अयोध्या से की गई रिपोर्टिंग के आधार पर लिखी गई दो भागों की श्रृंखला का यह दूसरा हिस्सा है, जिसमें राम मंदिर ट्रस्ट की कार्य प्रणाली को समझने के लिहाज़ से बहुत सारे लोगों से बात की गई, जो ट्रस्टियों, ट्रस्ट के कामकाज और इसके पूर्व महासचिव चंपत राय से परिचित हैं. पहला भाग यहां पढ़ सकते हैं.
अयोध्या (उत्तर प्रदेश): 9 जून 2026 को पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के यूट्यूब चैनल, टॉप सीक्रेट, को 9 जून 2026 को दिए गए एक साक्षात्कार में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी, महिपाल सिंह ने हिंदुत्व के सबसे बड़े आकर्षण, अयोध्या के राम मंदिर में खामियों से भरे वित्तीय लेनदेन- प्रतिदिन के हिसाब-किताब या जवाबदेही के न होने का खुलासा किया.
इस बातचीत के दौरान सिंह ने बताया कि मंदिर के चंदे की हो रही कथित चोरी पर उनका ध्यान 2021 में ही गया था. उन्होंने ये भी बताया कि इस बारे में बात करने के लिए वो चंपत राय (महासचिव) और अनिल मिश्रा (आमंत्रित सदस्य) दोनों से मिले, जो कि अब इस्तीफ़ा दे चुके हैं और उन्हें किसी भी मीटिंग में शामिल होने से मना किया गया है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.
उन्होंने बताया कि एक अन्य ट्रस्टी, अनिल मिश्रा, ने उन्हें वहां से जाने को कह दिया और महिपाल की जगह किसी और को नियुक्त कर दिया.
अयोध्या में महिपाल सिंह के मंदिर में नौकरी छोड़ने से पहले इस रिपोर्टर की मुलाकात ट्रस्टी से परिचित, एक स्थानीय निवासी से हुई थी जो 2022 में ह्विसिलब्लोअर महिपाल सिंह के संपर्क में था. सिंह ने इस व्यक्ति से अपने अनुभव साझा किए थे. उसने उसे बताया था कि चार साल पहले उसने मंदिर प्रशासन में कैसे भ्रष्टाचार होते देखा था.
सिंह के परिवार की राजस्थान के कोटा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से नज़दीकियां थी और उन्होंने अपने गृह जिले में मंदिर के निर्माण हेतु ज़मीन का एक टुकड़ा दान भी किया था. चंपत राय, जो विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं, का भी इस मंदिर में लगातार आगमन होता रहता था, जिसके कारण दोनों में घनिष्ठता बढ़ी.
एक बार जब राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ, महिपाल सिंह ने बैंक की अपनी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली. मंदिर में उन्हें लेखा प्रभारी बना दिया गया, जिस काम में उन्होंने अब अपना समय समर्पित कर दिया.
हालांकि, सब उम्मीदों के मुताबिक नहीं हुआ. उस स्थानीय निवासी के अनुसार, सिंह ने उससे कहा था कि ‘जिस तरह का भ्रष्टाचार वहां फैला हुआ है उससे मैं बहुत भयभीत हूं. यहां आकर मुझसे गलती हुई… लेकिन फिर मैंने सोचा कि कम से कम आठ महीनों के लिए मुझे भगवान् के दर्शन का अवसर मिल गया.’
इस रिपोर्टर को उस स्थानीय व्यक्ति से ये भी पता लगा कि 2022 में महिपाल सिंह ने उसे बताया थी कि वो किसी दूसरी नौकरी की तलाश में है. उस स्थानीय निवासी के अनुसार, सिंह ने कहा था कि ‘मेरे जैसे व्यक्ति में भ्रष्टाचार को लेकर बिल्कुल भी सहिष्णुता नहीं है. और वहां मंदिर में, सीसीटीवी कैमरे के बिल्कुल सामने, भ्रष्टाचार अपने पूरे चरम पर है, वहां जहां मैं भी बैठा करता था.’
