श्रीनगर: बिहार के रहने वाले राजमिस्त्री मोहम्मद आलम के लिए कश्मीर हमेशा उम्मीद की जगह रही है. बिहार और भारत के दूसरे हिस्सों से आए हज़ारों मज़दूरों की तरह, आलम भी काम के लिए कश्मीर आए थे. उन्हें उम्मीद थी कि यहां मिलने वाली मज़दूरी से उनके परिवार की ज़रूरतें पूरी हो पाएंगी. लेकिन हाल ही में हुए लक्षित हत्याओं (टारगेटेड किलिंग) के बाद उम्मीद की जगह डर ने ले ली है.
आलम ने ‘द वायर’ से कहा, ‘मैं अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहता, घर पर मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं. मैं बस वापस जाना चाहता हूं. मैं यहां घाटी में रोज़ी-रोटी कमाने आया था, लेकिन हाल की हत्याओं ने मुझे डरा दिया है.’
हालांकि, आलम अकेले नहीं हैं जिन्हें डर सता रहा है.
दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के किलाम गांव में एक ईंट भट्ठे पर दो प्रवासी मज़दूरों की हालिया हत्याओं ने पूरी घाटी में बाहरी मज़दूरों के बीच फिर से डर पैदा कर दिया है.
कई लोगों के लिए इन हमलों ने पुराने हमलों की यादें ताज़ा कर दी हैं, जबकि उन्हें लगने लगा था कि ऐसी हत्याओं का दौर गुज़र चुका है. यह डर सिर्फ़ निर्माण या ईंट भट्टों में काम करने वालों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सेब के बागों, बाज़ारों और छोटे-मोटे धंधों में लगे लोगों को भी लगता है कि माहौल अचानक बदल गया है.
पंजाब की रहने वाली माही, जो पिछले पांच सालों से श्रीनगर में चाबी के छल्ले (कीचेन) बेच रही हैं, उनके लिए यह ज़रूरी है कि अधिकारी उनके जैसे लोगों की सुरक्षा पक्की करें. उन्होंने कहा, ‘पहले प्रवासी मज़दूरों की हत्याओं के सिलसिले के बाद जो डर पैदा हुआ था, वह डर फिर से लौट आया है.’
किलाम हमले में मारे गए लोगों में छत्तीसगढ़ के शक्ति ज़िले के बुंदेली गांव के रहने वाले दीपक रात्रे भी शामिल थे. वह और पड़ोसी सारंगढ़-बिलाईगढ़ ज़िले के 28 वर्षीय भूपेंद्र भैना काम की तलाश में कश्मीर आए थे और एक ईंट भट्ठे पर काम कर रहे थे. रोज़ी-रोटी की तलाश में शुरू हुआ उनका सफ़र 31 जुलाई की रात एक दुखद अंत पर पहुंच गया, जब उग्रवादियों ने उन पर हमला किया और दोनों की जान ले ली.
श्रीनगर में गन्ने के रस की रेहड़ी लगाने वाले बिहार के प्रवासी संजीव ने ‘द वायर’ को बताया कि इस ताज़ा हमले ने उन लोगों को भी डरा दिया है जो बरसों से कश्मीर में काम कर रहे थे.
उन्होंने कहा, ‘मैं तीन साल से कश्मीर में काम कर रहा हूं, लेकिन पहली बार मुझे डर लग रहा है. बिहार में मेरे परिवार वाले मुझे वापस बुला रहे हैं और कह रहे हैं कि ज़िंदगी पैसे से ज़्यादा ज़रूरी है.’
मकान मालिकों को एहतियात बरतने के निर्देश
इस डर ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बदलना शुरू कर दिया है. कई प्रवासी मज़दूरों ने बताया कि पुलिस से निर्देश मिलने के बाद उनके मकान-मालिकों ने उन्हें शाम होने से पहले अपने किराए के घरों में लौटने की सलाह दी है.
पंजाब के रहने वाले बढ़ई दिलप्रीत ने बताया कि किलाम में हुई हत्याओं के बाद उनके मकान-मालिक ने उनसे दो दिनों तक काम पर न जाने की सलाह दी है. उन्होंने ‘द वायर’ से कहा, ‘मेरे मकान मालिक ने मुझे बताया कि पुलिस ने उनसे कहा है कि वे अपने उन किरायेदारों को, जो यहां के स्थानीय निवासी नहीं हैं, कम से कम दो दिन तक घर के अंदर ही रहने के लिए कहें. मैं पिछले दो दिनों से काम पर नहीं जा रहा हूं.’
दिलप्रीत के लिए घर के अंदर रहने की कीमत बहुत ज़्यादा है. उनके पिता घर पर गंभीर रूप से बीमार हैं और उन्हें महंगी दवाओं की ज़रूरत है, जिनका खर्च उनके काम से होने वाली कमाई से ही चलता है.
उन्होंने कहा, ‘अगर मैं काम पर नहीं जाऊंगा, तो कश्मीर में गुज़ारा नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मेरे पिता गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और उनकी दवाएं काफ़ी महंगी हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि काम मिलने और बेहतर मज़दूरी की वजह से उन्होंने हमेशा दूसरी जगहों के मुकाबले कश्मीर को ही प्राथमिकता दी है.
श्रीनगर में सजावटी सामान बेचने वाली तनु ने बताया कि उन्हें शुरू में हालिया हत्याओं के बारे में पता नहीं था. उन्होंने कहा, ‘मेरे मकान मालिक ने मुझे शाम छह बजे तक कमरे पर लौटने की सलाह दी. जब मैंने वजह पूछी, तो उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें हमें यह जानकारी देने के लिए कहा था.’
असल में बाहरी मज़दूरों को रहने की जगह देने वाले मकान मालिकों का कहना है कि हमलों के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उन्हें एहतियाती उपाय अपनाने की सलाह दी है.
बडगाम के रहने वाले गुलाम मोहम्मद, जो प्रवासी मज़दूरों को किराए पर कमरे देते हैं, ने बताया कि उन्हें स्थानीय थाने से एक फोन कॉल आया था जिसमें उन्हें अपनी इमारत में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए कहा गया था.
उन्होंने कहा कि पुलिस ने मकान मालिकों से अपनी इमारतों में रह रहे मज़दूरों की जानकारी देने को भी कहा है.
उन्होंने कहा, ‘जब 2021 में बाहरी लोगों की हत्या हुई थी, तब भी ऐसे ही निर्देश जारी किए गए थे. अब पुलिस ने हमसे उन नए किरायेदारों के आधार कार्ड जमा करने को कहा है जिनका अभी तक रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है.’
अधिकारियों ने सुरक्षा के कड़े इंतज़ामों के तहत घाटी के निवासियों से अपने किरायेदारों का नज़दीकी पुलिस स्टेशन में रजिस्ट्रेशन कराने की अपील भी की है.
सरकार की प्रतिक्रिया
हालिया हमले के बाद छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कहा कि पीड़ितों के परिवारों ने उन्हें बताया कि हमलावरों ने गोली चलाने से पहले मज़दूरों से लगभग 10 मिनट तक बातचीत की थी.
शर्मा ने कहा, ‘पीड़ितों के परिवार वालों ने मुझे बताया कि आतंकवादी आए, उनके साथ बैठे और गोली चलाने से पहले लगभग दस मिनट तक बातचीत की. यह एक कायरतापूर्ण हरकत है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘कोई कुछ भी सोचे, जम्मू-कश्मीर का हर इंच भारत का है, और भारतीय वहां जाते रहेंगे और वहां रहते रहेंगे.’
इस घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, हमलावर ने मज़दूरों से उनकी निजी जानकारी, वे कहां से आए थे और कितना कमाते थे, इस बारे में पूछा.
बताया जा रहा है कि हमलावर अपने हथियार एक बोरी में रखकर लाया था और उसने पीड़ितों पर गोली चलाने के लिए राइफल और पिस्तौल दोनों का इस्तेमाल किया. पुलिस अधिकारी ने आगे बताया कि हमलावर के भागने से पहले पीड़ितों की एक महिला रिश्तेदार ने उसका पीछा करने की कोशिश की थी.
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मारे गए दो मज़दूरों के परिवारों को मुख्यमंत्री राहत कोष से 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है.
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने सुरक्षा की समीक्षा के लिए एक उच्च-स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की और सभी डिप्टी कमिश्नरों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया कि वे जम्मू-कश्मीर के बाहर से आए मज़दूरों की सुरक्षा के लिए बनाए गए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) की व्यापक समीक्षा करें.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने प्रवासी मज़दूरों को तय सुरक्षा क्लस्टर में शिफ्ट करने का फैसला किया है. साथ ही संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाने, एरिया डोमिनेशन एक्सरसाइज़ और रात में गश्त करने का काम भी तेज़ किया जा रहा है.
यह फ़ैसला एलजी सिन्हा की अध्यक्षता में हुई एक हाई-लेवल सिक्योरिटी रिव्यू मीटिंग में लिया गया. बताया गया है कि सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके में कई ‘कॉर्डन-एंड-सर्च’ ऑपरेशन शुरू किए हैं, जबकि जांच के सिलसिले में आस-पास के गांवों के कई लोगों को हिरासत में लिया गया है, उनसे पूछताछ की गई है या उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया है.
इन हत्याओं का असर स्थानीय समुदायों पर भी पड़ा है.
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, किलाम के एक निवासी ने बताया कि हमले के बाद सुरक्षाकर्मी इलाके में आए थे.
उन्होंने कहा, ‘हमारी दुकानों में तोड़-फोड़ की गई और सुरक्षा बलों ने स्थानीय लोगों से कहा कि वे किराएदारों, खासकर बाहरी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोग किराएदारों को सुरक्षित नहीं रख सकते, तो उन्हें रहने की जगह न दें.’
ये हमले कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम समय पर हुए हैं.
घाटी भर में ईंट भट्टों में सैकड़ों प्रवासी मजदूर काम करते हैं, जबकि कई अन्य कश्मीर की सबसे बड़ी वार्षिक आर्थिक गतिविधियों में से एक, सेब की कटाई के मौसम के लिए आने लगे हैं. प्रवासी मजदूरों के बड़े पैमाने पर पलायन से निर्माण और बागवानी दोनों पर असर पड़ सकता है, ऐसे समय में जब श्रम की मांग चरम पर है.
‘आप कहते हैं कि आतंकवाद खत्म हो गया है. तो ये हत्यारे कौन हैं?’
इसी बीच, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने आतंकवाद के खत्म होने के सरकारी दावों पर सवाल उठाया.
अब्दुल्ला ने अनंतनाग में पत्रकारों से कहा, ‘मैं आपसे कह रहा हूं कि हमें बताएं कि ये हत्यारे कौन हैं. आप कहते हैं कि आतंकवाद खत्म हो गया है. तो फिर ये हत्यारे कौन हैं? उन्हें बेनकाब करें. हम देखेंगे, दुनिया देखेगी.’
किलाम में यह हमला 22 जुलाई को अनंतनाग में आतंकवादियों द्वारा जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक हेड कॉन्स्टेबल की गोली मारकर हत्या किए जाने के 10 दिन से भी कम समय में हुआ है. ये दोनों घटनाएं 3 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा के दौरान हुई हैं, जिससे घाटी में सुरक्षा हालात को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं.
फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने सरकार के सुरक्षा दावों पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने पूछा, ‘यहां लोगों की हत्या हो रही है और आप कहते हैं कि यह काम आतंकवादियों ने किया है. अगर बॉर्डर पूरी तरह से कंट्रोल में हैं, तो ये आतंकवादी कहां से आ रहे हैं? ये हत्यारे कौन हैं?’
ये ताज़ा हमले पहलगाम के बैसरन में 25 अप्रैल को हुए हमले के बाद लगभग एक साल की शांति के बाद हुए हैं; उस हमले में आतंकवादियों ने 25 पर्यटकों और एक स्थानीय पोनी ऑपरेटर की हत्या कर दी थी. पिछले महीने अनंतनाग में पुलिसकर्मी की हत्या के बाद पुलिस ने पूरी घाटी में 2,500 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया था.
मालूम हो कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के बड़े पैमाने पर सुरक्षा कार्रवाई के बीच लक्षित हमलों का सिलसिला जारी है. खबरों के मुताबिक, पिछले महीने एक पुलिसकर्मी की हत्या के बाद से लगभग 3,500 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें से ज़्यादातर युवा हैं.
हालांकि, दूसरे राज्यों से आए मज़दूरों के लिए आंकड़े, जांच और सुरक्षा समीक्षाओं से तुरंत कोई खास भरोसा नहीं मिलता है.
नोट: ‘द वायर’ ने पुलिस महानिदेशक नलिन प्रभात से संपर्क कर हालिया हमलों और कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा के लिए किए गए इंतज़ामों पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही. लेकिन, खबर छापे जाने तक उन्होंने कॉल या मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया. अगर कोई प्रतिक्रिया मिलती है, तो इस स्टोरी को अपडेट किया जाएगा.
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