नई दिल्ली: गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक निवासी को ‘विदेशी’ घोषित करने वाले विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) के फ़ैसले को सही ठहराया है, जबकि उस व्यक्ति ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 अलग-अलग दस्तावेज़ जमा किए थे.
विदेश मंत्रालय द्वारा कुछ दिन पहले यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, असम के 38 वर्षीय एक निवासी 15 अन्य दस्तावेज़ों के आधार पर यह साबित नहीं कर सके कि वे विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रिकॉर्ड में पाई गई विसंगतियों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें एक व्यक्ति को ‘विदेशी’ घोषित किया गया था. यह फैसला तब भी कायम रखा गया, जबकि उस व्यक्ति ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड, मतदाता फोटो पहचान पत्र सहित कई दस्तावेज़ प्रस्तुत किए थे और मौखिक गवाही भी दी थी.
जस्टिस कल्याण राय सुराना और शमीमा जहां की पीठ ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति की मौखिक गवाही इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वही व्यक्ति 1990 के दशक की मतदाता सूचियों या बाद के सरकारी अभिलेखों में दर्ज नाम वाला व्यक्ति है.
अदालत ने 30 जून के अपने आदेश में कहा, ‘हालांकि याचिकाकर्ता ने 15 दस्तावेज़ पेश किए थे, लेकिन इनसे यह साबित करने में कोई मदद नहीं मिली कि वह ‘फॉरेनर्स एक्ट, 1946’ की धारा 9 के तहत अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर पाया है कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है.’
इस धारा के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता पर संदेह हो, तो उसे खुद यह साबित करना होता है कि वह भारतीय नागरिक है.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता अमीनुल हक को कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) ज़िले के गुवाहाटी स्थित विदेशी न्यायाधिकरण ने 28 फरवरी, 2019 के एक आदेश में विदेशी घोषित किया था.
याचिकाकर्ता, जो किराए के एक मकान में रहने वाला दिहाड़ी मजदूर है, ने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी ने जांच के बाद पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके आधार पर विदेशी न्यायाधिकरण ने उसे विदेशी घोषित कर दिया.
इसी आदेश (दिनांक 28 फरवरी 2019) को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. उन्होंने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेज पेश किए, इनमें 1951 की राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) की प्रति, जिसमें उनके पिता और दादा-दादी के नाम दर्ज थे, मतदाता पहचान पत्र कार्ड, स्कूल प्रमाणपत्र और वर्ष 1973 की मूल भूमि खरीद रजिस्ट्री शामिल थी. उनका दावा था कि ये दस्तावेज़ साबित करते हैं कि वे भारतीय नागरिक हैं.
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, याचिकाकर्ता ने कहा कि उनके नाम चराई खसारा गांव के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) 1951 में दर्ज हैं. उन्होंने दावा किया कि 56-57 साल पहले नदी के कटाव के कारण उसके परिवार को चराई खसारा से धोबाकुरा गांव जाना पड़ा था, और उनके नाम मतदाता सूचियों में दर्ज होते रहे.
याचिकाकर्ता ने आगे बताया कि 1973 में उनके दादा ने घुगुडोबा में जमीन खरीदी. बाद में परिवार के बंटवारे के बाद उनके माता-पिता वहीं रहने लगे. उन्होंने यह भी कहा कि नामों की वर्तनी (स्पेलिंग) में मामूली अंतर होने के बावजूद उनके नाम बाद की मतदाता सूचियों में दर्ज रहे.
1 मई, 1988 को जन्मे याचिकाकर्ता का कहना था कि उसका जन्म और पालन-पोषण घुगुडोबा और बाद में हाशडोबा में हुआ था. उन्होंने अपनी पहचान साबित करने के लिए स्कूल सर्टिफिकेट, पैन कार्ड और मतदाता फोटो पहचान पत्र पेश किया.
उनका तर्क था कि उनके परिवार के नाम लगातार मतदाता सूचियों में दर्ज रहे हैं और उनके पिता, माता और दादा के नामों की अलग-अलग दस्तावेज़ों में जो अलग-अलग स्पेलिंग दर्ज है, वे सभी एक ही व्यक्ति को दर्शाती हैं. इसलिए केवल स्पेलिंग के अंतर के आधार पर उनकी भारतीय नागरिकता के दावे को खारिज नहीं किया जाना चाहिए.
द हिंदू के अनुसार, एक पुराने फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भारत में निवास साबित करने के लिए पेश किया गया एनआरसी का अंश सबूत के तौर पर मान्य नहीं है. कोर्ट ने पाया कि हक द्वारा पेश की गई 1951 की एनआरसी की कॉपी बिना किसी सर्टिफ़िकेट के सिर्फ़ कंप्यूटर से निकाला गया प्रिंटआउट थी, जबकि एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65B के तहत सर्टिफ़िकेट ज़रूरी है.
अदालत ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता के कथित दादा द्वारा खरीदी गई भूमि की बिक्री विलेख (सेल डीड) को भी न्यायाधिकरण ने खारिज कर दिया था, क्योंकि इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं था कि क्या वह ज़मीन असल में मौजूद है या नहीं और वह ज़मीन याचिकाकर्ता के दादा के कानूनी वारिसों को क्यों नहीं मिली.
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि न्यायाधिकरण ने दस्तावेज़ों और साक्ष्यों का मूल्यांकन करते समय कोई स्पष्ट कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि की थी.
गौरतलब है कि विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) अर्ध-न्यायिक निकाय हैं, जो संदिग्ध विदेशियों के मामलों का फैसला 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख के आधार पर करते हैं. यह तारीख 1985 के असम समझौते में नागरिकता निर्धारण के लिए तय की गई थी. यह समझौता मुख्यतः नवगठित बांग्लादेश से आए कथित ‘अवैध प्रवासियों’ के खिलाफ छह वर्षों तक चले आंदोलन के बाद हुआ था.
वर्ष 2025 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली असम सरकार ने इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) अधिनियम, 1950 के प्रावधानों का उपयोग शुरू किया. इसके तहत सरकार ने कुछ मामलों में विदेशी न्यायाधिकरणों की प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए जिन लोगों को ‘विदेशी’ माना गया, उन्हें सीधे बांग्लादेश वापस भेजने (पुश बैक) की कार्रवाई शुरू की.
