मिथकों की यह विशेषता है कि वे केवल कथाओं का सृजन नहीं करते अपितु समाज की नैतिकता, सत्ता और सामूहिक स्मृति की संरचना भी निर्मित करते हैं. मिथक यह भी निर्धारित करते हैं कि सामाजिक व्यवस्था में किसे विमर्श के केंद्र में रखा जाएगा और किसकी इच्छाओं को वैधता प्राप्त होगी. मिशेल फूको का यह विचार कि ‘सत्ता ही ज्ञान और सत्य का प्रतिपादन करती है’, इन संरचनाओं को समझने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है.
जहां एक ओर भारतीय पौराणिक परंपरा में स्त्रियों की उपस्थिति विविध रही है जिसमें अनसूया, गार्गी, मदालसा और शतरूपा जैसी स्त्रियां अपने वैचारिक स्वायत्तता में अत्यंत प्रखर तथा कथाओं के लगभग केंद्र में दिखाई देती हैं वहीं दूसरी ओर, कई प्रसंगों में स्त्री-चरित्रों के अंतर्जगत की स्वायत्तता पुरुष-नायकों के आभामंडल के पार्श्व में ओझल हो जाती है.
इसी परिप्रेक्ष्य में वरिष्ठ कवि पवन करण का विशेष कविता-संग्रह ‘स्त्रीशतक‘ इन पौराणिक स्त्रियों के दबे हुए स्वरों और उनकी अंतश्चेतना को मुखरित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है.
इस संग्रह की कविताएं किसी बंधी-बंधाई परिपाटी से अलग हटकर, इतिहास और व्यवस्था द्वारा व्याख्यायित स्त्री-इच्छा के आयामों को समझने का एक सीधा यत्न हैं. प्राचीन वृत्तांतों में अप्सरा उर्वशी को सौंदर्य और काम-भावना के सर्वोच्च शिखर के रूप में स्थापित किया गया है. पर पवन करण की कविता इस बाह्य आकर्षण के पीछे छिपी उर्वशी की विडंबना को स्वर देती है.
यहां वह उस स्त्री के रूप में सामने आती है जिसकी देह निरंतर दूसरों के आकर्षण और इंद्र की सत्ता का माध्यम बनी रही जबकि उसकी स्वयं की इच्छाएं हाशिए पर धकेल दी गईं. कविता में व्यक्त उसकी यह स्वीकारोक्ति द्रष्टव्य है:
‘प्रेम करने के लिए नहीं
हम अप्सराएं प्रेम का स्वांग
करने के लिए जन्मी हैं
हम स्वर्ग में हों या धरती पर
चाहते हुए भी प्रेम का अंकुर
नहीं पनपने देतीं अपने हृदय में’
और जब वह कहती है कि: ‘हमारी कंचन कायाओं में/हृदय के स्थान पर/इंद्र का अभिमान धड़कता है’ तो यह रूपक उस व्यवस्था को उद्घाटित करता है जहां स्त्री का अस्तित्व स्वयं की पहचान का विस्तार न होकर किसी बाह्य शक्ति का प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाता है. वह अंततः स्वामित्व का निषेध करते हुए कहती है कि उसे अपनी बनाए रखने के लिए कोई चाहे यज्ञ करे या तपस्या, वह कभी किसी की विजित संपत्ति नहीं बनेगी.
सौंदर्य का यही राजनीतिक उपयोग मोहिनी के प्रसंग में और अधिक तीक्ष्ण हो जाता है. समुद्र मंथन की कथा में असुरों को भ्रमित कर देवताओं को अमृत प्रदान करने के लिए विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करने की घटना को परंपरा ने सदैव एक दैवीय लीला के रूप में स्मरण किया जबकि इस बात की परिहार्यता को अंधेरे में धकेल दिया गया क्योंकि विष्णु के पास स्त्री देह में परिवर्तित होने के अलावा भी अशेष विकल्प थे. कविता में मोहिनी द्वारा विष्णु से पूछा गया यह प्रश्न विचारणीय है:
‘छल से इच्छित हासिल करने के लिए
एक स्त्री की ओट लेने के अलावा
और कुछ नहीं सूझा आपको
क्या अपना सुदर्शन कहीं रखकर
भूल गए थे आप, क्या स्त्री-सौंदर्य
सुदर्शन से अधिक धारदार है’
यह प्रश्न उस मानसिकता पर आघात करता है जिसने स्त्रीत्व को पुरुष-सत्ता के संघर्षों का एक साधन बना दिया. युद्ध और विजय पुरुषों की होती है मगर माध्यम स्त्री की देह को बनाया जाता है और इतिहास में कलंक भी उसी के हिस्से आता है. जब मोहिनी कहती है कि हर बार दूसरों के किए का दोष उसके माथे मढ़ दिया जाता है तो वह उसी ऐतिहासिक अन्याय को व्यंजना देती है.
