कला जीवन का अनुकरण करती है, यह एक प्रसिद्ध उक्ति है. पर यूक्रेनियन-अमेरिकन कवि, इल्या कामिंस्की का काव्यसंग्रह, डेफ रिपब्लिक, बहरा गणतंत्र (हिंदी), ठीक इसके विपरीत इस बात का सबूत है कि जीवन भी कला का अनुकरण कर सकता है.
डेफ रिपब्लिक एक ऐसे गणतंत्र की कहानी है जिसमें एक क्रूर एवं हिंसक सैनिक शासन सामान्य नागरिकों पर अत्याचार करता है. वहां के लोग उस शासन का विरोध करते हैं. हिंसा का शिकार होते हैं पर एक लम्बे समय तक विरोध में डटे रहते हैं.
2019 में छपे इस काव्य संग्रह की झलकियां आजकल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई पड़ रही हैं. यूक्रेन तो इसका ज्वलंत उदाहरण है पर प्रजातंत्र की बिगुल बजाने वाला अमरीका भी इससे अछूता नहीं है. इस संग्रह की पहली कविता की शुरुआती पंक्तियों का उल्लेख यहां जरूरी है:
‘जब वो दूसरों के घरों पे बम गिरा रहे थे, हमने
उसका विरोध किया
पर वो काफी नहीं था, हमने
उनका प्रतिरोध किया पर
वो काफी नहीं था.
मैं अपने बिस्तर में था
और मेरे बिस्तर के ही पास
अमरीका का पतन हो रहा था…’
एक इंटरव्यू के दौरान इल्या बताते हैं कि 2004 में जब उनका पहला काव्यसंग्रह, डांसिंग इन ओडेसा, प्रकाशित हुआ था, तब तक यूक्रेन से अमरीका आए हुए उन्हें 11 साल हो चुके थे और उस काव्यसंग्रह में वो यूक्रेन के अपने अनुभवों को व्यक्त कर चुके थे. उसके बाद वो एक ऐसे रचना संसार का सृजन करना चाहते थे जो ‘यूक्रेन और अमरीका दोनों से बातें करे’. दोनों देशों में व्याप्त हिंसा की सच्चाइयों को बाहर ला सके.
राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ी हिंसा को उन्होंने बहुत करीब से देखा है, सोवियत यूक्रेन, वर्तमान यूक्रेन और अमरीका में भी. वो गोगोल, बैबेल, काफ्का जैसे पूर्वी यूरोप के महान रचनाकारों की परंपरा को ध्यान में रखकर अपनी कविताओं में एक काल्पनिक लोक की रचना करना चाहते थे.
इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने डेफ रिपब्लिक की रचना की. ऊपर की पंक्तियां उसकी पहली कविता, युद्ध के दौरान हम खुशीपूर्वक रह रहे थे, का प्रारंभिक अंश है. और एक बहरे गणतंत्र की कहानी की भूमिका. ये कविता आजकल काफी लोकप्रिय हो रही है.
डेफ रिपब्लिक एक समकालीन महाकाव्य है जो वैसेंका नामक एक काल्पनिक लोक, एक गणतंत्र, की कहानी कहता है. इस गणतंत्र का क्या स्वरूप है और कवि ने इसे ‘डेफ'(बहरा) विशेषण से क्यों सुशोभित किया है? इन सारे प्रश्नों के उत्तर इस पुस्तक की कविताओं में मिलते हैं.
एक के बाद एक, परत दर परत. दो खंडों में विभक्त इस काव्यसंग्रह की शुरुआत गोलीबारी नामक कविता की इन पंक्तियों से होती है:
रंगमंच है हमारा ये देश.
यहां सैनिक जब शहर में करते हैं प्रवेश
लोगों के जमा होने पर तब लगता है निषेध.
पर आज शहर के मुख्य चौक पर
जब बजती है
सौन्या और एलफौंसो की
थिरकती कठपुतलियों की धुन
उनके मधुर संगीत को सुन
पड़ोसी सब निकल पड़ते हैं —
इस कविता की पहली पंक्ति में रंगमंच का प्रयोग काफी दिलचस्प है. पाठकों के लिए रंगमंच के कम-से-कम दो मायने तो स्पष्ट हैं. पहला रंगमंच है वैसेंका, वो शहर, जहां सैनिक रोज-ब-रोज अपनी क्रूरता का प्रदर्शन करते हैं. और ठीक उसके विपरीत दूसरा रंगमंच है शहर का वो मुख्य चौक जहां एक नवदंपति, सौन्या और एलफौंसो, कठपुतलियों का प्रदर्शन कर लोगों का मनोरंजन करते हैं.
पहला रंगमंच पीड़ा का प्रतीक है और दूसरा आनन्द का. यातना और भय के उस माहौल में सौन्या और एलफौंसो की कठपुतलियां लोगों के लिए खुशियों की एक खिड़की खोलती हैं. और लोग उन्हें देखने के लिए निकल पड़ते हैं. दर्शक जब कठपुतलियों का नाच देखने में मशगूल हैं तो अचानक आर्मी की जीप से एक हवलदार उतरता है और सभी लोगों को वहां से जाने का आदेश देता है.
दर्शकों में बैठा है एक बधिर बालक जिसका नाम है पेट्या जो हवलदार को देखकर हंसने लगता है और उसके ऊपर थूक देता है. जिसके बाद पेट्या को गोलियों से भून दिया जाता है. पेट्या एक अबोध बालक है. हवलदार की सत्ता से एकदम अनजान. पर क्या वह हवलदार, गणतंत्र का एक प्रतिनिधि, जिसने पेट्या की हत्या की, बहरा नहीं है? उसके इस कृत्य से गणतंत्र की श्रवण शक्ति पर भी सवाल उठता है.
इस कविता में इल्या ने बहरापन को एक विडंबना के रूप में इस्तेमाल किया है. ये एक रूपक भी है. पेट्या के संदर्भ में इसका अर्थ अगर शाब्दिक है तो गणतंत्र के संदर्भ में साहित्यिक. इस कविता से शीर्षक की सार्थकता भी स्पष्ट होने लगती है.
एक बालक के बहरेपन से भी बड़ी सच्चाई है एक गणतंत्र के बहरेपन की सच्चाई. दर्शकों के समक्ष हुई इस दर्दनाक घटना से कहानी एक नाटकीय मोड़ लेती है. जो लोग अभी तक सैनिकों के अत्याचार को चुपचाप सहते जा रहे थे, एक निर्दोष बालक की निर्मम हत्या से उनका सब्र का बांध टूट पड़ता है. और उनके अंदर सुलग रही विरोध की चिंगारी भड़क उठती है. वो हथियारबंद सैनिकों के खिलाफ विरोध का एक नायाब तरीका अख्तियार करते हैं:
अगली सुबह हमारा देश
जब सोकर उठा तब
उसने सैनिकों को सुनने से
इंकार कर दिया
और वस्तुतः अगली सुबह से वैसेंका के नागरिक सैनिकों की बातों को सुनना बंद कर देते हैं. उनसे न कोई बातचीत, न मेलजोल और न ही किसी भी प्रकार का आमदरफ्त. अभिवादन का आदान-प्रदान बंद. सैनिकों के लिए बेकरी के दरवाजे भी बंद कर दिए जाते हैं. लोग आपस में सांकेतिक भाषा का प्रयोग करने लगते हैं. और बधिरता को विरोध का हथियार बना लेते हैं.
‘तुम्हारी बात कोई नहीं सुनता’, ‘हम बहरे हैं’: सैनिकों को पोस्टर देकर, दीवार वगैरह पर लिखकर या सांकेतिक भाषा में संदेश दिए जाते हैं. धीरे-धीरे बहरापन एक विद्रोह का रूप धारण कर लेता है. शाम होते होते शहर में गिरफ़्तारियां होने लगती हैं. सैनिक महिलाओं पर गोलियां चलाते हैं और गली-गली में श्रवण जांच चौकी बिठाकर घोषणा करते हैं कि:
बहरापन एक छूआछूत की बीमारी है
अपनी सुरक्षा के लिए संक्रमित श्रेत्रों के
सभी लोग 24 घंटे के अंदर
जांच के लिए कर दें यहां आत्मसमर्पण
कहानी में बधिरता को अन्याय के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल एक अनूठा प्रयोग है. और ऐसा केवल इल्या कामिंस्की ही कर सकते हैं. क्योंकि उन्होंने इसे जिया है. करीब चार साल की उम्र में किसी बीमारी के कारण उनके सुनने की शक्ति क्षीण हो गई थी. अमरीका जाने के पहले, सोलह वर्ष की आयु तक, वो पूर्ण बधिर थे. इस अनुभव का उन्होंने कहानी में बखूबी इस्तेमाल किया है. कविताओं की जरूरत के अनुसार पुस्तक में सांकेतिक भाषा के अलग-अलग रेखाचित्रों का भी प्रयोग किया है.
बीसवीं सदी में महात्मा गांधी ने ये सिद्ध कर दिखाया था कि अहिंसा और असहयोग के बल पर कैसे एक ताकतवर साम्राज्य को झुकने पर मजबूर किया जा सकता है. इल्या द्वारा बधिरता और असहयोग के इस्तेमाल में भी गांधी के असहयोग आंदोलन की झलक मिलती है, जो ऐसे सिद्धांतों की सार्वभौमिकता का प्रमाण हैं.
डेफ रिपब्लिक अगर एक सैनिक शासन की क्रूरता और उसके खिलाफ विरोध की कहानी है, तो यह एक नवदंपति के दांपत्य जीवन और उनके शिशु के जन्म और लालन-पालन की भी कहानी है. एक कहानी में पीड़ा है, दर्द है, यातना है, तो दूसरे में प्रेम, वात्सल्य और ममता. दोनों कहानियां साथ-साथ चलती हैं. दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं, पर अलग भी. इन दोनों कहानियों के मुख्य पात्र हैं सौन्या और ऐलफौंसो.
सार्वजनिक जीवन में वे शासन के खिलाफ विरोध का नेतृत्व करते हैं. लोगों को सांकेतिक भाषा में संवाद करना सिखाते हैं. और निजी जीवन में उनका प्रणय, सौन्या का गर्भधारण, शिशु का जन्म और उसकी देखरेख, सब साथ-साथ चलता है. शहर की रोज-ब-रोज बिगड़ती स्थिति के बावजूद घर के अंदर उनकी क्रियाएं उतनी ही सामान्य हैं जितनी किसी भी मनुष्य के निजी जीवन में हो सकता है. इस विरोधाभास को कवि ने अपनी अलग-अलग कविताओं में काफी सुंदर ढंग से चित्रित किया है.
नीचे उद्धरित की गई कविता खासकर इस संदर्भ में काफी प्रासंगिक है. ये दर्शाती है कि एक गणतंत्र कैसे सामान्य नागरिक की निजी जिंदगी को एक पल में तहस नहस कर सकता है:
सुबह
अंदर, सौन्या दूध पिला रही है बच्ची को
जिसका नाम है अनुष्का
जाग रहा एलफौंसो
अपनी पत्नी के स्तन को छूकर…
शाम
चार जीप गली के नुक्कड़ पर रुकती है:
सौन्या को वे ले जाते हैं मुझसे चुराकर
और अनुष्का को रोती हुई छोड़कर
जीप का कारवां घड़घड़ाता हुआ
तेजी से निकल जाता है…
इस कविता के दो भागों में दो बिल्कुल अलग अलग दृश्यों का चित्रण है. सुबह के दृश्य में घर के अंदर एक मां का अपने शिशु को स्तनपान कराना, एक पति का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम का उमड़ना कुछ सहज मानवीय क्रियाएं हैं. उनसे जुड़ी भावनाएं जैसे ममत्व और प्रेम भी उतने ही सहज और मानवीय.
एक दांपत्य जीवन के सुख और शांति का प्रतीक. पर ठीक उसके विपरीत है शाम का दृश्य जिसमें सैनिक सौन्या को घर से गिरफ्तार कर जीप में बिठाकर ले जाते हैं, बिलखती हुई अनुष्का को घर में अकेली छोड़कर. इससे पता चलता है कि वैसेंका का गणतंत्र कितना निर्मम है. अपने नागरिकों की खुशियों को रौंदने में उसे कोई हिचक नहीं है.
एक साक्षात्कार में एक प्रश्न के सिलसिले में इल्या बताते हैं कि संकट के समय में भी लोग प्रेम करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं, बुजुर्ग माता-पिता का ख्याल रखते हैं इत्यादि-इत्यादि. हिंसा और आतंक के माहौल में प्रेम, वात्सल्य जैसी क्रियाएं निलंबित नहीं होती हैं. ऐसा नहीं है कि लोग प्रेम शुरू करने के लिए हिंसा के बंद होने का इंतजार करेंगे. दुख और सुख दोनों साथ साथ चलते हैं. उन दोनों को हम अलग नहीं कर सकते.
बहरहाल कहानी में आगे सौन्या को मुख्य चौक पर गोलियों से भून दिया जाता है. इसके बाद एलफौंसो का भी यही हस्र होता है. उनकी बेटी, अनुष्का, को सैनिक लेकर चले जाते हैं. और इसी के साथ काव्यसंग्रह के पहले खंड की समाप्ति होती है.
दूसरे खंड में विद्रोह की बागडोर थियेटर की मालकिन मौमा गल्या के हाथों में आ जाती है. वो सैनिकों को रिझाकर, उनसे यौन संबंध बनाकर उनसे नजदीकी रिश्ता स्थापित करती है. फिर एक दिन सैनिकों को झांसा देकर सौन्या और एलफौंसो की बेटी अनुष्का को उनके चंगुल से छुड़ा ले जाती है और अपने घर में उसका पूरा ख्याल रखती है.
दूसरी ओर विद्रोह का नेतृत्व करते हुए थियेटर की अपनी सहकर्मियों की मदद से एक-एक करके कई सैनिकों की हत्या करवाती है और थियेटर के पिछवाड़े में उन्हें दफनवा देती है. इन दोनों जिम्मेवारियों को मौमा गल्या बखूबी निभाती है.
कुछ समय बाद सैनिकों को इस बात का पता चल जाता है और गल्या समेत सभी थियेटर कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है. इस घटना के होने तक वैसेंका शहर के लोग थक चुके थे. डर भी गए थे. उन्होंने सैनिक सरकार की सत्ता को स्वीकार कर लिया था.
विरोध करना छोड़ दिया था. अचरज की बात ये है कि उसके बाद कई लोग मामा गौल्या से घृणा करने लगे. गल्या और उसके विरोध के दर्दनाक अंत के साथ ही काव्यसंग्रह का दूसरा खंड समाप्त होता है. दूसरे खंड की अंतिम कविता, फिर भी, रातों में कभी कभी, की शुरुआती पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं:
हमारे देश ने हथियार डाल दिए
सालों बाद, कुछ लोग कहेंगे कि
ऐसा कुछ नहीं हुआ था
दुकान खुले थे
हम खुश थे और
पार्क में हम कठपुतलियों का नृत्य देखते थे
पर फिर भी, रातों को कभी कभी
नगरवासी घरों की बत्तियों कम कर
अपने बच्चों को संकेत की भाषा सिखाएंगे…
डेफ रिपब्लिक की पहली कविता, युद्ध के दौरान हम खुशी पूर्वक जी रहे थे, एक प्रस्तावना के तौर पर वर्तमान काल में शुरू होती है. इसका कथावाचक भूतकाल में हुए एक युद्ध, उससे जुड़ी हिंसा और उसके खिलाफ हुए अपर्याप्त विरोध को अफसोस के साथ याद करता है.
काव्यसंग्रह के दोनों खंडों में एक काल्पनिक लोक में हुए उसी युद्ध की कहानी को कवि कविताओं के माध्यम से एक दृष्टांत की तरह पेश करते हैं. काव्यसंग्रह की अंतिम कविता, शांति के समय में, इसका उपसंहार है और यह देश और दुनिया में प्रचलित गणतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ी हिंसा पर एक गहरा प्रहार है. पहली और आखिरी दोनों कविताओं में विडंबना और कटाक्ष को इल्या ने बखूबी इस्तेमाल किया है.
अंतिम कविता, शांति के समय में, की अंतिम पंक्तियां आजकल यूक्रेन में हो रहे युद्ध के संदर्भ में काफी उपयुक्त हैं. इसमें तीखे कटाक्ष का प्रयोग पाठकों को झकझोरता है. कवि का संदेश बिल्कुल साफ और स्पष्ट है:
ये शांति, अमन-चैन का समय है
मैं गोलियों की आवाज नहीं सुनता
मैं तो सुनता हूं आवाज चिड़ियों के चहचहाने की
उपनगरों के पिछवाड़े में
कितना साफ है आसमान
कितना साफ है आसमान(माफ करें) कितना साफ
(अरुण जी लेखक, अनुवादक व शिक्षक हैं.)
