सिनेमा के बारे में मिथिला समाज का रुख बहुत सकारात्मक नहीं रहा है और अब भी ग्रामीण इलाकों में फिल्मों में काम करने को लगभग हेय दृष्टि से देखा जाता है.
याद करें, फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलाइट, जिसमें मुनरी नामक लड़की से प्रेम करने वाले नायक गोधन के बारे में समाज के लोगों की खराब धारणा का उल्लेख किया गया है, क्योंकि वह ‘सनीमा’ का गीत गाता है. हालांकि जब मुनरी अपनी सहेली के माध्यम से पंचों से कहलवाती है कि गोधन को पंचलाइट जलाना आता है, तो पंच लोग दूसरे गांव से किसी को पंचलाइट जलाने की बेइज्जती से बचने के लिए गोधन को माफ कर देते हैं और उसे सनीमा का गाना गाने की छूट भी मिल जाती है. कहने का तात्पर्य है कि मिथिला समाज का रुख सिनेमा को लेकर सकारात्मक नहीं है.
संभवतः यही वजह है कि मैथिली फिल्मों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, मैथिली में बहुत कम फिल्में बनी हैं. इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं. लेकिन संख्यात्मक दृष्टि से मैथिली में भले ही कम फिल्में बनी हों, गुणवत्ता के लिहाज से उनमें उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है और कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में मैथिली फिल्मों को सराहना और पुरस्कार भी मिले हैं.
मैथिली सिनेमा का दस्तावेजीकरण नहीं होने के कारण मैथिली फिल्मों से संबंधित जानकारी हासिल करने में फिल्म अध्येताओं और शोधकर्ताओं को नाकों चने चबाने पड़ते थे. लेकिन शुक्र है कि कई मैथिली फिल्मों से जुड़े कवि, पत्रकार और मैथिली मंच के युवा उद्घोषक किसलय कृष्ण ने शुरू से लेकर आज तक विभिन्न श्रेणियों में बनने वाली मैथिली फिल्मों का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण का सराहनीय कार्य शुरू किया जिसका ही परिणाम है पुस्तक ‘मैथिली सिनेमाक इतिहास’.
इस पुस्तक के माध्यम से अब मैथिली फिल्मों के जिज्ञासुओं और अध्येताओं को इस बात की क्रमिक जानकारी मिल सकेगी कि मैथिली में सिनेमा का इतिहास कैसा रहा और उनसे जुड़े हुए कौन-से लोग थे, जो आम तौर पर सिनेमा विरोधी मिथिला समाज में अपना श्रम, समय और पैसा खर्च करके फिल्मों-सिनेमा की नई धारा लाना चाह रहे थे.
किसी भी कला, चाहे वह साहित्य हो, फिल्म हो, चित्रकला हो या कोई अन्य, हर विधा अपना दस्तावेजीकरण चाहती है जो वर्तमान अध्येताओं के काम तो आता ही है, भावी पीढ़ी के लिए भी मील का पत्थर होता है. इसलिए भले ही मैथिली में कम फिल्में बनी हों, लेकिन उसका प्रामाणिक दस्तावेजीकरण ज़रूरी था और किसलय कृष्ण ने की भूमिका इसीलिए भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि वह सिर्फ संग्रहण का ही काम नहीं करते बल्कि मैथिली सिनेमा के इतिहास लेखन का ही एक तरह से यह पहला संघनित प्रयास है.
मैथिली में सिनेमा की शूटिंग के लिए कई शानदार लोकेशन हैं, मैथिली साहित्य में फिल्मों की पटकथा के लिए प्रचुर मात्रा में सामग्री है, लेकिन दो चीज़ों का भारी अभाव है- फिल्म निर्माण के लिए ज़रूरी पूंजी और फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए सामाजिक जागरूकता का अभाव, जिसे इस किसलय कृष्ण ने पुस्तक में सामाजिक एकता के अभाव और सिनेमा के प्रति छिद्रान्वेषण प्रवृत्ति के रूप में रेखांकित किया है.
अन्य भारतीय भाषाओं की छोटी-से- छोटी फिल्में भी आती हैं, तो पूरे समाज के लोग न केवल उसका प्रचार-प्रसार करते हैं, बल्कि बढ़-चढ़कर फिल्में देखते हैं और फिल्म कलाकारों से लेकर निर्माताओं तक को प्रोत्साहित करते हैं. पर यह मैथिली सिनेमा का ही दुर्भाग्य रहा कि जिस पहली मैथिली फिल्म (नैहर भेल मोर सासुर) का सपना मिथिला के स्वप्नद्रष्टा महंथ मदन मोहन दास ने 1963 में देखा था, वह करीब दो दशक बाद बदले हुए नाम (ममता गाबय गीत) के नाम से 1982 में सी. परमानंद के निर्देशन में पूरा हो सका.
