नई दिल्ली: पत्रकारों के संगठन एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने विदेश मंत्रालय (एमईए) द्वारा हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश-विदेश में बिना पूर्व-निर्धारित (अनस्क्रिप्टेड) प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के फैसले का बचाव करने की कोशिशों की कड़ी आलोचना की है.
गिल्ड द्वारा गुरुवार (16 जुलाई) को जारी एक बयान में कहा गया है कि इस संबंध में विदेश मंत्रालय के अधिकारी की दलील ‘पूरी तरह से गलत’ और ‘सतही’ थीं.
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संजय कपूर, महासचिव राघवन श्रीनिवासन और कोषाध्यक्ष टेरेसा रहमान द्वारा हस्ताक्षरित इस बयान में कहा गया है कि लोकतंत्र में नेताओं को ‘स्वतंत्र मीडिया के ज़रिए जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए.’
उल्लेखनीय है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान वहां हुई भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में एक स्थानीय पत्रकार ने पूछा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की.
इसके जवाब में मंत्रालय के अधिकारी रुद्रेंद्र टंडन ने कहा कि इस बात का जवाब देना उनका काम नहीं है, फिर भी वे इस विषय पर आए और मोदी का बचाव किया. टंडन ने उन्हें ‘एक बेहतरीन नेता’ बताते हुए जोड़ा कि मोदी ‘बिचौलियों’ के ज़रिये बात करने के बजाय जनता से सीधे बातचीत करना पसंद करते हैं.
अधिकारी ने दावा किया कि ‘भारतीय वोटर ज़्यादातर गांव के लोग हैं जो सीधा संपर्क चाहते हैं. उन्हें किसी के ज़रिए बात करना पसंद नहीं है.’
इन दावों को खारिज करते हुए एडिटर्स गिल्ड ने कहा है कि चुने हुए नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे अहम राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर शहरी और ग्रामीण नागरिकों के सवालों का जवाब दें.
संगठन ने कहा कि सिर्फ़ एकतरफा बातचीत, खासकर सोशल मीडिया के ज़रिए, स्वतंत्र पत्रकारों के साथ बातचीत की जगह नहीं ले सकती.
पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट पर प्रधानमंत्री की चुप्पी का सीधे तौर पर ज़िक्र करते हुए बयान में कहा गया है, ‘सच तो यह है कि वह (पीएम मोदी) इस बहुत बड़े संकट पर किसी भी तरह के मीडिया के साथ अपने विचार साझा करने से बचते रहे हैं.’
गिल्ड ने सरकारी अधिकारियों को ऐसी बातें कहने से बचने की चेतावनी भी दी, जिनसे भारत में प्रेस की आज़ादी और बोलने की आज़ादी कमज़ोर होती हो.
संगठन ने कहा, ‘हम ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों से अपील करते हैं कि वे ऐसी सतही और घिसी-पिटी बातें न कहें, जिनसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की आज़ादी पर और बुरा असर पड़ता है.’
अपने बयान में गिल्ड ने कहा कि दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों में निर्वाचित नेता नियमित रूप से मीडिया से संवाद करते हैं और पत्रकारों के बिना पूर्व-निर्धारित सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा माना जाता है. मीडिया जनता की ओर से सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही मांगता है और देश के सामने मौजूद तात्कालिक तथा महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके विचार जानने का माध्यम बनता है.
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप दौरे के दौरान स्थानीय मीडिया कवरेज में यह बात सामने आई कि वह लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से बचते रहे हैं और इसके बजाय वे ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, जिन्हें बहुत सावधानी से मैनेज किया जाता है.
पीएम मोदी के यूरोप दौरे के दौरान नॉर्वे और नीदरलैंड के पत्रकारों ने सार्वजनिक रूप से यह सवाल पूछा गया कि आखिरकार मोदी दूसरे विश्व नेताओं के साथ मिलकर सवालों के जवाब क्यों नहीं देते.
उल्लेखनीय है कि इस विवाद की शुरुआत नॉर्वेजियन पत्रकार हेले ल्यूंग द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर की गई उन टिप्पणियों के बाद हुई, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री के नॉर्वे दौरे के दौरान मीडिया के सवालों का जवाब न देने का ज़िक्र किया था.
इस संबंध में उन्होंने उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि विदेशी पत्रकार भारत में प्रेस की आज़ादी से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जिन देशों में प्रेस की आज़ादी की मज़बूत परंपरा है, वहां के पत्रकारों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे दुनिया के नेताओं के दौरे के समय ऐसे सवाल उठाएं.
वहीं, विदेश मंत्रालय के अधिकारी के बयानों की देश में भी राजनीतिक आलोचना हुई है. जैसा कि ‘द वायर’ ने पहले बताया था, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि भले ही नौकरशाह मौजूदा सरकार के लिए काम करते हैं, लेकिन जो सफ़ाई दी गई, वह ‘लोकतांत्रिक रूप से सही नहीं’ थी.
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस घटना की आलोचना करते हुए कहा कि इससे भारतीय मीडिया का ‘मज़ाक’ बना है.
ऑस्ट्रेलिया में भी स्काई न्यूज़ ने मेलबर्न में पीएम मोदी के लिए आयोजित बड़े प्रवासी कार्यक्रम पर सवाल उठाए और कहा कि यह ‘कूटनीति नहीं, बल्कि राजनीति’ थी.
इसकी तुलना अमेरिका के ह्यूस्टन में 2019 में हुए ‘हाउडी मोदी‘ कार्यक्रम से की गई, जहां मोदी ने सार्वजनिक रूप से डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव अभियान का समर्थन किया था. उस कार्यक्रम की भी काफ़ी आलोचना हुई थी क्योंकि उसे किसी दूसरे देश की घरेलू राजनीति में दखल के तौर पर देखा गया था, खासकर तब जब ट्रंप वह चुनाव हार गए थे.
गौरतलब है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है और नरेंद्र मोदी पिछले 12 साल से अधिक समय में पहले ऐसे प्रधानमंत्री है, जिन्होंने पदभार संभालने के बाद से भारत में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है.
