सावन की चोरी: हिंदू धर्म के हिंदुत्वीकरण की परियोजना में सावन एक पड़ाव है

भाजपा सरकारें श्रावण मास का स्वागत पूरे-पूरे पृष्ठों के विज्ञापनों के माध्यम से करती हैं. मानो अब आसमान के रंग से नहीं, इन्हीं विज्ञापनों से लोगों को सावन के आने की सूचना मिलेगी. कभी कृष्ण ने कहा था, उठो, पार्थ, गांडीव संभालो! अब सरकारें कहती हैं, श्रावण आ गया है. हे हिंदुओ, जागो, कांवड़ उठाओ.

बिहार भाजपा द्वारा जारी एक विज्ञापन. (स्क्रीनग्रैब साभार: X@bjp4bihar)

सावन के महीने की आमद है. कोई वक्त था जब सावन सिर्फ़ सावन हुआ करता था. तब बागों में झूले पड़ जाते थे. कजरी और मल्हार की तानें सुनाई देती थीं. सावन का रंग तब हरा हुआ करता था. प्रकृति हरी चुनरी ओढ़ लेती थी, उसका परिधान हरित हो जाता था. सावन का मतलब था राहत. किसानों के लिए सावन सावन ही है, आज भी वे सावन ही बोलते हैं. और सबसे अधिक धार्मिक भी वही हैं हिंदू समाज में.

आज भी बारिश और सूखे से उनका रिश्ता किसी दूसरे से कहीं ज़्यादा है. हर मास महत्त्वपूर्ण है किसी न किसी तरह लेकिन सावन का तो विशेषकर इंतज़ार रहता है उन्हें. सावन आने पर क्या करना होता है, क्या किसानों को बतलाने की ज़रूरत होती है? उन्हें मालूम है कि धान, मक्के, ज्वार, अरहर, उड़द, कपास, आदि फसलों के लिए सावन का क्या मतलब है. उनके पर्व त्योहार भी इसी माह में पड़ते हैं. तीज है, नागपंचमी है.

किंतु हम अब भारतीय काल चेतना के साथ जी रहे हैं, सो आधिकारिक भाषा में श्रावण मास का शुभारंभ हो रहा है. बिना विशेषणों के हम बात नहीं करते इसलिए श्रावण के पहले पावन, पवित्र, शुभ, आदि का प्रयोग करना होता है. इसका उच्चारण अब साधारण जन नहीं कर सकते. सावन चुरा लिया गया है.

यह भी कह सकते हैं कि सावन का अपहरण कर लिया गया है. अपहरण किया है भारतीय जनता पार्टी ने. पिछले 12-13 सालों में सावन का पूरी तरह राजकीय हिंदुत्वकरण कर दिया गया है. भारतीय जनता पार्टी की सरकारें पावन श्रावण मास का स्वागत पूरे-पूरे पृष्ठों के विज्ञापनों के माध्यम से करती हैं. मानो अब आसमान के रंग से नहीं, इन्हीं विज्ञापनों से लोगों को सावन के आने की सूचना मिलेगी.

एक दिन विज्ञापन देकर सरकारें चुप नहीं बैठ जातीं. बार-बार लोगों को याद दिलाती रहती हैं कि सावन आ गया है. इतना ही नहीं, वे बतलाती हैं कि श्रावण मास में हिंदुओं का मुख्य कर्तव्य क्या है. कभी कृष्ण ने कहा था, उठो, पार्थ, गांडीव संभालो! अब सरकारें कहती हैं, श्रावण आ गया है. हे हिंदुओ, जागो, कांवड़ उठाओ.

बिहार को ही ले लीजिए. बिहार के हिंदी अखबारों में 28 जुलाई को श्रावणी मेले के उद्घाटन समारोह का एक पूरे पेज का विज्ञापन बिहार सरकार और बिहार सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से छापा गया है. बिहार सरकार के सभी विज्ञापन आजकल भगवा रंग में आते हैं और यह भी उसी रंग में रंगा था हालांकि पदों के नाम को हरी पृष्ठभूमि में सफेद रंग से लिखा गया था.

विज्ञापन के सबसे ऊपर जहां श्रावणी मेला लिखा गया है वहां बायीं तरफ भगवा तिकोना ध्वज और डमरू के साथ त्रिशूल है, तो बीच में शिव जी के हाथ में त्रिशूल है. इस उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी थे जबकि दो अति विशिष्ट अतिथियों में जनता दल यूनाइटेड से संबंध रखने वाले दो उपमुख्यमंत्रियों विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव शामिल थे. इनके अलावा भी बिहार सरकार के कई मंत्री और बिहार के विधायक इस कार्यक्रम में मौजूद थे.

