राम मंदिर चढ़ावा चोरी: एसआईटी ने चोरी, गबन और सुरक्षा चूक मानी, पर बड़े सवालों को क्यों छोड़ दिया?

राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी पर एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट में 40 दिनों में 70 बार नकदी चोरी होने, छह लोगों पर एफआईआर की सिफ़ारिश और सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलताओं का उल्लेख है. लेकिन गबन की कुल राशि, शीर्ष स्तर की जवाबदेही और वर्षों से चली आ रही संस्थागत कमियों पर रिपोर्ट कई अहम सवाल अनुत्तरित छोड़ देती है.

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(फोटो: पीएमओ वाया पीटीआई)

नई दिल्ली: बीते महीने अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी की ख़बर सामने आने के बाद विवाद जारी ही था कि उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग ने मंदिर में चढ़ावे की धनराशि की चोरी और गबन के आरोपों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाया।

इस एसआईटी का गठन श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर किया गया. ट्रस्ट ने 12 जून 2026 को सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन और चोरी को लेकर मीडिया तथा सोशल मीडिया में लगातार खबरें आ रही हैं. इससे श्रद्धालुओं के बीच संदेह पैदा हो रहा है, इसलिए पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए.

इसके बाद उत्तर प्रदेश शासन के गृह विभाग ने 17 जून 2026 को एसआईटी का गठन किया. एसआईटी को निर्देश दिया गया कि वह पूरे प्रकरण की जांच कर यह पता लगाए कि चोरी कैसे हुई, इसके लिए कौन जिम्मेदार है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या सुधार आवश्यक हैं.

एसआईटी ने मात्र छह दिनों की जांच के बाद 23 जून 2026 को अपनी नौ पृष्ठों की अंतरिम रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव (गृह) को सौंप दी.

हालांकि यह अंतरिम रिपोर्ट जवाबों से अधिक सवालों को जन्म देती है. रिपोर्ट कहती है कि जिन लोगों पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन नहीं कराया.

रिपोर्ट की शुरुआत में ही एसआईटी लिखती है कि प्रथमदृष्टया यह सामने आया है कि चढ़ावे की गणना करने वाले कुछ कर्मचारियों ने नकदी की चोरी और गबन किया.

सीसीटीवी फुटेज में 40 दिन के भीतर 70 बार चोरी के कृत्य दर्ज हुए. अंतरिम रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि चढ़ावे के प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था में वर्षों से गंभीर कमियां थीं, जिन्हें आंतरिक ऑडिट लगातार रेखांकित करता रहा, लेकिन उन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई.

एसआईटी ने छह व्यक्तियों- अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पाण्डेय और रमाशंकर मिश्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की है. लेकन रिपोर्ट में ट्रस्ट के तत्कालीन महामंत्री और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) नेता चंपत राय का जिक्र तक नहीं है.

एसआईटी ने ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. अनिल मिश्रा और गणना प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव की पर्यवेक्षणीय विफलता का तो उल्लेख किया है. लेकिन निर्णय लेने वाली शीर्ष संरचना या उसके अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है.

इसके अलावा कई बड़े सवाल, जैसे- कुल गबन की राशि और वर्षों से चली आ रही संस्थागत विफलताओं की अंतिम जिम्मेदारी, का जवाब भी रिपोर्ट में नहीं मिलता है.

कैसे आता है मंदिर में चढ़ावा?

रिपोर्ट के अनुसार, राम मंदिर में श्रद्धालु तीन प्रमुख माध्यमों से चढ़ावा अर्पित करते हैं.

पहला, मंदिर परिसर में स्थापित हुंडियों (दानपात्रों) में नकद, सिक्के, सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं डालकर.

दूसरा, ट्रस्ट द्वारा निर्धारित काउंटरों पर सीधे जमा करके.

और तीसरा, गर्भगृह के समीप रामलला के चरणों में अर्पित करके.

बताया गया है कि इन सभी माध्यमों से प्राप्त नकदी और बहुमूल्य वस्तुओं को एकत्र कर गणना कक्ष तक लाया जाता था, जहां भारतीय स्टेट बैंक के सहयोग से उनकी गिनती होती थी.

