250 रुपये लीटर पेट्रोल, 5,000 रुपये का गैस सिलेंडर: नाकेबंदी के बीच मणिपुर में गहराया मानवीय संकट

कुकी समूहों पर छह नगा नागरिकों की कथित हत्या के आरोप के बाद शुरू हुई नगा संगठनों की नाकेबंदी ने पिछले डेढ़ महीने से मणिपुर के कांगपोकपी ज़िले में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित कर दी है. राज्य में दोनों समुदायों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. जिले में पेट्रोल 250 रुपये लीटर, एलपीजी सिलेंडर 5,000 रुपये का और 50 किलो चावल का बोरा लगभग 3,000 रुपये में मिल रहा है.

मणिपुर के इंफाल में कांतो साबल में नगा संगठनों द्वारा बनाए गए एक ‘चेकपॉइंट’ की ओर मार्च कर रहे कुकी प्रदर्शनकारियों को रोकते सेना के जवान. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: 250 रुपये लीटर पेट्रोल; 5,000 रुपये का एलपीजी सिलेंडर; 50 किलो चावल का बोरा लगभग 3,000 रुपये. मणिपुर के कांगपोकपी जिले के कई निवासियों का कहना है कि डेढ़ महीने से जारी आर्थिक नाकेबंदी के कारण कुकी-जो बहुल इलाकों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो गई है और उन्हें इन्हीं कीमतों पर सामान खरीदना पड़ रहा है.

हिंसा प्रभावित मणिपुर में केंद्र सरकार द्वारा ‘मुक्त आवाजाही’ की घोषणा किए हुए 16 महीने बीत चुके हैं, लेकिन कांगपोकपी के लोगों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था के बीच लोगों को आने-जाने की अनुमति भले मिल रही हो, लेकिन खाद्यान्न, ईंधन और रसोई गैस की निर्बाध आपूर्ति अब भी नहीं हो रही है. आवश्यक वस्तुओं का भंडार खत्म होने लगा है और अब लोगों को डर है कि कहीं भूख अगला मानवीय संकट न बन जाए.

यह संकट नगा संगठनों द्वारा पिछले एक महीने से जारी आर्थिक नाकेबंदी के बीच पैदा हुआ है, जिसने कुकी बहुल इलाकों तक सामान की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित कर दी है. दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने के साथ स्थिति और गंभीर हो गई है.

कांगपोकपी जिला आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए दो प्रमुख मार्गों पर निर्भर है- पहला, कांगलाटोंगबी के रास्ते जिला मुख्यालय को राज्य की राजधानी इंफाल से जोड़ता है, जबकि दूसरा मार्ग सेनापति जिले के जरिए नगालैंड के दीमापुर तक जाता है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि दोनों दिशाओं से आने वाली आपूर्ति बाधित है, जिसके कारण खाद्यान्न, ईंधन और अन्य जरूरी सामान लेकर आने वाले ट्रक जिले तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.

जरूरी सेवाएं ठप, रोजमर्रा की जिंदगी हुई मुश्किल

राजनीतिक विवाद अब कांगपोकपी के लोगों के लिए रोजमर्रा के अस्तित्व का संकट बन चुका है. जिले के सैकुल कस्बे में एलपीजी सिलेंडर मिलना लगभग असंभव हो गया है. ऐसे में कई परिवारों ने फिर से लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाना शुरू कर दिया है और जलावन जुटाना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गया है.

नगा संगठनों की नाकेबंदी के कारण कांगपोकपी का आपूर्ति मार्ग बाधित होने के बीच एक परिवार लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाता हुआ. (फोटो: अरेंजमेंट)

सैकुल और राहत शिविरों में रहने वाले लोगों की मदद करने वाले स्थानीय स्वयंसेवक गौपू कहते हैं कि संकट कभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि अब उसने एक नया रूप ले लिया है.

वे कहते हैं, ‘कुछ लोग खाना बनाने के लिए इंडक्शन चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सैकुल का बिजली उपकेंद्र इतना भार नहीं झेल पाता. ऊपर से जब बिजली चली जाती है तब इंटरनेट भी बंद हो जाता है. यानी एक समस्या के ऊपर दूसरी समस्या.’

बार-बार बिजली कटने और एलपीजी सिलेंडर की आसमान छूती कीमतों ने लोगों को फिर से जलावन पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर दिया है.

