पूर्व संपादक के वोटर लिस्ट में न होने, पासपोर्ट रिन्यू न किए जाने पर विपक्ष ने कहा- न्याय का घोर उल्लंघन

द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने और उसी आधार पर उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण को रोक दिए जाने पर चिंता जताते हुए विपक्षी नेताओं ने कहा कि यह मामला संवैधानिक प्रक्रिया, क़ानूनी नियमों और क़ानून के शासन को लेकर बुनियादी सवाल खड़े करता है. कुछ नेताओं ने इसे लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखे हैं.

टेलीग्राफ के पूर्व एडिटर आर. राजगोपाल और भारतीय पासपोर्ट, साथ ही उन लोगों का ज़िक्र जिनके नाम पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न के दौरान हटा दी गई है. इलस्ट्रेशन: द वायर, कैनवा. (फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स, पीटीआई)

नई दिल्ली: वरिष्ठ पत्रकार और द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने और उसी आधार पर उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण को रोक दिए जाने पर कई विपक्षी नेताओं ने गहरा आश्चर्य और चिंता व्यक्त की है. उन्होंने इस संबंध में केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकारों को पत्र भी लिखे हैं. ज्ञात हो कि यह मामला तब सामने आया जब राजगोपाल ने खुद अपनी परेशानी को सार्वजनिक किया.

इस बीच, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के साथ मिलकर राजगोपाल को पासपोर्ट न देने पर हैरानी जताई है. साथ ही, यह भी बताया कि एक अन्य पत्रकार सम्राट चौधरी को भी पुलिस की प्रतिकूल रिपोर्ट के आधार पर पासपोर्ट नहीं दिया गया है.

वहीं, सोमवार (29 जून) को माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पत्र लिखकर राजगोपाल के मामले को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि यह मामला संवैधानिक प्रक्रिया, कानूनी नियमों और कानून के शासन को लेकर बुनियादी सवाल खड़े करता है.

अपने पत्र में उन्होंने लिखा, ‘यह मामला वरिष्ठ पत्रकार और द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक राजगोपाल रामदास के पासपोर्ट के नवीनीकरण से इनकार किए जाने से जुड़ा है. इसका एकमात्र आधार पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जाना बताया गया है, जबकि उन्हें भारत सरकार ने 2005 में भारतीय पासपोर्ट जारी किया था, 2015 में उसका नवीनीकरण भी किया गया था और तब से उनकी पहचान, माता-पिता का विवरण, पता या राष्ट्रीयता में कोई बदलाव नहीं हुआ है.’

ब्रिटास ने कहा, ‘क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय से जारी सूचना में कथित तौर पर केवल एक प्रतिकूल तथ्य का ज़िक्र है- एसआईआर के कारण मतदाता सूची से नाम हटाया गया.’

उन्होंने लिखा, ‘अगर वास्तव में पासपोर्ट नवीनीकरण रोकने का यही एकमात्र आधार है, तो इस मामले पर तत्काल पुनर्विचार होना चाहिए. यह केवल एक नागरिक का मामला नहीं है, बल्कि ऐसा उदाहरण बन सकता है जिसका असर पूरे देश में पासपोर्ट प्रशासन पर पड़ेगा.’

गौरतलब है कि राजगोपाल का मामला विदेश मंत्रालय के उस बयान के कुछ ही दिनों बाद सामने आया है जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट एक ‘यात्रा दस्तावेज़’ है, न कि नागरिकता का सबूत.

ब्रिटास ने कहा कि भले ही मंत्रालय का कहना है कि पासपोर्ट ‘नागरिकता का ठोस सबूत’ नहीं है, लेकिन इसे जारी करना पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत पासपोर्ट अथॉरिटी का एक कानूनी फ़ैसला है. इसलिए किसी अन्य कानून के तहत किसी दूसरी संस्था द्वारा किए गए अस्थायी प्रशासनिक निष्कर्ष के आधार पर इसे महत्वहीन नहीं माना जा सकता.

उन्होंने कहा, ‘अगर धोखाधड़ी, तथ्य छिपाने, गलत जानकारी देने या कानून के तहत अन्य आधार मौजूद हों, तो ऐसे फ़ैसले की समीक्षा या उसे रद्द किया जा सकता है. लेकिन जब तक पासपोर्ट अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ऐसा नहीं किया जाता, तब तक इसे ऐसे नहीं माना जा सकता मानो वह कभी अस्तित्व में ही नहीं था.’

ब्रिटास ने इस मुद्दे को केवल एक व्यक्ति का मामला न बताते हुए कहा कि यह भारत गणराज्य द्वारा जारी संप्रभु दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता से जुड़ा व्यापक संवैधानिक सवाल है. उन्होंने मंत्रालय से आग्रह किया कि वह पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अनुसार इस मामले पर पुनर्विचार करे, न कि किसी अन्य कानूनी व्यवस्था के प्रशासनिक निष्कर्ष के आधार पर.