ट्रस्ट और बैंक के बीच इसके लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाई गई थी. इस प्रक्रिया में यह निर्धारित था कि हुंडियां ट्रस्ट और बैंक के प्रतिनिधियों की संयुक्त उपस्थिति में खोली जाएंगी, प्रत्येक हुंडी का अलग-अलग लेखा रखा जाएगा, कर्मचारियों की प्रवेश और निकास पर तलाशी होगी, गणना करने वाले कर्मचारी विशेष जेब रहित कपड़े पहनेंगे, निजी सामान गणना कक्ष में नहीं ले जा सकेंगे, प्रत्येक कर्मचारी की बायोमीट्रिक उपस्थिति दर्ज होगी और पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी में संचालित होगी.

कागजों पर यह व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ दिखाई देती थी, लेकिन एसआईटी की जांच में सामने आया कि व्यवहार में इन नियमों का पालन ही नहीं किया गया.

यहीं से शुरू होती हैं गंभीर अनियमितताएं

एसआईटी का कहना है कि चोरी की घटनाओं को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि चढ़ावे के प्रबंधन की पूरी प्रणाली कैसे काम कर रही थी.

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे पहली और सबसे गंभीर खामी यह थी कि अलग-अलग हुंडियों से निकाली गई नकदी को गिनती शुरू होने से पहले ही आपस में मिला दिया जाता था. जबकि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक हुंडी की अलग-अलग गणना और अलग रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए था.

इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि बाद में यह पता लगाना लगभग असंभव हो गया कि किसी विशेष दिन किसी विशेष हुंडी में कितनी धनराशि प्राप्त हुई थी. एसआईटी ने इसे जवाबदेही और पारदर्शिता के दृष्टिकोण से गंभीर संस्थागत कमजोरी माना है.

केवल नकदी नहीं, बहुमूल्य वस्तुओं के प्रबंधन में भी कमियां

एसआईटी ने अपनी जांच के दौरान यह भी पाया कि समस्या केवल नकदी तक सीमित नहीं थी. सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के प्रबंधन में भी गंभीर प्रक्रियागत कमियां मौजूद थीं. यदि किसी बक्से से सोना, चांदी या अन्य बहुमूल्य वस्तुएं निकलती हैं, तो उन्हें अलग रखकर विशेष हुंडी (संख्या-12) में जमा किया जाता है. बाद में उनका रिकॉर्ड तैयार किया जाता है, जैसे- वजन, फोटोग्राफी, अभिलेखीकरण और सुरक्षित सीलिंग.

लेकिन कई मामलों में इन प्रक्रियाओं का समान रूप से पालन नहीं हुआ. कुछ श्रद्धालुओं को रसीद नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आईं.

हालांकि एसआईटी ने यह भी दर्ज किया कि लॉकर में सुरक्षित रखी गई 11 बहुमूल्य वस्तुओं का औचक भौतिक सत्यापन किया गया और वे उपलब्ध मिलीं.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि बहुमूल्य धातुओं को बाद में भारतीय सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन को गलाने के लिए भेजे जाने की प्रक्रिया भी अभिलेखों में दर्ज मिली. इसके बावजूद एसआईटी ने माना कि बहुमूल्य वस्तुओं के प्रबंधन की पूरी प्रणाली को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और दस्तावेज आधारित बनाने की आवश्यकता है.

सीसीटीवी ने खोली चोरी की परतें

एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण आधार गणना कक्ष की सीसीटीवी फुटेज है.

रिपोर्ट के अनुसार, 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग के विश्लेषण में लगभग 70 ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिनमें गणना कर्मियों को नकदी अपने कपड़ों, जेबों, जूतों और अन्य तरीकों से छिपाकर गणना कक्ष से बाहर ले जाते हुए देखा गया.

रिपोर्ट स्पष्ट शब्दों में कहती है कि यह कोई एक-दो बार हुई घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी प्रवृत्ति थी जो अलग-अलग तिथियों पर लगातार दोहराई जा रही थी. एसआईटी ने इसे ‘निरंतर प्रवृत्ति’ बताया है.

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि उपलब्ध फुटेज पूरी अवधि की नहीं थी. गणना कक्ष की सीसीटीवी प्रणाली में रिकॉर्डिंग केवल सीमित अवधि तक सुरक्षित रहती थी और उसके बाद स्वतः ओवरराइट हो जाती थी. इसलिए एसआईटी केवल उसी अवधि की घटनाओं का विश्लेषण कर सकी, जिसकी रिकॉर्डिंग उपलब्ध थी.

रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि आरोपित कर्मचारियों के बयान और अन्य परिस्थितियां इस ओर संकेत करती हैं कि चोरी की घटनाएं 27 अप्रैल से पहले भी होती रही होंगी. लेकिन पुरानी रिकॉर्डिंग उपलब्ध न होने के कारण उस अवधि की जांच संभव नहीं हो सकी.

यही वह बिंदु है जहां एसआईटी स्वयं मानती है कि उपलब्ध साक्ष्य वास्तविक नुकसान की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते.

चोरी कैसे संभव हुई?

एसआईटी ने अपनी जांच में पाया कि गणना कक्ष में लागू किए जाने वाले लगभग सभी सुरक्षा उपाय या तो पूरी तरह निष्क्रिय थे या उनका पालन नहीं कराया जा रहा था.

रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों की प्रवेश और निकास के समय अनिवार्य तलाशी नहीं ली जा रही थी. निर्धारित जेब रहित वर्दी की व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं थी. कर्मचारी निजी कपड़ों में काम कर रहे थे और कई मामलों में मोबाइल फोन तथा अन्य निजी सामान भी अपने साथ गणना कक्ष में ले जा रहे थे.

गणना कक्ष में बैठने की व्यवस्था भी ऐसी थी कि नकदी की गड्डियां कर्मचारियों की सीधी पहुंच में रहती थीं.

एसआईटी के अनुसार, इन सभी कमियों ने मिलकर चोरी को आसान बना दिया.

एसओपी में बदलाव पर गंभीर टिप्पणी

राम मंदिर में चढ़ावे की गणना भारतीय स्टेट बैंक और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत होती थी.

रिपोर्ट के अनुसार, इस व्यवस्था में जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय थीं. ट्रस्ट की जिम्मेदारी थी कि वह हुंडियों की सुरक्षा, उनके खुलने की प्रक्रिया, गणना कक्ष की व्यवस्था, सुरक्षा प्रोटोकॉल और निगरानी सुनिश्चित करे. दूसरी ओर, एसबीआई को गणना प्रक्रिया, नकदी गिनने वाले कर्मचारियों, मशीनों, बैंकिंग रिकॉर्ड और जमा प्रक्रिया का संचालन करना था.

एसआईटी का कहना है कि दोनों संस्थाओं के बीच जिम्मेदारियां निर्धारित होने के बावजूद व्यवहार में किसी भी पक्ष ने सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कराया.

रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज है कि 20 सितंबर 2024 को एसबीआई के साथ हुए एक एएमयू के तहत लागू व्यवस्था में गणना कक्ष में आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य तलाशी का स्पष्ट प्रावधान था.

लेकिन 6 फरवरी 2025 को जारी नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में ट्रस्ट ने इस व्यवस्था को बदल दिया गया. नई एसओपी में प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य तलाशी के स्थान पर ‘रैंडम तलाशी’ का प्रावधान कर दिया गया.

एसआईटी ने इस बदलाव पर विशेष टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ट्रस्ट पदाधिकारियों द्वारा यह संशोधन किन परिस्थितियों में किया गया, यह विस्तृत जांच का विषय है.

सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज की भूमिका

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि गणना कक्ष में कार्यरत कर्मचारी सीधे ट्रस्ट के कर्मचारी नहीं थे. उन्हें अनुबंधित एजेंसी सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज के माध्यम से उपलब्ध कराया गया था और बैंक द्वारा गणना कार्य में लगाया गया था.

एसआईटी का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया, सत्यापन और निगरानी के पूरे तंत्र की भी विस्तृत जांच की आवश्यकता है. यही कारण है कि रिपोर्ट केवल कर्मचारियों की भूमिका पर नहीं रुकती, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की भी समीक्षा की जरूरत बताती है.

