नई दिल्ली: असम के विधायक अखिल गोगोई ने मंगलवार (15 जुलाई) को मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा पर निशाना साधते हुए राज्य सरकार की कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वापस भेजने (पुशबैक) की रणनीति को ‘फर्जी’ करार दिया.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, गोगोई ने कहा कि अवैध प्रवासियों के निर्वासन (डिपोर्टेशन) के मुद्दे पर भारत को बांग्लादेश के साथ बातचीत कर द्विपक्षीय समझौता करना चाहिए.
पत्रकारों से बातचीत में रायजोर दल के अध्यक्ष अखिल गोगोई ने कहा, ‘हिमंता बिस्वा शर्मा ऐसे व्यक्ति हैं जो बिना बात के मुद्दे बना देते हैं. अवैध प्रवासियों को वापस भेजना असम की लंबे समय से चली आ रही मांग है. लोगों को खुश करने के लिए मुख्यमंत्री ‘पुशबैक’ जैसी एक फर्जी रणनीति लेकर आए हैं, लेकिन इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है.’
राइजर दल के अध्यक्ष ने यह भी कहा कि भारत में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वापस भेजने के लिए कोई कानूनी तंत्र नहीं है.
उन्होंने कहा, ‘इसके लिए दोनों देशों के बीच स्वदेश वापसी (Repatriation) या प्रत्यर्पण (Extradition) संबंधी संधि होनी चाहिए.’

उन्होंने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह बांग्लादेश पर दबाव डाले ताकि वह ऐसा समझौता करे और अपने नागरिकों को वापस स्वीकार करे.
गौरतलब है कि हाल ही में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने असम विधानसभा में बताया था कि 25 मार्च 1971 (असम समझौते की कट-ऑफ तिथि) के आधार पर 1985 से अब तक 31,789 अवैध प्रवासियों को असम से निर्वासित किया गया है. इनमें से 2,366 लोगों को वर्ष 2011 से लेकर इस साल 30 जून तक निर्वासित किया गया.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में विदेशी न्यायाधिकरणों (Foreigners Tribunals) द्वारा ‘विदेशी’ घोषित किए गए 193 लोगों को बांग्लादेश की ओर ‘पुशबैक’ किया गया. इनमें से 67 लोगों को वापस भेजने के लिए असम से प्रवासियों के निष्कासन अधिनियम, 1950 का उपयोग किया गया.
यह कानून संसद द्वारा विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से असम में प्रवासियों के आने की समस्या से निपटने के लिए बनाया गया था. पिछले साल नवंबर में इसके पहले ज्ञात इस्तेमाल में सोनितपुर के जिला मजिस्ट्रेट ने पांच विदेशी घोषित लोगों को 24 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया था.
ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों द्वारा लोगों को वापस भेजने की कोशिशों का विरोध किया और दावा किया कि वे बांग्लादेशी नागरिक नहीं हैं.
इस बीच, सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को निरस्त कर दिया, जिनमें विदेशी न्यायाधिकरणों द्वारा 27 अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित किए जाने के आदेशों को बरकरार रखा गया था.
शीर्ष अदालत ने इन सभी मामलों को नए सिरे से सुनवाई के लिए संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों के पास वापस भेज दिया.
मणिपुर: सुरक्षा बलों के तलाशी अभियान के बीच एनएससीएन-आईएम ने संघर्षविराम उल्लंघन का आरोप लगाया
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आईएम) ने मणिपुर के टीएम कासोम गांव और माकुइलोंगडी के आसपास भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा नागरिकों के कथित उत्पीड़न की कड़ी निंदा करते हुए आरोप लगाया कि सुरक्षा बल लगातार दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से बने संघर्षविराम के नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं.
नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, एनएससीएन-आईएम द्वारा जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि हाल के दिनों में इस क्षेत्र में सुरक्षा बलों के ऑपरेशन बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं.
संगठन का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी कानूनी वारंट के छापेमारी की और घर-घर तलाशी अभियान चलाया.

संगठन ने यह भी दावा किया कि चार नागरिकों का अपहरण किया गया है और रिहायशी इलाकों में भारी सैन्य तैनाती कर दी गई है.
