एक समय था जब हिंदी सिनेमा में भोजपुरी सिनेमा की मौजूदगी किसी अनोखी लोक-कला के तौर पर नहीं, बल्कि उसके नैतिक और सांस्कृतिक पहलू के एक महत्वपूर्ण व खुशनुमा हिस्से के तौर पर हुआ करती थी.
आज़ादी के बाद के दशकों में हिंदी फिल्मों ने भोजपुरी गानों, बोलियों, लोक-मुहावरों और कलात्मक प्रदर्शनों की परंपराओं को खुलकर अपनाया. ये चीज़ें महज़ सजावट के लिए नहीं थीं, बल्कि इनमें वे विरह-स्मृतियां व यादें, पलायन, सामाजिक तथा आर्थिक यथार्थ की झलकियां थीं. बॉम्बे सिनेमा को इनकी जरूरत बड़े शहरों से परे एक ‘भारत’ की कल्पना करने के लिए होती थी.
गंगा-जमुना (1961), तीसरी कसम (1966) और बाद में नदिया के पार (1982) जैसी फिल्मों में भोजपुरी का इस्तेमाल सिर्फ़ पिछड़ेपन को दिखाने या गांव की एक आदर्श तस्वीर पेश करने के लिए नहीं किया गया था बल्कि इन फिल्मों की दुनिया ग्रामीण भाषा, बिरहा, फगुआ और चैता जैसे लोक संगीत, नौटंकी और लौंडा-नाच जैसी प्रदर्शन कलाओं और गांव की ज़िंदगी के जज़्बाती माहौल में रची-बसी थी.
सिनेमा और ओटीटी की दुनिया
पिछले दशक में ओटीटी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के बढ़ने से सिनेमा और दर्शकों के बीच का रिश्ता बदल गया है. हाल के हिंदी सिनेमा में भोजपुरी एक पूरी दुनिया के बजाय अक्सर एक ‘पल’ – जैसे कोई गाना, हुक लाइन, डांस नंबर या वायरल बीट – के तौर पर दिखाई देती है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (2012) से लेकर ‘स्त्री 2‘ (2024), नेटफ्लिक्स पर ‘मां बहन’ (2026) और ‘वेलकम टू द जंगल’ (2026) तक का सफ़र दिखाता है कि कैसे भोजपुरी अंदाज़ वाला संगीत उर्जा, ह्यूमर और ‘देसीपन’ पर आधारित एक व्यावसायिक ज़रिया बन गया है.
इस सफ़र में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर‘ ने एक अहम मोड़ लाया, और यह सिर्फ़ किसी चीज़ को अपना लेने (एप्रोप्रियेशन) का मामला नहीं था. ‘जिया हो बिहार के लाला’ और ‘ओ वुमनिया‘ जैसे गानों में भोजपुरी धुन वाले संगीत का इस्तेमाल सिर्फ़ सतही दिखावे के लिए नहीं, बल्कि उस सामाजिक माहौल को दिखाने के लिए किया गया था जिसमें फिल्म की कहानी बुनी गई है. इस लिहाज़ से फिल्म का संगीत उसकी सांस्कृतिक बनावट से अलग नहीं किया जा सकता.
फिर भी, फिल्म की कामयाबी ने बड़े हिंदी फिल्म जगत को यह दिखाया कि भोजपुरी रंग वाले संगीत को उसके क्षेत्रीय दर्शकों के दायरे से कहीं आगे भी पसंद किया जा सकता है.
अश्लीलता पर बहस
भोजपुरी गानों में अश्लीलता को लेकर एक पुरानी लेकिन ज़्यादा अहम बहस अब और तेज़ हो गई है, क्योंकि ये गाने अब ज़्यादा लोगों तक पहुंच रहे हैं. यह आरोप न तो मनगढ़ंत है और न ही किसी एक तरह के लोगों की तरफ से लगाया गया है. फरवरी 2026 में, बिहार पुलिस ने अश्लील और ‘दोहरे अर्थ वाले’ गानों के ख़िलाफ़ पूरे राज्य में एक अभियान शुरू किया. पुलिस ने इन गानों के फैलने को एक सामाजिक समस्या बताया, जिसका असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है.