उन्होंने कहा कि इस तरह की स्पष्टता न केवल इस मामले में न्याय सुनिश्चित करेगी, बल्कि उन अनगिनत नागरिकों को भी बहुत ज़रूरी भरोसा और निश्चितता देगी, जिन्हें दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं को गलत तरीके से एक-दूसरे से जोड़ने के कारण ऐसी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

इस मुद्दे पर चिंता जताने वाले ब्रिटास अकेले विपक्षी नेता नहीं थे.

केरल के मुख्यमंत्री ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा

इस बीच, केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने पश्चिम बंगाल के अपने समकक्ष सुवेंदु अधिकारी को पत्र लिखकर सरकार से आग्रह किया है कि वे इस बात पर विचार करें कि राजगोपाल एक ‘जाने-माने पत्रकार हैं जो पिछले तीन दशकों से कोलकाता में रह रहे हैं’ और वे प्रोफेसर वी. रामदास के बेटे भी हैं, जिन्होंने केरल में गांधी स्मारक निधि के राज्य सचिव के रूप में काम किया था.


उन्होंने लिखा, ‘मुझे जानकारी मिली है कि प्रतिकूल रिपोर्ट का आधार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जाना है. मतदाता सूची से जुड़ा मामला अपील की प्रक्रिया में है, लेकिन पुलिस रिपोर्ट के कारण उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण में देरी हो रही है.’

अन्य विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपने एक्स हैंडल पर सतीशन का पत्र साझा करते हुए इस पूरी घटना को ‘न्याय का घोर उल्लंघन’ बताया.

शशि थरूर ने भी कहा, ‘यह एक मुख्यमंत्री द्वारा दूसरे मुख्यमंत्री को किया गया महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है. बेशक, इसका जवाब यही मिलेगा कि यह केंद्र सरकार का मामला है और राज्य सरकार इसे नहीं देख सकती. लेकिन सच तो यह है कि जब भी न्याय में ऐसी भारी गड़बड़ी होती है, तो सभी लोकतांत्रिक भारतीयों को पीड़ितों के समर्थन में एकजुट होना चाहिए, ताकि जल्द से जल्द कोई उचित समाधान निकल सके. ऐसे मामले (एसआईआर अधिकारियों की समझ की कमी वाले और भी मामले सामने आए हैं) सरकार के लिए बेवजह शर्मिंदगी का कारण बनते जा रहे हैं.’

तृणमूल कांग्रेस की सांसद और पूर्व पत्रकार सागरिका घोष ने इस घटना को ‘चौंकाने वाला’ और ‘दिल दहला देने वाला’ कहा था और साथ ही इस मुद्दे पर मुख्यधारा की मीडिया की चुप्पी पर सवाल उठाया. ‘अगर यह आर. राजगोपाल जैसे प्रतिष्ठित पत्रकार और द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक के साथ हो सकता है, तो कल्पना कीजिए कि सीमित संसाधनों वाले आम नागरिक किन परिस्थितियों से गुजर रहे होंगे.’ उनका कहना था.

उन्होंने आगे लिखा, ‘यही नागरिकता के बुनियादी अधिकारों के धीरे-धीरे क्षरण का वास्तविक स्वरूप है. इससे भी अधिक चिंताजनक मुख्यधारा की मीडिया के एक बड़े हिस्से की चुप्पी है. ऐसी परेशान करने वाली घटनाओं को नज़रअंदाज़ क्यों किया जा रहा है?’

इससे पहले रविवार को सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी ने भी एक्स पर पोस्ट करके इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की आलोचना की.

उन्होंने लिखा, ‘शुरुआत से ही सीपीआई (एम) ने चेतावनी दी थी कि एसआईआर प्रक्रिया से देश के गरीब और कमज़ोर वर्गों के वोट देने का अधिकार छिन जाएगा. लेकिन अब, आर. राजगोपाल जैसे जाने-माने संपादक और मशहूर पत्रकार को भी वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है.’

एक और वरिष्ठ पत्रकार का पासपोर्ट भी रोका गया

सोमवार को जारी अपने बयान में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने राजगोपाल का नाम मतदाता सूची में बहाल करने और उनका पासपोर्ट लौटाने की मांग करते हुए यह भी बताया कि वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सम्राट चौधरी भी पासपोर्ट से वंचित कर दिए गए हैं.

प्रेस क्लब के अनुसार, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु के कई समाचारपत्रों के पूर्व संपादक रहे चौधरी का पासपोर्ट इसी महीने एक प्रतिकूल पुलिस सत्यापन रिपोर्ट के आधार पर जब्त कर लिया गया.

शिलांग में जन्मे चौधरी का कहना है कि उनके पास 1993 से भारतीय पासपोर्ट है और उनका नाम मेघालय की मतदाता सूची में दर्ज है. उन्हें 2022 में तत्काल श्रेणी के तहत पासपोर्ट का नवीनीकरण भी मिला था, जिसमें पासपोर्ट जारी होने के बाद पुलिस सत्यापन किया जा सकता है.

प्रेस क्लब ने कहा कि भारतीय नागरिकता पर संदेह करने का कोई कारण उन्हें नहीं बताया गया और यह भी उल्लेख किया कि 24 जून, यानी पासपोर्ट सेवा दिवस के दिन, अधिकारियों ने उनका पासपोर्ट अपने कब्जे में ले लिया.