गौपू कहते हैं, ‘कांगपोकपी जिले में आर्थिक नाकेबंदी के कारण एक गैस सिलेंडर की कीमत 5,000 से 6,000 रुपये तक पहुंच गई है.’

उनके मुताबिक, 13 मई के बाद से रसोई गैस की आपूर्ति लगभग पूरी तरह बंद है.

वे बताते हैं, ‘13 मई के बाद से सैकुल में एक भी गैस सिलेंडर नहीं आया. आवश्यक वस्तुओं का सारा भंडार भी खत्म हो चुका है. न गैस सिलेंडर हैं, न राशन, और न ही पेट्रोल-डीजल उपलब्ध है. मुस्लिम और नेपाली दोस्तों की मदद से कुछ जरूरी सामान मिल जाता है, लेकिन बहुत महंगी कीमत पर. मसलन, पेट्रोल 250 रुपये प्रति लीटर, गैस सिलेंडर 5,000 रुपये और 50 किलो चावल का बोरा 3,000 रुपये में मिल रहा है.

कांगपोकपी में आवश्यक वस्तुओं का भंडार खत्म होने की स्थिति है. (फोटो: अरेंजमेंट)

यह संकट अब पूरे कांगपोकपी जिले में फैल चुका है और हर वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है.

राहुल (बदला हुआ नाम), जो मणिपुर के मूल निवासी नहीं हैं और कांगपोकपी शहर में एक डिपार्टमेंटल स्टोर चलाते हैं, कहते हैं कि मई 2023 में मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा शुरू होने के बाद से उन्होंने ऐसा हाल कभी नहीं देखा.

वे कहते हैं, ‘2023 से हिंसा चल रही है, लेकिन तब भी खाने-पीने के सामान की आपूर्ति कभी इस तरह नहीं रुकी थी. आखिर सरकार क्या कर रही है?’

आवाजाही की अनुमति, लेकिन कड़ी पाबंदियां

राहुल बताते हैं कि उन्हें बफर जोन पार करने की अनुमति तो है, लेकिन उस पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं.

वे कहते हैं, ‘मैं इंफाल या राज्य के किसी भी हिस्से से अपने परिवार के लिए राशन खरीद सकता हूं, लेकिन महीने में सिर्फ एक बार ही खाद्य सामग्री लेकर बफर जोन पार करने की अनुमति है. अगर दूसरी बार गया, तो बफर जोन पर मौजूद नगा लोग न केवल मुझसे पूछताछ करेंगे बल्कि पूरा सामान भी रख सकते हैं, मारपीट का भी डर रहता है.’

ज्ञात हो कि मार्च 2025 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षा व्यवस्था के बीच पूरे मणिपुर में ‘मुक्त आवाजाही’ बहाल करने की घोषणा की थी और इसे सामान्य स्थिति की ओर एक कदम बताया था. लेकिन कांगपोकपी के लोगों का कहना है कि लोगों की आवाजाही तो कुछ हद तक शुरू हुई, मगर जरूरी सामान की निर्बाध आपूर्ति अब भी बहाल नहीं हो सकी है.

राहुल कहते हैं, ‘मुझे अपने दो कर्मचारियों को वेतन देना है. परिवार और बहनों की जिम्मेदारी भी है. किसी तरह अब तक काम चल रहा है, लेकिन ऐसे कब तक चल पाएगा?’

कांगपोकपी में एक कैफे चलाने वाली सुमी (बदला हुआ नाम) भी राहुल की तरह ही गंभीर संकट का सामना कर रही हैं. आवश्यक वस्तुओं की कमी के कारण उन्हें अपना कारोबार बंद करना पड़ा है.

वे कहती हैं, ‘हालात ऐसे हैं कि हमारे पास चिकन तो है, लेकिन चिकन फ्राइड राइस बनाने के लिए चावल नहीं है. हम लोगों को अधूरा खाना तो नहीं परोस सकते.’

जरूरी सामान इतना महंगा क्यों हो गया?

द वायर ने कांगपोकपी के निवासियों से यह समझने की कोशिश की कि आखिर एक एलपीजी सिलेंडर की कीमत 5,000 से 6,000 रुपये और पेट्रोल लगभग 250 रुपये प्रति लीटर तक क्यों पहुंच गई है.

