‘अगर आप इतने सशक्त हैं कि कला रच सकते हैं, तो इसके ज़रिये सामाजिक टिप्पणी करने की कोशिश करनी चाहिए’

साक्षात्कार: फिल्मकार-लेखक और पॉडकास्टर की पहचान रखने वाले आशीष साहनी मशहूर कहानीकार इस्मत चुगताई के नाती हैं. कुछ बरस पहले आशीष ने ट्रांसजेंडर और सिस जेंडर महिला फिल्मकारों को प्रोत्साहन तथा समर्थन देने के लिए इस्मत चुगताई पुरस्कार की स्थापना की थी. उनकी नई फिल्म, इस्मत आपा पर उनकी नई किताब और भारत की समकालीन क्वीर राजनीति जैसे विषयों पर उनसे बातचीत.

इस्मत चुगताई अपने नाती आशीष साहनी के साथ. (फोटो: गौतम राजाध्यक्ष)

मुंबई: फिल्मकार-लेखक और पॉडकास्टर आशीष साहनी मशहूर कहानीकार इस्मत चुगताई की बेटी के बेटे हैं. कठिन बचपन के बीच उन्हें अपनी नानी के घर में सुरक्षा और सशक्तीकरण का माहौल मिला. साहनी ने जीवन में एक लंबा सफर तय किया है. अब वे खुद को युवाओं को उनके रचनात्मक सफर में मदद करने के लिए उत्सुक एक बुजुर्ग क्वीर (Queer) की भूमिका में देखते हैं.

बीते महीने ‘प्राइड मंथ’ के दौरान 3-7 जून को मुंबई में 17वें कशिश फिल्म फेस्टिवल के दौरान उन्होंने ट्रांसजेंडर और सिस जेंडर महिला फिल्मकारों को प्रोत्साहन तथा समर्थन देने के लिए इस्मत चुगताई पुरस्कार की स्थापना के पीछे की सोच के बारे में विस्तार से चर्चा की.

उन्होंने 2023 में इस पुरस्कार की स्थापना की, जिसके तहत एक ट्रॉफी और नकद पुरस्कार दिया जाता है. यह पुरस्कार उन लेखक को श्रद्धांजलि है, जिसे दो स्त्रियों के बीच यौन अंतरंगता का चित्रण करने वाली उर्दू कहानी ‘लिहाफ’ लिखने के लिए कभी अश्लीलता के मुकदमे का सामना करना पड़ा था. इस कहानी को आज भी इसकी प्रसिद्धि और भारतीय साहित्य में समलैंगिकता प्रस्तुति के अकाल कारण खूब पढ़ा जाता है.

इस साक्षात्कार में साहनी ने अपनी नई फिल्म ‘द सेलर एंड द शेफ़’, चुगताई पर आ रही अपनी नई किताब और क्वीर संस्कृति की युवा केंद्रित प्रकृति और भारत की समकालीन क्वीर राजनीति जैसे मसलों पर चर्चा की. प्रस्तुत है आशीष साहनी से बातचीत के कुछ अंश.

आपने कशिश फिल्म महोत्सव में इस्मत आपा के नाम पर पुरस्कार स्थापित करने का फैसला कैसे लिया?

मुझे लगा कि उनके नाम पर पुरस्कार स्थापित करने के लिए कशिश महोत्सव सबसे अच्छी जगह है, खासकर यह देखते हुए कि इस्मत आपा ने हमेशा अपना जीवन मानवतावादी, विविधतावादी और समावेशिता आधारित सिद्धांतों के आधार पर जिया. यह एक सही चुनाव लगा क्योंकि मैं कशिश फिल्म महोत्सव में लगातार अपनी फिल्में दिखा रहा हूं और पैनल परिचर्चाओं में बोलता रहा हूं. जब मैंने इस पुरस्कार की योजना बारे में फेस्टिवल डायरेक्टर श्रीधर रंगायन और आर्टिस्टिक डायरेक्टर सागर गुप्ता को बताया, तो उन्होंने इसे पसंद किया और इसे तुरंत स्वीकार कर लिया.

आशीष साहनी. (फोटो: अरेंजमेंट)

इस्मत आपा के साथ वाले अपने जीवन का अनुभव साझा करना चाहेंगे?

मेरे माता-पिता (सीमा और नवीन साहनी), बैंगलोर में रहते थे. जब मैं चार साल का था, तब वे दोनों अलग हो गए. उसके बाद मैं अपनी नानी के साथ मरीन ड्राइव के नजदीक के उनके अपार्टमेंट में रहने के लिए मुंबई आ गया. मैंने 4 साल की उम्र से 14 साल की उम्र तक उनके साथ उनका कमरा साझा किया. उसके बाद मुझे अपना कमरा मिल गया. वे काफी असर डालने वाले साल थे. अपनी नानी के साथ रहने के लिए मैं हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा. उनकी मृत्यु 1991 में हुई, यानी वे मेरे 21 साल के होने तक जिंदा रहीं.

