तामलुक आए हुए मुझे कुछ महीने हो गए थे. बरसात झमाझम बरसकर जा चुकी थी और 1995 के अक्तूबर का महीना भी अलविदा कह रहा था. हर दिन प्रातः तथा संध्या के पश्चात गांवों के चूल्हों से उठते धुएं के अलावा खेतों और सड़कों पर हल्का कोहरा भी तैरने लगा था. ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी के रूप में मेरा अधिकतर समय क्षेत्र का दौरा करने में बीतता था तथा आते-जाते मैं पश्चिम बंगाल के इस अति उर्वर क्षेत्र के बारे में नई-नई बातें भी जानता-सीखता जा रहा था.
मानसून के अलावा कई नदियों तथा दो बड़ी नहरों से सिंचित यह इलाक़ा धान के उत्पादन के लिए जाना जाता था. पर ऐसा न था कि इस इलाक़े में केवल धान की खेती होती थी. हां, जो कृषक केवल धान उगाते थे वह वर्ष में तीन फसल काट लेते थे. मगर मैंने पाया कि धान के अलावा यहां और भी बहुत कुछ होता है.
अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में एक दिन नंदकुमार चौराहे से आगे बढ़ने पर रास्ते के किनारे मैंने कुछ खेत देखे, जो लगभग पांच फुट ऊंचे बांस और लकड़ी के सघन बाड़ों से घिरे थे तथा ऊपर से भी फूस से आच्छादित लग रहे थे. इस घेरे के अंदर से हरियाली झलक रही थी. मैं समझ नहीं पाया कि इन खेतों में आख़िर उपजाया क्या जा रहा है.
उनकी ओर इशारा करते हुए मैंने ड्राइवर से पूछा, ‘ओखाने की चाश होच्चे? (वहां क्या उगाया जा रहा है?)’ ड्राइवर ने बिना सिर घुमाए बताया, ‘सार, पान चाश होच्चे. ओ गुलो पानेर बरोज. आपनी देखबेन? (सर, वहां पान की खेती हो रही है. वो पान के बरज हैं. क्या आप देखेंगे?)’
अब पान ऐसी चीज़ है जिसका पूरे भारत में तो प्रचलन है ही पर पूर्वी भारत में यह विशेष रूप से लोकप्रिय है. पूर्वी उत्तर प्रदेश से चलकर बिहार, झारखंड, ओडिशा, असम से होते हुए त्रिपुरा तक, जिधर निकल जाएं ऐसा कोई चौक न मिलेगा जहां पान की तीन-चार दुकानें धुंआधार धंधा न कर रही हों व जिनके आसपास लाल और कत्थई छटा न बिखरी हो.
1990 के दशक तक इन राज्यों में ग्राम में या शहर में हर श्रेणी के लोग यदा-कदा या फिर आदतन पान का सेवन करते थे या करना चाहते थे. चूंकि पान के पत्तों को शुभ मानकर हर पूजा में इसे जगह दी गई है और इसकी पाचक क्षमता का गुण गान हम सब छुटपन से ही सुनते चले आए हैं, पहले यह मान लिया जाता है कि सभी को पान खाना चाहिए फिर यह भुला दिया जाता है कि बहुधा पान जर्दा सेवन का बहाना है.
पश्चिम बंगाल में पान चबाना एक अत्यंत ही आम तथा स्वीकृत शग़ल है. मैंने देखा था कि मेदिनीपुर ज़िले में यह समझा जाता है कि अगर आप बालिग़ हैं तो अवश्य ही पान का सेवन करते होंगे. इसलिए किसी के घर जाने पर चाय या जलपान पेश करने से पहले आपको एक गिलास पानी दिया जाता था ताकि आप कुल्ला करके मुंह साफ़ कर लें.
बहरहाल, मैंने नज़दीक से पान का बरज नहीं देखा था इसलिए ड्राइवर के पूछने पर गाड़ी रोकने को कहा. समीप जाकर देखा तो पाया कि वस्तुतः बांस, लकड़ी, सरकंडे तथा फूस से चारों ओर लगभग पांच फुट ऊंची बाड़ें और ऊपर छाजन बनाया गया है. इससे तेज धूप, वर्षा और हवा से पान की नाज़ुक बेलों की रक्षा होती है तथा भीतर आर्द्रता और तापमान नियंत्रित रहता है. उस ढंके हुए खेत में क़रीब दो फुट के अंतर पर पांतों में लगी बांस की पतली बल्लियों अथवा डोरियों के सहारे पान की बेलों को ऊपर की ओर सावधानीपूर्वक चढ़ाया गया था.
