भारतीय चुनावों में उपचुनाव प्रायः सत्ता नहीं बदलते. वे सरकार नहीं गिराते, संसद का गणित नहीं उलटते और अक्सर अगली सुबह राष्ट्रीय समाचारों के शोर में खो जाते हैं. लेकिन कभी-कभी कोई छोटी सीट राजनीतिक भूगर्भ में लगी उस सूक्ष्म मशीन की तरह काम करती है, जो धरती के नीचे सरकती चट्टानों की सूचना सतह पर खड़े साम्राज्यों से पहले दर्ज कर लेती है.
बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर सीटों के परिणाम ऐसे ही संकेत हैं. भाजपा ने गुजरात की मांजलपुर सीट बचा ली, लेकिन बांकीपुर और दतिया में उसके डबल इंजन राजनीतिक ढलान पर फिसल गए. खासकर बांकीपुर में यह सामान्य पराजय नहीं है. यह उस डबल इंजिन का अपने ही होम स्टेशन पर पटरी से उतरना है, जिसके एक इंजन पर केंद्र की सत्ता लिखा है और दूसरे पर बिहार की.
अभी हाल ही कॉकरोच आंदोलन में शिक्षा मंत्री प्रधान का इस्तीफ़ा एक तरह से सत्ता की अभेद्य छवि का सार्वजनिक उपहास तो था ही, अब भाजपा को बांकीपुर में दूसरी गहरी चोट मिली है. पहली चोट ने सरकार को झुकाया था; दूसरी ने उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष का किला गिरा दिया. कॉकरोच आंदोलन का पहला घाव ग्रेन्युलेशन की अवस्था में ही था कि बांकीपुर में भाजपा को उसी नाज़ुक राजनीतिक तंत्रिका पर एक और गहरा पुनराघात लगा. यह तरह से अधभरे घाव पर हुआ ‘सुपरइम्पोज़्ड ट्रॉमा’ है.
बांकीपुर में जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले. उन्होंने भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से हराया. भाजपा प्रत्याशी को 44,827 वोट मिले, जबकि राजद की रेखा कुमारी मात्र 14,273 वोट लेकर बहुत दूर तीसरे स्थान पर चली गईं. इन संख्याओं को सिर्फ़ मतगणना की मेज पर रखकर देखने से परिणाम की वास्तविक तीव्रता समझ में नहीं आएगी. नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नबीन ने इसी सीट पर 98,299 वोट और लगभग 63 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे. उनकी जीत का अंतर 51,936 वोट था. नौ महीने से भी कम समय में भाजपा 51,936 वोटों की विजय से 19,324 वोटों की पराजय तक पहुंच गई. भाजपा का मत प्रतिशत भी 63 प्रतिशत से गिरकर करीब 34 प्रतिशत रह गया. राजनीति में कई बार हार सीट की होती है, कई बार प्रतिष्ठा की. बांकीपुर में भाजपा ने दोनों गंवाई हैं.
तीन दशक का दुर्ग, तीस दिन का घेरा
बांकीपुर का राजनीतिक इतिहास वस्तुतः पुराने पटना पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र की निरंतरता है. भाजपा यहां 1995 से जीतती आ रही थी. नितिन नबीन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने पटना पश्चिम से लगातार चार चुनाव जीते. पिता की मृत्यु के बाद 2006 के उपचुनाव में नितिन नबीन पहली बार विधायक बने. परिसीमन के बाद बने बांकीपुर से उन्होंने 2010, 2015, 2020 और 2025 के चुनाव जीते. इस प्रकार पिता चार बार और पुत्र पांच बार—एक ही परिवार ने इस राजनीतिक भूगोल पर नौ चुनावों तक अपना वर्चस्व बनाए रखा.
यह भाजपा का तीन दशक से अधिक समय का मज़बूत किला था. भारतीय राजनीति में, जहां मतदाता सरकारों और नायकों को बड़ी निर्ममता से बदलते रहे हैं, किसी शहरी सीट पर तीन दशकों से अधिक की निरंतरता साधारण बात नहीं होती.
लेकिन इस बार किले के बाहर सेना कम और भीतर भ्रम अधिक था.

भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया. उन्होंने नामांकन दाखिल किया, प्रदेश के नेता उनके लिए प्रचार करने पहुंचे और उन्हें नितिन नबीन की पसंद माना गया. फिर अचानक उम्मीदवार बदल दिया गया. अभिषेक ने ‘पारिवारिक कारण’ बताए; लेकिन उनके माता-पिता की चारा घोटाले में सजा तथा आंतरिक गुटबाजी की चर्चाएं अभियान पर छा गईं. इसके बाद मंडल स्तर के कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा गया.
जिस स्टेशन पर दशकों से भाजपा की गाड़ी बिना रुके गुजरती थी, वहीं चुनाव से पहले उसका सिग्नल तंत्र गड़बड़ा गया. पहले इंजन लगाया गया, फिर हटाया गया; ड्राइवर बदला गया; पॉइंट अंतिम क्षण में पलटा गया और संगठन से कहा गया कि वही इंजन अब पहले से अधिक गति से दौड़ेगा. लेकिन मतदाता प्लेटफॉर्म पर खड़ा सब देख रहा था.
भाजपा ने इसे हल्का चुनाव नहीं माना था. बिहार के 60 से अधिक विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को प्रचार में लगाया गया. नितिन नबीन एक सप्ताह से अधिक समय तक क्षेत्र में डेरा डाले रहे. पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अपील प्रसारित की गई और समूचे एनडीए संगठन ने सीट बचाने के लिए अपनी शक्ति झोंक दी. फिर भी पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की राजनीतिक जन्मभूमि नहीं बचा सकी.
इसलिए ‘डबल इंजन’ का रूपक यहां भाजपा पर पहले से अधिक कठोर होकर लौटता है. केंद्र में भाजपा, बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की पुरानी सीट और सत्ता-संगठन के सारे डिब्बे जुड़े होने के बावजूद डबल इंजन मंजिल तक नहीं पहुंचा. दुर्घटना किसी दूरस्थ शाखा लाइन पर नहीं, मुख्यालय के अपने यार्ड में और राष्ट्रीय अध्यक्ष की अपनी पटरी पर हुई, जहां कुछ समय पहले वे ख़ुद अपराजेय रूप में खड़े थे.
प्रशांत किशोर का मतदाता-प्रयोग
यह परिणाम प्रशांत किशोर के लिए केवल विधानसभा में प्रवेश नहीं है. यह उस व्यक्ति का राजनीतिक पुनर्जन्म है, जिसकी पार्टी नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में 238 सीटें लड़कर एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. जन सुराज को केवल 3.44 प्रतिशत वोट मिले थे और दर्जनों सीटों पर उसके प्रत्याशी नोटा से भी पीछे रह गए थे.
उस पराजय के बाद यह मान लेना सुविधाजनक था कि प्रशांत किशोर एक कुशल चुनाव प्रबंधक तो हो सकते हैं; लेकिन स्वयं चुनावी नायक नहीं. बांकीपुर ने इस निष्कर्ष में छेद कर दिया है.
उन्होंने इस चुनाव को जातीय जोड़-घटाव से अधिक शिक्षा, रोज़गार, पलायन, शहरी प्रशासन और बिहार के नेतृत्व के प्रश्न से जोड़ा. बांकीपुर सरकारी कर्मचारियों, मध्यवर्गीय परिवारों, पुराने पटना के प्रतिष्ठित मोहल्लों और परंपरागत भाजपा समर्थक उच्च जातीय समूहों वाली सीट है. यहां जीतने का अर्थ केवल विरोधी दलों के वोट बटोरना नहीं, भाजपा के सुरक्षित सामाजिक खाते में सेंध लगाना है.
इस जीत ने प्रशांत किशोर को रातो-रात बिहार का निर्विवाद विकल्प नहीं बना दिया है. एक शहरी उपचुनाव में निजी प्रतिष्ठा, संसाधन और उम्मीदवार की दृश्यता पूरे राज्य की लंबी सामाजिक राजनीति का विकल्प नहीं होते. फिर भी उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक दरवाजा खोल दिया है—भाजपा को उसके सबसे सुरक्षित और संरक्षित किले में भी हराना अब इतना मुश्किल नहीं है, बशर्ते राजद और जनसुराज के बीच थोड़ी सी भी सहमति हो जाए.
