सुप्रीम कोर्ट का आसाराम की पॉक्सो सज़ा पर रोक लगाने और ज़मानत देने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयंभू बाबा आसाराम की सज़ा पर रोक लगाने या इस स्तर पर उन्हें ज़मानत देने पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले को किसी अन्य आपराधिक मामले की तरह नहीं देख सकते. अगर मेडिकल ज़मानत दी जानी है, तो वह तभी दी जाएगी जब उनकी जान को ख़तरा हो.

आसाराम. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (30 जून) को स्वयंभू बाबा आसाराम की सज़ा पर रोक लगाने या इस स्तर पर उन्हें ज़मानत देने पर विचार करने से इनकार कर दिया.

हालांकि, अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें 2013 में जोधपुर आश्रम में एक नाबालिग के यौन उत्पीड़न के लिए उन्हें दोषी ठहराया गया था.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने वाली आसाराम की याचिका पर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया. लेकिन कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि राज्य का पक्ष सुने बिना और जब तक उनकी मेडिकल कंडीशन से जान को गंभीर ख़तरा न हो, तब तक कोई अंतरिम राहत नहीं दी जाएगी.

पीठ ने कहा, ‘हम अभी ज़मानत नहीं दे रहे हैं. राज्य का पक्ष सुनने के बाद हम इस बात पर विचार करेंगे कि क्या ज़मानत देने की कोई गंभीर ज़रूरत है, जैसे कि उनकी जान को ख़तरा हो.’

अदालत ने फ़िलहाल सज़ा पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया. अदालत ने कहा, ‘हम सज़ा पर रोक लगाने पर विचार नहीं कर रहे हैं.’

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा, ‘हम आम स्वास्थ्य समस्याओं पर विचार नहीं करेंगे. अगर मेडिकल ज़मानत दी जानी है, तो वह तभी दी जाएगी जब आपकी जान को खतरा हो. हम सिर्फ़ इसी बात पर विचार करेंगे.’

पीठ ने कहा कि यह अदालत इस मामले को किसी अन्य आपराधिक मामले की तरह नहीं देख सकता.

राज्य को तीन हफ़्ते के अंदर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए पीठ ने आदेश दिया कि जेल में आसाराम को अभी जो मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं, वे जारी रहनी चाहिए. अदालत ने उन्हें यह छूट भी दी कि अगर उनकी सेहत बिगड़ती है, तो वे मामले की जल्द सुनवाई की मांग कर सकते हैं.

अदालत ने आगे कहा, ‘अगर जान बचाने के लिए बहुत ज़रूरी हुआ, तो हम छूट दे सकते हैं और देरी नहीं करेंगे. लेकिन हम राज्य का पक्ष सुनेंगे. हमें न्याय करना है.’

आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दामा शेषद्रि नायडू ने अदालत से उनकी ज़्यादा उम्र और स्वास्थ्य स्थिति पर विचार करने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि आसाराम, जो अब 80 साल से ज़्यादा के हैं, कई बीमारियों से जूझ रहे हैं. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उन्हें दोषी ठहराए जाने का फ़ैसला ‘सोशल मीडिया ट्रायल’ से प्रभावित था.

किसी भी तरह की अंतरिम राहत का विरोध करते हुए राज्य और पीड़ित की ओर से पेश वकीलों ने बताया कि इस मामले में पीड़ित नाबालिग है और आसाराम को ज़रूरत पड़ने पर हमेशा मेडिकल इलाज मिला है. राज्य ने अदालत को बताया कि उन्हें इस महीने की शुरुआत में अस्पताल ले जाया गया था और जान को ख़तरा पहुंचाने वाली कोई स्थिति नहीं पाई गई थी.

गौरतलब है कि आसाराम बलात्कार के दो मामलों में दोषी है और 31 अगस्त 2013 से जेल में है. उस पर पॉस्को कानून और अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप हैं.

जनवरी 2023 में गांधीनगर की सेशंस कोर्ट ने आसाराम को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने पाया था कि उन्होंने 2001 से 2006 के बीच अपने मोटेरा आश्रम में 16 वर्षीय लड़की के साथ कई बार बलात्कार किया. उसे भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था, जिनमें बलात्कार, अप्राकृतिक अपराध, गलत तरीके से बंदी बनाना, धमकाना, हमला करना या किसी को रोकने के लिए बल प्रयोग करना और छेड़छाड़ शामिल हैं.

इसके साथ ही गांधीनगर की एक अदालत ने आसाराम के खिलाफ 2013 में दर्ज एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उस पर अहमदाबाद के पास मोटेरा स्थित अपने आश्रम में 2001 से 2006 के बीच सूरत की रहने वाली एक महिला अनुयायी का कई बार यौन उत्पीड़न करने का आरोप है.

उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 376 2 (सी) (बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध), 342 (गलत तरीके से हिरासत में रखना), 354 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 357 (किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंधक बनाने के प्रयास में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया गया था.

गौरतलब है कि दोषसिद्धि से पहले आसाराम एक प्रमुख धार्मिक नेता माने जाते थे. उसने 1970 के दशक में अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे अपना पहला आश्रम बनाया था और बाद में करोड़ों रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया.