रज़ा अपनी बालभूमि मंडला में सर्वत्रपुण्या नर्मदा से कुछ ही दूर एक कब्रगाह में अपनी पिता की कब्र की बगल की कब्र में सोये हुए हैं. बाहर वे अपनी कला में, उसके बढ़ते प्रभाव में, उसकी समझ में और युवा प्रतिभा में अपने अटल विश्वास में जाग रहे हैं. उनकी कला जीवित है, सारी नश्वरता के बरक़्स वह कालजयी है. वे अपने रंगनयनों से अब भी प्रकृति को देख और रूपायित कर रहे हैं. वह अब भी प्रकृति और पुरुष के युग्म को, स्फुरण और बीज को, आरंभ और स्वस्ति को, बिंदु और आलोक को, शान्ति और मौन को, सुषमा और सौन्दर्य को देख रहे हैं- उनकी आभा में रंगदग्ध हैं.
मंडला और नर्मदा, उसके शहरातियों के समूह, उसके बच्चे-बच्चियां, उसकी घरेलू और कामकाजी स्त्रियां पिछले कुछ वर्षों से, धीरे-धीरे, जानने लगे हैं कि यह मूर्धन्य चित्रकार मंडला से उठा था और उसे और नर्मदा को कभी भूला नहीं.
– रज़ा को एक हालिया लेख में याद करते अशोक वाजपेयी
चित्रकार सैयद हैदर रज़ा अपने न होने में भी मौजूद रहे हैं. कला के साधकों को उनकी अनुपस्थिति का आभास न हो, इसका प्रयास उनके नाम पर बना रज़ा फाउंडेशन इन बरसों में करता रहा है. फाउंडेशन के प्रबंधक और आजीवन ट्रस्टी अशोक वाजपेयी लगातार इसके बैनर तले नए कलाकारों, लेखकों आदि को अवसर देने के साथ आर्काइव का भी काम कर रहे हैं. रज़ा की पुण्यतिथि पर उनसे मनोज मोहन की बातचीत:

सैयद हैदर रज़ा के उत्तर जीवन के दस साल पूरे हुए. हमारे आसपास जितना साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे हैं, उसमें अधिकांश रज़ा फाउंडेशन के कारण संभव हुए हैं. आप इन दस वर्षों को किस तरह देखते हैं?
रज़ा फाउंडेशन की स्थापना को इस वर्ष पच्चीस वर्ष पूरे हुए हैं. बिना किसी सरकारी अनुदान के और बिना कोई कॉरपोरेट मदद लिए पिछले दस वर्ष में अकेले फाउंडेशन ने ललित कला, संगीत, साहित्य, नृत्य, विचार, रंगमंच, वास्तुकला, फिल्म आदि के क्षेत्र में जो गतिविधियां, आयोजन, प्रकाशन, सहायता आदि किए हैं वे इन क्षेत्रों में सक्रिय अनेक निजी या सार्वजनिक संस्थानों के किए-धरे से अधिक हैं.

लगभग 27 शहरों में वर्षों भर हर चार-पांच दिनों में एक आयोजन होता है. रज़ा पुस्तकमाला में लगभग ढाई सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. तीन स्तरीय पत्रिकाएं निकलती हैं : ‘समास’, ‘स्वरमुद्रा’ और ‘अरूप’. अनेक समारोहों, गोष्ठियों और परिसंवादों, प्रकाशनों, फिल्म निर्माण आदि में वित्तीय सहायता दी गई है. अपने जीवनकाल में रज़ा साहब ने फाउंडेशन का एक भी पैसा उनके ऊपर खर्च करने नहीं दिया. उनके देहावसान के बाद पेरिस के पाम्पिदू सेंटर में उनकी तब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक प्रदर्शनी हुई जिसे लगभग सत्तर हज़ार लोगों ने देखा-सराहा. उनके दस्तावेजों और काग़ज़ात को एकत्र और व्यवस्थित कर रज़ा आर्काइव स्थापित किया गया है. उनकी बालभूमि मंडला में हर वर्ष दो बार उनकी स्मृति में कार्यशालाओं, प्रशिक्षण, प्रदर्शन, साहित्यिक और कला-विमर्श आदि के आयोजन होते हैं.
रज़ा साहब को लेकर जो पहली स्मृति है, उसे जानने की इच्छा होती है. उन्होंने आपकी कविता पंक्ति को लेकर चित्र बनाया है…
मेरी उनसे पहली मुलाकात बंबई में हुई थी. 76-77 में जब मैंने उन्हें भोपाल एक प्रदर्शनी और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सम्मानित होने के लिए आमंत्रित किया तो वे 1976 में भोपाल आए. उनकी कला पर शायद, उनके जीवन में पहला परिसंवाद भी उसी समय हुआ. उनके अपने मातृप्रदेश में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी भी तभी हुई. 1980 में उन्होंने मेरी एक कविता-पंक्ति ‘माँ, लौटकर जब आऊँगा क्या लाऊँगा’ का उपयोग अपनी एक बड़ी कलाकृति में किया था. वह उनके प्रमुख चित्रों में गिना जाता है.
उन्होंने उस कविता का अर्थविस्तार करते हुए उसे अपने देश के नाम एक प्रेमपत्र में बदल दिया था जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी. रज़ा संसार भर के आधुनिकों में शायद अद्वितीय हैं जिन्होंने अपने लगभग सौ चित्रों में कविता-पंक्तियां अंकित की हैं. सभी देवनागरी में लिखीं पर संस्कृत, हिंदी और उर्दू से चुनी गईं कविता-पंक्तियां.