मई 2026 के मध्य से जारी आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी के बीच मणिपुर के कांगपोकपी के रेस्तरां खाली पड़े हैं. (फोटो: अरेंजमेंट)

स्थानीय लोगों का कहना है कि इसकी एक बड़ी वजह यह है कि मणिपुर की पहाड़ियों और घाटी के बीच अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से आवाजाही केवल कुछ समुदायों के लोग ही कर पा रहे हैं. इनमें मेईतेई पंगल (मुस्लिम), नेपाली समुदाय के लोग और उत्तर भारत से आए कुछ गैर-मणिपुरी निवासी, जिन्हें स्थानीय लोग ‘मेनलैंडर्स’ कहते हैं, शामिल हैं.

इन समुदायों के लोग अब अनचाहे ही बिचौलियों की भूमिका निभा रहे हैं. वे इंफाल से जरूरी सामान खरीदते हैं, फिर संघर्ष के बाद बने या और अधिक सख्त हुए कई चेकपोस्टों और नाकेबंदियों को पार कर उसे पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुंचाते हैं. इस दौरान उन्हें रास्ते में कई स्थानों पर अनौपचारिक शुल्क भी देना पड़ता है.

परिवहन की हर कड़ी और हर चेकपोस्ट सामान की कीमत में इजाफा कर देती है और आखिरकार इसका पूरा बोझ कांगपोकपी के उपभोक्ताओं पर पड़ता है. नतीजतन, आवश्यक वस्तुएं अब कई परिवारों की पहुंच से बाहर हो गई हैं. रोजमर्रा की जरूरत का सामान भी लक्ज़री की चीज बनती जा रही है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि वे भोजन और ईंधन खरीदने के लिए अपनी जमापूंजी खर्च कर रहे हैं, जबकि कई परिवारों को डर है कि यदि जल्द ही आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो उनकी सारी बचत खत्म हो जाएगी.

नाकेबंदी कब खत्म होगी?

17 मई को अंतर-जिला आर्थिक नाकेबंदी का ऐलान करने वाली यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) का कहना है कि यह नाकेबंदी फिलहाल जारी रहेगी.

द वायर से बातचीत में काउंसिल के एक नेता ने कहा कि केवल उन छह नगा नागरिकों के शव बरामद हो जाने से, जिनके बारे में संगठन का आरोप है कि उनका कुकी समूहों ने अपहरण किया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई, नाकेबंदी वापस नहीं ली जाएगी.

13 मई को कांगपोकपी से कथित तौर पर अगवा किए गए कथित छह नगा लोगों के शव, 11 जून 2026 को मणिपुर के इंफाल स्थित जेएनआईएमएस शवगृह लाए गए. इससे एक दिन पहले सेनापति से अगवा किए गए 14 कुकी लोगों को रिहा किया गया था. (फोटो: पीटीआई)

उन्होंने कहा, ‘नाकेबंदी तब तक जारी रहेगी, जब तक मृतकों के परिवारों को न्याय नहीं मिल जाता.’

जब उनसे पूछा गया कि इस नाकेबंदी के कारण कांगपोकपी के लोग भोजन, ईंधन और दवाओं की भारी कमी से जूझ रहे हैं, तो उन्होंने अपने रुख का बचाव किया.

उन्होंने कहा, ‘सिर्फ कुकी ही नहीं, वहां रहने वाले दूसरे लोग भी इस नाकेबंदी से प्रभावित हैं.’ उनका तर्क था कि इसका असर केवल कुकी समुदाय तक सीमित नहीं है.

इस बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वरिष्ठ सूत्र ने द वायर को बताया कि छह नगा नागरिकों की हत्या के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी गई थी.

सूत्र के अनुसार, केंद्र सरकार से उन कुकी उग्रवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है, जो ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ (एसओओ) समझौते के तहत युद्धविराम में शामिल हैं. एसओओ एक ऐसा समझौता है, जिसके तहत उग्रवादी संगठन राज्य और केंद्र सरकार के साथ प्रस्तावित राजनीतिक समाधान की प्रक्रिया के दौरान हथियारबंद गतिविधियां रोकने और अपने हथियार जमा करने पर सहमत होते हैं.

हालांकि, अब तक बातचीत में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है और न ही नाकेबंदी खत्म होने के कोई संकेत मिले हैं. ऐसे में कांगपोकपी के लोग जातीय संघर्ष और राजनीतिक गतिरोध की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं. खाद्य सामग्री, ईंधन और अन्य जरूरी वस्तुओं की कमी के बीच उनका रोजमर्रा का जीवन लगातार कठिन होता जा रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)