पाकिस्तान और विभाजन के बारे में उनके साथ किस तरह की बातचीत होती थी?

वे इस बात को लेकर काफी साफ थीं कि वे भारत इसलिए नहीं छोड़ना चाहती थीं क्योंकि भारत उनका वतन था. उन्हें पाकिस्तान आने के लिए वहां की सरकार ने खूब मनाने की कोशिश की, जैसा कि उनके मित्र सआदत हसन मंटो के साथ किया गया था. मंटो वहां गए, लेकिन उनका अंत सुखद नहीं रहा. इस्मत आपा ने भारत में रहना चुना. यह संघर्षपूर्ण था लेकिन वे हमेशा अपने फैसले पर खुश रहीं. उनके लिए पाकिस्तान जाने का सवाल ही नहीं उठता था.

मंटो पर दो बायोपिक फिल्में बनी हैं- एक सरमद खूसट की 2015 की फिल्म और एक नंदिता दास की. क्या लगता है कि इस्मत आपा पर अभी तक कोई फिल्म क्यों नहीं बन पाई है?

ऐसा इसलिए है क्योंकि अभी तक मुझे ऐसे लोग नहीं मिले हें, जो इसमें पैसा लगाने के लिए तैयार हों. आजकल जब सब कुछ व्यावसायिक और स्टार संचालित हो चुका है, बायोपिक फिल्में बनाना सचमुच मुश्किल है.

जब भी भारतीय किस्सागोई में, चाहे वह साहित्य हो या फिर सिनेमा हो, स्त्री समलैंगिकता की प्रस्तुति की बात होती है, लोगों के जेहन में तुरंत ‘लिहाफ’ और इस कहानी पर बनी दीपा मेहता की फिल्म ‘फायर’ का नाम आता है. ऐसी विरासत को उत्तराधिकार में पाकर और इसे आगे ले जाने को लेकर कैसा महसूस होता है?

मेरे लिए अपनी इस पहचान को सबके सामने लाना और इसे स्वीकार करना बेहद संघर्षपूर्ण रहा, खासकर 1990 के दशक में. तब इस बात के लिहाज़ से माहौल काफी ख़राब हुआ करता था. लेकिन कहीं न कहीं, मुझे यह लगा कि जब मेरी नानी, एक मुस्लिम महिला होकर, 1940 के दशक में स्त्री समलैंगिता पर ‘लिहाफ’ जैसी कहानी लिख पाईं, तो मेरे पास उस विरासत के साथ दगा करने का कोई विकल्प नहीं था. मुझे लगता है कि काफी पहले, मैंने यह महसूस किया कि मुझे उनके प्रति सच्चा रहना है. इसलिए मुझे खुद को सामने लाने का रास्ता तैयार करना था.

इस्मत आपा के दौर में हमारे पास जेंडर, लैंगिकता, संबंधों के लिए वह भाषा या खुद के बारे में दोस्तों और परिवार के बात करने की प्रक्रिया नहीं थी. भारत के पास उस समय क्वीर कलेक्टिव्स या प्राइड मार्च जैसी चीजें नहीं थीं. जब आप उस घर में बड़े हो रहे थे, उस समय दोस्ती या समर्थन कैसा दिखता था?

मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं अपने बचपन की कुछ पृष्ठभूमि आपको बताऊं. मैं थोड़ा गर्ली (लड़की जैसा) लड़का था, इसलिए मुझे चिढ़ाया और परेशान किया जाता था. वे हमेशा मुझसे कहा करती थीं, ‘तुम एक अलग तरह के लड़के हो, तुम इसे स्वीकार करो और इसके साथ जिओ. यह कठिन होगा, लेकिन अंततः तुम खुश होगे. अगर तुम अपने सच को स्वीकार नहीं करोगे, तो तुम्हारे लिए जिंदगी कठिन बन जाएगी.

जब मैं छोटा था, तब मैं वास्तव में नहीं समझता था कि वे जो बात कर रही हैं, वह मेरी सेक्शुअलिटी (लैंगिकता) को लेकर है. लेकिन वे साफ तौर पर देख सकती थीं कि मैं उस सांचे में फिट नहीं बैठ रहा था, जिसकी उम्मीद समाज लड़कों से करता है. लेकिन उन्होंने मेरे लिए अपने घर और अपने दिल में जगह बनाई.