हिंदी कविता में कई कवियों को लेकर त्रयी बनी है. क्या रज़ा, हुसैन और रामकुमार को लेकर इस तरह सोचा जा सकता है? तीनों एक-दूसरे के गहरे मित्र रहे हैं… और आपके भी.
नहीं, ऐसा करने का कोई औचित्य नहीं होगा. भारतीय चित्रकला में वह ऐतिहासिक समय था जिसमें लगभग एक साथ इतने मूर्धन्य हुए, जिनमें हुसैन, रज़ा, सूज़ा, कृष्ण खन्ना, रामकुमार, तैयब मेहता, अकबर पदमसी, वासुदेव गायतोंडे सभी शामिल थे. उन्हें किसी अर्थ में समेटना या घटाना उपयुक्त नहीं है. मेरा सौभाग्य कि उनमें से कुछ से मेरी मित्रता हुई.
साठ साल लगातार फ्रांस में रहने के बाद वे भारत लौटे और यहीं के होकर रह गए, यह एक बड़ी घटना है. टीएस इलियट भी हार्वर्ड में रहते-रहते इंग्लैंड अपने पूर्वजों की धरती पर लौट आए थे. दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र की महान प्रतिभा थे. आप इस पर क्या सोचते हैं?
रज़ा साठ साल फ्रांस में रहे पर अपनी मानसिकता, दृष्टि और स्मृति में उन्होंने कभी भारत छोड़ा नहीं. उन्होंने फ्रांस की नागरिकता भी नहीं स्वीकार की: उनका पासपोर्ट भारतीय बना रहा. अपने उत्तर काल में पेरिस रहते वह वर्षों में कई महीनों के लिए भारत आते रहे.

इन प्रश्नों से अलग आप रज़ा साहब को लेकर क्या कहना चाहेंगे?
रज़ा कई मामलों में अप्रतिमेय थे. वे समय के नहीं, अनंत के चित्रकार थे. वे उद्गम के चित्रकार थे, इतिहास के नहीं. वे कविता और हिंदी प्रेमी चित्रकार थे. वे रंगदग्ध थे और साथ ही रंगनयन. वे अपने चित्रों पर अर्थ का बोझ नहीं डालते थे. वे आधुनिक थे पर उन्होंने अपनी कला में वैकल्पिक आधुनिकता रूपायित की-सुसंगति, ऐन्द्रियता, शांति, स्पंदित एकांत, मौन, स्फुरण, प्रकृति और मुक्ति की तलाश की.
अपने जीवन में दीर्घजीवी थे और लगभग अंत तक चित्र बनाते रहे: उनकी कला कालजयी है. उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक आधुनिकता पर जो रंगवितान छोड़े हैं वे अमिट हैं. उनकी अचूक और अदम्य उदारता कलाकार-समाज में विरल थी. उनका युवा प्रतिभा और संभावना में अटूट विश्वास था. उनका शरीर मंडला की कब्रगाह में दफ़्न है जहां वे सो रहे हैं पर वे अपने चित्रों में, युवा सृजन में अहर्निश जाग रहे हैं. वे संसार का एक अविस्मरणीय सत्यापन हैं.
(मनोज मोहन सीएसडीएस की शोधपरक पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति’ के सहायक संपादक हैं.)