एनएससीएन-आईएम ने आरोप लगाया कि बार-बार चलाए जा रहे सैन्य अभियान भारत-नगा शांति वार्ता की विश्वसनीयता को कमजोर कर रहे हैं. संगठन ने कहा, ‘किसी भी संघर्ष के बीच फंसे आम नागरिक, चाहे वह संघर्ष उचित हो या नहीं – सुरक्षा के हकदार हैं, उत्पीड़न के नहीं.’ बयान में कहा गया कि शांतिपूर्ण गांवों को डर और नियंत्रण के क्षेत्रों में बदल दिया गया है.
संगठन ने भारत सरकार को याद दिलाया कि संघर्षविराम के नियम एक द्विपक्षीय समझौते का हिस्सा हैं और किसी भी प्रकार की एकतरफा कार्रवाई आपसी विश्वास को कमजोर करती है.
एनएससीएन-आईएम ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह संघर्षविराम नियमों के कथित उल्लंघनों की तत्काल जांच कराए, समझौते की शर्तों का सख्ती से पालन करे और प्रभावित क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय और स्वतंत्र मानवाधिकार निगरानी की अनुमति दे.
अपने बयान के अंत में संगठन ने ‘बंदूक के दम पर’ शासन करने के बजाय सच्ची बातचीत का आह्वान किया और दोहराया कि नगा लोग एक स्थायी और सम्मानजनक समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
इस बीच, उग्रवाद विरोधी अभियानों को तेज करते हुए असम राइफल्स ने भारतीय सेना, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और मणिपुर पुलिस के साथ मिलकर 14 जुलाई को उखरूल जिले के टीएम कासोम क्षेत्र में संयुक्त तलाशी और क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अभियान चलाया.
मेघालय विधानसभा यूरेनियम खनन के विरोध में प्रस्ताव पारित करेगी
मेघालय विधानसभा राज्य में यूरेनियम खनन का औपचारिक रूप से विरोध करने और उस पर प्रतिबंध लगाने संबंधी एक प्रस्ताव पारित करेगी. यह घोषणा मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा ने गुरुवार (16 जुलाई) को की.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने एक वर्चुअल संबोधन में कहा, ‘इस मुद्दे पर हमारा रुख हमेशा स्पष्ट और अडिग रहा है. नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के कई नेताओं के साथ बैठक के बाद हमने मेघालय के लोगों के साथ खड़े रहने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है. सरकार के रूप में हम यूरेनियम खनन का लगातार विरोध करते रहेंगे और राज्य में इसे औपचारिक रूप से प्रतिबंधित करने के लिए विधानसभा में एक प्रस्ताव लाएंगे.’

मुख्यमंत्री हाल के दिनों में मेघालय में यूरेनियम खनन शुरू किए जाने की संभावित कोशिशों को लेकर चल रही अटकलों और समाचारों पर प्रतिक्रिया दे रहे थे.
उन्होंने कहा, ‘मैं कई बार स्पष्ट कर चुका हूं कि हमारी सरकार यूरेनियम खनन के खिलाफ है और राज्य में इसे शुरू करने के किसी भी प्रयास का विरोध करेगी.’
संगमा, जो सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, ने बताया कि उन्होंने बुधवार को पार्टी के बड़ी संख्या में नेताओं के साथ विस्तृत बैठक की थी.
बैठक के दौरान एनपीपी नेताओं ने सर्वसम्मति से सुझाव दिया कि राज्य सरकार और विधानसभा को यूरेनियम खनन का विरोध करने वाला प्रस्ताव पारित करना चाहिए.
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘बुधवार की बैठक में एनपीपी नेताओं द्वारा दिए गए सुझावों और लिए गए निर्णयों के आधार पर हम आगे बढ़ रहे हैं और अपने राज्य में यूरेनियम खनन का विरोध करने वाला प्रस्ताव पारित कराने की दिशा में काम करेंगे.’
उन्होंने कहा कि सरकार यूरेनियम खनन के संभावित दुष्प्रभावों से पूरी तरह अवगत है.
संगमा ने कहा, ‘हम जानते हैं कि इसका हमारे लोगों, पर्यावरण, जंगलों और राज्य के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. इसमें बहुत अधिक जोखिम जुड़े हुए हैं. इसलिए हम पूरी दृढ़ता के साथ अपने राज्य में यूरेनियम खनन का विरोध करेंगे.’
उधर, खासी स्टूडेंट्स यूनियन ने राज्य के पूर्व विधायकों को यूरेनियम माइनिंग ज़मीन सौदों के मामले में बेनकाब करने की चेतावनी दी है.
संगठन ने आरोप लगाया है कि मेघालय के डोमियासियाट इलाके में प्रस्तावित यूरेनियम माइनिंग परियोजना को फिर से शुरू करने की कोशिश की जा रही है. यूनियन ने कहा कि जैसे ही उन्हें दस्तावेज़ी सबूत मिल जाएंगे, वे उन पूर्व विधायकों के नाम उजागर करेंगे जो इस इलाके से जुड़े ज़मीन के सौदों में शामिल बताए जा रहे हैं.
संगठन कहा कि उसको इन ज़मीन सौदों के बारे में करीब दो महीने पहले जानकारी मिली थी और तब से वे सरकारी ज़मीन के रिकॉर्ड के ज़रिए इन दावों की पुष्टि कर रहे हैं.
नगालैंड: नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन ने पूर्वोत्तर में अवैध घुसपैठ को लेकर चिंता जताई
नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) के इनर लाइन रेगुलेशन कमीशन (आईएलआरसी) ने सोमवार (13 जुलाई) को बांग्लादेश और म्यांमार से आने वाले अवैध प्रवासियों के पूर्वोत्तर के विभिन्न हिस्सों में प्रवेश करने और वहां से होकर गुजरने की कोशिशों संबंधी खबरों पर गहरी चिंता जताई.
नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, आईएलआरसी ने एक बयान में कहा, ‘अगर इस तरह की गतिविधियों पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो इससे स्थानीय आदिवासी समुदायों के सामने जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं.’

कमीशन ने नगालैंड सरकार से राज्य के सभी प्रवेश बिंदुओं पर निगरानी और कानून व्यवस्था को तत्काल मजबूत करने का आग्रह किया. उसने कहा कि इनर लाइन परमिट (आईएलपी) प्रणाली का कड़ाई से पालन, पहचान दस्तावेजों का गहन सत्यापन, निरीक्षण अभियान तेज करना और सभी प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय राज्य के भीतर अवैध प्रवेश, आवाजाही और बसावट को रोकने के लिए आवश्यक है.
आईएलआरसी ने सभी उपायुक्तों (डीसी), जिला प्रशासन, कानून-प्रवर्तन एजेंसियों, ग्राम परिषदों, नगर परिषदों, कॉलोनी और वार्ड प्राधिकारियों, अन्य संबंधित पक्षों से भी सतर्क रहने की अपील की. उसने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 तथा अन्य लागू कानूनों के प्रावधानों का पालन किए बिना कोई भी व्यक्ति नगा क्षेत्रों में न रहे, न काम करे और न ही किसी प्रकार की गतिविधि संचालित करे.
कमीशन ने उन व्यक्तियों और समूहों को भी कड़ी चेतावनी दी जो आईएलपी लागू कराने के नाम पर गैर-नगा निवासियों, छात्रों, श्रमिकों या आगंतुकों से अवैध रूप से धन उगाही करते हैं या उन्हें परेशान करते हैं, धमकाते और उनका शोषण करते हैं.
बयान में कहा गया, ‘ऐसी गतिविधियां गैरकानूनी हैं, पूरी तरह अस्वीकार्य हैं और आईएलपी व्यवस्था का गंभीर दुरुपयोग हैं.’
आईएलआरसी ने कहा कि इस तरह की हरकतें न केवल कानून का उल्लंघन करती हैं, बल्कि समूचे नगा समाज की प्रतिष्ठा, सद्भावना और विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाती हैं.
कमीशन ने स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित प्रावधानों के अलावा किसी भी व्यक्ति को आईएलपी के नाम पर धन वसूलने, जुर्माना लगाने या किसी को डराने-धमकाने का कोई अधिकार नहीं है.