2024 में क्वीरबीट में धीरेन बोरिसा और अखिल कात्याल का एक आलोचनात्मक लेख ‘कास्ट अंडर क्विल्ट’ प्रकाशित हुआ था. इसमें विचार किया गया है कि कैसे इस कहानी के अंग्रेजी अनुवादों ने उर्दू की मूल कहानी में जाति और इच्छाओं के रिश्ते पर दिए गए जोर को व्यवस्थित तरीके से फीका करने का काम किया गया है. यहां तक कि जातिगत संकेतों को भी छोड़ दिया गया है. इस पठत के बारे में आपका क्या कहना है?

मैंने पिछले दस पहले ही उर्दू सीखना शुरू किया. अब जबकि मैंने अपनी नानी की कहानियों को उसकी मूल भाषा में पढ़ा है, तब मैं यह देख सकता हूं कि अंग्रेजी अनुवादों ने जाति के पहलू पर लीपापोती की है. क्योंकि अगर आप उर्दू में कहानी को पढ़ते हैं, तो वहां इस बात के काफी स्पष्ट संदर्भ हैं कि दो औरतें-  बेगम जान ओर रब्बू दो अलहदा सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं. एक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग और उच्च जाति की है और दूसरी के बारे में स्पष्ट कहा जा सकता है कि वह इस वर्ग और जाति की नहीं है.

भारत में क्वीर अधिकार आंदोलन के भीतर कई धड़े बन गए हैं, क्योंकि क्वीर दलित पहचान और क्वीर मुस्लिम पहचान कई लोगों को असहज और असुरक्षित बना रही है, खासकर अगर वे बहुमतवादी विचारधाओं से जुड़े हुए हैं, जो दलित और मुस्लिमों को नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसे समय में ‘लिहाफ’ का पुनर्पाठ और पुनर्मूल्यांकन कैसे करें?

मुझे लगता है कि हमें इस कहानी का पाठ खुले दिमाग और एक उदारवादी दृष्टिकोण से करना चाहिए क्योकि यह एक शानदार कहानी है जो हमें पहचान की कई परतों को देखने का मौका देती है. कई लोगों को यह लगता है कि यह एक समावेशी कहानी है. लेकिन मुझे यह भी पता है कि कुछ समस्यादायक प्रस्तुतियों के कारण इसकी आलोचना भी की गई है. और ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने बूढे़ हो जाने तक मेरी नानी की आलोचना की, उन्हें गालियां दी. उन्हें नफरत भरी चिट्ठियां आया करती थीं. लोग उन्हें ‘लिहाफ’ लिखने के लिए जान से मार देने की धमकी दिया करते थे. वे वास्तव में कहा करती थीं कि लोगों ने मेरी पिटाई करने के लिए लिहाफ को अपना डंडा बना लिया है.

क्या पाठकों को यह भी लगता था कि उनके प्रेमियों में स्त्रियां भी शामिल हैं?

हां, मुझे लगता है कि उनकी सेक्शुएलिटी को लेकर काफी कौतूहल रहा है, क्योंकि उनकी पढ़ाई महिलाओं के संस्थान इसाबेला थोबर्न कॉलेज, लखनऊ में हुई, और उनके आत्मकथात्मक लेखन में वे उम्र में बड़ी लड़कियों को पसंद करने और उन पर लट्टू होने की बातें की हैं. लोगों ने इसके अर्थ निकाले हैं. हालांकि, उनकी स्त्री प्रेमिकाएं थीं या नहीं, यह एक रहस्य ही रहेगा.

कभी-कभी मैं यह सोचता हूं कि क्या लोग ‘समलैंगिता’ पर बात करने से इसलिए कतराते हैं क्योंकि इस पद का आविष्कार 19वीं सदी के उत्तरार्ध में किया गया था और हाल तक इसका इस्तेमाल मेडिकल या पैथोलालॉजिकल संदर्भ में किया जाता था. लेकिन दक्षिण एशियाई संस्कृति में समलिंगी कामेक्षा, आकर्षण, फ्लर्टिंग और रोमांस के अनुभवों और आख्यानों का अस्तित्व सदियों से रहा है. यह सही है कि अपने यौन झुकाव (ओरिएंटेशन) को सार्वजानिक तौर पर स्वीकार करना, सशक्तीकरण की वजह हो सकता है, लेकिन साथ ही क्या इससे लोग एक खास लेबल में फंसा हुआ महसूस नहीं कर सकते?

बिल्कुल. मैं आपसे सहमत हूं. मुझे लगता है कि लोग कभी-कभी अपने उपर कोई लेबल लगाने से झिझकते हैं, क्योंकि यह उनके लिए समस्या खड़ी करता है. बहुलतावाद हमारी संस्कृति और इतिहास के केंद्र में है.

1946 में लाहौर हाईकोर्ट में इस्मत आपा को लेकर फ़ुहश-निगारी (अश्लीलता) का मुकदमा चला क्योंकि लोगों को यह कहानी नागवगार गुजरी. पर कुछ दो साल पहले पेंगुइन के चिल्ड्रेन इंप्रिंट ने ममता नैनी और बरखा लोहिया की किताब ‘रेबेल विद अ कॉज़: हाउ इस्मतम चुगताई रीरोट द रूल्स फॉर गर्ल्स’ का प्रकाशन किया. इसे किस तरह से देखते हैं?

मैं इसे दुनिया में हुए बदलाव कि एक निशानी के तौर पर देखता हूं. और यह खूबसूरत है. है न! आज उन्हें दूसरे लेंस से देखा जाता है, इसलिए बच्चों को भी उनकी कहानी पढ़ने को मिलेगी. वास्तव में मैं खुद भी एक बच्चों की किताब पर काम कर रहा हूं. यह किताब उनके बचपन पर, उनके साथ मेरे बचपन पर और एक फिल्म निर्माता के तौर पर मेरे करिअर में उनसे मिली प्रेरणा पर है.

यह उनका असर है कि मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि अगर आप इतने सशक्त हैं कि कला की रचना कर सकते हैं, तो इसमें सामाजिक टिप्पणी की परत भी शामिल करने की कोशिश कीजिए.

आपने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘सेलर एंड द शेफ़’ भी बनाई है, जिसका प्रीमियर इस बार कशिश फिल्म फेस्टिवल में किया गया. आपने 30 सालों से साथ रहे इन समलैंगिक पुरुषों की खोज कैसे की और इन पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?

जब मैं उम्र के छठे दशक मैं पहुंचा, तब मुझे यह लगने लगा कि एक फिल्मकार के तौर पर मेरा फोकस एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के विभिन्न पहलुओं पर रहा है, लेकिन बुजुर्ग आबादी की ओर मेरा ध्यान नहीं गया. इसलिए मैं अपनी कम्युनिटी के बूढ़े लोगों से मिलना और उनकी कहानियां सुनना शुरू किया.

इसी दौरान मेरी मुलाकात पीयूष से, जो इस इस टाइटल का सेलर है और सुशील से हुई जो शेफ़ है. उनकी कहानी सचमुच प्यारी है. दोनों एक साधारण मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं. यह कहानी संयोग से उनके मिलने, उनके बीच हुई दोस्ती और अपने लिए एक छोटी-सी सुंदर दुनिया बनाने, अपने परिवारों को अपने बारे में बताने और शादी के सवाल से टकराने के बारे में है. मुझे यह काफी प्रेरणादायक लगा.

पीयूष को दिल का दौरा पड़ा था और उसे एक्सरसाइज करने के लिए कहा गया था. यही वह वक्त था जब सुशील ने कहा था कि ‘हम डांस क्यों नहीं शुरू करते हैं?’ उन्हें इसमें इतना आनंद आया कि वे औपचारिक रूप से डांस सीखने लगे और अब वे स्थानीय कम्युनिटी कार्यक्रमों में आनंद के लिए डांस की प्रस्तुति भी देते हैं. उन्हें ‘डांसिंग डैडीज’ कहा जाता है. वे इस फिल्म में एक सकारात्मक और प्रेरक ऊर्जा भरते हैं.

क्या यह कहना उचित होगा कि भारत में और शायद दुनियाभर में क्वीर संस्कृति सामान्य तौर पर युवा केंद्रित है? क्या यह भी एक कारण रहा इस फिल्म को बनाने का.

हां, पूरी तरह से. युवा-केंद्रित होने के अलावा क्वीर संस्कृति कई स्तरों पर फासीवादी भी हो सकती है, खासकर समलैंगिक पुरुष (गे) समुदायों में. इसका सारा लेना-देना इस बात से है कि आप कैसे लगते हैं? आपके सिक्स पैक्स हैं, आप कौन से लेबल पहनते हैं और आपकी लाइफस्टाइल कैसी है. वहां काफी शेमिंग (शर्मिंदा किया जाना) है. वहां ऐसे लोग हैं, जो मोटे लोग, फेम (पारंपरिक स्त्री की तरह व्यवहार करने वाली लेस्बियन या क्वीर व्यक्ति) या बुजुर्ग लोगों का स्वागत नहीं करते हैं.

