ग़ज़ा आज दुनिया के सबसे अधिक चर्चित भूभागों में से एक है. पिछले दो वर्षों में वहां की तबाही, बमबारी, विस्थापन और नागरिकों की मौतों ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. लेकिन फ़िलिस्तीन की त्रासदी 7 अक्तूबर 2023 से शुरू नहीं हुई. यह एक लंबा इतिहास है—बेदख़ली, निर्वासन, शरणार्थी जीवन और प्रतिरोध का इतिहास. इस इतिहास को समझने के लिए केवल समाचार पर्याप्त नहीं हैं; साहित्य की भी आवश्यकता है. यही वह जगह है जहां ग़स्सान कनफ़ानी हमारे सामने आते हैं.
‘ग़ज़ा से ख़त’ फ़िलिस्तीनी लेखक, पत्रकार, विचारक और क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यकर्ता ग़स्सान कनफ़ानी की कहानियों का संग्रह है. कनफ़ानी उन दुर्लभ लेखकों में हैं जिनके लिए लेखन और राजनीतिक संघर्ष दो अलग-अलग कर्म नहीं थे. वे सच्चे अर्थों में ‘योद्धा लेखक’ थे. वे पॉपुलर फ़्रंट फ़ॉर द लिबरेशन ऑफ़ फ़िलिस्तीन (पीएफएलपी) के प्रमुख प्रवक्ताओं में थे, राजनीतिक लेख और वैचारिक निबंध लिखते थे, फ़िलिस्तीनी मुक्ति आंदोलन की बौद्धिक आवाज़ थे और साथ ही ऐसी कहानियां रचते थे जिन्हें आज विश्व साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है. उनकी साहित्यिक और राजनीतिक उपस्थिति इतनी प्रभावशाली थी कि 8 जुलाई 1972 को इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने बेरूत में कार बम विस्फोट कर उनकी हत्या कर दी. वे केवल छत्तीस वर्ष के थे.
पेश है ‘ग़ज़ा से ख़त’ की पहली कहानी. इस पुस्तक का मूल लेखन अरबी में है, जिसका उर्दू अनुवाद इनाम नदीम ने किया है और उर्दू से हिंदी में लिप्यंतरण शहादत ने किया है.
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चुराई हुई क़मीज़
उसने अपना सिर उठाकर अंधेरे आसमान की ओर देखा, एक कुफ़्रिया गाली उसकी ज़बान से निकलते-निकलते रह गई. काले बादल बसालट पत्थर के टुकड़ों की तरह एक-दूसरे से टकराते, फिर बिखर जाते. बारिश इतनी तेज़ हो रही थी कि आज रुकने से रही, मतलब आज फिर उसे सोना नसीब नहीं होगा, सारी रात उसे उसी कुदाल पर झुके हुए गुजारनी होगी. वह एक नाली खोद रहा था ताकि तेज़ बारिश की वजह से गंदा पानी उसके ख़ेमे की ख़ूंटियों के पास इकट्ठा न हो.
इस दौरान, उसकी पीठ न सिर्फ़ लगातार हो रही बारिश की मार की आदी हो चुकी थी बल्कि उसका लुत्फ़ भी लेने लगी थी. एकाएक उसके नाक के नथनों में कहीं से धुआं आता महसूस हुआ. ओह, वाह! उसकी बीवी ने रोटी पकाने के लिए आग जलाई थी, वह जल्द-से-जल्द गड्ढा खोदकर ख़ेमे के अंदर जाना चाहता था ताकि अपने हाथ सेंक सके, उसके दोनो हाथ इतने ठंडे हो चुके थे कि अंदर जाते ही वह उन्हें आग में घुसेड़ देना चाहता था. फिर चाहे हाथ जले या रहे! इतना तो वह बड़ी आसानी से कर सकता था कि जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा लेकर उसे फ़ुर्ती से दोनों हाथों पर लगातार रगड़ता रहे, बर्फ बन चुके उसके हाथों को इससे कम में राहत नहीं मिलने वाली थी!
