अडानी को राहत देने के अमेरिकी फैसले का आधार बने भारतीय आदेशों में रिश्वत के आरोपों की जांच नहीं हुई

अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी के खिलाफ आपराधिक मामला वापस लेने का बचाव करते हुए दावा किया कि भारतीय अधिकारियों ने आरोपों की जांच कर कोई कार्रवाई योग्य अनियमितता नहीं पाई. हालांकि, विभाग द्वारा उद्धृत तीनों भारतीय आदेशों में कथित रिश्वतखोरी की साजिश की जांच या उस पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है.

अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी. (फोटो: @gautam_adani/X via PTI)

नई दिल्ली: अरबपति उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को अचानक वापस लेने के अपने फैसले पर एक संघीय (फेडरल) न्यायाधीश के सामने सफाई देने के लिए मजबूर हुए अमेरिकी न्याय विभाग ने शनिवार को दावा किया कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने राजनीतिक कारणों से अडानी के खिलाफ केवल उनकी सार्वजनिक बदनामी (‘नेम एंड शेम’) के उद्देश्य से यह मामला दर्ज किया था.

साथ ही, न्याय विभाग ने यह भी कहा कि भारतीय अधिकारियों ने पहले ही इन आरोपों में से कई की जांच की थी और उनमें ‘कार्रवाई योग्य कोई अनियमितता (नो एक्शनेबल मिसकंडक्ट)’ नहीं पाई थी.

हालांकि, न्याय विभाग द्वारा अपनी दलील के साथ संलग्न किए गए भारत के तीनों आधिकारिक फैसलों से स्पष्ट होता है कि उनमें से किसी ने भी उस कथित रिश्वतखोरी की साजिश की जांच नहीं की थी, जो अमेरिकी अभियोग (इंडाइटमेंट) का मुख्य आधार है.

न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले की अमेरिकी जिला अदालत (यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के जज निकोलस गराउफिस के समक्ष शुक्रवार को दायर किए गए 10 पन्नों के इस जवाब में अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी, सागर अडानी, विनीत जैन और पांच अन्य लोगों के खिलाफ दायर अभियोग (इंडाइटमेंट) को स्थायी रूप से वापस लेने की अपनी मांग का बचाव किया.

यह जवाब जस्टिस गराउफिस के 26 जून के उस आदेश के बाद दाखिल किया गया, जिसमें उन्होंने न्याय विभाग की अभियोग को तुरंत खारिज करने की मांग को मंजूर करने से इनकार कर दिया था.

जज ने न्याय विभाग की मूल याचिका को ‘अत्यंत संक्षिप्त, सामान्य और केवल निष्कर्षात्मक’ बताते हुए अभियोजकों को निर्देश दिया था कि वे अभियोग वापस लेने के ‘हर कारण’ को विस्तार से स्पष्ट करें और उसके समर्थन में ‘पर्याप्त तथ्यात्मक आधार’ प्रस्तुत करें, ताकि अदालत यह तय कर सके कि इस अनुरोध को मंजूरी दी जाए या नहीं.

अभियोग वापस लेने के पक्ष में न्याय विभाग की प्रमुख दलीलों में से एक यह थी कि इस मामले के आधार बनने वाले कई आरोपों की भारतीय अधिकारियों द्वारा पहले ही जांच की जा चुकी है.

न्याय विभाग के प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉट्टर ने लिखा, ‘भारत ने इस मामले से जुड़े कई आरोपों की जांच की है और 2026 में जारी कई रिपोर्टों तथा फैसलों में यह निष्कर्ष निकाला है कि किसी प्रकार की कार्रवाई योग्य अनियमितता (नो एक्शनेबल मिसकंडक्ट) नहीं हुई.’

उन्होंने आगे कहा कि संलग्न भारतीय फैसलों की समीक्षा करने के बाद, ‘जिस देश का इस मामले में सबसे अधिक हित जुड़ा हुआ है, उसने भी यही निष्कर्ष निकाला है कि कोई अनुचित कार्य नहीं हुआ.’

हालांकि, इन तीनों संलग्न दस्तावेजों (एनेक्सर्स) को ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि इनमें से किसी ने भी उस कथित रिश्वतखोरी की साजिश पर फैसला नहीं दिया, जो अमेरिकी अभियोग का मुख्य आधार है.

अपने जवाब के शुरुआती हिस्से में मैककॉट्टर ने दलील दी कि अदालत को न्याय विभाग से यह पूछने का अधिकार ही नहीं था कि उसने मामला वापस लेने का फैसला क्यों किया. उनका कहना था कि आपराधिक मुकदमा शुरू करना या वापस लेना कार्यपालिका (एग्जीक्यूटिव) के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि न्याय विभाग की मूल याचिका जानबूझकर संक्षिप्त रखी गई थी, क्योंकि रूल 48 के तहत दायर की जाने वाली ऐसी याचिकाएं सामान्यतः इसी तरह पेश की जाती हैं. हालांकि, चूंकि न्यायाधीश गराउफिस ने विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा था, इसलिए न्याय विभाग ने अपने निर्णय के कारण बताने के लिए कार्यपालिका के विशेषाधिकार में केवल ‘सीमित छूट’ दी है.

एक फुटनोट में मैककॉट्टर ने यह भी स्वीकार किया कि इस जवाब पर केवल उनके ही हस्ताक्षर हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने जानबूझकर न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी या इस मामले को संभालने वाले अभियोजकों से इस पर हस्ताक्षर नहीं कराए, क्योंकि ‘इन आरोपों को वापस लेने का अंतिम और एकमात्र निर्णय मैंने ही लिया था.’

गौरतलब है कि 18 मई को दायर मूल याचिका पर भी केवल मैककॉट्टर का ही नाम था और मामले को संभालने वाले किसी अभियोजक के हस्ताक्षर नहीं थे. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने सूत्रों के हवाले से लिखा था कि इससे संकेत मिलता है कि अभियोजक इस फैसले से सहमत नहीं थे. रिपोर्ट के अनुसार, दो अभियोजकों ने इसके दो दिन बाद ही खुद को इस मामले से अलग करने की अर्जी भी दाखिल कर दी थी.

अखबार ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लंबे समय से सलाहकार और निजी वकील बोरिस एप्सटीन ने न्याय विभाग में मैककॉट्टर की नियुक्ति का समर्थन किया था.

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप से करीबी संबंधों के कारण विभाग के भीतर इस बात पर भी चर्चा हुई कि एप्सटीन कथित रूप से अडानी समूह की कानूनी रणनीति में भूमिका निभा रहे हैं. हालांकि, उन्होंने अभियोजकों के साथ किसी बैठक में हिस्सा नहीं लिया और न ही उनका नाम किसी अदालती दस्तावेज में दर्ज है.

एप्सटीन ने अडानी समूह से किसी भी संबंध या इस मामले में किसी भूमिका से इनकार किया. वहीं, न्याय विभाग की एक प्रवक्ता ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि मैककॉट्टर की नियुक्ति केवल ‘अनुभव और योग्यता’ के आधार पर हुई थी और न तो मैककॉट्टर तथा न ही कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने इस मामले पर एप्सटीन से कोई चर्चा की थी.

अडानी समूह और उसकी अमेरिकी कानूनी फर्म सुलिवन एंड क्रॉमवेल ने भी कहा कि एप्सटीन की कंपनी के बचाव में कोई भूमिका नहीं थी.