नई दिल्ली: नोएडा के गेझा गांव में सीवर सफाई के दौरान एक सफाईकर्मी के मौत का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासन को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है. बताया जा रहा है कि यह सीवर सफाई का काम नोएडा प्राधिकरण की ओर से करवाया जा रहा था, जिसमें सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और लापरवाही के आरोप लगाए जा रहे हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने बुधवार (15 जुलाई) को जानकारी दी कि नोएडा प्राधिकरण की ओर से सेक्टर 93 के गेझा गांव में सफाई का काम चल रहा था. इस दौरान एक 28 वर्षीय सफाई कर्मचारी की सीवर लाइन में उतरने के बाद मौत हो गई.
पुलिस के अनुसार, इस संबंध में मृतक शिवा के साथ काम करने वाले लोगों ने शाम करीब 7:30 बजे फेज-2 पुलिस थाने को घटना की सूचना दी थी, जिसके बाद टीम मौके पर पहुंची और सफाईकर्मी को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
पुलिस ने यह भी बताया कि प्राधिकरण और ठेकेदार के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.
अधिकारी के अनुसार, ‘सीवर में घुसने से पहले सफाईकर्मी ऑक्सीजन पाइप लगाते हैं और सेफ्टी बेल्ट पहनते हैं, वे आमतौर पर 10 से 15 मिनट तक अंदर रहते हैं. हमें शक है कि सेफ्टी बेल्ट से जुड़ी रस्सी शायद सीवर के अंदर कहीं फंस गई थी, जिसकी वजह से शिवा बाहर नहीं निकल पाया.’
वहीं, पुलिस को शक है कि ज़हरीली गैस सफाईकर्मी के सांस लेने के उपकरण में चली गई होगी या उसमें पानी रिस गया होगा, जिससे वह बाहर नहीं निकल पाए. अधिकारियों ने बताया कि मौत की असली वजह पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल पाएगी.
इस घटना को लेकर नोएडा प्राधिकरण महाप्रबंधक (जल-सीवर) आरपी सिंह ने बताया कि ठेकेदार ने शाम साढ़े छह बजे सफाईकर्मी को सीवर में उतारा था, जो नियम के विरुद्ध है, क्योंकि पांच बजे के बाद सीवर की सफाई प्रतिबंधित है, जिसके तमाम आदेश पूर्व में जारी किए जा चुके है. यही नहीं प्राधिकरण के पास तीन सुपर सकर मशीन खुद की है, दो प्राइवेट ले रखी है, छह सीवर क्लीनिंग मशीन है, जिनके जरिए सीवर की सफाई कराई जानी चाहिए, लेकिन ठेकेदार इन मशीनों के बगैर सीवर की सफाई करवा रहा था.
इस हादसे के संबंध में एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि सफाईकर्मी शिवा को सीवर की सफाई के लिए अंदर उतरा गया था. काफी देर तक जब वह बाहर नहीं आए, तो वहां मौजूद साथियों को चिंता हुई. इसके बाद उन्हें बाहर निकालने का प्रयास किया गया और तत्काल पास के अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. इस दौरान अस्पताल के बाहर सफाईकर्मियों द्वारा प्रशासन के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की गई.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है. यह भी पता लगाया जा रहा है कि सीवर सफाई के दौरान निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था या नहीं और सफाईकर्मी को आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए थे या नहीं. फिलहाल, पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई में जुटी है.
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, जानकारों का कहना है कि सीवर सिस्टम में अक्सर मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी खतरनाक गैसें होती हैं. बंद जगहों पर इन गैसों के संपर्क में आने से कोई व्यक्ति कुछ ही मिनटों में बेहोश हो सकता है और अगर तुरंत बचाव न किया जाए, तो यह जानलेवा भी साबित हो सकता है.
जानकार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि किसी भी सफाईकर्मी को गैस की जांच, हवा आने-जाने की सही व्यवस्था और सुरक्षा उपकरणों के बिना सीवर में नहीं उतरना चाहिए.
गौरतलब है कि नोएडा में पहले भी ऐसी दुखद घटनाएं हो चुकी हैं. जुलाई 2023 में सेक्टर 137 की एक रिहायशी सोसाइटी में सीवर टैंक की सफाई के दौरान ज़हरीली गैस की चपेट में आने से दो श्रमिकों की मौत हो गई थी. इसी घटना में एक और श्रमिक गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था.
इससे पहले सितंबर 2021 में सेक्टर 62 में सीवर की सफाई के दौरान एक सफाईकर्मी की मौत हो गई थी; तब जांच में सुरक्षा के अपर्याप्त इंतज़ामों की बात सामने आई थी.
2026 में सौ से अधिक लोग सीवर में जान गंवा चुके हैं
उल्लेखनीय है कि हाल ही में देश में हाथ से मैला ढोने के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेतृत्व करने वाले सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने एक बायन जारी कर कहा था कि इस साल सीवर में मरने वालों की संख्या 100 के पार पहुंच गई है.
8 जुलाई को जारी एक बयान में विल्सन ने बताया था कि सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 188 दिनों में देशभर में सीवर और सेप्टिक टैंकों में अब तक 101 लोगों की मौत हो चुकी है. अकेले दिल्ली क्षेत्र में 12 मौतें दर्ज की गई हैं.
इसमें आगे बताया गया कि सीवर में सफाई के दौरान होने वाली मौतों में इस साल भयावह वृद्धि हुई है, बीते 2025 के पूरे साल के दौरान 121 मौतें दर्ज की गई थीं.
संगठन का कहना है कि देश में हर 45 घंटे में सीवर में एक मौत हो रही है. बावजूद इसके सरकारें इस मामले में आपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि दलितों की जान सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखती और यह एक सामान्य बात बन गई है. इस प्रथा की व्यापकता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस साल 16 राज्यों से सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों की खबरें आई हैं.
सफाई कर्मचारी आंदोलन ने बताया कि 2016 में सीवर में मौत की केवल 39 मौतें दर्ज की गई थीं, जो अगले वर्ष 2017 में 350% बढ़कर 137 हो गईं.
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और उसके बाद ‘हाथ से मैला ढोने वालों के रोज़गार पर प्रतिबंध और उनके पुनर्वास अधिनियम’, 2013 के लागू होने के बाद उम्मीद थी कि सरकारें इस दिशा में सक्रिय कदम उठाएंगी. लेकिन संगठन ने नए अधिनियम के लागू होने के बाद से 1726 मौतों का दस्तावेजीकरण किया है.
इनमें से 1203 मौतें केवल सात राज्यों – तमिलनाडु (332), गुजरात (216), दिल्ली-एनसीआर (157), महाराष्ट्र (155), उत्तर प्रदेश (148), हरियाणा (104) और बिहार (91) से हुई हैं. इतनी बड़ी संख्या के बावजूद, इनमें से किसी भी राज्य ने इन मौतों को रोकने के लिए एक भी कदम नहीं उठाया है.