रामशंकर यादव उर्फ़ टिन्नू की भूमिका

रिपोर्ट में जिस व्यक्ति का नाम बार-बार आता है, वह है रामशंकर यादव उर्फ़ टिन्नू. एसआईटी के अनुसार, उनके पास मंदिर की हुंडियों की चाबियां थीं, जबकि इसके लिए कोई औपचारिक लिखित आदेश उपलब्ध नहीं मिला.

यही नहीं, चोरी में संलिप्त मनीष कुमार यादव की नियुक्ति भी उनकी सिफारिश पर हुई थी.

रिपोर्ट के अनुसार, इतनी संवेदनशील व्यवस्था में किसी व्यक्ति का बिना लिखित अधिकार के प्रभावी नियंत्रण रखना स्वयं सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरी थी.

एसआईटी ने उनकी भूमिका की आपराधिक दृष्टि से आगे जांच की सिफारिश की है.

सीसीटीवी तो लगे थे, लेकिन निगरानी नहीं हुई

एसआईटी ने यह भी पाया कि गणना कक्ष में पर्याप्त संख्या में सीसीटीवी कैमरे मौजूद थे.

लेकिन कैमरों का उपयोग मुख्यतः रिकॉर्डिंग तक सीमित था. उनकी लाइव मॉनिटरिंग या वास्तविक समय पर निगरानी प्रभावी ढंग से नहीं की जा रही थी.

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि कैमरों की निगरानी नियमित रूप से की जाती तो चोरी की घटनाओं को उसी समय रोका जा सकता था.

यानी समस्या तकनीक की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसके उपयोग और निगरानी की थी.

एसआईटी बनने से पहले ही लाखों रुपये बरामद

रिपोर्ट के अनुसार, एसआईटी के गठन से पहले ही ट्रस्ट ने अपने स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी थी.

जांच में पाया गया कि चोरी में संलिप्त छह व्यक्तियों से कुल लगभग 78.94 लाख रुपे नकद बरामद किए गए. इसके अलावा विदेशी मुद्रा, आभूषण और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं भी मिलीं.

रिपोर्ट में 4 जून 2026 की एक घटना का भी उल्लेख है, जिसमें गणना कक्ष से जुड़े शौचालय (बाथरूम) से लगभग 2.25 लाख रुपये नकद बरामद किए गए.

एसआईटी के अनुसार, यह बरामदगी इस बात का अतिरिक्त संकेत है कि गणना कक्ष से धनराशि व्यवस्थित तरीके से बाहर ले जाने का प्रयास किया जा रहा था.

चार वर्षों से मिल रही थीं चेतावनियां

एसआईटी रिपोर्ट का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट्स से जुड़ा है.

रिपोर्ट बताती है कि वित्तीय वर्ष 2022-23, 2023-24, 2024-25 और 2025-26 की इंटरनल ऑडिट में बार-बार गंभीर कमियों की ओर ध्यान दिलाया गया था.

इन ऑडिट रिपोर्टों में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे-

  • प्रत्येक हुंडी का अलग रिकॉर्ड रखा जाए.
  • गणना कक्ष में प्रवेश और निकास पर अनिवार्य तलाशी हो.
  • बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति पर तत्काल रसीद दी जाए.
  • सीसीटीवी रिकॉर्डिंग कम-से-कम 180 दिन तक सुरक्षित रखी जाए.
  • सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए.
  • दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया सुधारी जाए.

लेकिन एसआईटी ने पाया कि इन चेतावनियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई.

रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि ट्रस्ट पदाधिकारियों ने ऑडिट रिपोर्ट्स को गंभीरता से नहीं लिया और उनकी अनदेखी की.

यही टिप्पणी रिपोर्ट के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि सुरक्षा व्यवस्था की कमियां नई नहीं थीं, बल्कि कई वर्षों से दर्ज की जा रही थीं.

तीन चर्चित आरोपों पर एसआईटी का निष्कर्ष

रिपोर्ट में सोशल मीडिया पर वायरल तीन मामलों की भी अलग से जांच की गई.

पहला मामला इंडियन बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन के उत्तर भारत प्रमुख अनुराग रस्तोगी द्वारा अर्पित चांदी की ईंटों का था.