बिहार के इस उपचुनाव के राजनीतिक विश्लेषक चाहे कुछ भी कहें; लेकिन विधानसभा चुनाव 2025 में राजद के 46,363 वोटों में से इस उपचुनाव में 32090 वोटों का कम हो जाना और जनसुराज के 2025 के 7,717 वोटों का 56,434 वोट बढ़कर 64,151 हो जाना साफ़ बताता है कि बिहार में प्रतिपक्ष अगर थोड़ा सा भी आम सहमति और सियासी सहिष्णुता के साथ काम करे तो भाजपा के लिए सियासी दुनिया का सियाह-पोश होने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा. लेकिन छोटे-छोटे स्वार्थाें में बंटे प्रतिपक्ष के दिल में इस उपचुनाव जैसी कंदील पता नहीं कब रोशन होगी.
कुछ राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि बिहार में दशकों से चला आ रहा एनडीए और लालू-तेजस्वी धुरी का द्वंद्व पहली बार किसी प्रतिष्ठित शहरी सीट पर किसी तीसरे खिलाड़ी ने तोड़ा है. इसलिए बांकीपुर भाजपा के लिए जितनी बड़ी हार है, राजद के लिए उतना ही बड़ा राजनीतिक विस्थापन भी है. लेकिन राजद के प्रमुख नेता का इस उपचुनाव से दूरी बना लेना ही इस चुनाव परिणाम की एक अंतर्कथा है. इसी का परिणाम था कि चुनाव भाजपा बनाम राजद बनाम जसुपा नहीं रहा; भाजपा बनाम प्रशांत किशोर बन गया और भाजपा की राहें मुश्किल होती चली गईं.
भाजपा के सियासी सीने में वोटों के विभाजन की लाखों आरजुएं मचलती हैं. लेकिन बिहार के इस उपचुनाव में तेजस्वी ने परे रहकर बड़े सियासी सितम की राह तैयार कर दी. तेजस्वी यादव यहां मोर्चा क्यों नहीं ले रहे, इस तरह की इल्तिजाएं बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट् चौधरी खेमे की तड़पती आंखों में साफ़ देखी जा सकती थीं.
कॉकरोच आंदोलन के बाद एक और चोट
यह परिणाम ऐसे समय आया है, जब परीक्षा-पेपर लीक, भर्ती संकट, बेरोज़गारी और शिक्षा व्यवस्था की अव्यवस्था से उद्वेलित जेन-ज़ी ने कॉकरोच जनता पार्टी जैसे व्यंग्यात्मक मंच को एक प्रभावशाली आंदोलन में बदल दिया. जुलाई में हजारों युवाओं के प्रदर्शनों, संसद मार्च और पुलिस कार्रवाई के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. यह मोदी सरकार का एक दुर्लभ राजनीतिक समझौता था, जो आंदोलन के साथ किया गया. बांकीपुर का वह युवा वोटर भी भाजपा की सरकार और उसके संगठन के उग्र समर्थकों के रुख से नाराज़ हुआ है, जिसने जेन-ज़ी आंदोलन के बाद युवाओं को परेशान करने की कोशिश की. जुलाई के प्रदर्शनों में शिक्षा और रोजगार पहली बार जाति, धर्म तथा क्षेत्र की सीमाओं को पार करती साझा पीड़ा बनते दिखे थे और उसकी एक झलक भी इन नतीजों पर पड़ी है.
यह कहना जल्दबाजी होगी कि कॉकरोच आंदोलन का वोट सीधे प्रशांत किशोर के खाते में चला गया. लेकिन राजनीति केवल प्रत्यक्ष संगठनात्मक हस्तांतरण से नहीं बदलती; कभी-कभी एक आंदोलन समाज की भाषा बदल देता है. वह ऐसे प्रश्नों को वैध बना देता है, जिन्हें सत्ता लंबे समय से शोर, राष्ट्रवाद या प्रचार के नीचे दबाती रही हो.
प्रशांत किशोर का शिक्षा, रोजगार और पलायन-केंद्रित संदेश उसी नई भाषा से संवाद करता था. इस अर्थ में बांकीपुर कॉकरोच जनता पार्टी का चुनावी विस्तार नहीं; लेकिन उसके हाथों खोली गई बेचैनी की खिड़की से आया राजनीतिक हवा का एक ताजा़ झोंका अवश्य है.
दतिया: टिकट का केंद्रीकरण और कार्यकर्ता का प्रतिशोध
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 66,757 वोट लेकर भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया. भाजपा को 60,741 वोट मिले, जबकि आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव 22,527 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे. मतदान 71.44 प्रतिशत था. दतिया कांग्रेस की सीट थी, इसलिए परिणाम को बांकीपुर जैसा किला ढहना नहीं कहा जा सकता. फिर भी मध्यप्रदेश में भारी बहुमत वाली भाजपा सरकार और उसके विशाल संगठन के लिए इसे सामान्य पराजय मानना कठिन होगा.

