही बात करें, तो हमले के कुछ ही घंटों में हिंदुत्व पॉप सिंगर्स ने मुसलमानों को निशाना बनाते हुए कई गीत अपलोड किए.

रिपोर्ट बताती है कि ऐसे ही 5 गाने मई 2026 तक यूट्यूब पर 11 लाख से ज़्यादा व्यूज़ हासिल कर चुके थे.

इस सिलसिले में ‘पहले धर्म पूछा’ शीर्षक वाले कवि सिंह के गाने में कहा गया है कि हिंदू सेकुलर बने रहने की कोशिश करते हैं, जबकि मुसलमान हिंदुओं के ख़िलाफ़ साज़िश करने से बाज़ नहीं आते.

एक तरह से इसमें हिंदुओं की ‘बेहिसी’ का मज़ाक उड़ाया गया है. उल्लेखनीय है कि ये गाना हमले के अगले दिन अपलोड किया गया, और उस वक़्त से इसको 3,55,000 से ज़्यादा व्यूज़ मिल चुके हैं.

इसी तरह कई और गाने हमले के बाद अपलोड किए गए, जहां हिंदू होना ‘अपराध बन गया है’ और हत्याओं का बदला लेने की ‘अब हमारी बारी है’ जैसे भड़काऊ गानों ने भी ख़ूब व्यूज़ हासिल किए.

एक तरफ सेंसरशिप, दूसरी तरफ हिंसक भाषा को बढ़ावा

यहां, सवाल बहुत सारे हैं, जिन्हें रिपोर्ट में उठाया भी गया है. लेकिन मैं इन प्लेटफॉर्मों के किरदार और सरकार एवं उसके तंत्र की जवाबदेही के विचार से अलग सोच रहा था कि गीत-संगीत कभी प्रतिरोध का सबसे जीवंत माध्यम थे, और क्या ये सच में इस पैमाने पर नफ़रत और हिंसा का माध्यम बन सकते हैं.

ऐसे में इस रिपोर्ट को जारी करने वाले सीएसओएच के कार्यकारी निदेशक रकीब नाइक के इस बयान पर नज़र पड़ी कि,‘हेट म्यूजिक सामूहिक हिंसा के सबसे पुराने और सबसे खतरनाक साधनों में है, और हमने देखा है कि ये रवांडा से लेकर म्यांमार तक हमें कहां तक ले जा सकता है.’

वो ये भी जोड़ते हैं कि, ‘भारत के हिंदुत्व पॉप के बारे में सबसे चिंताजनक बात इसकी व्यापक पहुंच है. ये कंपनियां और प्लेटफॉर्म, जो ज़्यादातर अमेरिका में स्थित हैं, ने इन कलाकारों को एक वैश्विक मंच, करोड़ों दर्शकों तक पहुंच और ज़्यादा से ज़्यादा कंटेंट क्रिएट करने के लिए उपकरण और राजस्व स्रोत प्रदान किए हैं.’

इसके साथ ही यहां मैं अगर इस रिपोर्ट के सह-लेखक कुणाल पुरोहित की बात को दोहराना चाहूं तो कह सकता हूं कि, ‘हिंदुत्व पॉप म्यूजिक, आकर्षक धुनों और ज़हरीले गीतों के मेल से भारतीयों को कट्टरपंथी बनाने और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा भड़काने के सबसे शक्तिशाली हथियारों में से एक बनकर उभरा है.’

यहां उनकी ये चिंता भी समझ में आती है कि, ‘अमेरिकी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जहां एक तरफ़ मोदी सरकार की मामूली-सी भी आलोचना करने वाली सामग्री को सेंसर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ वो भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा का आह्वान करने वाली सामग्री को बढ़ावा दे रहे हैं, संरक्षण दे रहे हैं और उसके लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराया जा रहा है.’

ऐसे में रवांडा और म्यांमार के इतिहास को देखते हुए रूह कांप जाती है कि इस हेट म्यूजिक के जाने क्या-क्या नतीजे हो सकते हैं? और क्या हमारी सरकार समय रहते कोई एहतियाती कदम उठाएगी.

हालांकि, असल सवाल ये है कि जिस तरह रेडियो रवांडा नरसंहार के दौरान हिंसा भड़काने और उसको दिशा देने वाला एक शक्तिशाली हथियार बन गया था, तो क्या आज के भारत में भी ये डिजिटल प्लेटफॉर्म (किसी हद तक मीडिया के उस वर्ग को भी इसमें शामिल किया जा सकता है जो हिंसक और विभाजनकारी विमर्श को बढ़ावा देते हैं) धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ उसी तरह की कोई भूमिका निभाने की संभावना अपने भीतर रखते हैं?