‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी कालजयी कविता लिखने वाले निराला ने 1952 में यानी आज से लगभग पचहत्तर बरस पहले पुण्यनगर इलाहाबाद में रहते हुए एक गीत लिखा था जो उनके संग्रह ‘आराधना’ में संकलित है. उसकी आरंभिक पंक्तियां हैं:
राम के हुए तो बने काम,
संवरे सारे धन, धान, धाम.
समापन इन पंक्तियों से होता है:
वह सूर्यवंश सम्भूत तभी,
जीवन की जय का सूत तभी,
कृष्णार्जुन हारण पूत तभी
जो चरण विचार बिना दाम.
इधर राम मंदिर में हुई चोरी-डकैती-ग़बन के सिलसिले में मुझे यह कविता याद आई. राम के होने से काम तो बनता है सारे धन, धान और धाम संवर जाते हैं. पर कवि समापन में राम के होने की कुछ शर्तें बता रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं ‘जो चरण विचारण बिना दाम;’ अगर राम अपने चरण विचारण के लिए दाम लेने लगे तो फिर वह राम नहीं.
जो विवाद चल रहा है उसमें झगड़ा धन का यानी दाम का है. दाम लेना, किसी भी रूप में, उसे श्रद्धा से दिया चढ़ावा भी, राम को अवमूल्यित करना है. जहां धन होगा वहां झंझट, चोरी-चकारी होगी यह सामान्य विवेक है.
मैथिली शरण गुप्त ने अपनी एक कविता में कहा: ‘तुम निरखो, हम नाट्य करें/राम, तुम्हारी रंगभूमि में कहो कौन सा रूप धरें?’ तो अब राम की नई रंगभूमि में, जिसे बिना किसी प्रमाण सिर्फ़ आस्था के तर्क से, उनकी जन्मभूमि कहा जाता रहा है, कुछ रामभक्तों ने पूरी आस्था के साथ, चोर-डाकू-ग़बनकर्ता का रूप धरा है तो राम उन्हें एकटक देख ही रहे होंगे. इस निगरानी ने उन्हें अपने काम या कार्रवाई से रोका नहीं- राम के यहां अब सब चलता है.
दिलचस्प यह है कि राम मंदिर में हुए साफ़-साफ़ भ्रष्टाचार को लेकर रामभक्तों की अन्यथा बात-बात में आक्रामक होने वाली फ़ौज़ चुप है. ऐसा नहीं लगता कि सदमे में है; वह राम के नाम पर ऐसे भ्रष्टाचार को अनदेखा कर रही है.
जो राम जन्मभूमि आंदोलन और उससे हुए खून-ख़राबे का राजनीतिक लाभ उठाकर सत्ता में आए वे प्राणप्रतिष्ठापक, साष्टांग दण्डवत् करने वाले राजनेता चुप हैं. शायद अब यह धारणा बन गई है कि राम अपने मंदिर की चिंता और देखभाल स्वयं करने में सक्षम हैं, हमें चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है.
यह कहावत तो पुरानी है: ‘रामजी की चिड़िया-राम जी का खेत’. तो चिड़िया रामभक्त का नाम सार्थक करते हुए रामजी का खेत चुग रही है. ‘धन धान धाम’ संवर गए तो अब राम का क्या काम! उन्हें धनपिशाचों के बीच निहत्था छोड़ दिया गया है.
मोहन भागवत ने राम मंदिर की जिस दिन प्राणप्रतिष्ठा हुई, उसे भारत का असली स्वतंत्रता दिवस बताया था. तब समझ में नहीं आया. अब आ रहा है कि उनका आशय प्रबंधक-चौकीदार रामभक्तों को चोरी आदि करने की स्वतंत्रता से था. ज़ाहिर है यह स्वतंत्रता की अधिक समावेशी अवधारणा है: जिस स्वतंत्रता में चोरी करने की स्वतंत्रता शामिल न हो वह अधूरी स्वतंत्रता ही मानी जाएगी!
तुलसीदास भी कह गए हैं: ‘परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ.’
जो एक शहर था
एक ही सरकारी मकान में लगभग बीस बरस रहने के बाद मैंने 1992 के जून में भोपाल छोड़ा था और उसे छोड़े और दिल्ली में बसे अब 34 वर्ष हो चुके हैं. इस बीच भोपाल जाना बहुत कम हो गया है. पिछले लगभग एक सप्ताह एक पारिवारिक आयोजन के सिलसिले में वहां वक़्त बिताने का सुयोग हुआ. ज़्यादा कहीं गया नहीं अपनी बहनों और भाई के यहां ही रहा आया. एक तो गरमी बहुत थी, दूसरे अब पुराने मित्र बचे नहीं. जो थोड़े से हैं उनमें से कुछ कृपापूर्वक उदयन के यहां ही आ गए और कम से कम दो शामें गपशप में बीतीं.