सौंदर्य का यही सूक्ष्म अंतर्विरोध तारा की कविता में प्रकट होता है जहां प्रशंसा स्वयं एक अदृश्य बंधन का रूप ले लेती है. देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा, जिनका चंद्रमा द्वारा हरण किया गया, मूल कथा में दो पुरुषों के द्वंद्व के मध्य केवल एक सुंदर वस्तु की भांति दिखाई देती हैं. कविता सौंदर्य के इसी उत्सव को चुनौती देती है जहां उपमाओं का आधिक्य स्त्री को एक जीवित मनुष्य के स्थान पर एक चिह्नित प्रतीक में परिवर्तित कर देता है:
‘मैं यदि तुमसे कहूं कि तुम्हारा चेहरा
चन्द्र की तरह सुन्दर है
तो तुम मेरी यह उपमा
अपने चेहरे से नोचकर फेंक देना’
किसी पुरुष द्वारा स्त्री के चेहरे को चांद कहना, एक तरह से संसार की बुरी नज़रों को उसकी निजता और अस्तित्व की तरफ़ खींच लाना है. यह प्रशंसा उसे आदर देने के बजाय एक ऐसे सार्वजनिक पते की तरह चिह्नित कर देती है जहां उसकी स्वतंत्रता और निजता दोनों ही संशय के घेरे में आ जाती हैं: ‘किसी पुरुष का किसी स्त्री के चेहरे में /चन्द्र देख लेना चन्द्र को/खुद उसके चेहरे का पता बता देना है.’
यह संकट आगे बढ़कर इला के प्रसंग में अस्तित्व और सामाजिक स्वीकृति के प्रश्न में रूपांतरित होता है. मनु की संतान इला का यह मिथक लैंगिक परिवर्तन और पहचान के द्वंद्व का वह पुरातन वृत्तांत है जो शिव के श्राप के कारण क्रमिक रूप से पुरुष और स्त्री रूप में जीवन व्यतीत करती है. पुत्र की आकांक्षा से संचालित व्यवस्था में इला का जन्म आरंभ से ही एक अनपेक्षित विवशता की तरह घटित होता है:
‘पिता एक पुरुष थे आखिर
कैसे बर्दाश्त कर सकते थे वे
कि इच्छा के विरुद्ध उनकी उनके वीर्य से
पुत्र की जगह पुत्री ले ले जन्म’
इला की त्रासदी केवल लैंगिक नहीं बल्कि जाहिर रूप से वंशवादी भी है जहां संतान को एक स्वतंत्र व्यक्ति के स्थान पर केवल कुल को आगे बढ़ाने के माध्यम के रूप में देखा जाता है. देह यहां सामाजिक नियंत्रण का केंद्र बन जाती है और इला की आकांक्षा एक स्वीकृत मनुष्य के रूप में प्रतिस्थापित होने का मौलिक अधिकार है.
राजा ययाति की कथा से जुड़ी अप्सरा विश्वाची की कविता इसी अधिकार का एक दृढ़ वक्तव्य है. वह राजा के सम्मुख अपनी कामेच्छा के बदले ‘राजमहिषी’ होने की सामाजिक शर्त को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर देती है. यह अस्वीकृति अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज ने सदैव स्त्री की कामना को विवाह अथवा किसी सामाजिक पदवी की वैधता के भीतर ही स्वीकार किया है.
विश्वाची इस संस्थागत वैधता को नकारते हुए इच्छा की उस स्वायत्तता की मांग करती है जिसे किसी सामाजिक मुहर या पद की आवश्यकता न हो: ‘तुम किसी भी युग में मेरी /कामेच्छा के सामने अपनी /राजमहिषी होने की शर्त मत रखना’.
