नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने गुरुवार (16 जुलाई) को ‘बुलडोज़र जस्टिस’ के ख़िलाफ़ नवंबर 2024 के फैसले की अवमानना का आरोप लगाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं को अपने-अपने हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े, सीयू सिंह और हुज़ेफ़ा अहमदी ने कोर्ट से आग्रह किया कि वे हाईकोर्ट भेजने के बजाय सीधे इन मामलों पर सुनवाई कर फैसला सुनाएं.
इस संबंध में याचिकाकर्ताओं की ओर से शीर्ष अदालत के 2024 के फैसले के उल्लंघन के कुछ खास उदाहरणों का हवाला दिया गया, जिनमें फलों के स्टॉल को गिराना और यथास्थिति बनाए रखने (स्टेटस-क्वो) के आदेश के बावजूद एक मस्जिद को ढहाया जाना शामिल है.
मालूम हो कि सीजेआई के अलावा इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना भी शामिल थे, जिन्होंनेे कहा कि इन याचिकाओं में ऐसे विवादित सवाल उठाए गए हैं जिन पर हर मामले के हिसाब से फैसला करने की ज़रूरत है.
वहीं, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी भी इस बात पर सहमति जताते हुए कहा कि ये याचिकाएं देशभर से आई हैं.
जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि 2024 के फैसले को ‘किसी कानून’ की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए और इसे मामले के तथ्यों से अलग रखकर देखा जाना चाहिए.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस बागची ने राज्य सरकारों (खासकर भाजपा शासित सरकारों) द्वारा अपनाए जाने वाले उस विवादास्पद तरीके का ज़िक्र किया, जिसमें अधिकारी अतिक्रमण-विरोधी अभियानों के नाम पर लोगों के घरों और इमारतों को गिरा देते हैं.
जस्टिस बागची के अनुसार, ‘जब नगर निगम के अधिकारियों और अवैध कब्ज़ा करने वालों के बीच ‘मिली-भगत’ कानून के शासन को कमज़ोर करती है, तो ‘बुलडोज़र चलाना ही पड़ता है’. साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यही कार्रवाई किसी व्यक्ति को निशाना बनाने या ‘निर्दोष होने की धारणा’ (presumption of innocence) को नज़रअंदाज़ करने का ज़रिया नहीं बननी चाहिए.
याचिकाकर्ताओं के वकील ने क्या दलील दी?
लाइव लॉ के अनुसार, अहमदी ने दलील दी कि जहां भी नियमों का उल्लंघन ‘गंभीर’ हो और ‘हलफनामों से साफ़ तौर पर ज़ाहिर हो,’ वहां अदालत को दखल देना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि अगर मौका मिले तो वे 15 मिनट में इसे साबित कर सकते हैं. उनकी याचिका सोमनाथ में मस्जिदों को कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से ढहाए जाने से संबंधित थी.
बताया जाता है कि यह तोड़-फोड़ एक स्थानीय नेता के उस पत्र के बाद हुई थी जिसमें पूछा गया था कि ‘इस खास राज्य में एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद कैसे हो सकती है.’
अहमदी ने ज़ोर देकर कहा कि जिस संरचना की बात हो रही है, वह सरकारी ज़मीन पर नहीं बना था.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र से जुड़े अदालत की अवमानना के एक मामले में बहस करते हुए सिंह ने बेंच को बताया कि ऐसी कई तोड़-फोड़ की कार्रवाई से पहले स्थानीय नेताओं ने सार्वजनिक रूप से ‘बुलडोज़र एक्शन’ की घोषणा की थी.
उन्होंने कहा कि यह क्रम सामान्य कानूनी कार्रवाई के बजाय सज़ा देने के इरादे को दिखाता है.
सिंह ने आगे दावा किया कि उनके मुवक्किल के मामले में राज्य के अपने हलफ़नामे से पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था; साथ ही तोड़-फोड़ में दिखाई गई जल्दबाज़ी और उसके बाद नेताओं के जश्न वाले बयानों से यह साफ हो जाता है कि इस कार्रवाई का मकसद सज़ा देना था.
हेगड़े ने बताया कि कैसे उनके मुवक्किल के फलों के जूस के स्टॉल को बुलडोज़र से ढहा दिया गया, जबकि पास ही बैठा एक टीवी एंकर इस तोड़-फोड़ की लाइव रिपोर्टिंग कर रहा था.
उन्होंने तर्क दिया कि इस तोड़-फोड़ के तरीके से पता चलता है कि ऐसी कार्रवाई अब कानून लागू करने के बजाय एक तमाशा बन गई है.
बेंच की प्रतिक्रिया
सीजेआई ने इस मामले में सीधे दखल देने की मांग को खारिज करते हुए बताया कि 2024 के फैसले में ही पैराग्राफ 94 के तहत सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाली संरचनाओं के लिए कुछ अपवाद बताए गए थे.
उन्होंने कहा कि जब भी अधिकारी बचाव के तौर पर इन अपवादों का हवाला देते हैं, तो मामला तथ्यों से जुड़ा विवाद बन जाता है, जो अदालत के अवमानना अधिकार क्षेत्र (contempt jurisdiction) के दायरे में नहीं आता.
जस्टिस मोहना ने सीजेआई की दलीलों से सहमति जताते हुए सवाल उठाया कि क्या राज्य से जुड़े विवादों को सचमुच अवमानना की कार्यवाही के तहत सुलझाया जा सकता है. ‘
लाइव लॉ के मुताबिक, उन्होंने पूछा, ‘पूरे भारत में जो कुछ भी होता है, क्या हर कोई सीधे सुप्रीम कोर्ट आ सकता है?’
हर याचिकाकर्ता को वापस नहीं भेजा गया
वहीं, वरिष्ठ वकील एस मुरलीधर ने बेंच को बताया कि उनके मुवक्किल ने पहले ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से संपर्क किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था. इसकी वजह यह थी कि स्थानीय कलेक्टर को सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के फैसले की जानकारी नहीं थी. ऐसे में उनके पास सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.
मुरलीधर की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से तय करने के लिए वापस भेज दिया.
दूसरी याचिकाओं पर कोर्ट का फैसला
बाकी याचिकाओं का निपटारा करते हुए अपने लिखित आदेश में कोर्ट ने एक मुख्य सवाल उठाया: क्या याचिकाकर्ताओं की संपत्तियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2024 में तय किए गए सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करके तोड़ा गया था?
हालांकि याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि तोड़-फोड़ की कार्रवाई कानून के ख़िलाफ़ और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन करते हुए की गई थी, लेकिन राज्य के अधिकारियों का कहना था कि उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था.
लाइव लॉ के अनुसार, ‘तथ्यों से जुड़े कई सवालों’ को ध्यान में रखते हुए बेंच ने फैसला सुनाया कि इन विवादों को सुप्रीम कोर्ट के सामने अवमानना की कार्यवाही में ठीक से नहीं सुलझाया जा सकता है और इन्हें संबंधित हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया जाना चाहिए.
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का किसी भी आरोप की सच्चाई या मेरिट से कोई लेना-देना नहीं है और निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा तब तक जारी रहेगी जब तक कि संबंधित हाईकोर्ट में इन मामलों का निपटारा नहीं हो जाता.
