नई दिल्ली: जातीय हिंसाग्रस्त मणिपुर में मेईतेई नागरिक समाज संगठनों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से 2027 की जनगणना से पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने का आग्रह किया है.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के कम से कम 14 मेईतेई नागरिक समाज संगठनों (सीएसओ) ने कहा कि मई 2023 से राज्य में जारी संघर्ष का स्थायी समाधान निकालने के लिए यह जरूरी है.
मेईतेई बहुल घाटी के संगठनों ने एनआरसी लागू किए जाने का जोरदार समर्थन किया है, वहीं कुकी-जो और नगा जैसे आदिवासी समूहों ने आशंका जताई है कि इसका इस्तेमाल उनके समुदायों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है.
एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों और भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने अपनी लंबे समय से चली आ रही एनआरसी की मांग और राज्य में जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़े मुद्दे उनके समक्ष रखे.
बुधवार (8 जुलाई) को नई दिल्ली में जारी एक बयान में 14 नागरिक समाज संगठनों ने कहा, ‘रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के साथ हमारी बैठक में हमने स्पष्ट किया कि मणिपुर की वर्तमान स्थिति का समाधान तभी संभव है, जब यह पहचान की जाए कि राज्य में वास्तविक भारतीय नागरिक कौन हैं और अवैध प्रवासी कौन हैं.’
संगठनों ने कहा कि राज्य में जारी संकट के कारण फिलहाल जनगणना आगे नहीं बढ़ाई जानी चाहिए.
बैठक के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने जनसांख्यिकीय परिवर्तन को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं और कहा कि जनगणना से पहले अवैध प्रवासियों की पहचान की जानी चाहिए, क्योंकि इसका प्रभाव राज्य के मूल निवासियों पर पड़ रहा है.
उन्होंने सरकार से यह भी आग्रह किया कि जो लोग अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं, उन्हें संवैधानिक अधिकार न दिए जाएं.
बयान में कहा गया, ‘विदेशी मामलों के संयुक्त सचिव महात्मा संदीप नामदेव के साथ हुई बैठक में हमने आंकड़े प्रस्तुत किए, जिनसे पता चलता है कि भारत-म्यांमार सीमा के रास्ते पिछले 70 वर्षों से अधिक समय से मणिपुर में सीमा पार से लोगों का लगातार प्रवेश होता रहा है.’
प्रतिनिधिमंडल ने यह भी दावा किया कि कई जनजातियां खुली सीमा से भारत में दाखिल हुई हैं और उन्होंने 1950 के अनुसूचित जनजाति आदेश के तहत अनुसूचित जनजाति की सूची का फ़ायदा उठाया है.
बयान में कहा गया, ‘मणिपुर में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का गहन अध्ययन करने की जरूरत है. इन्हीं परिवर्तनों के कारण विभिन्न समुदाय अलग प्रशासन या अधिक स्वायत्तता की मांग करने लगे हैं. हमारा दृढ़ विश्वास है कि मणिपुर में मौजूदा संघर्ष की वजह वे अवैध अप्रवासी हैं जो खुद को भारतीय नागरिक बताते हैं.’
मेईतेई समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले इन संगठनों का दावा है कि राज्य के ‘मूल निवासियों’ की चिंताओं का समाधान करने के लिए वर्ष 1951 के बाद बसने वाले अवैध प्रवासियों की ‘पहचान कर उन्हें देश से निष्कासित करने’ के लिए एनआरसी जरूरी है.
ज्ञात हो कि मणिपुर में मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय तनाव मई 2023 में हिंसा में बदल गया था. इसके बाद से हुई हिंसा में नागरिकों तथा राज्य और केंद्रीय सुरक्षा बलों के कर्मियों सहित 290 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं.
दोनों समुदाय अभी भी एक-दूसरे से भौतिक रूप से अलग हैं और उनके बीच ‘बफर ज़ोन’ बने हुए हैं, जहां सुरक्षा बल गश्त करते हैं.
फरवरी में राज्य में एक और जगह कुकी और नगा समुदायों के बीच संघर्ष शुरू हुआ, जिसमें दोनों समुदायों के सदस्य मारे गए, बंधक बनाए गए और उनके घर जला दिए गए.