पास के खेत में एक किसान बरज के अंदर पान से सजे बाड़ों के बीच घुसकर मटके से सिंचाई कर रहा था. उनसे बात करने पर पता लगा कि पान का पौधा बहुत ही कोमल होता है. तेज धूप पान के नरम पत्तों को जला सकती है और अत्याधिक पानी देने से बेलों की जड़ें सड़ सकती हैं. इस वजह से जहां एक ओर पान के कोमल पत्तों को धूप से बचाने के लिए बाड़े पर फूस बिछानी पड़ती है तो दूसरी ओर अधिक पानी न पड़ जाए इसलिए पान की सिंचाई बहुत सावधानी के साथ पोखर से मटके में जल लाकर की जाती है.
पान की सिंचाई की यह पारंपरिक पद्धति अब प्रायः लुप्त हो चुकी है. आज के युग में सिंचाई के साधनों में उल्लेखनीय आधुनिकीकरण हुआ है. पहले जहां तालाबों से हाथ से पानी लाकर पान की बेलों को सींचा जाता था, आज वहीं पंप, पीवीसी पाइपलाइन, सूक्ष्म सिंचाई साधन, स्प्रेयर और कुछ स्थानों पर सौर ऊर्जा चालित पंपों का उपयोग भी किया जा रहा है.
इस बदलाव से श्रम और जल की बचत तो हुई है पान की गुणवत्ता और उत्पादकता- दोनों में सुधार भी हुआ है. इसी प्रकार बरज बनाने की सामग्री में भी काफ़ी उन्नति हुई है. प्लास्टिक की महीन जाली, कृत्रिम रस्सियां, गैल्वनाइज़्ड तार, तथा आरसीसी के स्तंभों के उपयोग ने पान के बरज को अधिक टिकाऊ, कम श्रमसाध्य और रख-रखाव की दृष्टि से अधिक सुविधाजनक बना दिया है.
बरज के भीतर लगभग 70-90 प्रतिशत आर्द्रता बनाए रखने का प्रयास किया जाता है ताकि नियंत्रित नियमित सिंचाई और वायु-संचार द्वारा एक माइक्रो-क्लाइमेट बनाया जाए जिसमें उच्च गुणवत्ता का पान उगाया जा सके. वैसे तो पान की खेती देश के कई राज्यों में की जाती है- जैसे ओडिशा, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और कुछ अन्य कुछ दक्षिणी राज्यों में भी, पर बंगाल के पान की खेती की यह बरज प्रणाली बिल्कुल अनूठी है.
दौरे से वापस तामलुक पहुंचकर मैंने पता किया तो मालूम हुआ कि मेदिनीपुर का यह इलाक़ा (अब पूर्व मेदिनीपुर ज़िला) पश्चिम बंगाल में पान उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है. यहां बांग्ला, मीठा, सांची, काली बांग्ला तथा सिमुराली बांग्ला जैसी अनेक लोकप्रिय किस्मों की खेती की जाती है. जैसा अपेक्षित है तामलुक पान के व्यापार और विपणन का एक प्रमुख केंद्र भी बन गया है, जहां से पान भारत के विभिन्न राज्यों के अतिरिक्त मध्य-पूर्व और यूरोप के कई देशों तक हवाई मार्ग से भेजा जाता है.
1980-90 के दशक में आरंभ हुए गुटका चबाने के नाशक चलन ने पान कृषकों को कुछ तकलीफ़ दी थी, लेकिन 2012 से गुटका उत्पादन पर लगे प्रतिबंध ने राहत दी. पान के व्यवहार में कुछ कमी हुई, पर पश्चिम बंगाल तथा विशेषकर तामलुक में उच्च स्तर के पान की खेती में तथा इसके खेतिहरों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है.
पिछले चार दशकों में पान की खेती में व्यापक परिवर्तन हुआ है किंतु तामलुक के किसानों ने पान के बरज की मूल संरचना को नहीं त्यागा है, क्योंकि वही पान की उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए आवश्यक नम, छायादार और संतुलित सूक्ष्म जलवायु का सृजन करती है.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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