लेकिन वह इस ख़ेमे में दाख़िल होने से डरता है, वह उस ख़ौफ़नाक सवाल का सामना करने से डरता है, जो उसकी बीवी के हल्क में लंबे समय से कुंडली मारे बैठा है. नहीं! ये ठंड़क उस ख़ौफ़नाक सवाल से कम जानलेवा है. ख़ेमे के अंदर जाते ही आटा गूंथ रही उसकी बीवी की नज़रें उसके पूरे वजूद को छलनी कर देगी, कोई काम मिला? खाएंगे क्या? फलां, फलां को काम मिल गया, तुम्हें कैसे नहीं मिला? फिर ख़ेमे के एक कोने में भीगी बिल्ली की तरह पड़े हुए अब्दुलरहमान की तरफ इशारा करके ख़ामोशी के साथ अपना सिर हिलाएगी, ये ख़ामोश जुबिंश उसे ख़ून के आंसू रुला देती. हर रात की तरह आज की रात भी उसके पास सिर्फ़ यही जवाब था-
‘क्या तुम चाहती हो कि मैं अपने बेटे अब्दुलरहमान की मुश्किलों को ख़त्म करने के लिए कहीं जाकर चोरी करुं?’
उसने कराहते हुए अपनी कमर सीधी की, कुछ ही देर में उसे अपनी टूटी हुई कुदाल का सहारा लेना पड़ा. उसकी निगाहें मायूसी की चादर लपेटे ख़ेमे पर जमी हुई थी और वह बेहद परेशानी के आलम में सोच रहा था- क्यों न चोरी ही कर ली जाए?
इंटरनेशनल एड एजेंसी का गोदाम ख़ेमों के पास में ही है अगर उसने चोरी करने की ठान ही ली तो किसी तरह आटे और चावल की बोरियों तक पहुंच बना ही लेगा. अंदर घुसने के लिए कहीं से सुराख तो मिलेगा ही, फिर गोदाम में पड़ा माल किसी की हलाल कमाई थोड़े ही है. ये सब माल वहां से आया है. एक दिन अब्दुलरहमान को स्कूल टीचर ने बताया था कि ये सब माल ऐसे लोगों के पास से आता है, जो आदमी को मारकर उसी के जनाज़े में शामिल होते हैं. किसी का क्या बिगड़ जाएगा अगर वह एक बोरी, दो बोरी या दस बोरी आटा चुरा ले? क्या हो जाएगा अगर वह कुछ आटा उन लोगों के हाथों बेच दे जो सूंघकर चोरी किए माल का पता लगा लेते हैं और फिर उसका भाव करने में ग़ैर-मामूली होशियारी दिखाते हैं.
उसके मन में लड्डू फूट रहे थे. वह एक नए हौसले के साथ ख़ेमे के चारो ओर गड्ढा खोदने लगा. उसने सोचा क्यों न इस योजना का आग़ाज़ आज ही से कर दिया जाए? मूसलाधार बारिश हो रही है, इतनी ठंडक है कि चौकीदार खुद अपनी जान की ख़ैर मना रहा होगा, गोदाम की पहरेदारी क्या करेगा? तो क्यों न आज ही शुरुआत कर दी जाए?
‘क्या कर रहे हो, अबू अब्द?’
उसने अपना सिर आवाज़ की दिशा में उठाया, दूर लाइन से लगे ख़ेमों के बीच से अबू समीर उसकी तरफ़ आता महसूस हुआ.
‘आटा खोद रहा हूं…’
‘क्या खोद रहे हो?’
‘गड्ढा… गड्ढा… खोद… रहा हूं…’
अबू समीर का तूफ़ानी क़हक़हा उसके चारो ओर गूंज गया, फिर वह बड़बड़ाते हुए बोला, ‘लगता है आटे के बारे में सोच रहे हो. आटे का बंटवारा आने वाले महीने की दसवीं तारीख़ के बाद ही होगा, यानी आज से तक़रीबन पंद्रह दिन बाद. इसलिए अभी से ख़्याली पुलाव मत पकाओ, वहां अगर गोदाम से एक-दो बोरी उधार लेनी है तो बात अलग है…’
अबू समीर अपने हाथ से गोदाम की तरफ़ इशारा कर रहा था, उसके मोटे-मोटे होंठों पर एक शैतानी मुस्कुराहट तैर रही थी.
