आसाराम को मिली 20 दिन की पैरोल, कोर्ट ने कहा- सरकार ने अर्ज़ी ख़ारिज करने की ठोस वजह नहीं दी

बलात्कार दोषी आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से 20 दिनों की नियमित पैरोल मिल गई है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार पैरोल आवेदन ख़ारिज करने का कोई ठोस और वैध आधार बताने में विफल रही है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की पॉक्सो सज़ा पर रोक लगाने और ज़मानत देने से इनकार कर दिया था.

आसाराम. (फाइल फोटो साभार: पीटीआई)

नई दिल्ली: राजस्थान हाईकोर्ट ने बलात्कार के दो मामलों में सज़ा काट रहे स्वयंभू बाबा आसाराम को 20 दिनों की नियमित पैरोल देने का आदेश देते हुए कहा कि राज्य सरकार पैरोल आवेदन खारिज करने का कोई ठोस और वैध आधार बताने में विफल रही है.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, हाईकोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को कहा कि राज्य सरकार आसाराम की पैरोल अर्जी खारिज करने के अपने फैसले को उचित ठहराने में विफल रही है. अदालत ने यह भी कहा कि पहले मिली अंतरिम रिहाई के दौरान आसाराम का आचरण संतोषजनक रहा था और वे 13 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल सामान्य या अस्पष्ट आपत्तियां पैरोल से इनकार करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. यदि किसी दोषी की पैरोल याचिका खारिज की जाती है, तो उसके लिए स्पष्ट और ठोस कारण होना आवश्यक है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने सोमवार को यह आदेश दिया. अदालत ने आसाराम को उनकी नियमित पैरोल देते हुए 50,000 रुपये के निजी मुचलके और 25,000-25,000 रुपये की दो जमानतें जमा करने के बाद 20 दिनों के लिए रिहा करने का निर्देश दिया है.

अदालत ने अच्छे आचरण का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद आसाराम 13 वर्ष, एक महीना और 24 दिन जेल में बिता चुके हैं.

पीठ ने यह भी गौर किया कि उन्हें पहले कई बार अंतरिम जमानत मिली थी और उस दौरान उन्होंने किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया. उनके खिलाफ फरार होने की कोशिश, गवाहों को प्रभावित करने या कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करने का भी कोई रिकॉर्ड नहीं है.

राज्य सरकार ने किया विरोध

राज्य सरकार ने पैरोल का विरोध करते हुए दलील दी कि रिहा होने पर आसाराम के फरार होने की आशंका है. सरकार ने यह भी कहा कि राजस्थान के बाहर उनके खिलाफ अन्य आपराधिक मामले लंबित हैं और गुजरात में भी उन्हें दोषी ठहराया जा चुका है.

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि उनका इलाज चल रहा है, उन्हें पैरोल के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट घोषित नहीं किया गया है और उनकी रिहाई से पीड़िता के परिवार की सुरक्षा को खतरा हो सकता है.

हाईकोर्ट ने राज्य की आपत्तियां खारिज कीं

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार की यह आशंका कि आसाराम फरार हो सकते हैं या किसी तरह का खतरा पैदा कर सकते हैं, केवल अटकलों पर आधारित है. इसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आसाराम की पैरोल अर्जी पर फैसला ‘राजस्थान प्रिजनर्स रिलीज ऑन पैरोल रूल्स’ के तहत किया जाना चाहिए. दूसरे राज्यों में लंबित मामलों या अन्य मामलों में हुई सजा को इस मामले में पैरोल देने से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

मालूम हो कि 27 मई को राजस्थान हाईकोर्ट ने 2013 के नाबालिग से बलात्कार मामले में आसाराम की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था.

मेडिकल आधार पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 30 जून को स्वयंभू बाबा आसाराम की सज़ा पर रोक लगाने या इस स्तर पर उन्हें ज़मानत देने पर विचार करने से इनकार कर दिया था.

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि एम्स के मेडिकल पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उन्हें चौबीसों घंटे चिकित्सकीय निगरानी और सहायता की जरूरत है.

अब जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त के लिए तय की है.

दोनों मामलों में उम्रकैद की सजा

गौरतलब है कि आसाराम बलात्कार के दो मामलों में दोषी है और 31 अगस्त 2013 से जेल में है. उस पर पॉस्को कानून और अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप हैं.

जनवरी 2023 में गांधीनगर की सेशंस कोर्ट ने आसाराम को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने पाया था कि उन्होंने 2001 से 2006 के बीच अपने मोटेरा आश्रम में 16 वर्षीय लड़की के साथ कई बार बलात्कार किया. उसे भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था, जिनमें बलात्कार, अप्राकृतिक अपराध, गलत तरीके से बंदी बनाना, धमकाना, हमला करना या किसी को रोकने के लिए बल प्रयोग करना और छेड़छाड़ शामिल हैं.

इसके साथ ही गांधीनगर की एक अदालत ने आसाराम के खिलाफ 2013 में दर्ज एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उस पर अहमदाबाद के पास मोटेरा स्थित अपने आश्रम में 2001 से 2006 के बीच सूरत की रहने वाली एक महिला अनुयायी का कई बार यौन उत्पीड़न करने का आरोप है.

उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 376 2 (सी) (बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध), 342 (गलत तरीके से हिरासत में रखना), 354 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 357 (किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंधक बनाने के प्रयास में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया गया था.

गौरतलब है कि दोषसिद्धि से पहले आसाराम एक प्रमुख धार्मिक नेता माने जाते थे. उसने 1970 के दशक में अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे अपना पहला आश्रम बनाया था और बाद में करोड़ों रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया.