भारत में अनेक माता-पिता गर्व से कहते हैं कि उन्होंने अपनी बेटियों को जीवनसाथी चुनने की पूरी स्वतंत्रता दी है. कुछ समय तक यह बात सच भी प्रतीत होती है. एक लड़की विवाह के कई प्रस्ताव ठुकरा सकती है, अपने करिअर को प्राथमिकता देते हुए विवाह टाल सकती है और यह विश्वास कर सकती है कि अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार वास्तव में उसी के पास है.
लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि यह स्वतंत्रता निःशर्त नहीं, बल्कि एक अनकहे अनुबंध के साथ आती है. उसकी पसंद का वास्तविक सम्मान तब तक ही किया जाता है, जब तक वह साधारण विवाह प्रस्तावों को अस्वीकार करती है. असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब वह किसी ऐसे प्रस्ताव को ‘ना’ कहती है जिसे परिवार और समाज ‘आदर्श रिश्ता’ मानते हैं- प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी, करोड़ों का पैकेज, ऊंची सामाजिक हैसियत या प्रभावशाली परिवार.
यहीं से उसकी स्वतंत्रता की सीमाएं तय होने लगती हैं. ‘यह तुम्हारी ज़िंदगी है, फैसला तुम्हारा होगा’ जैसी बातें अचानक गायब हो जाती हैं. उनकी जगह ले लेते हैं भावनात्मक दबाव, अपराधबोध, रिश्तेदारों की नसीहतें और परिवार की यह चिंता कि ‘ऐसा रिश्ता दोबारा नहीं मिलेगा.’
विकल्पों में चयन की स्वतंत्रता
उसी क्षण बेटी समझ जाती है कि उसे जीवनसाथी चुनने की नहीं, केवल उन विकल्पों में से चयन करने की स्वतंत्रता दी गई थी जिन्हें परिवार पहले ही स्वीकार कर चुका था. उसकी स्वायत्तता तब तक मान्य थी, जब तक वह परिवार की अपेक्षाओं के भीतर निर्णय ले रही थी. जैसे ही उसकी इच्छा उन अपेक्षाओं से टकराती है, उसकी स्वतंत्रता एक भ्रम बनकर रह जाती है.
अचानक रिश्ते की कसौटियां बदल जाती हैं. अब यह नहीं देखा जाता कि प्रस्तावित व्यक्ति (पुरुष) भावनात्मक रूप से परिपक्व है या नहीं, या वह बराबरी का साथी बन सकता है या नहीं. चर्चा उसकी सालाना आय, जाति, धर्म और परिवार की प्रतिष्ठा पर केंद्रित हो जाती है. इस रिश्ते को जीवन में एक बार मिलने वाले सुनहरे अवसर की तरह पेश किया जाता है, जिसे किसी भी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.
ऐसी स्थिति में लड़की का इनकार उसकी स्वतंत्र इच्छा नहीं माना जाता, बल्कि उसे बचकानी ज़िद, अपरिपक्वता या कृतघ्नता का नाम दे दिया जाता है. फिर भावनात्मक ब्लैकमेल, अपराधबोध और सूक्ष्म दबाव का पूरा तंत्र उसे यह समझाने में लग जाता है कि इस ‘आदर्श’ रिश्ते के बाहर जीवन में कुछ नहीं बचा.
इस ज़माने में महानगरों या शहरों में रहने वाले एक वर्ग को किसी महिला के स्वयं जीवनसाथी न चुनने की आज़ादी और ‘अरेंज मैरिज’ की बाध्यता या यूं कहें दबाव की बात अटपटी या पुरातनपंथी लग सकती है, मगर भारत में रह रही अधिकांश महिलाओं के जीवन का सच यही है.
हर लड़की स्वतंत्रता की एक जैसी समझ के साथ बड़ी नहीं होती. कुछ परिवारों में बेटियों को बचपन से ही स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है कि उनके पास न तो अपने करिअर के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होगा और न ही अपने जीवनसाथी को चुनने का. सीमाएं पहले से तय होती हैं- भले ही वे प्रतिबंधात्मक क्यों न हों.
लेकिन कई परिवार ऐसे भी होते हैं जहां बेटियों को अपनी पढ़ाई, करिअर, पहनावे, दोस्तों के साथ घूमने-फिरने और जीवन के अनेक निर्णय स्वयं लेने की आज़ादी दी जाती है. वे यह विश्वास लेकर बड़ी होती हैं कि उन्हें अपना जीवन अपनी पसंद से गढ़ने का अधिकार है. पर जैसे ही जीवनसाथी चुनने की बात आती है, वही स्वतंत्रता अचानक उनसे छीन ली जाती है. परिवार की इज़्ज़त, जाति, धर्म या सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर यह निर्णय उनके हाथों से निकाल लिया जाता है.
पितृसत्तात्मक समाज में बेटियां
यही विरोधाभास सबसे अधिक विचलित करता है. जिस लड़की को बचपन से स्वतंत्र सोचने और अपने निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया हो, उससे अचानक यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने जीवन के सबसे निजी और महत्वपूर्ण निर्णय पर बिना किसी प्रश्न के परिवार की इच्छा के आगे झुक जाए.
विद्रोह केवल माता-पिता की असहमति से नहीं जन्म लेता, बल्कि उस स्वायत्तता के अचानक छिन जाने से पैदा होता है, जिसे वह अब तक अपना अधिकार समझती आई थी. यही अनुभव उसे भीतर से आहत, दुविधाग्रस्त और कई बार विद्रोही बना देता है.
पितृसत्तात्मक समाज में बेटियों को अक्सर ऐसे व्यक्तियों के रूप में देखा जाता है जिन्हें सशक्त बनाने के बजाय संरक्षण की आवश्यकता है. अनेक माता-पिता यह मानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अपनी बेटी के लिए ऐसा पति ढूंढ़ना है जो उसका ‘ख़याल रख सके’, जबकि उसे सक्षम बनाने पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है ताकि वह स्वयं अपना जीवन संभाल सके; अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं ले सके.
हाल के दिनों में पत्नियों या मंगेतरों द्वारा अपने साथी की हत्या के मामलों ने एक असहज लेकिन आवश्यक चर्चा को फिर से जन्म दिया है. निस्संदेह, प्रत्येक अपराध की अपनी परिस्थितियां होती हैं और उन्हें किसी एक कारण तक सीमित नहीं किया जा सकता. फिर भी, कुछ मामलों में यह सामने आया है कि संबंधित महिलाओं पर ऐसे विवाह के लिए दबाव डाला गया था या उन्हें विवश किया गया था, जिसे वे स्वयं नहीं चाहती थीं.
ये घटनाएं समाज के उस अंतर्निहित सच को उजागर करती हैं, जिसे स्वीकार करने से अक्सर बचा जाता है- कि आज भी अनेक महिलाओं को अपने जीवनसाथी का चयन करने की वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है.
स्वायत्तता और उनके भावनात्मक जीवन की अनदेखी
कई परिवारों में बेटियों की ‘उचित समय’ पर शादी कराने की इतनी जल्दबाज़ी होती है कि उसका कारण केवल सामाजिक अपेक्षाएं नहीं होतीं, बल्कि यह भय भी होता है कि कहीं बेटी किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम न करने लगे जिसे परिवार स्वीकार न करे. यहां तक कि जब माता-पिता जानते हैं कि उनकी बेटी पहले से किसी संबंध में है, तब भी वे यह मान लेते हैं कि विवाह उसके अतीत को मिटा देगा और उसका होने वाला पति किसी तरह उसकी भावनात्मक उलझनों को संभाल लेगा.
ऐसी धारणाएं महिलाओं की स्वायत्तता और उनके भावनात्मक जीवन की अनदेखी करती हैं. विवाह न तो प्रेम को मिटा सकता है, न ही मन में बसे आक्रोश, पीड़ा या मानसिक आघात को.
जब किसी महिला की सहमति से समझौता किया जाता है और उसकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, तब उसके परिणाम असुखी वैवाहिक जीवन, आजीवन मानसिक पीड़ा और अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हिंसा जैसी चरम घटनाओं के रूप में सामने आ सकते हैं.