यहां, मैं ‘अश्लीलता’ को एक ऐसी विवादास्पद नैतिक राय के तौर पर परिभाषित करता हूं जिसमें यौनिकता पर आधारित उत्तेजक बोल, दोहरे अर्थ वाले शब्द और महिलाओं के कुछ खास तरह के चित्रण सामने आते हैं. हालांकि, यह भोजपुरी भाषा का अपना कोई स्वाभाविक गुण नहीं है. इसका इस्तेमाल संदर्भ, श्रोताओं और विभिन्न वर्गों के अनुसार अलग-अलग होता है.
भोजपुरी पॉपुलर संगीत के ख़िलाफ़ हर आपत्ति को सिर्फ़ ‘वर्ग-आधारित पूर्वाग्रह’ (क्लास प्रेजुडिस) कहकर खारिज कर देना सही नहीं होगा; इस शैली में ऐसे गाने भी बने हैं जो महिलाओं को सिर्फ़ भोग की वस्तु के तौर पर दिखाते हैं और आक्रामक मर्दवाद को बढ़ावा देते हैं. लेकिन यहां यह सवाल ज़रूर उठाया जाना चाहिए कि क्यों ये आरोप अक्सर कुछ विशेष गानों से बढ़कर पूरी भोजपुरी संस्कृति पर लगने लगता है?
इसका एक संभावित जवाब यह है कि इन गानों को सुनता कौन है. जब बिहार, पूर्वी यूपी, दिल्ली की प्रवासी बस्तियों या खाड़ी देशों में काम करने वाले मज़दूर वर्ग के लोग इस तरह के संगीत को सुनते हैं, तो इसे ‘सस्ता’ या ‘अश्लील’ कहा जाता है. इसी तरह के संगीत को जब बॉलीवुड कोरियोग्राफ करता है, कोई स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म प्रमोट करता है और लोग इसे मल्टीप्लेक्स या बड़े शहरों की पार्टियों में सुनते हैं, तो इसे ‘खाटी’, ‘देशी’ या ‘लोकगीत की ऊर्जा’ (फोक एनर्जी) कहकर सराहा जाता है.
संभवत: कंटेंट एक जैसा न हो, लेकिन सांस्कृतिक मान्यता के मामले में जो अंतर है, उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. भोजपुरी मीडिया लंबे समय से आम लोगों और दूसरे राज्यों से आकर बसे दर्शकों से जुड़ा रहा है, इसलिए इसके सांस्कृतिक महत्व के बारे में किसी भी राय के बनाए जाने को, इसे देखने-सुनने वाले लोगों के बारे में राय बनाए जाने से अलग नहीं किया जा सकता.
बॉलीवुड का ‘भोजपुरीकरण’
फिल्म ‘स्त्री 2’ का गाना ‘आई नहीं‘ (जिसे पवन सिंह ने सचिन-जिगर के साथ गाया है.) और ‘वेलकम टू द जंगल’ का गाना ‘घिस घिस घिस‘ (जिसे विक्रम मोंट्रोस और सुप्रिया पाठक ने गाया है.) बॉलीवुड के उस ‘भोजपुरीकरण’ का उदाहरण हैं, जिसकी मैं बात कर रहा हूं: यानी भोजपुरी के बड़े स्टार्स और उनकी परफॉर्मेंस के अंदाज़ को मुख्यधारा के हिंदी फिल्मी संगीत में शामिल करना, जिससे एक क्षेत्रीय शैली पूरे भारत में पसंद की जाने वाली फिल्मी चीज़ बन जाती है.
नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘मां बहन’ ने भी ‘कारी कारी‘ गाने के साथ यही तरीका अपनाया; इस गाने को फिल्म के सिग्नेचर ट्रैक के तौर पर प्रमोट किया गया और यह दर्शकों की बड़ी संख्या के बीच हिट रहा.
यह सफलता अचानक नहीं मिली है. यह भोजपुरी संगीत की पहले से मौजूद लोकप्रियता का फ़ायदा उठाती है और साथ ही बॉलीवुड के प्रोडक्शन सिस्टम के ज़रिए इसे ‘बेहतर’ या ‘साफ़-सुथरा’ बनाती है; इसमें बोली में चुनिंदा बदलाव, म्यूज़िक और कंपोज़िशन में फेरबदल, और कोरियोग्राफ़ी व विज़ुअल प्रेजेंटेशन में सुधार किया जाता है ताकि इसे बड़े शहरों और पूरे देश के दर्शकों के लिए पसंद करने लायक और सम्मानजनक बनाया जा सके.
इस तरह, भोजपुरी-स्टाइल वाला संगीत सिर्फ़ एक क्षेत्रीय पहचान से कहीं ज़्यादा बन गया है; यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बड़ी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है, जिसे ओटीटी ने और तेज़ कर दिया है. फिल्म की विधा (जॉनर) चाहे जो भी हो, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भोजपुरी-धुन वाला गाना जोड़ने से फिल्म को सोशल मीडिया और यूट्यूब पर नई ज़िंदगी मिल सकती है.
प्रचार-प्रसार या सांस्कृतिक चोरी?
मेरा तर्क यह नहीं है कि भोजपुरी संगीत को सिर्फ़ भोजपुरी सिनेमा तक ही सीमित रहना चाहिए. कोई भी लोक या संगीत परंपरा हमेशा के लिए किसी एक क्षेत्र की नहीं होती, बल्कि लोकप्रिय संस्कृति प्रसार के ज़रिए ही जीवित रहती है. असली सवाल यह है कि क्या इस प्रसार का ‘हथियाने’ (एप्रोप्रिएशन) की हद तक पहुंच जाना ठीक है?
जब हिंदी सिनेमा भोजपुरी को अपनाता है, लेकिन उसे पैदा करने वाले लोगों, उनके इतिहास और मेहनत से कोई जुड़ाव नहीं रखता, तो नतीजा ‘सांस्कृतिक दोहन’ (कल्चरल एक्सट्रैक्शन) होता है. भोजपुरी का स्वागत एक लय या धुन के तौर पर तो होता है, लेकिन एक भाषा के तौर पर नहीं; इसे अश्लील मनोरंजन कह दिया जाता है और इसे सामाजिक कलात्मक प्रतिष्ठा नहीं दी जाती.
विडंबना यह है कि भोजपुरी संगीत हमेशा से आधुनिक और सुरीला रहा है, जो पलायन, ऑर्केस्ट्रा परफॉर्मेंस और दूसरे देशों में काम करने वाले मज़दूरों के रास्तों से होकर आगे बढ़ा है. बॉलीवुड ने भोजपुरी को खोजा नहीं, बल्कि उसे यह पता चला कि भोजपुरी के दर्शक पहले से ही मौजूद थे. जो चीज़ बदली है, वह संगीत की लोकप्रियता नहीं, बल्कि उसे सुनने-देखने के नज़रिए और उसके सम्मान का स्तर है.
इसलिए चुनौती भोजपुरी संगीत को ‘साफ़-सुथरा’ बनाने की नहीं है; ऐसा करने से वही ‘नैतिक पहरेदारी’ दोहराई जाएगी जो लंबे समय से क्षेत्रीय लोकप्रिय संस्कृतियों के साथ जुड़ी रही है. असली चुनौती यह समझने की है कि जब हिंदी सिनेमा को किसी हिट गाने की ज़रूरत होती है, तो उसे सबसे पहले भोजपुरी की ही याद क्यों आती है.
अगर भोजपुरी फिल्मों में ट्रेंड बन सकती है, तो यह कहानियों, किरदारों, इतिहास और टकरावों को भी दिखा सकती है. यह सिर्फ़ तीन मिनट के इस्तेमाल से कहीं ज़्यादा की हक़दार है. इसे उस सिनेमाई और कलात्मक गंभीरता की ज़रूरत है जो कभी इसमें हुआ करती थी.
हिंदी सिनेमा के लिए असली परीक्षा यह नहीं है कि वह एक भोजपुरी गाना शामिल कर सकता है या नहीं; बल्कि यह है कि क्या वह भोजपुरी को सिर्फ़ कमर्शियल सफलता के फ़ॉर्मूले के तौर पर नहीं, बल्कि एक संस्कृति के तौर पर स्वीकार कर सकता है?
(लेखक: विद्यासागर शर्मा जर्मनी की बीलेफेल्ड यूनिवर्सिटी के सोशियोलॉजी फ़ैकल्टी में सोशल एंथ्रोपोलॉजी के डॉक्टोरल रिसर्चर हैं.)
(अनुवादक: शिशु रंजन एक चीवनिंग स्कॉलर हैं, जिन्होंने बर्कबेक यूनिवर्सिटी लंदन और जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई की है. यज्ञेश और वंशज ने हिंदी संपादन में सहयोग किया है.)
(मूल लेख अंग्रेज़ी में प्रकाशित किया गया था, जिसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