दूसरा मामला विश्व सिंधी सेवा समाज के अध्यक्ष राजू मंडवानी के उस दावे का था, जिसमें उन्होंने 200 किलोग्राम चांदी अर्पित करने और रसीद नहीं मिलने की बात कही थी.

तीसरा मामला मुंबई के अनिल विश्वकर्मा द्वारा चढ़ाए गए चांदी के हार और चरण पादुकाओं का था.

तीनों मामलों में एसआईटी ने ट्रस्ट के रिकॉर्ड, लॉकर रजिस्टर और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया.

रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित बहुमूल्य वस्तुएं ट्रस्ट के रिकॉर्ड में दर्ज मिलीं. कुछ वस्तुओं को बाद में सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को गलाने के लिए भेजा गया था और उसका अभिलेख भी उपलब्ध था.

इसी आधार पर एसआईटी ने निष्कर्ष निकाला कि सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं होती.

हालांकि, रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं करती कि जिन श्रद्धालुओं ने रसीद न मिलने की शिकायत की थी, उनकी शिकायतों का निस्तारण किस प्रकार किया गया और बहुमूल्य वस्तुओं के मूल्यांकन की स्वतंत्र प्रक्रिया क्या थी.

यहीं से एसआईटी रिपोर्ट का दूसरा पक्ष सामने आता है, जहां वह कुछ आरोपों को खारिज करती है, वहीं कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ देती है.

रिपोर्ट के निष्कर्षों में विरोधाभास

एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट का अंतिम हिस्सा सबसे अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यहीं वह एक साथ दो अलग-अलग निष्कर्ष दर्ज करती है.

एक ओर रिपोर्ट कहती है कि गणना कक्ष के भीतर धनराशि की चोरी और गबन की घटनाएं प्रथमदृष्टया स्थापित होती हैं. दूसरी ओर रिपोर्ट का जोर इस बात पर भी है कि अधिकांश अनियमितताएं ‘प्रणालीगत कमियों’ का परिणाम थीं.

लेकिन रिपोर्ट के भीतर ही दर्ज तथ्य इस निष्कर्ष को अधिक जटिल बनाते हैं.

रिपोर्ट खुद कहती है कि सुरक्षा व्यवस्था को लागू करने में गंभीर लापरवाही हुई, कई नियमों का जानबूझकर पालन नहीं कराया गया और वर्षों से मिल रही चेतावनियों के बावजूद व्यवस्थागत सुधार नहीं किए गए.

यहीं से कई ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर अंतरिम रिपोर्ट नहीं देती.

कुल कितनी राशि की चोरी हुई?

पूरी रिपोर्ट में सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न यही है. एसआईटी बताती है कि लगभग 70 घटनाएं उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देती हैं. छह लोगों से 78.94 लाख रुपये की बरामदगी हुई. बाथरूम से 2.25 लाख रुपये नकद मिला. विदेशी मुद्रा और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं भी बरामद हुईं.

लेकिन रिपोर्ट कहीं भी यह अनुमान नहीं लगाती कि कुल कितनी धनराशि का गबन हुआ.

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एसआईटी स्वयं स्वीकार करती है कि उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज केवल सीमित अवधि की है और चोरी 27 अप्रैल 2026 से पहले भी होती रही होगी.

यदि ऐसा है, तो वास्तविक नुकसान उपलब्ध बरामदगी से कहीं अधिक हो सकता है. लेकिन अंतरिम रिपोर्ट इस पर कोई आकलन प्रस्तुत नहीं करती.

चार वर्षों तक ऑडिट चेतावनियों की अनदेखी क्यों?

एसआईटी रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक की आंतरिक ऑडिट रिपोर्टों में लगातार गंभीर कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया था.

इन रिपोर्टों में तलाशी व्यवस्था मजबूत करने, प्रत्येक हुंडी का पृथक लेखा रखने, बहुमूल्य वस्तुओं का बेहतर दस्तावेजीकरण करने, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग 180 दिन तक सुरक्षित रखने और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार की सिफारिश की गई थी.