जब द वायर ने ह्विसिलब्लोअर महिपाल सिंह से संपर्क किया, तब उसने इस बात की पुष्टि की कि, ‘मैं वहां आरएसएस के तरफ से अप्रैल 2021 से जुलाई 2022 तक बिना किसी शुल्क के अपनी सेवा देने गया था.’
हालांकि सिंह ने मंदिर के शीर्ष प्रबंधन समिति के लोगों, जिसमें राय और अनिल मिश्रा समेत अन्य ट्रस्टी, या खजांची गोपाल राव और गोविंद गिरि भी शामिल हैं, की इस भ्रष्टाचार में कथित संलिप्तता पर कुछ भी बोलने से इनकार किया.
‘जो भी मुझे कहना था वो सबके सामने है,’ कहते हुए सिंह ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वो बैंककर्मी, रत्नेश चतुर्वेदी और गगनदीप के दानपेटी के रुपयों की गिनती करने वाले अन्य कर्मचारियों के साथ, जो वाउचर के आंकड़ों की हेराफेरी में लगे थे, की मिलीभगत की बात पर कायम रहे.
तुलसी के पत्तों से लेकर चरणामृत तक: मंदिर के नए कानून
अयोध्या में मणि राम दास छावनी से कुछ कदमों की दूरी पर, ‘1992 में मस्जिद गिराने से पहले की वो जगह जहां सारी योजना बनी थी’, दंत धवन कुंड अचारी मंदिर है जिसका राम जन्मभूमि से जुड़ा एक इतिहास है.
30 अक्टूबर 1990 और 02 नवंबर 1990 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने कारसेवकों पर दो बार गोलीबारी की, अस्सी के दशक के अंत से वहां जाने वाले भक्तों का जत्था सोलहवीं सदी में निर्मित बाबरी मस्जिद के होने के बावजूद, वहां मंदिर निर्माण की मांग करता रहा है.
उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा जैसे भगवा ब्रिगेड के शीर्ष के नेताओं ने जहां एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक जगह और अयोध्या के केंद्र में स्थित, मणि राम दास छावनी के अंदर शरण ली थी, वहीं दंत धवन कुंड अचारी मंदिर भी सुरक्षित जगह की तलाश में भागते सैकड़ों कारसेवकों के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में उभरा था.
एक छोर पर बैरिकेड लगा कर बंद की गई वो सड़क, जो अचारी मंदिर के बगल से गुज़रती है, और अंततः हनुमानगढ़ी मंदिर की ओर जाती है, को अभी भी वो सड़क कहा जाता है जहां पुलिस ने कारसेवकों को निशाना बनाया था.

फ्रंटलाइन पत्रिका ने मार्च 2002 में विवादित ज़मीन पर राम मंदिर निर्माण के लिए विहिप के पत्थर दान करने के एजेंडे के साथ आगे बढ़ने की खबर प्रकाशित की थी, हालांकि 27 फरवरी को गोधरा में हुई घटना, जिसमें गुजरात वापस लौटते 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी, के कारण कुछ धार्मिक धड़ों ने इससे दूरी बनाना तय किया था.
दंत धवन कुंड मंदिर के प्रमुख पुजारी, स्वामी नारायणचारी, उनमें से एक थे जिन्होंने खुद को विहिप के इस आयोजन से दूर रखा था. 24 वर्षों बाद उनके बेटे महंत विवेक अचारी ने 2020 के दिसंबर में महंत के रूप में पदभार संभाला, जो राम मंदिर ट्रस्ट की कार्य प्रणाली के मुखर आलोचक हैं.
‘शुरुआत में उनका (ट्रस्टी) का व्यवहार अच्छा था; लेकिन बाद में वे हम लोगों से बेरुखी से पेश आने लगे. पीठाधेश्वर और महंतों को ट्रस्ट ज़्यादातर नज़रअंदाज़ करने लगे,’ अचारी ने ये बातें द वायर को बताई.