पार्टी ने छह बार के विधायक और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया. उनके समर्थकों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया, पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए और राजमार्ग अवरुद्ध करने के दौरान हिंसक टकराव भी हुआ. भाजपा ने स्थानीय गुटों से अपेक्षाकृत दूर आरएसएस पृष्ठभूमि के संगठनकर्ता आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया; लेकिन उम्मीदवार बदलने से जातीय गणित तो संभवतः सुरक्षित रहा, संगठनात्मक रसायन टूट गया.
बांकीपुर और दतिया के बीच यही साझा सियासी धागा है: दोनों जगह भाजपा ने टिकट वितरण में अपने कार्यकर्ताओं और स्थानीय सत्ता-संरचनाओं को असमंजस में डाला. एक स्थान पर घोषित उम्मीदवार हटाया गया; दूसरे पर वापसी की तैयारी कर रहे बड़े नेता को रोका गया. दोनों जगह नेतृत्व ने समझा कि पार्टी का चुनाव-चिह्न किसी भी उम्मीदवार और किसी भी आंतरिक विद्रोह को पार लगा देगा. दोनों जगह मतदाता ने इस विश्वास को गलत सिद्ध किया.
गुजरात: विजय, जिसकी चमक घट गई
गुजरात की मांजलपुर सीट भाजपा ने बचा ली. उसके उम्मीदवार सतीश पटेल ने कांग्रेस के भीखा रबारी को 30,630 वोटों से हराया. पटेल को 55,481 और रबारी को 24,851 वोट मिले. लेकिन 2022 में दिवंगत भाजपा विधायक योगेश पटेल की जीत का अंतर 1,00,754 वोट था. इस बार मतदान भी 60.15 प्रतिशत से गिरकर लगभग 37.5 प्रतिशत रह गया और भाजपा-कांग्रेस के बीच मत-प्रतिशत का अंतर करीब 72 अंकों से घटकर 38.14 अंक हुआ. अर्थात् गुजरात में इंजन पटरी पर रहा; लेकिन उसकी गति और यात्री दोनों घट गए हैं. यह पराजय नहीं, पर इस परिणाम ने भाजपा की सियासी हसरतों के बगीचे में बेचैनियां पैदा कर दी हैं.
सत्ता की मशीन से आ रही आवाज
कुल मिलाकर, इन तीन उपचुनावों से राष्ट्रीय भविष्यवाणी करना राजनीतिक अतिशयोक्ति होगी. भाजपा अभी भी देश की सबसे शक्तिशाली, सर्वाधिक संसाधन-संपन्न और तेज़ी से सीखने वाली चुनावी मशीन है. एक बांकीपुर या एक दतिया उसके राष्ट्रीय आधार के विघटन का प्रमाण नहीं है. लेकिन चुनावी मशीनें अचानक बंद नहीं होतीं. पहले उनमें असामान्य कंपन पैदा होता है. फिर सिग्नल देर से पकड़ में आते हैं. चालक को लगता है कि पटरी सीधी है, जबकि नीचे की पटरियां फैल चुकी होती हैं.
बांकीपुर का संदेश यह नहीं कि भाजपा समाप्त हो रही है. संदेश यह है कि उसकी विजय अब स्वचालित नहीं रही. परंपरागत शहरी मतदाता, शिक्षित मध्यवर्ग और युवा नागरिक पार्टी को स्थायी पट्टा देकर नहीं बैठे हैं. दतिया कहता है कि केंद्रीकृत टिकट व्यवस्था स्थानीय कार्यकर्ता का विकल्प नहीं हो सकती. मांजलपुर बताता है कि सीट बच जाना हमेशा जनाधार की पूर्ण सलामती का प्रमाण नहीं होता.
और बांकीपुर सबसे कठोर वाक्य लिखता है: जिस डबल इंजन को देश भर की पटरियों पर अजेय बताया गया, वह अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्टेशन पर आते-आते इतना आत्मविश्वासी हो गया कि उसने लाल सिग्नल को भी स्वागत की रोशनी समझ लिया. यह भाजपा के विजय रथ के रोक का संकेत नहीं; लेकिन उसकी स्वचालित विजय के मिथक का अंत अवश्य है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