सिनेमा में सेलर का जो किरदार है, समलैंगिक पुरुषों में, साथ ही साथ पोर्नोग्राफी में भी उसको लेकर काफी आकर्षण है. क्या सेलर एंड द शेफ़ का निर्माण करते वक्त इस इतिहास का आपको ध्यान था?

मैं रेनर वर्नर फासबाइंडर की फिल्म ‘कुरेल’ के बारे में सोच रहा था. यह जीन जेनेट के उपन्यास ‘कुरेल द ब्रेस्ट’ पर आधारित है, जिसमें एक बेल्जियन सेलर (नाविक) की कहानी कही गई है. मैं जेनेट का बड़ा प्रशंसक हूं.

मध्यवर्गीय एलजीबीटीक्यू+ लोग अपने परिवारों और साथियों के बीच अपनी पहचान उजागर करने के लिए वित्तीय रूप से सुरक्षित होने का इंतजार करते हैं. लेकिन यह भी देखा गया है कि सुविधासंपन्न वर्गों और खानदानी रईस घरों में जन्म लेने वाले लोग खोल में बंद रहना पसंद करते हैं. वे अपनी बेहतर स्थिति और आवाज का इस्तेमाल अपनी कम्युनिटी के लिए नहीं करते हैं. आपने अपने लिए सही दिशा की पहचान कैसे की?

आपके सवाल से मुझे मेरी नानी और मेरे बचपन के दोस्त रियाद वाडिया, जो  एक भारतीय फिल्मकार हैं, जिन्होंने बॉमगे (1996) की फिल्म बनाई है, की याद आ रही है. हमारे बीच इस विषय पर चर्चा होती थी. शुरू में जब मैंने काम करना शुरू किया तो मुझे डर लगता था. मैं एक फिल्म डायरेक्टर बनने के लिए अपने क्वीरनेस (लैंगिकता) को छिपाना चाहता था. उस समय ऐसे डायरेक्टर नहीं थे, क्वीर के तौर पर अपनी पहचान को सामने रख चुके हों. लेकिन क्वीर मेकअप आर्टिस्ट, फैशन डिजाइनर और डांसर थे. क्वीर को को कुछ खास पेशों तक सीमित कर दिया गया था.

मेरे पास एक वर्गीय सुविधा के साथ-साथ जाति और शिक्षा की भी सुविधा थी. साथ ही मैं हिंदू-मुस्लिम विवाह की संतान हूं. हमारे पास ये सारी अलग-अलग पहचान एक साथ आ गई हैं. मुझे पुरुष सेक्सवर्कर्स के बोर में हैप्पी हूकर्स (2006) और कमिंग आउट स्टोरीज (2016) जैसी फिल्में बनाने और नेटफ्लिक्स की छह एपिसोड वाली डॉक्यूमेंट्री सीरीज बिग डे (2021) का सीरीज डायरेक्टर होने की खुशी है, जिसमें एक पूरा एपिसोड विवाह करने वाले एक समलैंगिक पुरुष (गे) जोड़े के बारे में है.

मुझे ज़ोया अख्तर और रीमा कागती के शो ‘मेड इन हेवन’ पर गर्व है, जिसमें मैंने अभिनय किया. यह क्वीर संबंधों को संवेदनशील तरीके से दिखाता है. मैंने कहानियां लिखी हैं जो मीनल हजरतवाला द्वारा किए गए संकलन ‘आउट! स्टोरीज फ्रॉम द न्यू क्वीर इंडिया’ (2012) और पवन ढल के संकलन ‘क्वीर पोटली: मेमोरीज, इमैजिनेशन एंड री-इमैजिनेशंस ऑफ अर्बन क्वीर स्पेसेज इन इंडिया’ में प्रकाशित हुई हैं.

मुझे नहीं पता कि मैंने खुद को सामने लाने का कोई खामियाजा भुगता या नहीं. शायद हां. शायद मुझे काम का नुकसान हुआ हो. मेरी ज्यादा फिल्में सेल्फ फंडेड हैं. लेकिन मैं एक सुखी आदमी की तरह कब्र में जाऊंगा. और यही वह चीज है जो मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखती है.

(चिंतन गिरीश मोदी, लेखक, शिक्षक और साहित्य आलोचक हैं. उनकी रचनाएं बॉर्डरलीनेस: खंड 1 (2015), क्यिलर होल्ड बिल्ड (2019) और बेंट बुक (2000) आदि कई संग्रहों में प्रकाशित हैं. उनसे @chintanwriting पर इंस्टाग्राम और एक्स पर संपर्क किया जा सकता है.)

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