बताई गई बहुत सारी घटनाओं में से एक यह है कि नवंबर 2025 में ध्वजारोहण समारोह के दौरान और जनवरी 2025 में प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के समय भी अयोध्या के धर्माचार्यों को समारोह स्थल के बिल्कुल किनारे में जगह दी गई थी. महंत कहते हैं कि ‘राम मंदिर आखिर धर्म के संरक्षण के लिए बना है; भगवान राम तक भी एक निश्चित मर्यादा का पालन करते थे और जो भगवान के ध्वजवाहक हैं, उन्हें ही नज़रअंदाज़ किया जा रहा था.’
उनकी केवल यही एक शिकायत नहीं है. इससे पहले उन्होंने द वायर से कहा था कि चढ़ावा चोरी मामले में उन्होंने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा जांच की मांग की थी. शहर के निवासियों द्वारा जाहिर किए गए गुस्से और चिंता को लेकर उन्होंने कहा कि ‘सीबीआई को सिर्फ इसलिए शामिल करना चाहिए था ताकि अयोध्यावासियों पर लगे कलंक को मिटाया जा सके.’
मंदिर प्रशासक, गोपाल राव, जिसे ‘ट्रस्ट की बैठकों में शामिल होने से मना कर दिया गया है’, के द्वारा जारी किए गए कुछ आदेशों को याद करते हुए अचारी ने रिपोर्टर को बताया कि अमेरिका में रहने वाला ओबेरॉय ग्रुप का एक व्यवसाय प्रमुख एक बार मंदिर दर्शन करने आया. चूंकि वह इतनी दूर से आया था इसलिए उन्होंने तुलसी दल या मूर्ति पर चढ़ाए जाने वाले फूल को निशानी के तौर पर देने का आग्रह किया गया, तब हमें इसके लिए गोपाल राव से पूछने को कहा गया. अंदर 18 पुजारी हैं और तुलसी के एक पत्ते के लिए भी गोपाल राव के अनुमति की ज़रूरत है.
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया के लिए द वायर ने गोपाल राव से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने हमारा फोन ही काट दिया.
इस दौरान, करपात्री महाराज के भी गोपाल राव द्वारा जारी किए गए ऐसे एक आदेश को लेकर अपने कड़वे अनुभव हैं.
करपात्री महाराज ने कहा कि ‘एक बार मैं मंदिर गया और पुजारी से थोड़ा चरणामृत देने को कहा; तब मुझसे कहा गया कि गोपाल राव ने अब और चरणामृत बांटने से मना किया है. और तो और, उसने पुजारी को ‘पांडेय जी’ या ‘चौबे जी’ न बुलाकर कर उन्हें बस ‘पुजारी’ बुलाने का निर्देश जारी किया है.
‘वह (गोपाल राव) ट्रस्ट में किसी पद पर भी नहीं है और बस आमंत्रित सदस्यों में से एक है, लेकिन फिर भी उसकी बहुत चलती है,’ करपात्री ने कहा.
जांच के घेरे में अन्य ट्रस्टी
बीते 01 जुलाई 2026 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अयोध्या जिला महासचिव सूर्यकांत पांडेय ने इस मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखा.
‘जब पहले भी आरएसएस के लोगों के ट्रस्ट में सदस्य के तौर पर रहते हुए उसे लूट से नहीं बचाया जा सका, तब तुरंत संघ के लोगों को दोबारा इसमें शामिल करना मुझे आपत्तिजनक लगता है. मेरा आपसे निवेदन है कि ट्रस्ट में किसी विशेष विचारधारा के लोगों को ही शामिल करना घातक होगा.’
ऐसा उस चिट्ठी में लिखा गया है जिसकी एक प्रति द वायर के द्वारा देखी गई. पांडेय ने लिखा कि ‘श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में निष्पक्ष पृष्ठभूमि वाले साधुओं को शामिल करना बेहतर होगा.’