असल सवाल यह है कि महिलाओं को वास्तव में ‘ना’ कहने की अनुमति कितनी बार मिलती है? अधिकांश घरों में लड़की का इनकार होने वाले चुने गए पुरुष तक पहुंचता ही नहीं. उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मेहमानों के सामने चाय परोसे, औपचारिक बातचीत करे और अपनी खुशी दिखाए. परिवार को समाज में अपमान का डर होता है, वहीं लड़की को अपने माता-पिता का दिल टूटने, भावनात्मक सहारा खोने या आर्थिक असुरक्षा का भय सताता है.
जिन महिलाओं की अपनी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं होती, उनके लिए ‘ना’ कहना केवल एक पसंद नहीं, बल्कि बहुत बड़ा जोखिम होता है. यदि किसी रिश्ते को ठुकराने का अर्थ घर में युद्ध छिड़ जाना हो, तो उस चुनाव को स्वतंत्र कैसे कहा जा सकता है?
भारतीय माता-पिता अक्सर यह कहकर अपनी बात सही ठहराते हैं कि ‘हमें जीवन का अधिक अनुभव है.’ निस्संदेह वे बैंक बैलेंस देख सकते हैं, परिवार की पृष्ठभूमि की जांच कर सकते हैं. लेकिन किसी का चमकदार बायोडाटा यह नहीं बताता कि वह कितना संवेदनशील है, उसका स्वभाव कैसा है, या उसके साथ रोज़मर्रा का जीवन कैसा होगा.
अक्सर माता-पिता यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी बेटी उस विवाह प्रस्ताव को क्यों ठुकरा रही है जिसे समाज ‘आदर्श रिश्ता’ मानता है—जहां लड़का अच्छी नौकरी करता हो, आर्थिक रूप से सक्षम हो और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित परिवार से आता हो. उनके लिए ऐसा रिश्ता ठुकराना समझ से परे होता है.
लेकिन इसके कारण व्यक्तिगत हो सकते हैं. महिला को लग सकता है कि वह लड़का भावनात्मक रूप से उपलब्ध नहीं है, दोनों के स्वभाव और सोच में मूलभूत असंगति है, या वह उसके साथ एक संतोषजनक जीवन की कल्पना ही नहीं कर पा रही. ये कारण भले ही दिखाई न दें, लेकिन वे आर्थिक सुरक्षा या सामाजिक प्रतिष्ठा जितने ही वास्तविक और महत्वपूर्ण होते हैं.
दुर्भाग्य से, ऐसे कारणों को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता. उसकी बात समझने की कोशिश करने के बजाय उसे यही समझाया जाता है कि उसकी अपेक्षाएं अवास्तविक हैं, कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, और शादी के बाद समझौता करना सीखना पड़ता है.
इस पूरी प्रक्रिया में भावनात्मक अनुकूलता को एक अनावश्यक विलासिता मान लिया जाता है, जबकि समझौते को स्त्री का कर्तव्य बनाकर उसके सामने प्रस्तुत किया जाता है.
यह बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब महिला पहले से किसी और से प्रेम करती हो, विशेषकर यदि वह व्यक्ति उसी जाति या समुदाय का न हो. केवल आर्थिक रूप से बेहतर या सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य विकल्प के लिए उसकी पसंद को नकार देना यह दर्शाता है कि आज भी विवाह को साथ निभाने का संबंध नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने का माध्यम माना जाता है.
और यदि वह अपार साहस जुटाकर इस रिश्ते को ठुकरा दे, तो उसकी परीक्षा वहीं समाप्त नहीं होती. परिवार, रिश्तेदार और परिचित उसे कभी बिना सवालों के जीने नहीं देते. वह जहां भी जाती है, एक ही सवाल उसका पीछा करता है- ‘अरे, तुम्हारा रिश्ता तो उस लड़के से तय हुआ था न?’