इच्छा और नैतिकता का यह अंतर्द्वंद्व पिंगला की कविता में भी उपस्थित होता है. गणिका पिंगला के माध्यम से समाज के उस नैतिक पाखंड पर प्रहार किया गया है जो रात के अंधकार में उसकी देह का मूल्य चुकाता है और दिन के प्रकाश में उसे अपवित्र घोषित करता है. पिंगला उन पुरुषों की वासना को बहुत स्पष्टता से पहचानती है जो अपनी देह-लोलुपता को भी दैवीय विधान का आवरण पहना देते हैं:
‘कहते कि उन पर कृपा है तुम्हारी
और ये भी कि उन पर तुम्हारी कृपा न होती
तो क्या वे मेरा मूल्य चुका पाते’
वह स्वयं को पतन का प्रतीक मानने से इनकार करती है और उस समाज के सामने एक दर्पण बनकर खड़ी हो जाती है जो उसकी देह की वीथिकाओं से होकर गुज़रता है.
और अंततः शर्मिष्ठा की बात. असुर गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और असुर राज वृषप्रवा की पुत्री शर्मिष्ठा की कहानी वर्ग-श्रेष्ठता और स्त्री-अस्मिता के क्षरण की कहानी रही है. मूलतः सहेलियां रहीं इन दोनों के बीच एक वन-विहार के दौरान हुआ साधारण सा वस्त्र-विवाद (अनजाने में शर्मिष्ठा द्वारा देवयानी के वस्त्र धारण कर लिए जाना) प्रतिष्ठा की ऐसी लड़ाई में बदल गया कि गुस्से में शर्मिष्ठा ने देवयानी को एक सूखे कुएं में धकेल दिया. जब राजा ययाति ने कुएं से बाहर निकालकर देवयानी की रक्षा की तो देवयानी ने ययाति से विवाह कर लिया.
विवाह पूर्व देवयानी ने एक शर्त रखी जिसके अनुसार शर्मिष्ठा को देवयानी के साथ एक दासी के रूप में ययाति के महल में जाना पड़ा. ग़ौरतलब है कि देवयानी के साथ विवाह उपरांत ययाति ने शर्मिष्ठा से भी गुप्त रूप से विवाह कर लिया था. शर्मिष्ठा उस पुरुष-पाखंड को भी बेनकाब करती है जहां एक राजा अपनी मर्यादा भूलकर दासी के सम्मुख ‘चिरौरी’ करने पर उतर आता है. वह देवयानी को बताती है कि जिस समय वह ययाति के साथ ‘प्रणय’ के गौरव में मग्न थी, ठीक उसी समय राजा उसे भी अपनी ‘अंकशायिनी’ बनाने के लिए अनुनय कर रहा था और किस तरह पुराने अपमान की पीड़ा में जलते हुए उसने ययाति का आग्रह स्वीकार किया.
‘मुझे अपनी अंकशायिनी बनाने
जिस समय वह चिरौरी कर रहा था मेरी
ठीक उसी समय तुम्हारी पहुंचाई पीड़ा
बाहर उभर आई मेरे भीतर से
जिसने तुम्हारे बराबर दरबार में
ले जाकर बिठा दिया मुझे भी.’
इन सभी चरित्रों को समग्रता में देखने पर स्पष्ट होता है कि स्त्री-इच्छा किसी एक बंधे-बंधाए ढांचे में उपस्थित नहीं है. उर्वशी की देहगत पीड़ा, मोहिनी का राजनीतिक प्रश्न, तारा का प्रतीक-विरोध, इला का अस्तित्वगत संकट, विश्वाची की स्वायत्तता, पिंगला का नैतिक प्रतिरोध और शर्मिष्ठा द्वारा अपने अपमान व विवशता को प्रतिशोध और सत्ता-संतुलन के हथियार में बदल देना, यह सभी इच्छा के भिन्न-भिन्न आयाम हैं.
‘स्त्रीशतक’ के माध्यम से पवन करण ने पौराणिक पात्रों को पारंपरिक श्रेणियों में स्थिर करने के बजाय उनके भीतर के उन प्रश्नों को मुखरित किया है, जिन्हें सदियों तक वृत्तांतों का अंग तो बनाया गया पर उनका अर्थ निर्धारित करने का अधिकार कभी नहीं दिया गया.
(लेखक कवि और अनुवादक हैं और अंग्रेज़ी साहित्यिक पोर्टल ‘पोएम्स इंडिया’ का संपादन करते हैं.)