अबू अब्द स्थिति की गंभीरता को समझ चुका था, वह ख़ामोशी के साथ झुका और अपनी टूटी हुई कुदाल लेकर फिर सरगर्मी से काम में जुट गया.
‘ये सिगरेट लो… लेकिन इस मूसलाधार बारिश में इसका कोई फ़ायदा नहीं… मैं तो भूल ही गया था कि बारिश हो रही है… मेरा दिमाग़ भी ना, एक दम ख़राब हो चुका है, लगता है उसमें भी आटा भर गया है…’
जैसे अबू अब्द का दम घुटने लगा हो, ये ख़बीस अबू समीर… उसको वह एक लंबे समय से सख़्त नापसंद करता था.
‘इस बारिश में बाहर क्यों निकले हो?’
‘मैं… मैं निकला था कि अगर कोई ज़रूरत हो तो तुम्हारी मदद करूं.’
‘नहीं… शुक्रिया…’
‘ये खोदने-खादने का काम ज़्यादा देर तक चलेगा क्या?’
‘तक़रीबन पूरी रात…’
‘कितनी बार तुमसे कहा है कि गड्ढा दिन में खोदा करो. दिन में तो ख़ेमा छोड़कर पता नहीं कहां चले जाते हो… ख़ातिम सुलेमानी की तलाश में जाते हो क्या?’
‘नहीं… काम की तलाश में…’
उसने अपना सिर कुदाल से उठाया और हांफते हुए बोला…
‘जाकर सो क्यों नही जाते? मुझे अकेला नहीं छोड़ सकते?’
अबू समीर धीमी चाल से उसके पास आया और अपना हाथ उसके कंधे पर रखकर घुटी हुई आवाज में बोला,
‘सुनो, अबू अब्द अगर अभी आटे की बोरी अपने सामने चलती देखो तो किसी को बताना मत!’
‘कैसे?’
अबू अब्द का दिल जोरों से धड़क रहा था, उसकी आंखें फटी हुई थी, अबू समीर के मुंह से तम्बाकू की बू आ रही थी. वह फुसफुसा रहा था,
‘आटे की बोरियां रात के वक्त निकलती है और वहां चली जाती है…’
‘कहां?’
‘वहां…’
अबू अब्द ने अबू समीर का इशारा देखने की कोशिश की, लेकिन यह क्या? उसके हाथ तो उसके पहलू के साथ ही लटके हुए थे, अबू समीर ने धीमी आवाज़ में सरगोशी की,
‘नहीं, तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’
अबू समीर ने नहीं में सिर हिलाया, ख़ुशी के मारे उसकी बांछे खिल गई थी, फिर वह राज़दार अंदाज में बोला,
‘आटे की बोरियां ख़ुद ही निकलती है… चहलक़दमी करने के लिए!’
‘पागल हो गए हो…’
‘नहीं… बल्कि तुम बुद्धू हो… सुनो, सीधे काम की बात करते हैं. हमें गोदाम से आटे की बोरियां निकाल के वहां ले जानी है, चौकीदार हमेशा की तरह सारा मामला संभाल लेगा. बेचने की ज़िम्मेदारी न मेरी, न तुम्हारी, एजेंसी में नौकर गोरा अमेरिकी यह काम कर लेगा… आंखें मत फाड़ो, आपस में रज़ामंदी हो तो सब जायज़ है. अमेरिकी माल बेचेगा, मैं अपना हिस्सा लूंगा, चौकीदार अपना… तुम्हारा हिस्सा तुम्हारे हवाले, सब कुछ आपसी रज़ामंदी और साझेदारी से होगा, क्या कहते हो?’
उसकी बात सुनकर अबू अब्द को लगा कि मामला एक, दो या दस बोरियां चुराने का नहीं, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा पेचीदा है, यक़ीनन कोई-न-कोई गड़बड़ है… उसने सोचा कि इस इंसान के साथ कोई काम नहीं करना चाहिए… पूरी बस्ती में मशहूर था कि ये भरोसे के क़ाबिल नहीं… लेकिन इसके साथ ही उसके मन के किसी कोने में रंगीन इच्छाएं भी अंगड़ाई लेने लगी थीं, एक दिन उसके हाथ में अब्दुलरहमान के लिए नई शर्ट होगी, मुद्दत गुज़र गई अपनी बीवी के लिए वह कोई तोहफ़ा नहीं लाया, उस दिन उसके लिए ढेर सारे तोहफ़े ख़रीदकर लाएगा, दोनों ख़ुशी के मारे फूले नहीं समाएंगे. कितनी दिलकश होगी उनकी मुस्कुराहट! सिर्फ़ अब्दुलरहमान इस क़ाबिल है कि उस पर निसार हुआ जाया जाए. लेकिन अगर उसके हाथ नाकामी लगी तो?
उसके बीवी-बच्चे की तो दुनिया ही ख़त्म हो जाएगी… अब्दुलरहमान को जूता पॉलिश का बॉक्स लिए हुए गलियों में भटकना पड़ेगा, उसके नन्हे-मुन्ने हाथ जूता चमकाएंगे और सिर ताबदारी में हिलता रहेगा, भयानक अंजाम! लेकिन अगर वह क़ामयाब हो गया तो अब्दुलरहमान एक नए इंसान की शक्ल में नमूदार होगा, उसकी बीवी की आंखों से भी वो ख़ौफ़नाक सवाल हमेशा के लिए ग़ायब हो जाएगा और न ही हर बारिश वाली रात में गड्ढा खोदने के लिए वह मजबूर होगा. इसके बाद तो उसकी ज़िंदगी की रंगत ही बदल जाएगी.
‘इस मनहूस गड्ढे का खोदना बंद क्यों नहीं कर देते? पौ फूटने से पहले ही काम शुरू हो जाना चाहिए.’
हां, वह यह गड्ढा खोदना बंद क्यों नहीं कर देता? अब्दुलरहमान ख़ेमे के एक कोने में पड़ा सर्दी के मारे कराह रहा है, उसे महसूस हो रहा था कि अब्दुलरहमान की सांसें उसके ठंड़े माथे को जला डालेगी… वह अब्दुलरहमान को उस कमज़ोरी और ख़ौफ़ से बचाना चाहता था, बारिश लगभग बंद हो चुकी थी, चांद आसमान में अठखेलियां करता आगे बढ़ रहा था…
अबू समीर एक अंधेरे साये की तरह उसके सामने खड़ा था, उसके भारी-भरकम पैर कीचड़ में धंसे हुए थे और उसने अपने पुराने कोट का कॉलर उठाकर अपने कानों पर कर लिया था. वह अब भी अबू अब्द के जवाब का इंतज़ार कर रहा था. ये इंसान जो उसके सामने खड़ा है, उसके पास एक नए और आरामदायक भविष्य की चाबी है. ये मुझसे गोदाम से बोरियां उठवाकर कहीं ले जाना चाहता है, किसी ऐसी जगह जहां कोई गोरा अमेरिकी हर महीने आता है, आटे की बोरियों के पास खड़ा होता है और अपने गोरे हाथ मसल-मसल कर हंसता है, हंसते वक्त उसकी नीली आंखों में वही चमक होती है, जो किसी बदनसीब चूहे का शिकार करते वक्त बिल्ली की आँखों में होती है.
‘तुम कब से चौकीदार और अमेरिकी के साथ काम कर रहे हो?’ उसने पूछा.