यदि बाद में उसे उसी ‘हैसियत’ का लड़का नहीं मिलता, या वह अविवाहित रहने का निर्णय लेती है, तो वह ठुकराया हुआ रिश्ता जीवनभर उसके सामने ऐसा उदाहरण बनाकर रखा जाता है, जिसके जरिये उसे बार-बार यह एहसास दिलाया जाता है कि उसने जीवन की सबसे बड़ी भूल कर दी- ऐसा अपराधबोध, जिसे उसे पूरी उम्र ढोना पड़ेगा.
अपेक्षाओं की फेहरिस्त
बरसों बरस भारत, खासकर दक्षिण एशियाई समाज में प्रचलित रही अरेंज मैरिज का स्वरूप भी आज बदल चुका है. परिवारों के मिलने-जुलने की परंपरा अब कॉरपोरेट भर्ती प्रक्रिया में बदलती जा रही है. यूट्यूब के रिलेशनशिप ‘विशेषज्ञों’ से प्रेरित प्रश्नों की सूची लेकर युवक-युवतियां एक-दूसरे का इंटरव्यू लेने बैठते हैं. प्रश्न समझने के लिए नहीं, बल्कि परखने के लिए पूछे जाते हैं.
वह पूछता है, ‘क्या तुम मेरे माता-पिता की हर बात मानोगी और उनका सम्मान करोगी?’
वह जवाब देती है, ‘मैं उनका सम्मान करूंगी, लेकिन अपनी पहचान की कीमत पर नहीं.’
बस इसी एक उत्तर के आधार पर वह उसे ‘असम्मानजनक’ मान लिया जाता है और वह उसे ‘पितृसत्तात्मक’ समझ लेती है. पूरे भविष्य का फैसला वास्तविक अनुभवों के आधार पर नहीं, बल्कि कल्पित आशंकाओं के आधार पर हो जाता है. ईमानदारी बोझ बन जाती है. व्यक्तित्व छिपा दिए जाते हैं और वास्तविक इंसान की जगह एक सावधानी से गढ़ी हुई छवि प्रस्तुत की जाती है. उद्देश्य एक-दूसरे को जानना नहीं, बल्कि ‘इंटरव्यू’ पास करना रह जाता है.
जो विवाह केवल लेन-देन जैसी बातचीत या माता-पिता की अपेक्षाएं पूरी करने के लिए होगा, उसकी नींव स्वाभाविक रूप से कमजोर होती है. जैसे ही दिखावा समाप्त होता है और वास्तविक जीवन शुरू होता है, दबाए गए मतभेद सामने आने लगते हैं. ऐसे समाज में जहां तलाक को अब भी कलंक माना जाता है, यह भावनात्मक कैद एक प्रेशर कुकर बन जाती है, जो कभी असंतोष, कभी घरेलू हिंसा और कभी गंभीर अपराधों में बदल सकती है.
आख़िर विवाह का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या यह दो लोगों के साथ मिलकर जीवन बनाने की संस्था है या केवल परिवारों को पड़ोसियों की बातों से बचाने की ढाल?
यदि कोई वयस्क यह तय ही न कर सके कि वह किसका हाथ थामना चाहता है और किसका हाथ छोड़ना चाहता है, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक वादा खोखला रह जाता है. माता-पिता का काम मार्गदर्शन देना है, गाड़ी चलाना नहीं. सच्ची स्वतंत्रता में गलती करने की स्वतंत्रता भी शामिल होती है. वयस्क अपनी गलतियों से सीखते हैं, उनसे आगे बढ़ते हैं और स्वयं को संभालना भी सीखते हैं. ‘सुरक्षा’ के नाम पर उनसे निर्णय लेने का अधिकार छीन लेना, अक्सर उन संभावित गलतियों से कहीं अधिक नुकसान पहुंचा देता है, जो वे स्वयं कर सकते थे.
यदि समाज वास्तव में केतन हत्याकांड जैसी त्रासदियों को रोकना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि अपने जीवनसाथी का चुनाव करने की स्वतंत्रता कोई ऐसा विशेषाधिकार नहीं है जिसे दिया या छीना जा सके, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता का एक मूलभूत अधिकार है.