उसने कहा कि ऐसी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति की पहचान की जाएगी और उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए मामला संबंधित सक्षम अधिकारियों के समक्ष उठाया जाएगा.
त्रिपुरा और मिज़ोरम 109 किलोमीटर लंबे बॉर्डर विवाद पर फिर से बातचीत शुरू करेंगे
त्रिपुरा और मिज़ोरम अपने लंबे समय से चले आ रहे अंतर-राज्यीय बॉर्डर विवाद का समाधान खोजने के लिए बातचीत फिर से शुरू करने वाले हैं.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों की जल्द ही बैठक होने की संभावना है. यह बैठक दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच प्रस्तावित बातचीत से पहले होने की उम्मीद है.

अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने दोनों राज्यों के बीच 109 किलोमीटर लंबे बॉर्डर से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए बातचीत का एक नया दौर शुरू किया है. यह कदम पिछले महीने शिलांग में नॉर्थ ईस्टर्न काउंसिल के 73वें पूर्ण सत्र के दौरान डॉ. साहा और मिज़ोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा के बीच हुई बातचीत के बाद उठाया गया है.
अधिकारियों ने कहा, ‘त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव दिया कि मुख्यमंत्री स्तर की किसी भी बैठक से पहले, दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों को इस मामले पर विस्तार से चर्चा करनी चाहिए. ये बातचीत मुख्यमंत्रियों के बीच बाद की चर्चाओं के लिए आधार का काम करेगी.’
त्रिपुरा बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर लंबा अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर साझा करता है, जो इसकी कुल सीमा का लगभग 84% है. यह असम के साथ 53 किलोमीटर और मिज़ोरम के साथ 109 किलोमीटर लंबा अंतर-राज्यीय बॉर्डर भी साझा करता है. त्रिपुरा-मिज़ोरम सीमा कई वर्षों से विवादित रही है, और जब भी कोई राज्य विवादित क्षेत्रों में विकास या निर्माण कार्य करता है, तो तनाव बढ़ जाता है.
पिछले साल मई में उत्तरी त्रिपुरा जिले में त्रिपुरा-मिज़ोरम सीमा पर स्थित फुलडुंगसेई गांव में बन रही एक पर्यटन सुविधा एक विस्फोट में क्षतिग्रस्त हो गई थी. दोनों राज्यों की पुलिस ने घटनास्थल का दौरा किया और शांति बनाए रखने के लिए कदम उठाए.
इस घटना के बाद, त्रिपुरा के पर्यटन और परिवहन मंत्री सुशांत चौधरी ने जंपुई में एक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की और क्षतिग्रस्त इको-टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया. दोनों राज्यों के निवासियों ने फुलडुंगसेई को अपना क्षेत्र बताया, जिससे यह अंतर-राज्यीय सीमा पर सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक बन गया है.
अधिकारियों ने बताया कि पर्यटन परियोजना केंद्र की स्वदेश दर्शन योजना के तहत लगभग 3.12 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से विकसित की जा रही है, लेकिन विवाद के कारण पिछले कुछ वर्षों से काम रुका हुआ है.
विस्फोट के बाद इलाके में एक सुरक्षा चौकी स्थापित की गई थी, और बाद में त्रिपुरा सरकार ने मिज़ोरम के साथ यह मामला उठाया. विवादित इलाकों की पहचान करने और उन्हें सुलझाने के लिए नॉर्थ त्रिपुरा ज़िले, मिज़ोरम के ममित ज़िला प्रशासन और सर्वे ऑफ़ इंडिया के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई है.
हालांकि, अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया है, जबकि मिज़ोरम के कुछ संगठन सीमावर्ती गांवों में त्रिपुरा सरकार द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्य का विरोध कर रहे हैं.
इससे पहले साल 2020 में जम्पुई हिल्स पर स्थित फुलडुंगसेई गांव में शिव मंदिर बनाने को लेकर विवाद हुआ था, जिसके बाद त्रिपुरा सरकार ने धारा 144 लागू कर दिया था.