एसआईटी यह भी लिखती है कि ट्रस्ट पदाधिकारियों ने इन ऑडिट रिपोर्टों को गंभीरता से नहीं लिया और ऑडिट टिप्पणियों की अनदेखी की. लेकिन इसके बाद रिपोर्ट यह नहीं बताती कि

  • इन ऑडिट रिपोर्टों पर अंतिम निर्णय किस स्तर पर लिया जाता था?
  • किन अधिकारियों ने इन सिफारिशों को लागू नहीं किया?
  • क्या इस लापरवाही के लिए किसी प्रशासनिक या आपराधिक जवाबदेही का निर्धारण किया जाएगा?
  • सीसीटीवी रिकॉर्डिंग केवल सीमित अवधि तक ही क्यों?

अंतरिम रिपोर्ट यह भी नहीं बताती कि सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग क्षमता बढ़ाने का निर्णय क्यों नहीं लिया गया?

तलाशी के नियम में बदलाव क्यों किया गया?

एसआईटी की रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष 6 फरवरी 2025 को लागू नई एसओपी से जुड़ा है. नई व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य तलाशी को बदलकर ‘नियमित/रैंडम’ तलाशी कर दिया गया.

रिपोर्ट स्वयं लिखती है कि यह संशोधन किन परिस्थितियों में किया गया, यह गहन जांच का विषय है.

लेकिन अंतरिम रिपोर्ट उस गहन जांच का कोई परिणाम प्रस्तुत नहीं करती. यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि यह निर्णय किसने प्रस्तावित किया, किसने इसे मंजूरी दी, और क्या सुरक्षा विशेषज्ञों की राय ली गई थी?

बहुमूल्य वस्तुओं के मामले में क्या जांच अधूरी है?

सोशल मीडिया पर वायरल तीन मामलों की जांच में एसआईटी ने ट्रस्ट को राहत दी है.

रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित चांदी की ईंटें, हार और चरण पादुकाएं ट्रस्ट के रिकॉर्ड में दर्ज मिलीं और कुछ वस्तुएं बाद में सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को गलाने के लिए भेजी गई थीं. लेकिन रिपोर्ट कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर मौन है. उदाहरण के लिए,

गलाने से पहले बहुमूल्य वस्तुओं का स्वतंत्र मूल्यांकन किसने किया?

जिन लोगों ने रसीद न मिलने की शिकायत की थी, उनकी शिकायतों का समाधान कैसे हुआ?

क्या बहुमूल्य वस्तुओं की सूची का किसी स्वतंत्र एजेंसी से मिलान कराया गया?

इन प्रश्नों का उत्तर अंतरिम रिपोर्ट में नहीं मिलता.

शीर्ष स्तर की जवाबदेही का प्रश्न

रिपोर्ट डॉ. अनिल मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और रामशंकर यादव उर्फ़ टिन्नू की भूमिकाओं पर टिप्पणी करती है और छह कर्मचारियों के विरुद्ध प्राथमिकी की सिफारिश भी करती है.

लेकिन ट्रस्ट की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संरचना की सामूहिक जवाबदेही पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं देती.

रिपोर्ट यह भी नहीं बताती कि वर्षों तक चली सुरक्षा संबंधी कमियों की नियमित समीक्षा किस स्तर पर होती थी? ऑडिट रिपोर्टों की समीक्षा कौन करता था? और सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू कराने की अंतिम जिम्मेदारी किसकी थी?

आगे क्या?

रिपोर्ट के अंतिम भाग में एसआईटी स्पष्ट करती है कि उसकी जांच अभी पूरी नहीं हुई है. यानी फिलहाल एसआईटी ने इतना भर कहा है कि मंदिर के चढ़ावे की गणना के दौरान चोरी हुई, सुरक्षा व्यवस्था विफल रही, कई कर्मचारियों और पर्यवेक्षण स्तर के अधिकारियों की भूमिका प्रथम दृष्टया संदिग्ध है तथा उनके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए.

लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि इस अंतरिम रिपोर्ट ने कई ऐसे प्रश्न खुले छोड़ दिए हैं जिनके उत्तर ही तय करेंगे कि यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों द्वारा की गई चोरी का था या फिर वर्षों से चली आ रही संस्थागत लूट का परिणाम.