बिहार सरकार का एक विज्ञापन.

इसी 15 जुलाई को बिहार सरकार ने श्रावणी मेला के प्रचार प्रसार के लिए ‘आकर्षक पुरस्कार’ योजना का विज्ञापन भी दिया है. श्रावणी मेले में पुरस्कार देने की योजना पर्यटन विभाग की ओर से आई है.

इसमें कहा गया कि ‘श्रावणी मेला 2026 के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन अनुभवों को अपने कमरे और रचनात्मकता के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाएं और जीतें आकर्षक पुरस्कार.’ इसके तहत पहला पुरस्कार तीन लाख, दूसरा दो लाख और तीसरा एक लाख रुपये का है. इसके अलावा दो प्रतिभागियों के लिए पचास हजार रुपये का चौथा पुरस्कार और पांच के लिए सांत्वना में पच्चीस हजार रुपये प्रति प्रतिभागी पुरस्कार की घोषणा की गई है.

इस साल 28 जुलाई के श्रावणी मेले के विज्ञापन कुछ समझने के लिए हमने पिछले साल के विज्ञापन को तलाश तो उसमें इससे काफी छोटा विज्ञापन मिला. इसमें उद्घाटन के बारे में कोई सूचना नहीं थी बस यह बताया गया था कि 11 जुलाई से 9 अगस्त के बीच श्रावणी मेले में भक्तों की सुविधा के लिए क्या कुछ व्यवस्था की गई है.

इसमें ऊपर यह लिखा गया है, ‘भक्तों की सुविधा पर ध्यान कांवड़ यात्रा अब हुई आसान.’ उसके ठीक नीचे श्रावणी मेला लिखा गया है जिसमें एक त्रिशूल और एक डमरू है. इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं. इसके बाद यह बताया गया है कि बिहार पर्यटन द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा और कांवड़ यात्रा को सुगम बनाने के लिए यात्रा मार्ग में विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं. इसमें रैन बसेरा, टेंट सिटी, चिकित्सा शिविर, कैफेटेरिया, शुद्ध पेयजल, पंखा, कूलर, पर्यटक सहायता केंद्र, कांवड़ स्टैंड सीसीटीवी, शौचालय और 24×7 हेल्पलाइन नंबर की बात की गई है. इस विज्ञापन में एक तरफ नीतीश कुमार हैं तो दूसरी तरफ कुछ कांवड़ यात्रियों को दिखाया गया है.

पिछले साल के सावन के सरकारी स्वागत और इस बार के सरकारी स्वागत में अंतर इसलिए आया है कि पिछली बार थी तो एनडीए की ही सरकार लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे. इस बार मुख्यमंत्री भाजपा के हैं. पिछली बार के विज्ञापन में शिव के हाथ में त्रिशूल न था. इस बार थमा दिया गया है. भाजपा की सेवा में राम को तीर धनुष और शिव को त्रिशूल लिए तैनात रहना है.

सावन के महीने में शिव डमरूधारी हुआ करते थे. भोले बाबा अब भोले नहीं रह गए, उनसे भोलापन छीना जा रहा है और अनेक भक्तों से भी. दोनों का सरकारीकरण किया जा रहा है.

पारंपरिक कांवड़ यात्री ख़ुद को बम कहते हैं. बम भोले की गुहार लगाते जल लिए बाबा धाम को जाते हैं. कुछ दौड़ते हुए, कुछ ज़मीन पर लोटते हुए, कुछ सुस्ता-सुस्ताकर. अब वे धार्मिक पर्यटक हो गए हैं. सरकार उनकी सेवा को तत्पर है. वे जो आध्यात्मिक श्रम कर रहे हैं, भाजपा उससे पुण्य लाभ करना चाहती है.

बिहार में तो फिर भी हिंदू केंद्र में हैं. उत्तर प्रदेश में ध्यान हिंदुओं से अधिक मुसलमानों पर है. मांस की दुकानें बंद की जा रही हैं. रास्ते के होटलों को चेतावनी दी रही है. जो एक जुमे के दिन एक घंटे के लिए सड़क पर सामूहिक नमाज़ को सार्वजनिक यातायात के लिए बाधा बतलाते हैं, वे अब रास्तों और राजमार्गों को सामान्य लोगों के लिए बंद कर रहे हैं. वे मात्र कांवड़ यात्रियों के लिए आरक्षित हैं.

सावन की चोरी हो गई है. त्रिलोक के स्वामी शंकर का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया है. हिंदू धर्म के हिंदुत्वकरण की परियोजना में सावन एक पड़ाव है.

(अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं. समी अहमद पत्रकार हैं.)