द वायर के पांडेय से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि सारे ट्रस्टियों में, डॉ. अनिल मिश्रा की तरक्की उन्हें विशेष तौर पर अचरज में डालती है. ‘1990 के आसपास, उसने (मिश्रा) होम्योपैथी के चिकित्सक के रूप में यहां दो स्थानों, साहबगंज और रिकबगंज, में प्रैक्टिस शुरू की. संघ से संबंधित गतिविधियों का जिम्मा भी वो अपने हाथ में लेते थे.’
अनिल मिश्रा के पिता बब्बन मिश्रा अंबेडकर नगर से अयोध्या आकर बसे थे, और सड़क एवं भवन निर्माण की परियोजनाओं में ठेकेदार के तौर पर काम करते थे.
ऐसा प्रतीत होता है कि 2020 में ट्रस्ट में शामिल होने के बाद मिश्रा की व्यक्तिगत प्रगति में अचानक से उछाल आया है. पहले तो उनके पास 1980 में विकसित हुए अयोध्या नगर निगम कॉलोनी में दो कमरों का एक मकान था. ट्रस्ट में शामिल होने के बाद उन्होंने उसी जगह एक दूसरा फ्लैट भी खरीद लिया. बाद में, उन्होंने अमानीगंज में भी अलग प्रॉपर्टी खरीदी.
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी प्राथमिक रिपोर्ट (जिसे राम मंदिर ट्रस्ट ने 06 जुलाई को अपनी प्रेस विज्ञप्ति में साझा किया) में कहा कि, ‘जहां तक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) की बात थी अनिल मिश्रा ने ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व किया. चूँकि उन्हें एसओपी के बारे में अच्छी तरह पता था इसलिए उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी; और तलाशी न लिए जाने के बारे में आंतरिक तंत्र के द्वारा उन्हें अवगत कराया गया था. बावजूद इसके तलाशी को लेकर कोई भी लिखित निर्देश जारी नहीं किया गया.’
ट्रस्ट और मंदिर में गणना केंद्र के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी बैंक के कर्मचारियों के बीच एसओपी या मानक संचालन प्रक्रिया की व्यवस्था की गई थी. रिपोर्ट से पता चलता है कि, चोरी के कई संदिग्ध मामले के बाद भी मंदिर प्रशासन ने इस व्यवस्था की अवहेलना की.
1997 में प्रकाशित अपनी किताब, द आइडिया ऑफ इंडिया (पेंगुइन, 2004), में समाजविज्ञानी सुनील खिलनानी अयोध्या में राम जन्मभूमि परियोजना की ‘हिंदू वेटिकन’ की स्थापना के रूप में व्याख्या करते हैं. हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए इसका अर्थ है ‘भाजपा का एक ऐसे दल के रूप में चुना जाना जो अतीत में हुए गलत को सही कर आधुनिक भारत का उसके सुनहरे इतिहास से सीधा संबंध स्थापित करेगी.’
ठीक इसी तरह 2024 में प्रकाशित अपनी किताब ट्वाईलाईट प्रिज़नर्स: द राइज ऑफ द हिंदू राइट एंड द डिक्लाइन ऑफ इंडिया (संदर्भ, 2024) में लेखक सिद्धार्थ देब भाजपा के लिए एक राजनीतिक परियोजना के रूप में अयोध्या का महत्व पर प्रकाश डालते हैं.
‘अयोध्या के बारे में जो एक कड़वा सच दिखाई देता है वो ये है कि राम मंदिर निर्माण के अभियान द्वारा पूरे देश में हिंदू दक्षिणपंथ के प्रसार को गति देकर समस्त भारत में इसके प्रभाव को महसूस करने के बाद भी वहां बेहतरी के लेकर बहुत ज़्यादा कुछ नहीं बदला है. ख़ासकर मोदी ने, हिंसा और तमाशे के मेल को और आगे ले जाकर अपने विक्षिप्त व्यक्तित्व पर एक निश्चित मुहर लगा दी है.’
राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद के बाहर आने के एक महीने बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर कुछ भी नहीं कहा है. अभी तक भी नहीं.
(मूल अंग्रेजी से कुमार निशांत द्वारा अनूदित)
