नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दतिया ज़िले की पूरी संगठनात्मक इकाई को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में अपनी सबसे अहम राजनीतिक हार में से एक का सामना करने के 24 घंटे से भी कम समय बाद भाजपा की मध्य प्रदेश इकाई ने मंगलवार (4 अगस्त) को दतिया की पूरी ज़िला संगठनात्मक इकाई भंग कर दी. विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के भीतर शुरू हुए व्यापक आत्ममंथन के बीच यह बड़ा कदम उठाया गया है.
भाजपा के राज्य कार्यालय सचिव श्याम महाजन द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के निर्देश और दतिया उपचुनाव के नतीजों की समीक्षा के लिए गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर ज़िले के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाता है.
आदेश के तहत ज़िला अध्यक्ष, ज़िला पदाधिकारी, ज़िला कार्यकारिणी, मंडल समितियां, मोर्चे, प्रकोष्ठ, परियोजनाएं, विभाग और संगठन की अन्य सभी इकाइयों को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है.
इस फैसले से पहले मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने सरकारी आवास पर एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की. बैठक में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, मंत्री, वरिष्ठ पदाधिकारी और दतिया उपचुनाव के प्रचार अभियान से जुड़े नेता शामिल हुए.
अख़बार ने पार्टी सूत्रों के हवाले से बताया है कि बैठक में 6,016 वोटों से मिली हार के कारणों, गुटबाज़ी के आरोपों, संगठन की कार्यप्रणाली और स्थानीय नेताओं द्वारा कथित तौर पर पार्टी विरोधी गतिविधियों पर चर्चा हुई.
सूत्रों का कहना है कि समीक्षा के बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है. दतिया ज़िला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा समेत कई पदाधिकारियों के खिलाफ मिली शिकायतों को एकत्र कर केंद्रीय नेतृत्व को भेजा जाएगा.
आंतरिक रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि एक दर्जन से अधिक भाजपा पार्षदों ने चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ काम किया. इस मामले में भी अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है.
उल्लेखनीय है कि यह कार्रवाई कांग्रेस द्वारा दतिया विधानसभा सीट बरकरार रखने के एक दिन बाद की गई है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता घनश्याम सिंह ने भाजपा के नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 6,016 मतों से हराया. यह चुनाव दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था.
मालूम हो कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत खंडेलवाल के लिए यह पहला चुनावी इम्तिहान था. इस सीट पर इसलिए भी सबकी नजर थी क्योंकि भाजपा ने छह बार के विधायक और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था.
उम्मीदवार बदलने के फैसले के बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने खुलकर विरोध किया. सड़क जाम, इस्तीफों और पुलिस से झड़प जैसी घटनाओं के कारण चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी को लगातार डैमेज कंट्रोल करना पड़ा.
हालांकि, बाद में नरोत्तम मिश्रा ने भाजपा उम्मीदवार के समर्थन में जोरदार प्रचार किया, लेकिन पार्टी उस सीट को बचाने में नाकाम रही, जिसे लंबे समय तक उनका राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है.
मंगलवार के फैसले से पहले हेमंत खंडेलवाल ने कहा था कि भाजपा उपचुनाव परिणामों की व्यापक समीक्षा करेगी और अनुशासनहीनता तथा संगठनात्मक कमियों से जुड़ी शिकायतों की जांच कराएगी. पूरी ज़िला इकाई को भंग करना इसी समीक्षा प्रक्रिया के तहत की गई पहली बड़ी संगठनात्मक कार्रवाई माना जा रहा है. इससे संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व इस हार को केवल उम्मीदवार की हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक विफलता के रूप में देख रहा है.
यह कदम इस बात का भी संकेत है कि भाजपा दतिया उपचुनाव को कितना महत्वपूर्ण मान रही थी. मुख्यमंत्री मोहन यादव, कई मंत्री और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी चुनाव प्रचार में सक्रिय रहे थे. ऐसे में विधानसभा में स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद इस सीट पर मिली हार ने सत्तारूढ़ दल के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी.
गौरतलब है कि बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनावों के नतीजे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कई कारणों से बड़ा राजनीतिक झटका माने जा रहे हैं.
इन चुनाव में भाजपा के ‘अजेय’ होने की धारणा को झटका लगा है – जिन सीटों को पार्टी सुरक्षित मानती थी, वहां हार ने उसके राजनीतिक प्रभुत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इसके अलावा इसे युवाओं की नाराज़गी का असर भी माना जा रहा है – परीक्षा घोटालों, बेरोज़गारी और छात्र आंदोलनों से उपजा असंतोष अब मतदान में दिखाई देने लगा है.
दतिया में पार्टी का संगठनात्मक संकट भी नज़र आया. यहां भाजपा की हार को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि अंदरूनी गुटबाज़ी और उम्मीदवार चयन से जुड़े असंतोष का परिणाम बताया जा रहा है.
इसके साथ ही इन चुनाव परिणामों का असर पीएम मोदी की राजनीतिक छवि पर भी पड़ता नज़र आ रहा है. हाल की घटनाओं ने प्रधानमंत्री की मज़बूत नेतृत्व वाली छवि को चुनौती दी है और विपक्ष को नया राजनीतिक नैरेटिव मिला है.
यह चुनाव विपक्ष के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त का काम कर सकते हैं – इन परिणामों से विपक्षी दलों का मनोबल बढ़ने और भाजपा की चुनावी अजेयता की धारणा कमजोर होने की बात कही जा रही है.
ऐसे में माना जा रहा है कि यह उपचुनाव भले ही सीमित सीटों पर हुए हों, लेकिन यह आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए व्यापक राजनीतिक संदेश देते हैं.