लौटते हुए मुझे लगता रहा कि सागर के बाद यह दूसरा शहर है जिसे अब मैं गंवा चुका. जो भोपाल मैंने छोड़ा था वह अब भी है लेकिन कुछ छुप-सा गया है. शहर अब भी हरा-भरा है लेकिन वह कई तरफ़ बढ़ गया है. अब पूरा शहर शहर कम, एक बड़ा चमकता-दमकता बाज़ार लगता है. रिहाइशें दुकानों के पीछे दबी-सी हैं. बहुत कुछ अधबना सा है, बहुत कुछ खुदा हुआ है, बहुत कुछ बहुत तेज़ी से हांफते हुए भाग-सा रहा है.
समय के साथ शहर बदलते हैं. कुछ तो इतना बदल जाते हैं कि असली शहर ग़ायब ही हो जाता है. लंदन, पेरिस, क्राकोव आदि शहर कई बार गया हूं- वहां लंबे अरसे ठहरा भी हूं. अब कभी जाता हूं तो वे बदले तो हैं, कुछ अधिक जनाकीर्ण हो गए हैं, पर वे अब भी लंदन, पेरिस, क्राकोव अदम्य रूप से बने हुए हैं.
भोपाल में तथाकथित न्यू मार्केट चौहत्तर बंगले के पास अब भी है. हम अक्सर पैदल ही वहां सौदा-सुलुफ़ लेने जाते थे. कम से कम दो बार मेरी बेटी दूबी यूं ही, जब वह तीन बरस की थी तो बंगले का गेट खोलकर या उसके नीचे से सरककर इसी न्यू मार्केट तक अकेले चली गई थी. लेकिन हम दोनों बार उसे खोज और सकुशल पा सके थे. इस बार अपने पोते-नातिन को हम भोपाल की विख्यात टॉप एन टाउन आइसक्रीम खिलाने न्यू मार्केट गए तो इतनी भीड़ बरामदों में थी कि चलना दुश्वार था.
भोपाल में अब कई नए छोटे-बड़े होटल बन गए हैं. उन्हीं में से एक रिट्रीट में वह विवाह संपन्न हुआ जिसमें उपस्थित होने के लिए हम गए थे. मेट्रो भी बनाई जा रही है. उसकी कितनी ज़रूरत है, पता नहीं. ये सभी विकास के नए प्रतीक हैं.
एक अख़बार से पता चलता रहा कि अब भोपाल में कितने अधिक धार्मिक आयोजन कहां-कहां हर रोज़ होते रहते हैं. इन सबको अब सांस्कृतिक कार्यक्रम भी कहा जाने लगा है. किसी ने बताया कि भारत भवन में भी लगभग नियमित रूप से आध्यात्मिक प्रवचन आदि होते रहते हैं और जब-तब मोहन भागवत जैसे संत हितोपदेश करने आते रहते हैं.
कभी भोपाल में शरद जोशी, विद्रोही, ताज भोपाली, शेरी भोपाल, कैफ़ भोपाली, फज़ल ताबिश, सत्येन कुमार, शानी, मंजूर एहतेशाम, ज्योत्सना मिलन, नवीन सागर, भगवत रावत, सोम दत्त जैसे लेखक, इरफ़ाना शरद, अलखनन्दन, भाऊ खिरवड़कर, पापिया दासगुप्त, बेनु गांगुली, प्रभात गांगुली, गुलवर्धन जैसे रंगकर्मी, सचिदा नागदेव, सुरेश चैधरी, रमेश नूतन एवं मंजूषा गांगुली जैसे कलाकार; उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खां, ओमप्रकाश चौरसिया, सज्जनलाल भट्ट जैसे संगीतकार श्याम मुंशी जैसे रसिक आदि थे.
अब मेरे परिचितों-मित्रों में रमेशचन्द्र शाह, राजेश जोशी, ध्रुव शुक्ल, मदन सोनी, उदयन, अखिलेश आदि इस बदले भोपाल में हैं- उन्हीं में मेरा छूट गया भोपाल बचा है. भोपाल में बरसों हमारे घरेलू सहायक रहे नीम प्रसाद, कुणा और जुबैर से भी हम मिल पाए.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