लेकिन इस फिल्म के रिलीज़ होने से पहले मैथिली में दो फिल्में-‘कन्यादान’ (निर्देशक फणी मजूमदार) और ‘जय बाबा बैजनाथ’ (निर्देशक प्रह्लाद शर्मा) या चुकी थीं. ‘ममता गाबय गीत’ फिल्म के रिलीज़ होने के बाद एक बार फिर 17 वर्षों तक सूखा बना रहा और एक भी मैथिली फिल्म बड़े परदे पर नहीं आ सकी.
इतने बड़े अरसे का यह अभाव ख़त्म हुआ साल 1999 में आई फ़िल्म ‘सस्ता जिनगी महग सेनूर’ से, जिसके निर्माता थे बालकृष्ण झा. यह फिल्म मैथिली सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुई और उसके बाद अबाध गति से मैथिली सिनेमा का निर्माण होने लगा. उसके बाद कई अच्छे निर्देशक दृश्य पटल पर उभरकर आए. कुणाल बैकुंठ सिंह की फिल्म ‘खगड़िया बाली भौजी’ और मनोज श्रीपति की फिल्म ‘लव यू दुल्हिन’ ने व्यावसायिक दृष्टि से अच्छी सफलता हासिल की, लेकिन सस्ता जिनगी महग सेनूर फिल्म की सफलता को नहीं दोहरा सकी.
प्रौद्योगिकी के विकास और डिजिटल तकनीक के प्रादुर्भाव ने मैथिली फिल्म निर्माण को नई गति दी, जिसके कारण अब निरंतर मैथिली में फिल्में बन रही हैं और थिएटर से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. मैथिली सिनेमा में पिछले एक दशक से सार्थक सिनेमा का दौर चल रहा है, जिसने मैथिली फिल्मों को वैश्विक मंचों पर उपस्थिति दिलवाई है.
सुप्रसिद्ध कथाकार राजकमल चौधरी की कहानी पर आधारित ‘ललका पाग’ नामक मैथिली फिल्म को युवा निर्देशक प्रशांत नागेंद्र ने निर्देशित किया और यह फिल्म 2015 में मल्टीप्लेक्स में प्रदर्शित होने वाली पहली मैथिली फिल्म बन गई. 2016 में नितिन चंद्रा द्वारा निर्देशित ‘मिथिला मखान’ को पहली बार सर्वश्रेष्ठ मैथिली फीचर फिल्म का राष्ट्रीय अवार्ड प्रदान किया गया. हालांकि इससे पहले ‘दूइ पाटन के बीच में’ और ‘नैना जोगिन’ नामक मैथिली वृत्तचित्र को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका था.
नितिन चंद्रा द्वारा निर्देशित थ्रिलर फिल्म ‘जैक्सन हाल्ट’ ने भी अच्छी व्यावसायिकता हासिल की और इसके मुख्य किरदार (खलनायक) की भूमिका निभाने वाले रामबहादुर रेणु को इस फिल्म की भूमिका के लिए कई पुरस्कार मिले. युवा निर्देशक अचल मिश्रा की फिल्म ‘गामक घर’ ने न केवल समीक्षकों, बल्कि भारतीय फिल्मकारों एवं निर्देशकों के बीच भी अपनी पहचान बनाई. अचल मिश्रा की दूसरी फिल्म ‘धुइन’, प्रतीक शर्मा की ‘लोटस ब्लूम’ और नीरज मिश्रा की ‘समानांतर’ ऐसी ही सार्थक फिल्में हैं, जिसने आम दर्शकों से लेकर फिल्म समीक्षकों तक का ध्यान आकर्षित किया.
मात्र छह दशक में ही एक सार्थक यात्रा पूर्ण कर चुकी मैथिली सिनेमा की यह बड़ी उपलब्धि है कि मैथिली फिल्में मामी फिल्म फेस्टिवल से लेकर कान फिल्म फेस्टिवल तक प्रदर्शित हो रही हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भी कई मैथिली फिल्मों को विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया गया है. व्यावसायिक दृष्टिकोण से मैथिली सिनेमा को भले ही उतनी सफलता नहीं मिली है जैसी अपेक्षा थी, लेकिन वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति के कारण पिछला एक दशक मैथिली सिनेमा के लिए सुखद रहा है.
मैलोरंग से प्रकाशित इस पुस्तक में मैथिली फिल्मों में गहरी पैठ रखने वाले किसलय कृष्ण ने सिर्फ फीचर फिल्मों की ही नहीं, बल्कि मैथिली में निर्मित वृत्तचित्र, लघु फिल्म, टेली फिल्म आदि के बारे में भी विस्तार से चर्चा की है. इसके अलावा मैथिली की साहित्यिक कृतियों पर निर्मित फिल्मों पर भी अलग से एक अध्याय केंद्रित है.
मैथिली सिने जगत का एक विहंगम दृश्यावलोकन करवाती यह पुस्तक मैथिली फिल्मों में रुचि रखने वाले सिनेमा प्रेमियों, शोधकर्ताओं एवं अध्येताओं के लिए निश्चित रूप से मूल्यवान पहल है.
(रमण कुमार सिंह पेशे से पत्रकार हैं और हिंदी एवं मैथिली में सृजन करते हैं. वे साहित्य अकादेमी में मैथिली परामर्श मंडल के सदस्य भी हैं.)