‘तुम क्या चाहते हो? मेरी जांच-पड़ताल करना चाहते हो या आटे की क़ीमत लेकर अपनी पसंद की चीज़ें ख़रीदना चाहते हो? सुनो, ये अमेरिकी मेरा दोस्त है, उसे ख़तरनाक काम करने पसंद हैं. वह मुझसे हमेशा कहता है कि प्लानिंग वग़ैरह के लिए वक्त पहले से रखा करो. उसे तय वक्त में देरी बिल्कुल पसंद नहीं… हमें अब काम शुरू करना होगा. जल्दी करो…’
उसके मन में आटे की बोरियों के सामने खड़े उस अमेरिकी की तस्वीर फिर से उभरी. उसकी छोटी नीली आंखों में हंसी थी और वह मारे ख़ुशी से अपने गोरे हाथ मसल रहा था. उसे सख़्त कोफ़्त महसूस हुई. उसे लगा कि जिस वक्त वह ख़ेमों का चक्कर लगाकर लोगों को ये बता रहा था कि राशन का बंटवारा अगले महीने की दस तारीख़ तक टल गया है, उस वक्त वह अमेरिकी कहीं आटा बेच रहा था. उसके अंदर एकाएक इंतक़ाम का जज़्बा पैदा हो गया. वह उस दिन को याद करने लगा जब वह गोदाम से ख़ाली हाथ लौटकर आया था और अपनी बीवी से मुरझाई आवाज़ में कहा था कि आटे का बंटवारा दस दिन के लिए टाल दिया गया है, तो अगले ही लम्हे उसकी बीवी के सांवले पड़ चुके थके चेहरे पर दर्दनाक मायूसी के साये लहरा गए थे, वह ख़ामोशी के साथ उसके कंधे से फांसी के फंदे की तरह लटके आटे की ख़ाली बोरी देख रही थी. उसकी नज़रें कह रही थी कि उन्हें आटे के बगैर दस दिन गुजारने होंगे, उसके हल्क में जैसे नागफनी के लम्बे और नुकीले कांटे फंस गए थे, लगता है अब्दुलरहमान भी स्थिति को समझता था, तभी तो वह खाना मांगने में जिद नहीं करता था…
शरणार्थियों की इस बस्ती में हर किसी की आंखों में यही मायूसी छाई हुई थी, हर बच्चे को रोटी के लिए दस दिन का इंतज़ार करना पड़ता था. अच्छा, तो ख़ैर यह वजह है, अबू समीर उसके सामने अंधेरे साये की तरह खड़ा था, उसके पांव मिट्टी में धंसे हुए थे और वह अपने प्रस्ताव का नतीजा जानने के लिए बेक़रार था. यही अबू समीर और वह अमेरिकी गोरा इस ख़्यानत के लिए ज़िम्मेदार है. अमेरिकी आटे की बोरियों के सामने खड़ा अपने गोरे हाथ मसल रहा है और उसकी छोटी नीली आँखों से हँसी के फ़व्वारे फूट रहे हैं…
उसे नहीं मालूम कि कैसे उसने पूरी ताक़त से कुदाल उठाकर अबू समीर के सिर पर दे मारी. उसे ये भी नहीं मालूम कि कैसे उसकी बीवी उसे घसीटकर अबू समीर की लाश से दूर ले गई, हां, जब उसकी बीवी उसे घसीटकर ख़ेमे के अंदर ले जा रही थी तो वह चीख़-चीख़कर कह रहा था कि इस महीने आटे का बंटवारा मुल्तवी (स्थगित) नहीं होगा…
उसे जब होश आया तो वह ख़ेमे के अंदर पड़ा था, उसका जिस्म पानी और कीचड़ से लथपथ था. उसने झट से अपने बेटे अब्दुलरहमान को सीने से लगा लिया और उसके पीले पड़ चुके चेहरे को घूरने लगा.
वह अपने बेटे के चेहरे पर मुस्कुराहट के चिह्न देखना चाहता था. वही मुस्कुराहट जो नई शर्ट पाकर ज़ाहिर होती है.
लेकिन वह रोने लगा…
(साभार- आस प्रकाशन)
